NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे
कारपोरेट-फासीवादी आक्रामकता के कैसे ख़ौफ़नाक दौर में हम  फंसे हैं, यह किसान-आंदोलन के स्थगन के 15 दिन के अंदर के घटनाक्रम से ही साफ हो गया है।
लाल बहादुर सिंह
01 Jan 2022
kisan andolan

किसान-आंदोलन ने 2021 को प्रतिरोध, विजय और उम्मीद का साल बनाया। साल का आखिरी महीना आते-आते, सरकार को किसानों से समझौता करना पड़ा और विजयी किसान अपने घरों को वापस लौटे।

देश को उम्मीद थी कि किसान-आन्दोलन ने 2020 से  विरासत में मिले  विभाजनकारी एजेंडा को पीछे धकेलकर आपसी भाईचारे, लोकतांत्रिकता और राष्ट्रीय एकता का जो माहौल बनाया है, वह आगे बढ़ेगा तथा मोदी सरकार किसानों से किये गये commitment पर कायम रहेगी और उसकी कारपोरेटपरस्ती पर आंशिक ही सही  लगाम लगेगी।

पर, कारपोरेट-फासीवादी आक्रामकता के कैसे खौफ़नाक दौर में हम  फंसे हैं, यह किसान-आंदोलन के स्थगन के 15 दिन के अंदर के घटनाक्रम से ही साफ हो गया है।

दिल्ली, हरिद्वार से लेकर रायपुर तक जिस तरह धर्म-संसद के नाम पर खुलेआम अल्पसंख्यकों के जनसंहार का आह्वान करते हुए जहर उगला जा रहा है, राष्ट्रपिता गांधी को गालियां दी जा रही हैं, देश के पूर्व प्रधानमंत्री को गोली मारने की बात की जा रही है, उससे लोग दंग रह गये हैं।

भले ही यह आसन्न चुनावों में ध्रुवीकरण के उद्देश्य से प्रेरित है, पर यह साफ है कि फ़ासिस्ट हिन्दुराष्ट्र की परियोजना के तहत देश को कदम-ब-कदम गृह-युद्ध की ओर धकेला जा रहा है। सबसे चिंताजनक यह है कि खुले आम कानून, संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, पर सत्ता-शीर्ष पर आपराधिक सन्नाटा है। देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री मौन हैं। यह तय है, दंगाइयों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि उन्हें सत्ता संरक्षण प्राप्त है।

एक बार फिर बेहद शिद्दत से लोगों को किसान-आंदोलन की याद आने लगी है और यह साबित हो रहा है कि केवल और केवल सड़कों पर लगातार लड़ती जनता ही कारपोरेट-साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के रथ को रोके रख सकती है। यह  साफ है कि समाज में जब भी लोकतान्त्रिक आंदोलन retreat में होंगे, उस vacuum में सांप्रदायिक फ़ासिस्ट एजेंडा हाबी हो जायेगा।

सत्ता पर काबिज ऐसे अनैतिक गिरोह से देश का पाला पड़ा है, जो केवल और केवल जनप्रतिरोध की भाषा समझता है ; जिसके लिए जनता के हित, उससे अपने commitment , अपने ही किये वायदे, किसी चीज का कोई अर्थ नहीं है, जो अपनी ही जनता पर पलट कर वार करने के लिए बस मौके के इंतज़ार में बैठा रहता है, इसे देखकर लोग हतप्रभ हैं।

किसानों के साथ सरकार के समझौते और किसानों को घर लौटे अभी 10 दिन भी नहीं बीते थे कि कृषिमंत्री ने बेहद अहंकार के साथ घोषणा कर दिया कि हम एक कदम ही पीछे हटे हैं, फिर आगे बढ़ेंगे! तोमर के इस बयान पर, जो बिना मोदी-शाह से हरी झंडी के वे बोल ही नहीं सकते थे, लोग चकित हैं। 

संयुक्त किसान मोर्चा ने कृषि मंत्री के बयान का मुंहतोड़ जवाब देते हुये कहा है कि – “कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर का यह बयान घमंड से भरा हुआ है। पर अगर भाजपा सरकार को लगता है कि वह एक कदम पीछे लेकर आगे लंबी छलांग लगाएगी तो यह उसका कोरा वहम है। किसान व किसान संगठन MSP समेत सभी मुद्दों पर एकजुट हैं और इस सरकार का घमंड तोड़ने के लिए हर समय तैयार हैं।”

किसान नेता राकेश टिकैत ने चेतावनी दी "  किसान कहीं गए नहीं है, बस 4 महीने की छुट्टी पर हैं। हमारा आंदोलन खत्म नहीं, सिर्फ स्थगित हुआ है।"

मोदी-शाह ने यह बयान तो सम्भवतः कारपोरेट लॉबी को आश्वस्त करने, अपने demoralised समर्थकों को उत्साहित करने, किसानों से सरकार के हार जाने का जो  perception बना था, उसे बदलने के लिए दिलवाया है, पर इससे सरकार का इरादा तो एक बार फिर बिल्कुल साफ हो ही गया है। किसानों की MSP की मांग तो अभी अटकी ही है, कृषि कानूनों की पुनर्वापसी का खतरा भी मौजूद है।

किसान-आंदोलन पार्ट-2 की भूमिका तैयार हो रही है। जाहिर है, इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए किसान-संगठनों की एकजुटता हर हाल में बनी रहे, आज यह सबसे जरूरी है।

पर इस बीच कुछ ऐसे developments हो रहे हैं, जो चिंताजनक हैं।

हाल ही में  पंजाब के कुछ किसान-संगठनों ने चुनाव में उतरने का फैसला किया है और किसान-आंदोलन के वरिष्ठ नेता बलबीर सिंह राजेवाल को अपना चेहरा घोषित किया है,  किसान नेता चढूनी ने भी चुनाव लड़ने का एलान किया है। हालांकि पंजाब के सभी बड़े किसान-संगठन तथा संयुक्त किसान मोर्चा के प्रमुख नेता जोगिंदर उगराहां, डॉ. दर्शन पाल, जगजीत सिंह दल्लेवाल  इस चुनावी पहल से अलग हैं।

बेहतर होता कि संयुक्त किसान मोर्चा सामूहिक रूप से एकल इकाई के बतौर चुनाव पर अपना stand तय करता।

किसान-आंदोलन अपने मुद्दों पर लड़ता हुआ गैर-चुनावी pressure-ग्रुप बना रहेगा अथवा भविष्य में कारपोरेटपरस्त फ़ासिस्ट  राजनीति के खिलाफ किसान-प्रश्न, लोकतन्त्र और देश बचाने तथा राष्ट्रीय नवनिर्माण के कार्यक्रम के आधार पर, एक किसान-आधारित राजनैतिक दल के रूप में भी evolve होगा, ( और अगर ऐसा होता है तो इसका सही समय क्या होगा, ) यह  भविष्य के गर्भ में है और इसका फैसला किसान नेता करेंगे।

पर यह जरूर लगता है कि कुछ किसान संगठनों ने अलग से पंजाब में चुनाव  में उतरने का जो फैसला लिया है, विभिन्न कारणों से वह premature था।

वैसे तो संयुक्त किसान मोर्चा के अनेक शीर्ष नेता चुनाव लड़ते रहे हैं,  पर वे जिन राजनीतिक दलों से जुड़े थे उस प्लेटफार्म से चुनाव लड़ते थे। 

बहरहाल जिन संगठनों के नेता अभी चुनाव लड़ रहे हैं, उन्हें निश्चय ही किसानी-लोकतन्त्र व देश बचाने के कार्यक्रम और सुस्पष्ट भाजपा विरोधी दिशा के साथ ही ऐसा करना चाहिए। तभी वे अपने ऐतिहासिक आंदोलन की भावना के साथ न्याय कर पाएंगे, अपनी किसान-हितैषी छवि को अक्षुण्ण रख पाएंगे और भविष्य में यही दिशा किसान-आंदोलन और उनके बीच सेतु बनाएगी।

संयुक्त किसान मोर्चा ने उचित ही यह साफ कर दिया है कि, " कुछ किसान संगठनों द्वारा "संयुक्त समाज मोर्चा" के नाम से पंजाब के विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेने की घोषणा का संयुक्त किसान मोर्चा से कोई संबंध नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा की यह नीति है कि हमारे नाम और मंच का इस्तेमाल किसी राजनीतिक दल द्वारा नहीं किया जाएगा। संयुक्त किसान मोर्चा के नाम का चुनाव में इस्तेमाल करना मोर्चे के अनुशासन का उल्लंघन होगा। "

संयुक्त किसान मोर्चा की 15 जनवरी को होने जा रही राष्ट्रीय बैठक के सामने चुनौतियां बढ़ गयी हैं।

हमारा देश आज जिस असाधारण संकट के भंवर में फंसा है, उससे उबारने में किसान आंदोलन की भूमिका अद्वितीय रही है , आने वाले दिनों में इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने की उम्मीद भी किसानों पर टिकी हुई है। कारपोरेट-फ़ासिस्ट आक्रामकता की विनाशलीला का perfect antidote किसान ही हैं, यह एक साल से ऊपर चले किसान-आंदोलन ने और आंदोलन स्थगित होते ही तेजी से बदलते माहौल ने साबित कर दिया है।

आज लोकतन्त्र और देश बचाने की राष्ट्रीय लड़ाई का नेतृत्व इतिहास ने उन्हीं के कंधों पर डाल दिया है। किसानों का हित और राष्ट्रीय जरूरत आज एकरूप हो गए हैं।

किसानों ने 2021 में अकूत बलिदान देकर अपनी चट्टानी एकता, अजेय प्रतिरोध और शुरुआती कामयाबी से जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे देश की सभी लोकतंत्रिक ताक़तों को साथ लेकर इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे। इसकी पहली परीक्षा आगामी विधानसभा चुनावों में होगी, जहां किसान-विरोधी भाजपा की हार सुनिश्चित करनी होगी।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

kisan andolan
farmers protest
Farm Laws
Agriculture Laws
democracy

Related Stories

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

पत्रकारिता एवं जन-आंदोलनों के पक्ष में विकीलीक्स का अतुलनीय योगदान 

किसानों को आंदोलन और राजनीति दोनों को साधना होगा

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल


बाकी खबरें

  • law
    विक्रम हेगडे
    भारतीय अंग्रेज़ी, क़ानूनी अंग्रेज़ी और क़ानूनी भारतीय अंग्रेज़ी
    19 Nov 2021
    न्यायिक फ़ैसलों और दूसरे क़ानूनी दस्तावेज़ों में साहित्यिक श्रेष्ठता का होना ज़रूरी नहीं है।
  • education
    प्रियंका ईश्वरी
    बिहार के बाद बंगाल के स्कूली बच्चों में सबसे ज़्यादा डिजिटल विभाजन : एएसईआर सर्वे
    19 Nov 2021
    एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट 2021 की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, स्कूली बच्चों के घरों में कम से कम एक स्मार्टफ़ोन होने के मामले में केरल(97.5%), हिमाचल प्रदेश(95.6%) और मणिपुर(92.9%) सबसे आगे हैं।
  • sc
    सोनिया यादव
    "पॉक्सो मामले में सबसे ज़रूरी यौन अपराध की मंशा, न कि ‘स्किन टू स्किन’ टच!"
    19 Nov 2021
    शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सेक्शुअल मंशा से छूना भी अपराध है। धारा 7 के तहत टच और फिजिकल कॉन्टैक्ट को “स्किन टू स्किन टच” तक सीमित करना न केवल संकीर्ण होगा, बल्कि प्रावधान की बेतुकी…
  • Farmer wins, hate is defeated
    न्यूज़क्लिक टीम
    जीत गया किसान, नफरत हार गई!
    19 Nov 2021
    पिछले एक साल से जिन 3 कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलन कर रहा है आज मोदी सरकार ने उसको ख़ारिज करने का फ़ैसला लिया है, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि जब तक मोदी सरकार…
  • doctor
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : गया ज़िले में 15 लाख से ज़्यादा की महिला आबादी पर केवल 24 महिला डॉक्टर
    19 Nov 2021
    बिहार में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ़ की भारी कमी है साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर का भी अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों की हालत तो बद से बदतर है। नीति आयोग की 2019 के हेल्थ इंडेक्स में 21 राज्यों की सूची में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License