NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कोरोना संकट में छाए आर्थिक संकट से उबरने का रास्ता गांवों से होकर जाता है !
2008 में जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के चपेट में थी तब भारत की अर्थव्यवस्था के कुछ स्थिर और संभले रहने के पीछे की वजह यहां की मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी। एक दशक बाद जब फिर हालात उससे बुरे हैं तो क्या फिर ये गांव ही संकट मोचक की भूमिका में आएंगें?
अमित सिंह
17 Apr 2020
village
Image courtesy: Youtube

कोरोना वायरस महामारी के कारण इस साल एशिया की आर्थिक विकास दर शून्य रह सकती है। यदि ऐसा हुआ तो यह पिछले 60 साल का सबसे खराब प्रदर्शन होगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने यह आशंका व्यक्त की है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि भारत में 40 करोड़ लोग और अधिक गरीबी की चपेट में आ सकते हैं। वर्ल्ड बैंक ने कहा है कि कोरोना वायरस के चलते भारत सहित आठ एशियाई देशों में 40 साल की सबसे भीषण आर्थिक सुस्ती आ सकती है।

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (एनएसएस) और पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वेज (पीएलएफएस) के आंकड़ों पर आधारित हाल के अनुमानों के मुताबिक करीब 14 करोड़ गैर कृषि रोजगारों पर फौरी खतरा मंडरा रहा है। इनमें स्थायी कर्मचारी ही नहीं, दिहाड़ी मजदूर भी शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) की एक नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया गया है कि कोरोनोवायरस के तेजी से फैलने के कारण विशेष रूप से विकासशील दुनिया में हाशिये के लोगों के बीच खाद्य असुरक्षा, कुपोषण और गरीबी बढ़ सकती है।

गोल्डमैन सैश ने यह अनुमान व्यक्त किया है कि कोरोना वायरस संक्रमण तथा इसकी रोकथाम के लिए लागू लॉकडाउन के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर कई दशक के निचले स्तर 1.6 प्रतिशत पर आ सकती है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के मुताबिक देश में अप्रैल के पहले हफ्ते में बेरोजगारी दर 23.4 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि मार्च के मध्य में बेरोजगारी की दर सिर्फ 8.4 फीसदी थी। सबसे ज्यादा चोट शहरों में लगी है। शहरों में बेरोजगारी की दर 30.9 फीसदी पहुंच गई है।

इन खबरों के साथ ही यह भी पढ़ा जाय कि देश में लॉकडाउन लागू होने के बाद बड़ी संख्या में शहरों से गांवों की ओर मजदूर लौट गए। यानी एक तरह से रिवर्स माइग्रेशन हुआ है।

इतने बुरे आंकड़ों के बीच यह खबर भी आई कि मानसून की अच्छी बारिश के मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मद्देनजर फसल वर्ष 2020-21 में 29.83 करोड़ टन खाद्यान्न के रिकॉर्ड उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। राजधानी दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन-2020 के दौरान इसकी घोषणा की गई।

सम्मेलन के दौरान कृषि मंत्रालय की ओर से आगामी फसल वर्ष की तस्वीर पेश की। इसके मुताबिक फसल वर्ष 2020-21 के दौरान फसल उत्पादन का लक्ष्य 29.83 करोड़ टन निर्धारित किया गया है। इसमें आगामी खरीफ सीजन में 14.99 करोड़ टन और रबी सीजन में 14.84 करोड़ टन खाद्यान्न की पैदावार का लक्ष्य तय किया गया है, जबकि वर्ष 2019-20 में 29.10 करोड़ टन पैदावार हुई।

ऐसे समय में जब शहरों में लोगों को अपनी नौकरियों की चिंता सता रही है और शेयर बाजार गमगीन है तो लाखों लोग गांवों का रुख कर रहे हैं। गांवों में अभी फसल की कटाई का सीजन चल रहा है। यानी इसके बाद गांव के लोगों के हाथ में और भी पैसा आने की उम्मीद है।

आपको याद होगा कि 2008 में जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के चपेट में थी तब भारत की अर्थव्यवस्था के कुछ स्थिर और संभले रहने के पीछे की वजह यहां की मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी। ऐसे में सवाल यह है कि एक दशक बाद जब फिर हालात उससे बुरे हैं तो क्या फिर ये गांव ही संकट मोचक की भूमिका में आएंगें?

इस सवाल के जवाब के लिए हमें अपनी आर्थिक नीतियों पर एक निगाह डाल लेनी चाहिए। उदारीकरण के बाद के दशकों में हमारे भारत के नीति निर्माता ऐसी स्थायी विकास नीतियां तैयार करने में नाकाम रहे हैं जो गांवों में भी खुशहाली लाए। उन गांवों में जहां 70 फीसदी लोग रहते हैं। गांवों के युवाओं को ज्यादा बेहतर नौकरियों के लालच में शहरों की ओर खींच लाया गया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कम से कम ही की गई।

सरकार की नीतियां कुछ यूं थी कि कॉरपोरेट पर लगातार करम किया गया और गांवों पर सितम जारी रहा। खेती को घाटे का सौदा बता दिया गया और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को निराश करने वाली व्यवस्था में बदल दिया गया। खेती को मुनाफे का सौदा बनाने और गांवों की अर्थव्यवस्था में निवेश करने के बजाय पूरा ध्यान गांवों की जनसंख्या को शहरों में खींच लेने पर रहा। इसका परिणाम यह रहा कि शहरों की ओर बड़ी संख्या में पलायन हुआ और गांव वीरान होते गए।

फिलहाल इसका परिणाम भी अच्छा नहीं रहा। जब तक ऊंची आर्थिक विकास दर थी तब तो सब बढ़िया रहा लेकिन एक बार इसके नीचे जाते ही बड़ी संख्या में बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ने लगी। दूसरे शब्दों में कहें तो खेती और फैक्ट्रियों का उत्पादन.. दोनों ही ऊंची आर्थिक विकास दर की भेंट चढ़ चुके थे।

आपको बता दें कि कोरोना वायरस के भारत में पहुंचने से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था की हालत चिंताजनक थी। कभी दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की विकास दर बीते साल 4.7 फीसदी रही। यह छह सालों में विकास दर का सबसे निचला स्तर था।

ऐसे में सवाल यह है कि अब आगे क्या होगा? दरअसल हर आपदा एक मौका देती है। कोरोना संकट के चलते भारत की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट एक ऐसा मौका है जिससे विकास के टिकाऊ मॉडल पर ध्यान दिया जा सके।

ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं का शहर से वापस लौटना वैसे तो अच्छा नहीं है, लेकिन इसे एक संभावना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। दुनिया में रिवर्स माइग्रेशन के कई उदाहरण हैं, लेकिन जिन देशों ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया वे आज प्रभावशाली देशों में गिने जाते हैं।

ऐसे में आर्थिक विकास का नया आधार ‘समझदारी से भरा विकास’ होना चाहिए। जिसमें जबरन पलायन के बजाय गांवों में रोजगार मुहैया कराने का प्रयास किया जाय।

इसके लिए कुछ छोटे छोट कदम ही उठाने होंगे। जैसे कृषि एवं गैर-कृषि क्षेत्र में अल्पावधि एवं दीर्घावधि योजना बनानी होंगी, ताकि शहरों से लौटे युवाओं को खेती से जोड़ा जा सके। खेती उनके लिए रुचिकर, स्वरोजगारोन्मुखी एवं टिकाऊ होनी चाहिए, क्योंकि तभी युवा आकर्षित होकर गांवों में रुक सकेंगे।

कृषि के साथ-साथ पशुधन क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जाए और सब्जी की खेती को विशेष प्रोत्साहन मिले। पंचायत स्तर पर बकरी, सूअर एवं मत्स्य पालन के साथ-साथ डेयरी को बढ़ावा अवश्य दिया जाए। कृषि उपज की खरीद के लिए सरकार तत्परता दिखाए और फसल खरीद की गारंटी भी दे। खेती आधारित उद्योग को भी बढ़ावा दिया जाए।

नि:संदेह यह केवल सरकारी प्रयासों से ही संभव नहीं होगा, लेकिन इसके लिए पहल सरकार को ही करनी होगी। रिवर्स माइग्रेशन करके गांव लौटे मजदूरों में बड़ी संख्या स्किल मानव संसाधन भी है। जो व्यक्ति पैदल ही लंबी दूरी तय कर अपने गांव-घर लौट सकता है वह अपने लिए रोजगार भी अपने गांव में ही पैदा कर सकता है। बस इसके लिए सही माहौल बनाने की जरूरत है।
 
कल्पना करिए कि इस आपदा के बाद अगर अगले कुछ सालों में भारत के 6.4 लाख गांवों में से सिर्फ आधे गांव आत्मनिर्भर हो जाएं तो देश की तस्वीर क्या होगी? तब अर्थव्यवस्था का आधार हमेशा से उपेक्षित रहे भारत में होगा और वहीं भविष्य है।

ऐसे में महात्मा गांधी का वह कथन आज भी प्रासंगिक लग रहा है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित करना होगा, तभी हम ग्रामीण युवाओं को रोजगार देने में सक्षम हो पाएंगे। यानी जरूरत अब नदी के पाट को शहरों से गांव की तरफ बदल देने का है।

अंत में कोरोना संकट ने विकासवाद और विज्ञान व प्रौद्योगिकी को केंद्रीय जीवन मूल्य मानकर रची जा रही मानव सभ्यता को गांधी के ‘हिंद स्वराज’ की तरफ देखने के लिए विवश कर दिया है।

Coronavirus
COVID-19
Lockdown
Corona Crisis
Village
economic crises
Economic Recession
IMF
NSSO Report
IFPRI
agriculture ministry
agricultural crises
Rural Economy

Related Stories

हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...

IMF की SDR की नयी खेप, तीसरी दुनिया के लिए कितनी फायदेमंद है?

महंगाई और बेरोज़गारी के बीच अर्थव्यवस्था में उछाल का दावा सरकार का एक और पाखंड है

कोरोना में कावड़ यात्रा, दो-बच्चे कानून का प्रस्ताव और यूपी में एकदलीय व्यवस्था की आहट!

मृत्यु महोत्सव के बाद टीका उत्सव; हर पल देश के साथ छल, छद्म और कपट

बीच बहस: नेगेटिव या पॉजिटिव ख़बर नहीं होती, ख़बर, ख़बर होती है

पीएम का यू-टर्न स्वागत योग्य, लेकिन भारत का वैक्सीन संकट अब भी बरकरार है

दुनिया बीमारी से ख़त्म नहीं होगी

गोल्ड लोन की ज़्यादा मांग कम आय वाले परिवारों की आर्थिक बदहाली का संकेत


बाकी खबरें

  • otting massacre
    अजय सिंह
    2021: हिंसक घटनाओं को राजसत्ता का समर्थन
    31 Dec 2021
    दिखायी दे रहा है कि लिंचिंग और जेनोसाइड को सामाजिक-राजनीतिक वैधता दिलाने की कोशिश की जा रही है। इसमें भाजपा और कांग्रेस की मिलीभगत लग रही है। वर्ष 2021 को इसलिए भी याद किया जायेगा।
  • dharm sansad
    स्मृति कोप्पिकर
    तबाही का साल 2021: भारत के हिस्से में निराशा, मगर लड़ाई तब भी जारी रहनी चाहिए
    31 Dec 2021
    साम्प्रदायिक विद्वेष और दलित विरोधी हिंसा के चलते हमारी स्थिति पहले भी बहुत ख़राब थी, लेकिन मौजूदा स्थिति कहीं ज़्यादा ख़राब है। नफ़रत 2021 की हमारी नयी पहचान बन गयी और भारत सरकते हुए बहुत नीचे चला…
  • BAJRANG DAL
    रवि शंकर दुबे
    बजरंग दल को नए साल के जश्न से भी परेशानी, काशी की गलियों में नोटिस लगाकर दी धमकी
    31 Dec 2021
    विश्व हिंदू परिषद हर दिन नई धमकियाँ दे रहा है। इस बार विहिप ने धमकी दी है कि अगर नए साल का जश्न मनाया गया तो ठीक नहीं होगा, साथ ही इस दल ने पब और होटल पर संगीन आरोप मढ़ दिए हैं।
  • dharm sansad
    सत्यम श्रीवास्तव
    असल सवाल इन धर्म संसदों के औचित्य का है
    31 Dec 2021
    सवाल हरिद्वार या रायपुर में एक या अनेक लेकिन एक जैसे कथित संतों द्वारा बदतमीज़ी और उकसाने वाले बयानों का नहीं है बल्कि असल सवाल इन कथित धर्म सांसदों के आयोजनों के औचित्य का है।
  • protest
    रौनक छाबड़ा
    हरियाणा: यूनियन का कहना है- नाकाफी है खट्टर की ‘सौगात’, जारी रहेगी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की हड़ताल
    31 Dec 2021
    8 दिसंबर से जारी हड़ताल की कार्रवाई के चलते राज्य भर के सभी 22 जिलों में लगभग 26,000 आंगनबाड़ी केंद्रों में कामकाज पूरी तरह से ठप पड़ा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License