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प्रवासी मज़दूर अपनी बदहाली की गठरी लादे आसमान से अवतरित नहीं हुए थे
COVID-19  जैसी विकराल महामारी और सरकार द्वारा उनकी बदहाली पर छोड़े जाने के बाद जब प्रवासी मज़दूर भूखे- प्यासे अंतहीन यात्राओं पर चल पड़े तब जाकर मुख्यधारा की कल्पना में इनकी पीड़ा जगह पा सकी।
उमेश यादव
14 Apr 2020
प्रवासी मज़दूर
Image courtesy: Apparel Resources

कोरोना माहमारी के मद्देनज़र देश भर में लागू हुए 21 दिन के लॉकडाउन को बढ़ा कर 3 मई तक कर दिया गया। इन 21 में लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा प्रभाव उन मज़दूरों पर पड़ा है जो रोज़ कमाते, रोज़ खाते हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा 21 दिनों के अकस्मात् लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के बाद ही शहरों से गाँवों की तरफ़ प्रवासी मज़दूरों की विशाल धारा चलायमान हो उठी थी। ट्रेन और बस सेवाओं के ठप होने के बाद भी अफ़वाहों के कारण इन मज़दूरों के बेचैन हजूम अपने गंतव्य की बस पकड़ने के लिए बस अड्डों पर इकट्ठा हो गए थे। बसों और ट्रेन सेवाओं की अनुपस्थिति की वजह से अपने सामान को सिरों पर लादे, नन्हे बच्चों को कमर पर टिकाए, इनमें  से बहुत से लोग हज़ारों किलोमीटर की असंभव प्रतीत होने वाली यात्राओं पर निकल पड़े। इन मज़दूरों की हृदयविदारक तस्वीरों को समाचार पत्रों ने प्रमुखता से छापा। चैनलों पर इनकी तस्वीरों और वीडियो ने खूब सहानुभूति बटोरी। सारा संसार अपनी बेफ़िक्री की नींद से उठकर इनकी पीड़ा के प्रति जाग गया।  मानो अपनी बदहाली की गठरी सिर पर लादे इन प्रवासी मज़दूरों का हुजूम अचानक ही आसमान से धरती पर अवतरित हो गया हो।

इन मज़दूरों के पैदल यात्रा करने पर मजबूर होने का कारण मज़दूरी करके गुजारा करने वाले करोड़ों लोगों के अस्तित्व को नकार कर लिया गया 21 दिनों के लॉकडाउन का फैसला था। सरकार की तरफ से भोजन और आय की उपलब्धता सुनिश्चित किए बिना लॉकडाउन किए जाने का सीधा सा मतलब है कि सिर्फ जिन लोगों के पास समुचित मात्रा में संचित क्रय शक्ति, यानी कि बचत राशि है,  उन्हीं लोगों के पास 21 दिनों तक घरों में रहकर गुजारा करने का साधन मौजूद है। 

जैसे-तैसे करके ज़िंदा रहने भर की कमाई करने वाले अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूरों, छोटे उत्पादकों और ग़रीबों को उनकी हालत पर छोड़ दिया गया है।  लॉकडाउन के दौरान लोगों की संचित क्रय शक्ति उनके ज़िंदा रहने की शर्त बन गई है। मनुष्य की ज़िंदगी की कीमत उसकी संचित क्रय शक्ति से लगाई जा रही है। सरकार द्वारा परित्यक्त कामगार वर्ग भुखमरी का कोपभाजन बनने के कगार पर खड़ा है। 

शहरों में मौजूद दो तरह की दुनिया

अनियोजित लॉकडाउन ने शहरों में मौजूद दो तरह की दुनिया के बीच के विरोधाभास को सतह पर ला दिया है। एक तरह की दुनिया, जो शहरों की कल्पना को सामान्य तौर पर परिभाषित करती है, वो हर तरह की सुविधाओं से लैस उच्च/ मध्यम वर्ग के रहने की जगह है ।  दूसरी तरह की दुनिया उन इलाकों में बसती है जहाँ पर शहर का निम्न वर्ग रहता है। ये साधारणतया उच्च /मध्यम के इलाकों की परिधि पर बसती है। यहाँ पर ग़रीब कामगार वर्ग, और खासकर प्रवासी मज़दूर रहते हैं।

इनको घेटो(ghetto) और झुग्गी बस्ती  के नामों से संबोधित किया जाता है। ये उच्च/ मध्यम वर्ग के रिहायशी इलाकों के साथ - साथ कारख़ानों और छोटे उद्योगों के लिए सस्ते श्रम के स्त्रोत हैं। कारख़ानों में इनको बहुत ही कम वेतन मिलता है , समाजिक सुरक्षा की सहूलियतें इनको नहीं मिलती हैं।  इनको शोषणकारी माहौल में काम करना पड़ता है। इनकी स्थिति उच्च/माध्यम वर्ग के इलाकों में भी कुछ ख़ास अलग नहीं है। यहाँ पर ये घरेलू मज़दूर , सुरक्षा कर्मी , माली और इस तरह के अनेकों काम करके अपनी श्रम शक्ति को सस्ते दामों पर बेचते  हैं । यहाँ पर भी इनका पुरजोर शोषण होता है।

सस्ती त्याज्य वस्तुओं के समान हो गए हैं प्रवासी मज़दूर

उनके पास 21 दिनों तक गुजारा करने के लिए ज़रूरी बचत राशि इसलिए नहीं थी क्योंकि उनको मिलने वाला मेहनताना इतना कम है कि बड़ी मुश्किल से उनका गुजारा हो पाता है। नवउदारवादी नीतियों के आक्रामक अनुपालन और इसके परिणामस्वरूप शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के बढ़ते निजीकरण ने इनकी आय में सेंध लगा रखी है। इनके पास मुश्किल वक़्त के लिए पैसे बचाने का सामर्थ्य ही नहीं है। 

पहले से ही कमज़ोर श्रम क़ानूनों को निष्प्रभावी बना देने के कारण मज़दूरों को मालिकों के रहमोकरम पर रहना पड़ता है। निवेश आकर्षित करने के लिए और उत्पादन की  लागत को कम करने की गला काट प्रतिस्पर्धा के कारण मज़दूरों को काफी कम वेतन दिया जाता है। मुनाफ़ा कमाने के लिए बलि हमेशा मज़दूरों की ही चढ़ाई जाता है। यह सिर्फ कारख़ानों तक ही सीमित नहीं है। उच्च / मध्यम वर्ग भी काफी कम मेहनताना देकर इन प्रवासी मज़दूरों के सस्ते श्रम का लाभ लेता है। मज़दूरों के शोषण को बढ़ावा देने वाली नीतियों का सीधा फायदा उच्च/ मध्यम वर्ग भी उठाता है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि संकट का कहर काफी पहले से छाया हुआ है।  कृषि और उससे जुड़ी हुई गतिविधियाँ एक सीमित क्षमता तक ही रोज़गार दे सकती हैं। इसकी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में शहरों की तरफ मज़दूरों का पलायन होता है। श्रम क़ानूनों के निष्प्रभावी होने और मज़दूरों के हितों के लिए संघर्ष करने वाली कामगार यूनियनों की अनुपस्थिति के कारण मज़दूर शहरों में असहाय अवस्था में होते हैं। गाँवों से शहरों की तरफ होने वाले अधिकाधिक पलायन की वजह से शहरों में काम की खोज में आने वाले मज़दूरों की बाढ़ लगी रहती है। इसकी वजह से मज़दूरों की अपने अधिकार की बात करने या बेहतर मेहनताना के लिए समझौता करने की ताकत ख़त्म हो जाती है। चूँकि वापस गाँव जाने का विकल्प इनके पास होता नहीं है, इसलिए जितनी भी मज़दूरी इनको दी जाती है उसी को स्वीकार करके ये काम करने लग जाते हैं। इन कारणों की वजह से ये मज़दूर वास्तव में सस्ती त्याज्य चीज़ों के जैसे हो गए हैं। 

उदाहरणार्थ, फ़रीदाबाद  की औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले मज़दूरों को दिन के 8 - 10 घंटों के काम के लिए 8,000 - 10,000 रूपए का मासिक वेतन मिलता है। मैं औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों पर आधारित  शोध कार्य के सिलसिले में वहाँ जाकर सर्वे कर चुका हूँ। इनके रहने वाले इलाकों को कागज़ी तौर पर “अवैध” माना जाता है। इस वजह से ज्यादातर सरकारी सुविधाएँ यहाँ पहुँच भी नहीं पाती हैं। संकरी गलियाँ, बदबू छोड़ती बजबजाती नालियाँ और माचिस के डिब्बे जैसे दिखने वाले छोटे मकान ही इनकी पहचान हैं।  

मज़दूरों अधिकार की बात होनी चाहिए 

 COVID-19  जैसी विकराल महामारी और सरकार द्वारा उनकी बदहाली पर छोड़े जाने के बाद जब प्रवासी मज़दूर भूखे- प्यासे अंतहीन यात्राओं पर चल पड़े तब जाकर मुख्यधारा की कल्पना में इनकी पीड़ा जगह पा सकी। देश की आँखों ने इनके अस्तित्व को स्वीकारना तब शुरू किया जब इनके अमानवीय शोषण का वीभत्स चेहरा अपने नग्न स्वरूप में सड़कों पर दृष्टिगोचर हुआ ।  

लोगों के बीच इनकी सहायता के लिए दान की अपील की जानी चाहिए। राहत कार्य युद्ध स्तर पर चलाए जाने चाहिए। 

लेकिन इन मज़दूरों की इस हालत के लिए ज़िम्मेदार कारणों को आँखों से ओझल नहीं  होने देना चाहिए। इनकी बदहाली का कारण इनको दी जाने वाली बहुत की कम मज़दूरी , काम करने  के ख़राब हालात और सामाजिक सुरक्षा की सहूलियतों का अभाव है। इनकी सहायता के सार्थक पहल की शुरूआत ज़िन्दगी चलाने के लिए  पर्याप्त न्यूनतम मज़दूरी का कानून बनाकर कार्य स्थलों पर उसका सख़्ती से पालन कराने से ही होगी। चाहे वो कारख़ाने हों या घरेलू कार्यक्षेत्र। इन मज़दूरों का इतना शोषण किया जाना कि सिर्फ कुछ दिनों काम नहीं करने की स्थिति इनके लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल बन जाए अपने आप में अमानवीय है। शहरों से भागने की इनकी बेचैन कोशिश इसी पद्धतिबद्ध शोषण का नतीजा है। 

अगर सरकारी सहायता और समाज के दानशील वर्ग की मेहरबानी से ये लॉकडाउन के दौर को पार कर भी लें तो भी उनको दोबारा उसी शोषणजाल में फंसकर पिसना  पड़ेगा। उनके शोषण का चक्र फिर से निर्बाध शुरू हो जायेगा। वो पहले की तरह ही मुख्यधारा की चकाचौंध से दूर भुखमरी और ग़रीबी के साये में जियेंगे। सहानुभूति का ये अकस्मात् गुबार उनकी नियति को नहीं बदलने वाला है। उचित न्यूनतम मज़दूरी,  काम करने के बेहतर हालात और सामाजिक सुरक्षा की सहूलियतों के प्रति प्रतिबद्धता ही इनकी ज़िंदगी के हालात को बेहतर बना सकती है।

(लेखक ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

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