NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है कृषि उत्पाद का मूल्य
कृषि क्षेत्र की बुनियादी समस्याएं और कृषि आयोग की सिफारिशों के संदर्भ में कृषि क्षेत्र की समस्याओं के निराकरण किया जाना आवश्यक है।
डॉ. अमिताभ शुक्ल
27 Nov 2021
kisan
Image courtesy : NDTV

कृषि के महत्व, योगदान, उपयोगिता एवं उस पर एक बड़ी जनसंख्या की निर्भरता के कारण कृषि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अर्थव्यवस्था का  सर्वाधिक समस्याग्रस्त क्षेत्र भी कृषि ही है। देश की जनसंख्या के एक महत्वपूर्ण भाग की जीविकोपार्जन हेतु कृषि पर निर्भरता के कारण भी कृषि से प्राप्त लाभ और हानि से यह बड़ा तबका प्रभावित होता है।

इन स्थितियों में पिछले एक वर्ष पूर्व बनाए गए कृषि कानूनों को रद्द किया जाना, किसानों के आंदोलन के संदर्भों में इसकी पृष्ठभूमि और अंतर्निहित समस्याओं को समझना और हल किया जाना आवश्यक है।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन आवश्यक

कृषकों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है कृषि उत्पाद का मूल्य। यह  प्रारंभ से ही कृषि क्षेत्र की सबसे प्रमुख समस्या रही है। इस विषय पर स्थायी रूप से केंद्र सरकार द्वारा एक "कृषि मूल्य आयोग " स्थापित किया गया था। इस आयोग में देश के प्रतिष्ठित कृषि अर्थशास्त्री की अध्यक्षता में विभिन्न  कृषि उत्पादों की लागत का परीक्षण करते हुए कृषि उत्पादों के मूल्य हेतु सिफारिशें की जाती रही हैं। लेकिन इसके बावजूद इन आयोगों की सिफारिशें पूर्णरूपेण लागू नहीं किए जाने से किसानों को उत्पादन लागत के अनुसार मूल्य प्राप्त नहीं हुए। वर्ष 2004 में एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में केंद्र सरकार द्वारा "नेशनल कमीशन फॉर फार्मर्स" बनाया गया था। इस आयोग ने वर्ष 2006 में 5 रिपोर्ट सौंपी थीं। तब से ही कृषि क्षेत्र में मूल्य के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण और कृषि और किसानों के लिए उपयोगी और लाभदायक माना जाता रहा है एवं इसकी सिफारिशों को लागू किए जाने की मांग की जाती रही है।

संक्षेप में इसकी दस महत्वपूर्ण सिफारिशें थीं: कृषि को समवर्ती सूची में लाया जाए,  कृषि उत्पादों के उत्पादन लागत से 50% ज्यादा दाम दिए जाएं,  कृषकों को कम दामों में गुणवत्तापूर्ण बीज दिये जाएं,  गांवों में ज्ञान चौपाल की स्थापना एवं महिला किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दिए जाएं, किसानों को प्राकृतिक आपदा में मदद दी जाए, सरप्लस और उपयोग न की जाने वाली भूमि का वितरण किया जाए,  प्रत्येक फसल हेतु फसल बीमा लागू किया जाए,  खेतिहर जमीन और वन भूमि को गैर कृषि उद्देश्यों हेतु कार्पोरेट्स को न दिया जाए, खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था हर जरूरतमंद तक पहुंचे एवं सरकारी मदद से किसानों को मिलने वाले कर्ज की ब्याज दर कम कर के 4% की जाए।

निश्चित ही यह सिफारिशें महत्वपूर्ण थीं लेकिन, कुछ आसान सिफारिशों के अतिरिक्त शेष का क्रियान्वयन नहीं हुआ। किसानों की मांग स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की भी रही है।

वर्ष 2020 में बनाए एवं रद्द किए गए कृषि कानून और उनके निहितार्थ

यह कृषि कानून: 1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 के अंतर्गत अनाज, दलहन, तिलहन,  खाद्य तेल, प्याज,  आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान किया गया था और इन्हें बाजार में प्रतियोगी कीमतों पर बेचने को स्वीकृति प्रदान की गई थी। जाहिर है कि इसके कारण किसानों को मूल्य की गारंटी और बाजार में कीमत नियंत्रण समाप्त हो जाता।

2. कृषि उत्पादन,  व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा ) कानून 2020 के अंतर्गत कृषि उत्पादन विपणन समिति के बाहर भी उत्पादन बेचने की छूट दी गई थी। इससे समर्थन मूल्य पर कृषि उपज मंडियों में उत्पाद के निश्चित मूल्य पर शासकीय क्रय की व्यवस्था समाप्त हो जाती। विगत एक वर्ष में ही तेजी से घोषित और अघोषित रूप से देश में कृषि उपज मंडियों का बंद होना इस कानून के क्रियान्वयन का एक कदम था।

3. कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून 2020 के द्वारा किसानों को निवेशक/ पूंजीपति से समझौते द्वारा उत्पादन के पूर्व ही फसल का सौदा तय करने की छूट का प्रावधान किया गया था। यह सर्वाधिक विवादास्पद पहलू रहा, जिसमे बड़े पूंजीपतियों द्वारा उत्पाद का उचित मूल्य न दिए जाने से लेकर जमीन पर कब्जे और किसानों के विभिन्न प्रकार से शोषण की आशंकाएं शामिल थीं। 

स्वतंत्रता के पश्चात से ही कृषि के प्रमुख मुद्दों की उपेक्षा

दरअसल, केंद्र सरकारों द्वारा कृषि पर बजट, योजनाओं के निर्माण, किसानों को राहत दिए जाने को प्राथमिकता दी जाती रही लेकिन, बड़े सुधारों द्वारा कृषि को लाभदायक बनाने के प्रयास नहीं हुए। इस संबंध में अधिकांश छोटी जोतों का हवाला देते हुए किसी परिवर्तन या सुधार के लिए इसको बाधक माना जाता रहा है। तथापि, वृहद पैमाने पर सहकारी खेती को जनांदोलन बनाने के प्रयास भी नही हुए। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में जहां ऐसे प्रयोग स्वैच्छिक संगठनों के प्रयासों और सरकारी सहयोग से किए गए वहां इसके लाभदायक परिणाम कृषि, उत्पादन और लाभ के रूप में सामने आए और किसानों की आय और आर्थिक स्तर पर सकारात्मक प्रभाव प्राप्त हुए। कृषि सुधार की दिशा में ही  "एग्रो क्लाईमेटिक जोन्स" बना कर क्षेत्र अनुसार जलवायु, मिट्टी , वर्षा आदि के आधार पर खेती की योजना भी वांछित उद्देश्यों के अनुरूप क्रियान्वित न हो सकी। इनके अतिरिक्त "खाद्ध प्रसंस्करण उद्योगों" की चर्चा बहुत हुई लेकिन, खेती को फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज से संबद्ध करने  के काम को भी वांछित सीमा तक क्रियान्वित नही किया जा सका। आशय यह है कि कृषि को लाभ का क्षेत्र बनाने की असफलता के कारण पूर्व से ही कृषि और किसानों की समस्याएं बढ़ती ही रहीं।

कृषि सुधार की उपेक्षा से उत्पन्न समस्याएं

पिछले वर्षों में इन्ही समस्याओं के कारण और कृषि उत्पादन की अस्थिरता , समुचित मूल्य नहीं मिलने और सूखे और अतिवृष्टि से उत्पन्न " कर्ज की समस्या" का परिणाम  महाराष्ट्र , कर्नाटक और पंजाब सहित देश भर में किसानों की बड़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति के रूप में भी सामने आया है। कृषि के क्षेत्र में  "भारतीय खाद्य निगम" की भूमिका का सीमित होना और उपज के भंडारण हेतु शासकीय व्यवस्थाओं का नहीं किया जाना, सहकारी प्रयत्न न होना एवं निजी पूंजीपतियों को सरकार  द्वारा अनुमति दिया जाना भी ऐसे पहलू हैं जो कृषि और किसानों के हितों को संरक्षण प्रदान किए जाने में सरकार की अपनी भूमिका से पीछे हटने को स्पष्ट करते हैं एवं इनके विपरीत प्रभाव कृषक हितों पर हो रहे हैं।

वर्तमान कृषि समस्याएं, कानूनों का रद्दीकरण,  अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र

वर्तमान स्थितियों में इन सबके मध्य स्पष्ट, सीधे, गहरे और दूरगामी संबंध हैं। सर्वप्रथम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के एक बड़े वर्ग को संतुष्ट  किए बिना उन्हें प्रभावित किए जाने वाले कानून का निर्माण होना और उसके कारण  देश में जन, धन का इस सीमा तक प्रभावित होना है। दूसरा मुद्दा देश की अर्थव्यवस्था और जनता की बुनियादी समस्याओं को दर किनार कर तेजी से किया जाने वाला निजीकरण है। यह कानून भी उस दिशा में ही थे। तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा लोकतंत्र की स्थिति से संबंधित है। अर्थात यदि सरकार ही जन हित को प्रभावित करने वाली नीतियां बनाए और जनता उनके प्रति इस हद तक असंतोष व्यक्त करे तब लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा?

इस संबंध में एक महत्वपूर्ण भूमिका न्यायपालिका की भी थी जो समस्या की वास्तविकता और विकरालता के परिप्रेक्ष्य में निरंतर मध्यस्थता और निराकरण हेतु आवश्यक पहल और दिशा निर्देश देता रहा, लेकिन वास्तविक समाधान को लेकर उसके प्रयास भी कम रहे या कहें कि सवालों के घेरे में रहे।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और विगत चार दशकों से शोध, लेखन और अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

kisan andolan
farmers protest
agricultural crises
Agriculture workers
Agriculture Laws
MSP
Agriculture commission

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

किसान आंदोलन: मुस्तैदी से करनी होगी अपनी 'जीत' की रक्षा

बिहार: कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर आलू किसान

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा


बाकी खबरें

  • सोनिया यादव
    आंगनवाड़ी की महिलाएं बार-बार सड़कों पर उतरने को क्यों हैं मजबूर?
    23 Feb 2022
    प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं का कहना है कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा घोषणाओं और आश्वासनों के बावजूद उन्हें अभी तक उनका सही बकाया नहीं मिला है। एक ओर दिल्ली सरकार ने उनका मानदेय घटा दिया है तो…
  • nawab malik
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हम लड़ेंगे और जीतेंगे, हम झुकेंगे नहीं: नवाब मलिक ने ईडी द्वारा गिरफ़्तारी पर कहा
    23 Feb 2022
    लगभग आठ घंटे की पूछताछ के बाद दक्षिण मुंबई स्थित ईडी कार्यालय से बाहर निकले मलिक ने मीडिया से कहा, '' हम लड़ेंगे और जीतेंगे। हम झुकेंगे नहीं।'' इसके बाद ईडी अधिकारी मलिक को एक वाहन में बैठाकर मेडिकल…
  • SKM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बंगाल: बीरभूम के किसानों की ज़मीन हड़पने के ख़िलाफ़ साथ आया SKM, कहा- आजीविका छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए
    23 Feb 2022
    एसकेएम ने पश्चिम बंगाल से आ रही रिपोर्टों को गम्भीरता से नोट किया है कि बीरभूम जिले के देवचा-पंचमी-हरिनसिंह-दीवानगंज क्षेत्र के किसानों को राज्य सरकार द्वारा घोषित "मुआवजे पैकेज" को ही स्वीकार करने…
  • राजस्थान विधानसभा
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान में अगले साल सरकारी विभागों में एक लाख पदों पर भर्तियां और पुरानी पेंशन लागू करने की घोषणा
    23 Feb 2022
    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार को वित्तवर्ष 2022-23 का बजट पेश करते हुए 1 जनवरी 2004 और उसके बाद नियुक्त हुए समस्त कर्मचारियों के लिए आगामी वर्ष से पूर्व पेंशन योजना लागू करने की घोषणा की है। इसी…
  • चित्र साभार: द ट्रिब्यून इंडिया
    भाषा
    रामदेव विरोधी लिंक हटाने के आदेश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया की याचिका पर सुनवाई से न्यायाधीश ने खुद को अलग किया
    23 Feb 2022
    फेसबुक, ट्विटर और गूगल ने एकल न्यायाधीश वाली पीठ के 23 अक्टूबर 2019 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें और गूगल की अनुषंगी कंपनी यूट्यूब को रामदेव के खिलाफ मानहानिकारक आरोपों वाले वीडियो के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License