NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
रिज़र्व बैंक द्वारा रेपो रेट में कटौती के मायने
जब सरकार आय बढ़ाने के उपाय करने की बजाय ब्याज दर में कमी करके सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था से निपटने की कोशिश कर रही हो तो इसका सीधा मतलब है कि वह बड़ी कंपनियों को लाभ पहुँचाने की कोशिश कर रही है। उनके कर्ज को कम कर रही है। कर्ज पर दिए जाने वाले ब्याज को कम कर रही है।
अजय कुमार
08 Oct 2019
RBI
image courtesy: ChiniMandi

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने बैंकों को छोटी अवधि में देने वाले कर्जों की दरों में फिर से कटौती की है। तकनीकी शब्दावली में कहा जाए तो रेपो रेट या पॉलिसी रेट में कटौती की है। आरबीआई ने अपनी मौद्रिक समीक्षा नीति की बैठक में रेपो दरों में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती करने की घोषणा की है। इस साल में आरबीआई द्वारा अपने रेपो रेट में यह लगातार पांचवीं बार की गयी कटौती है।  

अर्थव्यवस्था के नियम के तौर कहा जाए तो रिज़र्व बैंक को जब लगता है कि बाजार में पूंजी की कमी है। पूंजी की कमी वजह से अर्थव्यवस्था ढलान पर है तो वह पूंजी के प्रवाह को बढ़ाने का जुगाड़ करती है। उसमें एक जुगाड़ यह भी है कि रेपो दरों में कटौती की जाए ताकि बैंकों को सस्ते दर में कर्ज मिले और बैंक भी अपने ग्राहकों को सस्ते दर में कर्ज दे ताकि निवेश में बढ़ोतरी हो। मंद पड़े उद्योग-धंधों में तेजी आयी और अर्थव्यवस्था ठीक से चलता रहे।

लेकिन अर्थव्यवस्था में पूंजी के प्रसार को बढ़ाने का यह बहुत सारे तरीकों में से केवल एक तरीका मात्र है। इससे ऐसे मकसद पूरे नहीं होते कि मंद पड़ती अर्थव्यवस्था सही से पटरी पर आ जाए। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले बहुत सारे कारक होते है। और मंद पड़ती अर्थ व्यवस्था से निपटने के लिए उन सारे कारकों पर संतुलन बिठाना पड़ता है। खासकर उन कारकों से निपटना पड़ता है, जो मौजूदा समय में मंदी के लिए जिम्मेदार होते हैं।

यही वजह है कि आरबीआई द्वारा रेपो रेट में पांच बार कटौती करने के बाद भी स्थिति जस की तस है। पांच बार कटौती करने के बाद आरबीआई की रेपो दर फरवरी 2019 में 6.25 फीसदी से घटाकर अक्टूबर 2019 में 5.15 फीसदी कर दी गयी है। इस तरह से 110 बेसिस पॉइंट की कमी कर दी गयी। पिछले नौ सालों में रिज़र्व बैंक द्वारा रेपो दर में की गयी यह सबसे बड़ी कमी है। लेकिन इसका कुछ फायदा नहीं हुआ है।

इसका सबसे बड़ा सबूत आरबीआई द्वारा किया गया वित्त वर्ष 2019 -20 के लिए किया गया आकलन है। वित्त वर्ष की शुरुआत में आरबीआई ने आकलन किया था कि जीडीपी की दर 6.9 फीसदी तक हो सकती है। लेकिन अब आरबीआई का आकलन है कि यह 80 बेसिस पॉइंट कम हो सकता है। यह 6.1 फीसदी तक रह सकता है। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था अभी लम्बे समय तक मंद गति से चलती रहेगी। इसकी रफ्तार अभी बहुत धीमी है।

आरबीआई द्वारा उठाये गए इस कदम का मकसद यही है बैंकों का लोन का दर सस्ता हो, बाजार में पैसा आये और निवेश बढे। लेकिन इससे क्या ऐसा होगा ? साल भर से रिपोर्ट आ रही है कि बैंकों की स्थिति बहुत नाजुक है। डूबत ऋण (बैड लोन) बढ़ता जा रहा है। बचत दर पिछले बीस सालों में सबसे कम है। कारण है कि लोगों की आय नहीं बढ़ रही है और खर्चे उतने ही हैं जितना वह पहले किया करते थे।

सेंटर स्टैटिक्स ऑफिस के आंकड़ों के तहत  लोगों की प्रति व्यक्ति आय  की बढ़ोतरी दर साल 2018 में अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुकी थी। ग्रामीण क्षेत्रों मजदूरी दर पिछले तीन सालों में सबसे कम है। बेरोजगारी दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है। इन सबका मिला जुला प्रभाव है कि लोग बैंकों में कम डिपॉजिट यानी कम पैसा जमा कर रहे हैं।  

ऐसे में जब रेपो दर में कमी की जाती है। यानी पॉलिसी रेट में कमी की जाती है, तब बैंक कर्ज देने पर ब्याज को तो कम करते ही हैं, साथ ही साथ डिपॉजिट रेट या जमा दर भी कम करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बैंक की कमाई उनके द्वारा दिए जाने वाले लोन पर मिलने वाले ब्याज से ही होती है।  इसलिए जब लोन पर ब्याज की दर कम होती है तो डिपॉजिट दर भी कम होती है।

यानी लोगो द्वारा पैसा जमा करने पर बैंक द्वारा कम ब्याज दिया जाता है। ऐसे में जब पहले से ही बैंकों की बैलेंस शीट टूटी हुई है, बैंकों में कम डिपॉजिट हो रहा है, ऐसे में रेपो रेट में कमी के बाद डिपॉजिट रेट में भी कमी आएगी। और बैंकों में पूंजी का फ्लो कम होगा।  

इस मुद्दे पर आर्थिक पत्रकार अनिंदो चक्रवर्ती अपने यू ट्यूब चैनल पर कहते है कि हम कर्ज लेने के बारें में तब सोचते हैं , जब हमें यह अनुमान होता है  कि आने वाले दिनों में हमारी आय बढ़ेगी। लेकिन जब हम पर यह तलवार लटक रही हो कि आने वाले दिनों में  हमारी नौकरी भी छीन सकती है तो आम आदमी कर्ज लेना नहीं पसंद करता है।  

इसलिए ब्याज दर में होने वाली कमी से आम आदमी कर्ज लेगा और बाजार में डिमांड पैदा करेगा, ऐसा होना बहुत मुश्किल लगता है। जहां तक ब्याज दर कम होने पर अपना उद्योग धंधा बढ़ाने की बात है तो  यह भी तब किया जाता है जब मालिक को यह लगे कि उसका मुनाफा ब्याज दर से अधिक होगा।  यानी जब उसे पता हो उसे अपने धंधे से कर्ज पर दिए जाने वाले ब्याज से ज्यादा मुनाफा होगा।

मालिक ऐसा तभी सोचता है , जब उसे इसे बात का एहसास हो कि बाजार में उसके सामान की मांग है और मुनाफा होगा। इसलिए मांग की कमी होने की वजह से बैंक से कर्ज लेने की कोशिश कोई भी समझदार मालिक नहीं करेगा।

फिर यह सवाल उठता है कि ब्याज दरों में कमी का फायदा किसे होगा तो इसका जवाब यही है कि इसका फायदा बड़ी कंपनियों को होगा। जब सरकार आय बढ़ाने के उपाय करने की बजाय ब्याज दर में कमी करके सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था से निपटने की कोशिश कर रही हो तो इसका सीधा मतलब है कि वह बड़ी कंपनियों को लाभ पहुँचाने की कोशिश कर रही है। उनके कर्ज को कम कर रही है। कर्ज पर दिए जाने वाले ब्याज को कम कर रही है।

इस पर वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार अंशुमान तिवारी अपने ट्वीटर पर लिखते हैं  कि आम लोगों के कर्ज की किस्त घटे या नहीं लेकिन रेपो रेट कम होते ही कंपनियों के कर्ज पर ब्याज घट जाता है। पिछले महीनों में ब्याज दर में 1.35% की कमी और कॉरपोरेट टैक्स  में 1.50 लाख करोड़ रु. की रियायत से बड़े उद्योगों की झोली भर गई है। फिर भी आरबीआई को मंदी गहराने का डर है।  

इसे आसान शब्दों में ऐसे समझिये रेपो रेट कम होने पर बैंक द्वारा लिए गए कर्ज पर ब्याज दर भी कम होता है।  ऐसे में आम जनता को बैंक से लिए कर्ज पर ब्याज कम देना पड़ता है, लेकिन उसके कर्ज की राशि इतनी कम होती है कि उसे इस राहत का कम एहसास होता है।  लेकिन बड़ी कंपनियों के बारे में सोचिये जिनका बैंक से लिया गया कर्ज 1000 करोड़ रूपये का हैं ,उन्हें ब्याज दर कम होने पर आसानी से बड़ी राहत मिल जाती है।

इस तरह से सरकार जो भी कदम उठा रही है उसे वह यह सोच के उठा रही है कि बड़ी कंपनियों को फायदा हो। उनके पास अधिक से अधिक पूंजी रहे और वह निवेश करे। लेकिन मंदी के कारण बड़ी कंपनियों के यहां नहीं है।  

मंदी का असल कारण  आय में कमी , बचत दर में कमी , मांग में कमी जैसी समस्याएं हैं जो अर्थव्यवस्था के संरचनागत कमियों की वजह से पैदा हुई है। इसलिए सरकार अपनी प्राथमिकता में भले बड़ी कंपनियों को ला रही है फिर भी यह भरोसा पैदा नहीं होता कि मंदी से निपटने में यह सहायक साबित होंगे।

RBI
Reserve Bank of India
repo rate
RBI cuts repo rate
economic crises
indian economy
Finance minister Nirmala Sitharaman
BJP
Narendera Modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर
    30 Apr 2022
    मुज़फ़्फ़रपुर में सरकारी केंद्रों पर गेहूं ख़रीद शुरू हुए दस दिन होने को हैं लेकिन अब तक सिर्फ़ चार किसानों से ही उपज की ख़रीद हुई है। ऐसे में बिचौलिये किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे है।
  • श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 
    30 Apr 2022
    प्रदेश के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 22 अप्रैल 2022 को विधानसभा में घोषणा की कि ग्रामसभाओं की बैठक गणतंत्र दिवस, श्रम दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के अलावा, विश्व जल दिवस और स्थानीय शासन…
  • समीना खान
    लखनऊ: महंगाई और बेरोज़गारी से ईद का रंग फीका, बाज़ार में भीड़ लेकिन ख़रीदारी कम
    30 Apr 2022
    बेरोज़गारी से लोगों की आर्थिक स्थिति काफी कमज़ोर हुई है। ऐसे में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि ईद के मौक़े से कम से कम वे अपने बच्चों को कम कीमत का ही सही नया कपड़ा दिला सकें और खाने पीने की चीज़ ख़रीद…
  • अजय कुमार
    पाम ऑयल पर प्रतिबंध की वजह से महंगाई का बवंडर आने वाला है
    30 Apr 2022
    पाम ऑयल की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। मार्च 2021 में ब्रांडेड पाम ऑयल की क़ीमत 14 हजार इंडोनेशियन रुपये प्रति लीटर पाम ऑयल से क़ीमतें बढ़कर मार्च 2022 में 22 हजार रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गईं।
  • रौनक छाबड़ा
    LIC के कर्मचारी 4 मई को एलआईसी-आईपीओ के ख़िलाफ़ करेंगे विरोध प्रदर्शन, बंद रखेंगे 2 घंटे काम
    30 Apr 2022
    कर्मचारियों के संगठन ने एलआईसी के मूल्य को कम करने पर भी चिंता ज़ाहिर की। उनके मुताबिक़ यह एलआईसी के पॉलिसी धारकों और देश के नागरिकों के भरोसे का गंभीर उल्लंघन है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License