NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ये पब्लिक है, मुखौटे उतारने में देर नहीं लगाती!
बंगाल और केरल की जीत ने यह भी साबित कर दिया कि नरेंद्र मोदी कोई अजेय नहीं हैं। इससे भविष्य की झलक भी मिलती है कि शायद 2024 तक नरेंद्र मोदी के सामने सम्पूर्ण विपक्ष का एक ऐसा चेहरा होगा, जिसका नाम नहीं काम बोल रहा होगा।
शंभूनाथ शुक्ल
04 May 2021
ये पब्लिक है, मुखौटे उतारने में देर नहीं लगाती!
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

मोदी सरकार और मीडिया ने सिर्फ़ बंगाल को टारगेट किया और बुरी तरह मुँह की खाई। हालाँकि चुनाव असम, केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी में भी थे। लेकिन जीत का सारा श्रेय ममता बनर्जी को मिला। क्योंकि भाजपा के रणनीतिकारों और मीडिया ने सारे चुनावों को मोदी बनाम ममता बना दिया था।

इसलिए किसी ने भी गौर नहीं किया कि क्यों आख़िर पिनराई विजयन ने केरल में 45 साल की लीक को तोड़ दिया और पूरी ताक़त के बावजूद तमिलनाडु में डीएमके नेता स्तालिन एडीएमके के ई. पलाईस्वामी को शून्य पर नहीं ला पाए।डीएमके को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस की मदद लेनी ही पड़ेगी। पुद्दचेरी में भाजपा नीत गठबंधन कैसे जीत गया तथा असम में भाजपा सरकार में आने के बावजूद क्यों कमजोर पड़ी? 

दरअसल भाजपा नेताओं ने ही 2014 के बाद से चुनाव के लिए काम नहीं बल्कि चेहरों को आगे कर दिया था। इसे चुनावी भाषा में पोस्टर बॉय कहते हैं। लोकतंत्र के ये मुखौटे अपनी गुंडई और व्यक्तिवादी राजनीति से सरकार से लेकर पार्टी तक को नियंत्रित करते हैं। 

हालाँकि यह परंपरा 1989 से शुरू हो गई थी, लेकिन परवान चढ़ी 2004 से। भाजपा के लोकप्रिय चेहरे अटल बिहारी बाजपेयी के ‘शाइनिंग इंडिया’ के नारे के साथ। उसमें सत्तारूढ़ भाजपा लुढ़की और कांग्रेस के एक ऐसे चेहरे मनमोहन सिंह को कुर्सी मिली जो बहुत लो-प्रोफ़ाइल थे। 

इकोनामिक रिफ़ॉर्म्स और ग्लोबलाइज़ेशन के समर्थक मनमोहन सिंह को वाम दलों का भी समर्थन मिला। इसके बाद 2009 में कांग्रेस का चेहरा मनमोहन सिंह थे तथा भाजपा के लाल कृष्ण आडवाणी। इसमें आडवाणी को मात मिली। लेकिन 2014 से तो भाजपा के पोस्टर बॉय नरेंद्र मोदी रहे।

 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में जीत के बाद वे ऐसे इतराए मानों देश अब उनके ही इशारे पर चलेगा। यहीं मात खा गए मोदी जी। अपने अहंकार के चलते वे बंगाल को पहचान नहीं पाए और पूरी लड़ाई सर्व साधन संपन्न पार्टी के नेता मोदी और उनकी तुलना में विपन्न पार्टी टीएमसी नेता ममता बनर्जी के बीच हो गई। 

प्रचार में अरबों रुपए फूंके गए लेकिन भाजपा धड़ाम से गिर गई। इस तरह मोदी का अहंकार टूटा। भारतीय लोकतंत्र की यह बहुत बड़ी जीत है, जो उसने इतरा रहे नेता को धूल चटा दी। अब भाजपा लाख सफ़ाई दे कि क्या हुआ, हम बंगाल में तीन से 77 तक तो पहुँच गए। किंतु क्या यह हार नहीं है कि जो पार्टी दो साल पहले बंगाल में 40 प्लस प्रतिशत वोटों पर खड़ी थी, वह इतने कम समय में 37 परसेंट पर कैसे आ गई? 

बंगाल में भाजपा ने अपना सर्वस्व दांव पर लगाया था। यही कारण है कि वह केरल की तरफ़ ध्यान नहीं दे पाई और अपनी एकमात्र सीट भी गँवा दी। ज़ाहिर है भाजपा के पोस्टर बॉय नरेंद्र मोदी का चेहरा अब फीका पड़ने लगा है। वे कोई नई बात नहीं कह पा रहे हैं। उनके सात वर्ष के शासन में पब्लिक ने उनकी नाकामियाँ देख लीं। 

सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम कर वोट नहीं मिला करते। इससे आप अपनी तरफ़ लोगों का ध्यान तो आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन लोग समझ गए हैं कि हाथ मटका कर भाषण देने की कला में दक्ष होने वाला व्यक्ति अच्छा अटेंशन सीकर तो हो सकता है, राज-काज में शून्य होगा। शायद इसीलिए 2002 में तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने नरेंद्र मोदी के गुजरात में हुआ हिंसक तांडव देख कर कहा था, राज धर्म सीखिए मोदी जी। 

काश! वे राज-धर्म सीखे होते तो आज उनका चेहरा यूँ मुरझाया हुआ नहीं होता। कोई दक्षिणपंथी पार्टी भी अगर चुनाव में जीतती है तो उसे भी सत्ता में आने का हक़ है और निश्चित रूप से है। आख़िर यह लोकतंत्र है, इसीलिए किसी को भी इस बात से दिक्कत नहीं होगा। 

लेकिन यदि उस पार्टी का नेता सत्ता में आने के बाद सरकार न चला पाए तो वह हँसी का पात्र ही बनेगा। ऊपर से वह यह स्वीकार करने को राज़ी न हो कि उसे सत्ता चलानी नहीं आती तो वह अहंकारी बन जाएगा। यही हश्र भाजपा के इन पोस्टर बॉय का हुआ जो “जय श्री राम” का नारा लगाते-लगाते रावण के रोल में आ गए। बंगाल में उनकी हार इसी बात का द्योतक है। मंच पर जाकर अकेली पड़ चुकीं ममता बनर्जी को “दीदी! ओ दीदी!!” कह कर खिझाने से ऐसा लग रहा था मानों यह चुनावी मंच नहीं बल्कि कोई नासमझ अपने करतब दिखा रहा है। यह किसी को पसंद नहीं आया। 

प्रधानमंत्री को शालीनता दिखानी थी, मगर वे चूक गए। ऐसा नहीं कि बंगाल ममता बनर्जी के शासन से खुश था। लेकिन उस शासन को एक्सपोज करने के चक्कर में मोदी जी अपने को एक्सपोज कर गए। यही उनकी हार का कारण बना और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस विधानसभा चुनाव में 200 का आँकड़ा पार कर गई। 

लेकिन दो मई को आए नतीजों में सबसे ज़बरदस्त जीत थी केरल में एलडीएफ की। वहाँ मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपनी सरकार को रिपीट कर लिया। यह चमत्कार 45 साल बाद हुआ। अन्यथा वहाँ एक बार कांग्रेस का गठबंधन यूडीएफ जीतता और एक बार एलडीएफ। पर इस बार वाम मोर्चा संगठन एलडीएफ फिर से जीत गया। जबकि इस बीच मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पर तस्करी तक के आरोप लगाए गए। किंतु मुख्यमंत्री इन आरोपों से विचलित नहीं हुए और कोरोना के विरुद्ध जंग लड़ते रहे। 

कोरोना का सबसे पहला केस गत वर्ष 2019 की 29 जनवरी को केरल में ही मिला था। वहाँ संक्रमण भी खूब फैला किंतु अफ़रा-तफ़री नहीं फैली। न भुखमरी आई न किसी प्रवासी मज़दूर को भगाया गया। केरल सरकार की स्वास्थ्य मंत्री शैलजा टीचर ने कोरोना कंट्रोल का ऐसा मॉडल पेश किया जो पूरे देश में आदर्श है। यही कारण है कि इस बार केरल में एलडीएफ को मुसलमानों और ईसाइयों का वोट भी मिला, जो परंपरागत रूप से यूडीएफ का वोट माना जाता है।

अगर अन्य प्रदेशों की सरकारें केरल मॉडल को अपनातीं तो आज कोरोना की दूसरी लहर में ऐसी मार न आती। केरल के मुख्यमंत्री ने प्रदेश की जनता से सीधा संवाद रखा। उन्हें भरोसा दिया कि कोरोना से किसी को भी न भूखों मरने दिया जाएगा न उसकी नौकरी जाएगी। इसलिए कोरोना को लेकर केरल की जनता को अपनी सरकार पर भरोसा रहा। यह अकेले केरल में ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत में तमिलनाडु, आंध्र और तेलंगाना की सरकारों ने भी कुछ ऐसे ही कदम उठाए। इसलिए कोरोना वहाँ भी रहा किंतु पैनिक नहीं फैला। यही वजह रही कि अन्ना डीएमके को डीएमके साफ़ नहीं कर पाई। जबकि उसके पास इस बार कोई चमत्कारी चेहरा नहीं था। 

ई. पलाईस्वामी के नेतृत्त्व में लड़ी डीएमके को विधानसभा में 66 सीटें मिली हैं, जबकि उसकी सहयोगी भाजपा को चार। डीएमके ने 133 सीटें जीती हैं। कांग्रेस को 18 और वाम दलों को चार। इस तरह वहाँ सरकार तो डीएमके की बन ही जाएगी। दरअसल यह कोरोना कंट्रोल का कमाल था कि अन्ना डीएमके तमिलनाडु में ज़ीरो पर नहीं आई, जबकि उससे जनता प्रसन्न नहीं थी। अभी भी वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। 

इन चुनावों ने यह संकेत भी दिया है कि भविष्य में राज वही कर पाएगा जो कुछ काम करेगा, बातें करने वाला हाथ मलता रह जाएगा। नरेंद्र मोदी की सरकार ने बातें तो बड़ी-बड़ी कीं मगर धरातल में उनका काम कुछ नहीं। उल्टे जो संस्थाएँ काम कर रही थीं उन्हें भी ध्वस्त कर दिया। नतीजा सामने है। सिर्फ़ धार्मिक या जातीय ध्रुवीकरण से वोट नहीं मिलते। उसके लिए “गुड गवर्नेंस” भी चाहिए। जो भाजपा न केंद्र में दिखा सकी न किसी राज्य में। इसलिए उसके बड़बोलेपन को मतदाता ने धूल चटवा दी। बंगाल और केरल की जीत ने यह भी साबित कर दिया कि नरेंद्र मोदी कोई अजेय नहीं हैं। इससे भविष्य की झलक भी मिलती है कि शायद 2024 तक नरेंद्र मोदी के सामने सम्पूर्ण विपक्ष का एक ऐसा चेहरा होगा, जिसका नाम नहीं काम बोल रहा होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

West Bengal
Kerala
Assembly Election 2021
Narendra modi
Modi Magic
BJP
Godi Media

Related Stories

राज्यपाल की जगह ममता होंगी राज्य संचालित विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति, पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने पारित किया प्रस्ताव

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • ganguli and kohli
    लेस्ली ज़ेवियर
    कोहली बनाम गांगुली: दक्षिण अफ्रीका के जोख़िम भरे दौरे के पहले बीसीसीआई के लिए अनुकूल भटकाव
    19 Dec 2021
    दक्षिण अफ्रीका जाने के ठीक पहले सौरव गांगुली बनाम विराट कोहली की टसल हमारी टीवी पर तैर रही है। यह टसल जितनी वास्तविक है, यह इस तथ्य पर पर्दा डालने के लिए भी मुफ़ीद है कि भारतीय टीम ऐसे देश का दौरा कर…
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License