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ऐसा देश हो जिसमें कोई रह सके, खेती कर सके, प्यार कर सके और गाना गा सके... 
संघर्ष एफ्रो-ब्राजीलियाई लोगों का पुराना साथी है, जिसने पहले ग़ुलामी की व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व किया और अब भूमि के अधिकार और प्रकृति की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। क्योंकि संघर्ष का इतिहास ही मानवता को उसके सबसे बुरे अवतार के रूप में अवतरित होने से बचाए रखता है।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
18 Apr 2020
संघर्ष
गोंट्रान गुनेस नेट्टो, तोते की धरती के लोग, 1982

अफ्रीकी महाद्वीप के सहेल क्षेत्र का देश बुर्किना फ़ासो वैश्विक महामारी से बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आधिकारिक तौर पर COVID-19 से हो चुकी मौतों में अफ्रीका में अल्जीरिया के बाद बुर्किना फ़ासो दूसरे स्थान पर है। पिछले सोलह महीने में दो करोड़ की आबादी में से लगभग 840,000 लोग हिंसा और सूखे के कारण विस्थापित हो चुके हैं। मार्च महीने में ही 60,000 लोगों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पिछले साल हुई संयुक्त राष्ट्र की गणना के अनुसार बुर्किना में 680,000 ऐसे निवासी थे जिनको ठीक से भोजन नहीं मिल पा रहा था।

 इस वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि ये संख्या बढ़कर 21 लाख तक पहुँच सकती है। संसाधनों और विचारधाराओं के संघर्षों से यह क्षेत्र पहले ही तनाव-ग्रस्त था; जलवायु परिवर्तन के कारण पड़े सूखे ने सहेल क्षेत्र में और गंभीर कृषि संकट पैदा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) के सहेल समन्वयक जेवियर क्रेच ने हाल ही में कहा कि ‘स्थानीय समुदायों ने उल्लेखनीय उदारता का प्रदर्शन किया है, लेकिन इससे ज़्यादा मुक़ाबला करने में वे सक्षम नहीं हैं। देश पर क्षमता से अधिक दबाव है। आने वाला ख़राब मौसम, सशस्त्र संघर्ष और COVID-19 के साथ मिलकर नाटकीय परिस्थितियाँ पैदा करेगा और आबादी का विस्थापन बढ़ाएगा। समय तेज़ी से गुज़र रहा है, हमारे पास बहुत कम समय बचा है।'
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पियरे-क्रिस्टोफ गम, हत्या, 2017

दुनिया कितनी बदतर हो चुकी है। 1984 में बुर्किना फ़ासो के मार्क्सवादी नेता थॉमस संकारा ने संयुक्त राष्ट्र में भूखमरी मिटाने की ज़रूरत पर बात की। उन्होंने कहा कि उनके देश के प्रत्येक व्यक्ति को एक दिन में कम-से-कम दो वक़्त का भोजन और साफ़ पानी मिलना ही चाहिए। इसी कारण संकारा की समाजवादी सरकार ने कृषि सुधार के ऐजेंडे पर काम किया। इस ऐजेंडे के तहत देश में भूमि-पुनर्वितरण और सूखे से बचने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया। उनकी ‘एक गाँव, एक उपवन’ परियोजना के परिणामस्वरूप पंद्रह महीने में एक करोड़ पेड़ लगाए गए। उनका मानना था कि विदेशी सहायता और भोजन के आयात पर भरोसा करने की बजाये ‘हमें अधिक उत्पादन करना चाहिए’ क्योंकि ‘यह स्वाभाविक है कि जो आपको खिला रहा है वह अपनी मर्ज़ी भी थोपेगा।’ संयुक्त राष्ट्र के भोजन के अधिकार पर विशेष रिपोर्टर जीन ज़िग्लर के अनुसार जब संकारा की नीतियों के चलते बुर्किना फ़ासो में भूखमरी ख़त्म हो रही थी तब उन्होंने कहा था कि ‘हमारे पेट ख़ुद अपनी कहानी सुनाएँगे।’ 1987 में इन्हीं नीतियों के लिए संकारा की हत्या कर दी गई और बुर्किना फ़ासो मुक्ति के महान सपने के खंडहर में बदल गया।
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जोस फ्रांसिस्को बोर्जेस, हे पारिस्थितिक अपराध, 2004

1971 में ब्राज़ीली गायिका ज़ेलिया बारबोसा ने ‘ब्राज़ील: प्रतिरोध के गीत’ नामक एक एल्बम जारी किया जिसमें एडू लोबो और राय गुवेरा का 1964 में लिखा गीत भी शामिल किया: ‘ऐसा देश हो जिसमें कोई रह सके, खेती कर सके, प्यार कर सके और गाना गा सके, बिना इसके कोई कैसे ज़िंदा रह सकता है।'

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ज़ेलिया बारबोसा, दूरदराज़ के इलाक़े और बस्तियाँ, 1968  

ब्राजील और दुनिया के अन्य कई हिस्सों में, बड़े पैमाने पर सामंती जोतदारों और आज के कॉर्पोरेट फ़ार्मों ने हज़ारों लाखों किसानों के हाथों से उत्पादन का साधन और जीने का सहारा छीन लिया है। अपनी ज़मीनों से बेदख़ल कर दिए गए ये लोग, औद्योगिक और कृषि कारख़ानों को अपना श्रम बेचने के लिए मजबूर हो गए। दक्षिणी गोलार्ध में अपनी मिट्टी और जड़ों से दूर हो चुके कृषि व औद्योगिक मज़दूर काम की तलाश में खेत से कारख़ाने और कारख़ानों से खेत की अंतहीन यात्रा में जीवनभर चलते रहते हैं।

अमानवीय शोषण और ज़मीन की भूख के कारण दुनिया भर में भूमि सुधार और यूनीयन बनाने के लिए राजनीतिक आंदोलन शुरू हुए। ब्राजील में 1984 में भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (MST) की शुरुआत हुई। भूमि पर कब्ज़ा कर बस्तियों का निर्माण करने के साथ इस आंदोलन ने सहयोग और एकजुटता की संस्कृति क़ायम की और कृषि श्रमिकों व भूमिहीन ग़रीबों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए सहकारी समितियों का निर्माण किया। इस आंदोलन ने अर्जेंटीना से लेकर हैती और जिम्बाब्वे तक, दुनिया भर के भूमिहीन श्रमिकों को अपना भूमि का अधिकार फिर से हासिल करने के लिए प्रेरित किया है। MST का संघर्ष ज़मीन के मुद्दे से जुड़ा रहा है, लेकिन नस्लवाद, पितृसत्ता, होमोफ़ोबिया जैसे हर प्रकार के सामाजिक उत्पीड़न के ख़िलाफ़ राजनीतिक संघर्ष के रूप से विकसित होते हुए MST आज पूर्ण सामाजिक परिवर्तन का संघर्ष बन गया है। संघर्ष एफ्रो-ब्राजीलियाई लोगों का पुराना साथी है, जिसने पहले ग़ुलामी की व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व किया और अब भूमि के अधिकार और प्रकृति की रक्षा के लिए संघर्ष कर रह है। क्योंकि संघर्ष का इतिहास ही मानवता को उसके सबसे बुरे अवतार के रूप में अवतरित होने से बचाए रखता है।
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डोसियर की तस्वीर

‘ब्राज़ील के लोक-सम्मत कृषि सुधार और भूमि-संघर्ष’— ब्राजील के भूमि संघर्ष के लंबे इतिहास और MST के विचारों और कार्यों पर केंद्रित है। डोसियर के दूसरे भाग में सैंटा केटेरिना राज्य की डियोसियो सेरेकेरा नगरपालिका में तीस साल पहले बनी ‘कोंक्विस्ता ना फ्रन्टियरा (सीमा पर जीत)’ नामक बस्ती के जीवन और कार्यशैली का वर्णन किया गया है। इरमा ब्रुनेटो, जो इस बस्ती में शुरुआत से रह रही हैं, हमें बताती हैं कि ये बस्ती किस तरह से संगठित है, बस्ती के लोग कैसे रहते हैं, कैसे खेती करते हैं, कैसे अपने बच्चों को पढ़ाते हैं, और कैसे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करते हैं। इरमा कहती हैं, ‘हमारे जैसे व्यक्तिवादी समाज में, हम धारा के ख़िलाफ़ तैरते हैं।' लेकिन वो जानती हैं कि बुर्जुआ व्यवस्था की विफलता के कारण संघर्षों और भूखमरी से बर्बाद हो चुकी दुनिया के लिए सहकारी व्यवस्था कितनी आवश्यक है।

ऑक्सफ़ैम और संयुक्त राष्ट्र ने 8 अप्रैल को एक अध्ययन रिपोर्ट जारी किया है। इसके अनुसार COVID-19 के कारण आय या उपभोग में 20% की गिरावट हो सकती है। इसका मतलब यह है कि ग़रीबी में रहने वालों की संख्या 42 करोड़ से बढ़कर 58 करोड़ हो सकती है। तीस वर्षों में यह पहली बार होगा कि ग़रीबी में रह रहे लोगों की संख्या में वृद्धि होगी, और पहली बार ही यह वृद्धि इतनी तेज़ी से होगी। सबसे बुरा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में दिखेगा। बुर्जुआ व्यवस्था के पास इस आपदा का कोई हल नहीं है। दूसरी ओर, MST जैसे समाजवादी संगठन पहले से ही भविष्य के लिए प्रोयोगरत हैं।
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जोओ पेद्रो स्टेडिल MST के राष्ट्रीय नेतृत्व के सदस्य है। कृषि सुधार की अनिवार्यता के बारे में और ये जानने के लिए कि ब्राजील कोरोना आपदा से कैसे निपट रहा है, मैंने उनसे इस हफ़्ते बात की।

आपको क्या लगता है कि ब्राजील का शासक वर्ग देश में ज़मीन की भूख की वास्तविक समस्या का हल क्यों नहीं करता?

ब्राजील दुनिया में सबसे अधिक भूमि-संकेंद्रण वाला देश है (यानी, वहाँ ज़मीन मुख्यत: कुछ ही लोगों के नियंत्रण में है)। इसका कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत है। 400 साल तक ज़मीन पर राजशाही का स्वामित्व था, जो दासों, स्वदेशी लोगों और अफ्रीकियों के श्रम पर निर्भर थे। हमारा प्रभुत्वशाली वर्ग सही मायने में आज भी दास प्रथा पर आधारित है। यह श्रमिकों को ऐसी ‘वस्तु’ रूप में देखता है जिससे काम लिया जा सके।

1888 में दास प्रथा के अंत के बाद हम कृषि सुधार लागू करने का अवसर चूक गए, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका, हैती और लैटिन अमेरिका के अन्य देशों में दास प्रथा ख़त्म होने के बाद से कृषि सुधार हुए। 20 वीं सदी में औद्योगिक पूँजीवाद में प्रवेश करने के साथ हम घरेलू खपत के लिए बाज़ार निर्माण करने का मौक़ा फिर चूक गए। 1960 के दशक में हम फिर से एक अवसर गँवा बैठे जब संयुक्त राज्य अमेरिका भी क्यूबा की क्रांति से डरा हुआ था। कैनेडी प्रशासन भी महाद्वीप की क्रांतियों के विस्तार को रोकने के लिए कृषि सुधारों का पक्ष ले रहा था।

ब्राजील की आर्थिक शक्तियाँ और ब्राज़ील का प्रभुत्वशाली वर्ग बड़े भूस्वामियों, औद्योगिक पूँजी, बैंकों और अंतरराष्ट्रीय कृषि निगमों के गठजोड़ से बनी हैं और ये सारी शक्तियाँ एक साथ मिलकर काम करती हैं। ज़ाहिर है कि ये साझीदार कृषि सुधारों के मॉडल के बजाये एक ऐसे मॉडल को पसंद करते हैं जो कृषि-व्यवसाय को अधिक-से-अधिक केंद्रित बनाए रखता है।

क्या ब्राजील नवफ़ासीवाद के गतिरोध के ख़िलाफ़ एक नयी ऐतिहासिक परियोजना के लिए तैयार है? क्या बोलसोनारो की कोरोना पर प्रतिगामी प्रतिक्रिया से नवफ़ासीवाद में किसी तरह की सेंध लगेगी?

ब्राजील इस समय इतिहास के अपने सबसे बड़े संकट में डूबा हुआ है। हम 2014 से गहरे आर्थिक संकट में घिरे हुए हैं। बढ़ती बेरोजगारी, लाचारी और वित्त पूँजी पर बढ़ती निर्भरता से सामाजिक संकट पैदा हुआ है। इन्हीं परिस्थितियों में दिल्मा के तख़्तापलट और चुनाव में नवफ़ासिवादी सरकार की जीत से राजनीतिक संकट विकसित हुआ है।

कोरोनावायरस के प्रकोप ने इस संकट को हर तरह से गहराया है। सामाजिक दृष्टिकोण से ये संकट और बढ़ गया है क्योंकि  हम दुनिया के दूसरे देशों में देख चुके हैं इससे लड़ने का एक मात्र रास्ता यही है कि मज़बूत सरकार, जन संगठन और सशक्त नेतृत्व सब मिलकर आगे बढ़कर काम करें।

लेकिन मात्र 8% कट्टर अनुयायियों, नवफ़ासिवादियों, पेंटाकोस्टल मतावलम्बियों और लम्पट पूँजीपतियों का प्रतिनिधित्व कर रही नवफ़ासीवादी सरकार इसके बिलकुल उलट है। मेरा मानना है कि कोरोनावायरस लोगों की समझदारी बढ़ाने में और पूँजीपति व मध्यम वर्ग के अवगाव को दर्शाने में हमारी मदद करेगा और जब हम सड़कों पर लौटेंगे, हम फ़ासीवादी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे।

नवफ़ासीवदी सरकार पूरी तरह हतोत्साहित है। ट्रम्प प्रशासन की विचारधारा का पालन करने के अलावा सरकार के पास कुछ नहीं बचा है, वे दोनों एक ही डूबते हुए जहाज़ पर सवार हैं। इस संकट से संयुक्त राज्य साम्राज्य भी पराजित होगा।

गैर-ग्रामीण आबादी कृषि सुधार की अनिवार्यता को कैसे स्वीकार करेगी?

आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और कोरोनावायरस संकट शहरों में रहने वाले 85% आबादी को ये समझाने में हमारी मदद कर रहे हैं कि हमें एक नया नवउदारवादविरोधी, साम्राज्यवादविरोधी आर्थिक मॉडल बनाने की ज़रूरत है। हम आशा करते हैं कि हम सामाज को संगठित करने की नयी मिसाल क़ायम कर सकेंगे।

इनमें से एक मिसाल यह है कि संपूर्ण जनसंख्या के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए हमें पौष्टिक भोजन की आवश्यकता है। केवल छोटे किसान और कृषक ही पौष्टिक भोजन का उत्पादन कर सकते हैं। कृषि-व्यवसायी पौष्टिक भोजन का उत्पादन नहीं करते, ये वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और विशेष रूप से मुनाफ़े में रुचि रखते हैं। यह सामाजिक रूप से ठीक नहीं है।

निकट भविष्य में हमारे पास लोगों को यह समझाने के लिए बेहतर परिस्थितियाँ होंगी कि नये कृषि सुधार केवल भूमि सम्पदा के पुनर्वितरण से किसानों के ही काम नहीं आएँगे। बल्कि यह नये प्रकार के कृषि सुधार नये प्रतिमानों पर आधारित हैं: सभी के लिए पौष्टिक भोजन का उत्पादन करना एक ऐसे कृषि-पारिस्थितिक मॉडल के द्वारा ही किया जा सकता है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर काम करे, पानी बचाए और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय संकटों तथा असमानताओं के ख़िलाफ़ संघर्ष करे। इस नये कृषि सुधार में हमारी खाद्य संप्रभुता क़ायम रखने के लिए कृषि-उद्योग और वैज्ञानिक ज्ञान के उपयोग की सहायता से भी भोजन का उत्पादन होगा। दूसरे शब्दों में, बहुराष्ट्रीय व्यापारियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करने की निर्भरता कम करने के लिए प्रत्येक क्षेत्र अपने भोजन का उत्पादन ख़ुद करेगा। यह सुनिश्चित कर लेने के बाद ही हम अधिशेष भोजन का व्यापार करेंगे कि हमारे सभी लोगों को पर्याप्त भोजन मिल चुका है। हम स्थानीय खान-पान के तरीक़ों और हमारे लोगों की संस्कृति को महत्व देंगे। हम ग्रामीण इलाक़ों सहित पूरी आबादी के लिए शिक्षा सुनिश्चित करेंगे। इस लोक-सम्मत कृषि सुधार से न केवल किसान बल्कि पूरी आबादी को फ़ायदा होगा, जिसका अधिकांश हिस्सा पहले से ही शहरों में रह रहा है।
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सेबास्टियो सालगादो, भूमि के लिए संघर्ष: मानव टुकड़ी का मार्च, 1997

ये ऐसा एजेंडा है जो आगे देखता है और मानवीय चिंता को घृणा के साथ घोलता नहीं हैं।

MST के नेता और कवि अडमार बोगो ने अपनी कविता ‘इट इज़ टाइम टू हार्वेस्ट’ में ऐसे ही दृष्टिकोण के बारे में लिखा है:

इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं
जब सभी सफलताएँ
हमसे दूर जाती हुई दिखती हैं।
लेकिन जो हतोत्साहित नहीं होते वही जीतते हैं
और तलाश करते हैं अपने आत्म-सम्मान में
दृढ़ बने रहने की ताक़त।

समय धीरे-धीरे गुज़र जाता है, लेकिन उसके साथ गुज़र जाती है
सम्राट की महिमा।
जिनके पास हाथ हैं निर्माण करने के लिए
उन्हें उठकर निर्णय लेना होगा
किस दिन वे दर्द को दफ़न कर देंगे

और उठेंगे हर जगह से
कहने के लिए कि समय आ गया काटने का
सबकुछ जो लगाया गया था।
लोग समुद्र के पानी की तरह होते हैं:
वो धीरे-धीरे चलता हुआ भी,
अपनी लहरों के माध्यम से दिखा देता है
कि उसे कभी मोड़ा नहीं जा सकता।

हमने विवेक के रेगिस्तान को पानी दिया
और एक नये अस्तित्व का जन्म हुआ;
ये आगे बढ़ने का समय है कामरेड;
तुम ही वो योद्धा हो जिसे इतिहास ने हमें दिया है।


समय आ गया है कि हम अतीत से विरासत में मिली असमानताओं और दुखों को त्यागकर भविष्य के संभावित - और आवश्यक - आदर्श लोक का निर्माण करें। भविष्य, जिसके लिए मेहनत की ज़रूरत है।

साभार : ट्राईकॉटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान

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