NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
सावरकर के पैदा होने से बहुत पहले ही 1857 की जंग को लिख दिया गया था- राष्ट्रीय क्रांति
लंदन में बैठकर अमेरिकी अख़बारों के लिए लिखे लेखों में एक "पत्रकार'' ने उसे न सिर्फ भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया था, बल्कि वे कारक भी बता दिये थे जिनके चलते  अब हिंदुस्तान में अंग्रेजी राज का ख़त्म होना तय था।
बादल सरोज
18 Oct 2019
History of savarkar

इतिहास को 'तड़ीपार' करने की तैयारी ! 

जब 1857 की जंग जारी थी, उसी वक़्त लंदन में बैठकर अमेरिकी अख़बारों के लिए लिखे लेखों में एक "पत्रकार'' ने उसे न सिर्फ भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया था, बल्कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में रखी अनेक रिपोर्ट और वाइसरायों के जरिये इंग्लैंड भेजे जा रहे डिस्पेचों के आधार पर वे कारण भी गिनाये थे जिनकी वजह से यह संग्राम शुरू हुआ था और वे कारक भी बता दिये थे जिनके चलते  अब हिंदुस्तान में अंग्रेजी राज का ख़त्म होना तय था।

इस पत्रकार का नाम था ; कार्ल मार्क्स !!

गुरुवार, 17 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेतृत्व में - जिसकी संख्या जहां समाप्त हो जाती है उस - दो नंबरी श्रेणीक्रम पर आसीन अमित शाह का दावा पढ़ा तो 1857 के महासमर से जुड़ी अनेक बातों के साथ यह भी याद आया।
देश के गृह मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि सावरकर न होते तो 1857 का स्वतंत्रता संग्राम इतिहास में दर्ज न हो पाता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में उन्होंने कहा कि वक्त आ गया है जब इतिहास नए नज़रिये से लिखा जाए।

ऐसा नहीं है कि उन्हें नहीं पता कि सावरकर के जन्म (1883) लेने के भी 26 साल पहले जुलाई 1857 और अक्टूबर 1858 के बीच कार्ल  मार्क्स ने 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' को भेजे अपने 37 और इस बगावत को कुचल दिये जाने के बाद के 5 डिस्पेचेज़ में इस महासमर का जो विवरण दिया है, मूल्यांकन किया है,  वह इतिहास मे दर्ज किसी आँखों देखे हाल से कम नहीं है।  

मार्क्स पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 31 जुलाई 1857 के अपने डिस्पेच में कहा कि " सरकारी प्रवक्ता इसे अराजकता वाला गदर गलत कहते हैं, यह सिपाहियों का गदर (म्यूटिनी) नहीं है, सच  यह है कि यह एक राष्ट्रीय क्रांति; नेशनल रिवोल्ट है । "
 72576970_2589432271122606_7964435857320968192_n.jpg

इसके पहले जून 1857 मे अपने लेख मे एक महीने पहले शुरू हुयी इस जंग या बगावत पर मार्क्स की टिप्पणी थी कि "सिपाहियों के जरिये अंग्रेज़ो की भारतीय सेना ही क्रांति का जरिया बनने जा रही है ।'' इसमें उन्होंने किसानों की बढ़ी चढ़ी भूमिका का भी उल्लेख किया है।

30 जून 1857 की अपनी टिप्पणी मे मार्क्स इस क्रांति के एक और गुणात्मक रूप से महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करते है जब वे कहते हैं कि "इस बग़ावत की ख़ास बात यह है कि इसने हिन्दू और मुसलमानों के बीच के वैमनस्य को खत्म कर दूरी को पाट दिया है ।" 

वे लंदन के अखबारों मे चलाये जा रहे उस झूठे प्रचार का भी खंडन करते हैं जिसमें दावा किया गया था कि "हिन्दू इस क्रांतिके साथ नहीं है।"  वे इसे सरासर कल्पित बताते हैं और अवध से लेकर मेरठ, झांसी से ग्वालियर तक के उदाहरणों से अपनी बात की ताईद करते हैं।
72662713_2589432217789278_3549876764626911232_n_0.jpg
लंदन और ब्रिटेन  के सारे अखबार उन दिनों इस बगावत के दौरान अंग्रेज़ों और उनकी महिलाओं तथा परिवारों के साथ की  जा रही कथित "क्रूरता और जघन्य हिंसा" की  अतिरंजित खबरें छापकर राष्ट्र उन्माद फैलाने मे लीन थे। ठीक उसी बीच ठेठ लंदन मे बैठकर मार्क्स इन अतिरंजित खबरों का न केवल खंडन करते हैं बल्कि खुद ब्रिटिश फौजों द्वारा की जा रही बर्बरता को भी विश्व समुदाय और ब्रिटिश जनता के सामने पूरे साहस के साथ उजागर करते हैं।

दूर लंदन मे बैठे मार्क्स न केवल भारत के घटनाक्रम को गहराई से देख रहे थे बल्कि उसके सारे आयामों की तथ्यों और आंकड़ों के साथ जांच परख कर इस बगावत द्वारा भारतीय समाज पर छोड़ी जा रही गुणात्मक छाप को भी जांच और आंक रहे थे।

इस क्रांति को कुचल दिये जाने के बाद के लेखों और एंगेल्स तथा लासाल के साथ अपने पत्राचार की 13 चिट्ठियों मे मार्क्स दर्ज करते हैं कि "प्रतिहिंसा में उन्मादी अंग्रेज़ फौजें जो कर रही हैं उससे भी कहीं ज्यादा जुल्म सरकार टेक्सों मे जानलेवा बढ़ोत्तरी करके कर रही हैं। इन सबका नतीजा सिर्फ एक ही निकलेगा और वह यह कि विक्टोरिया को अपना बिस्तरा गोल करके वापस लौटना ही होगा। क्रांतिभले विफल हो गई है, भारत को अब ज्यादा दिन गुलाम बनाना असंभव काम है ।"

ख़ैर, चलिये थोड़ी देर के लिए अमित शाह के इतिहास को ही इतिहास मान लेते हैं, मगर इसमे भी पेच हैं। आज़ादी की इस पहली लड़ाई की जो दो विशिष्ट उपलब्धि थी उसके बारे में पता नहीं इस इतिहासविहीन, ज्ञानवंचित, सूचना-कुपोषित  मण्डली को कुछ पता भी है कि नहीं। पहली तो यह कि 1857 के इस महासमर में रानी झांसी, तात्या टोपे, मंगल पांडे से लेकर गंगू मेहतर तक ने अपने प्राण जिस  मकसद के लिए दिये थे उसकी तार्किक परिणिती दिल्ली सल्तनत के तख़्त पर बहादुर शाह ज़फ़र की बादशाहत बहाल करने के  रूप मे होनी थी! क्या यह उम्मीद करें कि सावरकर इस मकसद के साथ थे !!  

दूसरी अनूठी बात थी दिल्ली से अंग्रेजों को भगाने के बाद राज चलाने के लिए लागू की गई शासन प्रणाली। बादशाह तख़्त पर ही बैठते थे। असली राज चलाने के लिए एक साझी, सेक्युलर, मेहनतकश लोगों की परिषद बनाई गयी थी। इसमें हिन्दू मुसलमानों का ही नहीं सिपाहियों और किसानों का भी बराबरी का प्रतिनिधित्व रखा गया था। धर्म मजहब की आड़ मे होने वाली बेहूदगी और उग्रता को दबाने के प्रबंध किए गए थे।  यही काउंसिल थी जो सारे फ़ैसले लेती थी और बहादुर शाह ज़फ़र से उन्हीं पर अपनी सील मोहर लगाने के लिए कहती थी। सावरकर इस तरह की आज़ादी के पक्षधर थे क्या ?

इतिहास बनाने वाले कम होते हैं, लिखने वाले उनसे कुछ अधिक, पढ़ने वाले कुछ और अधिक ; किन्तु इतिहास गवाह है कि जिनका इतिहास माफ़ीख़ोरी का रहा वे कभी इतिहास नहीं लिख पाये, बनाना तो दूर की बात। मगर फिर भी इस तरह की जानबूझकर कही जा रही झूठी बातों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। एक तो इसलिए कि गोयबल्स को आराध्य  मानने वाली इस मंडली को विश्वास है कि उनके द्वारा एक झूठ को हज़ार बार दोहराने से वह सच बन जाएगा। दूसरा इसलिए भी कि, जैसा नाजी यातनागृह  मे बंद और बाद में महज 38 वर्ष की आयु मे हिटलर की फासी हुकूमत द्वारा गोली से भून दिये गए नाजी विरोधी धर्मशास्त्री  दिएत्रिच बोनहाइफर (Dietrich Bonhoeffer) ने कहा है कि "कपट और द्वेष से ज्यादा ख़तरनाक मूढ़ता होती है, क्योंकि कपट का अनुमान लगाकर आप उसका सामना करने की तैयारी कर भी सकते हैं। मूढ़ता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।" आइंस्टीन तक कह गए हैं कि "ब्रह्मांड की भी अंतत: एक सीमा होगी, किन्तु मूर्खता असीम है।" ख़ासतौर से तब और जब वह धूर्तता के तड़के के साथ हो।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।) 

Savarkar
History of savarkar
War of 1857
Karl Marx
History of India
RSS
BJP

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता

एक महान मार्क्सवादी विचारक का जीवन: एजाज़ अहमद (1941-2022)


बाकी खबरें

  • tourism sector
    भाषा
    कोरोना के बाद से पर्यटन क्षेत्र में 2.15 करोड़ लोगों को रोज़गार का नुकसान हुआ : सरकार
    15 Mar 2022
    पर्यटन मंत्री ने बताया कि सरकार ने पर्यटन पर महामारी के प्रभावों को लेकर एक अध्ययन कराया है और इस अध्ययन के अनुसार, पहली लहर में 1.45 करोड़ लोगों को रोजगार का नुकसान उठाना पड़ा जबकि दूसरी लहर में 52…
  • election commission of India
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली नगर निगम चुनाव टाले जाने पर विपक्ष ने बीजेपी और चुनाव आयोग से किया सवाल
    15 Mar 2022
    दिल्ली चुनाव आयोग ने दिल्ली नगर निगम चुनावो को टालने का मन बना लिया है। दिल्ली चुनावो की घोषणा उत्तर प्रदेश और बाकी अन्य राज्यों के चुनावी नतीजों से पहले 9 मार्च को होनी थी लेकिन आयोग ने इसे बिल्कुल…
  • hijab
    सीमा आज़ाद
    त्वरित टिप्पणी: हिजाब पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फ़ैसला सभी धर्मों की औरतों के ख़िलाफ़ है
    15 Mar 2022
    इस बात को दरअसल इस तरीके से पढ़ना चाहिए कि "हर धार्मिक रीति का पालन करना औरतों का अनिवार्य धर्म है। यदि वह नहीं है तभी उस रीति से औरतों को आज़ादी मिल सकती है, वरना नहीं। "
  • skm
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमएसपी पर फिर से राष्ट्रव्यापी आंदोलन करेगा संयुक्त किसान मोर्चा
    15 Mar 2022
    एसकेएम ने फ़ैसला लिया है कि अगले महीने 11 से 17 अप्रैल के बीच एमएसपी की क़ानूनी गारंटी सप्ताह मना कर राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरूआत की जाएगी। 
  • Karnataka High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिजाब  मामला: हिजाब इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने खारिज की याचिका
    15 Mar 2022
    अदालत ने अपना फ़ैसला सुनते हुए यह भी कहा कि शिक्षण संस्थानों में यूनिफ़ॉर्म की व्यवस्था क़ानूनी तौर पर जायज़ है और इसे संविधान के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं कहा जा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License