NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
यह पैकेज संख्याओं का है, राहत का नहीं : थॉमस इसहाक
बहुत ही जल्दी हर किसी को इस पैकेज की हक़ीक़त समझ में आती गयी कि इस पैकेज में जो कुछ पैसे दिख रहे थे, वह सही मायने में अल्पावधि में अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत थोड़ी सी रक़म थी।
थॉमस इसाक
26 May 2020
थॉमस इसहाक
Image courtesy: Evartha

वैश्विक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, दोनों ही अर्थव्यवस्थायें इस समय एक ऐसे संकट का सामना कर रही हैं, जो आधुनिक इतिहास में पैमाने और प्रकृति दोनों के लिहाज से अभूतपूर्व हैं। एक तरफ़ जहां महामारी और लॉकडाउन ने आपूर्ति श्रृंखलाओं को छिन्न-भिन्न कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ़ लाखों लोगों ने अपनी रोज़ी-रोटी गंवा दी है और इससे वस्तुओं और सेवाओं की उपभोक्ता मांग में कमी आ गयी है। नतीजतन, जापान ने पहले ही लगातार तीसरी तिमाही में नकारात्मक वृद्धि दर्ज की है और औपचारिक रूप से मंदी के रहने की घोषणा कर दी है। सभी आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) देश मंदी की राह पर हैं। लिहाजा चीन और भारत की अर्थव्यवस्थायें भी लगभग इसी हालत में हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने संकेत दिया है कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था 5% की दर तक सिकुड़ जायेगी। मौजूदा तिमाही के दौरान, विभिन्न अर्थव्यवस्थायें 10-50% के बीच कहीं न कहीं सिकुड़ती जा रही हैं।

सवाल है कि दुनिया भर के नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों ने उपरोक्त आपदा से निजात पाने के लिए आख़िर किस तरह से सोचा है ? लोगों को आय के हस्तांतरित किये जाने की अहमियत को लेकर रूढ़िवादियों के बीच भी सर्वसम्मति है, ताकि अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ाया जा सके। वस्तु एवं सेवाओं को लेकर किसी भी तरह की मुफ़्त योजना की सभी धारणाओं का विरोध करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी अपनी नौकरी गंवा चुके 30 मिलियन से अधिक कामगारों को बेरोज़गारी भत्ता देने के अलावे सबसे बड़ी आय हस्तांतरण (प्रत्येक नागरिक को 1200 डॉलर देने वाली) योजनाओं  को लागू कर रहे हैं। प्रत्यक्ष भूमिका निभाने के लिए लगभग सभी देशों के केंद्रीय बैंकों के पास मात्रात्मक सहजता (अपरंपरागत मौद्रिक नीति का एक रूप,जिसमें कोई केंद्रीय बैंक खुले बाज़ार से लंबी अवधि की प्रतिभूतियों की ख़रीद करता है ताकि धन की आपूर्ति में वृद्धि हो सके और उधार और निवेश को प्रोत्साहित किया जा सके) या हेलीकॉप्टर मनी (जैसा कि अब इसे कहा जाता है) की विभिन्न योजनायें हैं। परंपरावादी मौद्रिक नीति को कम से कम इस समय तो नहीं ही अपनाया जा रहा है। हर कोई जॉन मेनार्ड कीन्स के नाम की क़समें खा रहा है।

इस रुझान को नज़रअंदाज़ करने वाला शायद एकमात्र देश भारत ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है, जो भारत के जीडीपी के 10% के बराबर है। यहां तक कि शेयर बाजार, जिसमें इन सुधारों को लेकर बेहतर असर पड़ना चाहिए था, उसने भी संकेत दिया है कि पैकेज एक धोखा है। प्रधानमंत्री के 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा के बाद सेंसेक्स में 1,000 अंक की तेज़ी आयी थी,लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अगले पांच दिनों में इस पैकेज के आवंटन को लेकर जैसे-जैसे परत-दर-परत स्पष्टीकरण देती गयीं, वैसे-वैसे सेंसेक्स में 2,000 प्वाइंट्स की गिरावट आती गयी।। बहुत ही जल्दी हर किसी को इस पैकेज की हक़ीक़त समझ में आती गयी कि इस पैकेज में जो कुछ पैसे दिख रहे थे, वह सही मायने में अल्पावधि में अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत थोड़ी सी रक़म थी।

भारतीय बैंकों में सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक के अनुसंधान विभाग के मुताबिक़, उस पैकेज का प्रत्यक्ष राजकोषीय प्रभाव महज 2,02,660 करोड़ रुपये या जीडीपी का 1.01% था। बाकी रक़म सभी वित्तीय संस्थानों के ऋण या इन संस्थानों को मिलने वाली मौद्रिक सहायता है या फिर ज़्यादा से ज़्यादा भविष्य में होने वाला ख़र्च है। प्रत्यक्ष राजकोषीय प्रभाव के 2 लाख करोड़ रुपये में से केवल 76,500 करोड़ रुपये (मुफ़्त राशन सहित) ही लोगों को प्रत्यक्ष धन हस्तांतरण में शामिल था।

यह सकल घरेलू उत्पाद का 0.38% है। संक्षेप में कहा जाय,तो यह वही रक़म है,जिसके बारे में कई वित्तीय फ़र्मों के उन प्रवक्ताओं द्वारा बार-बार बताया गया गया है, जिन्हें विभिन्न रिपोर्टों में शेयर बाजार के अजीब-ओ-ग़रीब व्यवहार की व्याख्या करते हुए ज़िक्र किया गया है।

1.5 लाख करोड़ रुपये की कर रियायतें और सार्वजनिक क्षेत्र, खनिज संसाधनों और भूमि के भारी सब्सिडी वाली राहत के बाद कॉर्पोरेट्स के पास असंतोष जताने का कोई कारण नहीं है। हालांकि किसानों और एमएसएमई क्षेत्र के लिए अतिरिक्त ऋण उदारतापूर्वक देने का वादा तो किया गया है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान उनके नुकसान की भरपाई करने या उनके कर्ज़ के बोझ को कम करने के लिए जो कुछ किया गया है,वह बहुत कम है।

केंद्र सरकार के व्यवहार में मैक्रो या समष्टि आर्थिक बोध नहीं दिखता है, आज जिस तरह प्रवासी श्रमिक एक ख़ास प्रतीक बन गये हैं, और जिस तरह से वे एक जगह से दूसरे जगह जाते हुए अपने ही देश में शरणार्थी बन गये हैं, उसे लेकर मानवीय सहानुभूति और ग़रीबों के प्रति चिंता कहीं नहीं दिखती है। लगता है कि शायद उन्हीं नीक-हक़ीम के समूह ने एक बार फिर पर्दे के पीछे से खेल खेल दिया है, जिन्होंने कभी प्रधानमंत्री को नोटबंदी की सलाह दी थी। मैं सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के बयान को बनायी गयी ख़बर की सुर्खी को पढ़कर इतना हैरान था कि उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। सुर्खी कुछ इस तरह थी: "बड़े प्रोत्साहन पर बड़ी राशि ख़र्च होगी; कोई मुफ़्त योजना नहीं”। उन करोड़ों भारतीयों को ‘मुफ़्त वस्तु या सेवा’ मुहैया कराना सरकार का फ़र्ज़ बनता है, जिन्होंने लॉकडाउन के कारण अपनी रोज़ी-रोटी और आमदनी गंवा दी है।

ऐसा करना सरकार के लिए व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण के लिहाज से पूरी तरह तर्कसंगत हो सकता है,लेकिन जो कुछ किया जा रहा है, वह व्यक्तियों और कॉरपोरेट्स के लिए कोई मायने नहीं रखता है। क्या वह कीन्स ही नहीं थे, जिन्होंने अपने जनरल थ्योरी में सुविदित तौर पर कहा था कि "सरकार को लोगों को ज़मीन खोदने और फिर उन्हें भरने के लिए भुगतान करना चाहिए ?"

"देशभक्त" नेताओं की एक नई नस्ल ने कल्पना कर ली है कि महामारी के बाद जो दुनिया होगी, अगर हमने राजकोषीय घाटे की संख्या के खेल के प्रति अपनी अडिग निष्ठा साबित कर दी, और श्रम क़ानूनों को ध्वस्त कर दिया और सार्वजनिक स्वास्थ्य सहित सभी क्षेत्रों और संस्थानों का निजीकरण कर दिया, तो भारत, चीन से भागने वाली कंपनियों द्वारा लायी गयी पूंजी, तकनीक और नौकरियों से लबालब भर जायेगा।

हर कोई लंबे समय तक अपने सपने देखने के लिए आज़ाद है, लेकिन हमें सबसे पहले अल्पावधि के लिए अपने आप को बचाये रखने की ज़रूरत है। यह वही बात है, जिसे उस बाज़ार ने भी ज़ोर-शोर और साफ़ शब्दों में कहा है, जिसे आर्थिक पैकेज के लंबे समय तक दृष्टिकोण को साझा करने में कोई समस्या नहीं होगी। तो क्या ऐसे में नीति निर्धारक इस पैकेज की छठी किस्त को आगे ला पायेंगे, जो मौजूदा संकट के मांग पक्ष को हल कर पाये ?

हमें जिन बातों को लेकर न्यूनतम प्रयास करना चाहिए,वे निम्नलिखित हैं: पहला, उन सभी प्रवासी कामगारों के लिए मुफ़्त सार्वजनिक परिवहन और भोजन और जेब ख़र्च, जो घर जाना चाहते हैं। दूसरा, हर जन धन खाते में 7,500 रुपये ट्रांसफर किया जाय। तीसरा, मनरेगा श्रमिकों के खातों में अग्रिम राशि के रूप में उनके पिछले वर्ष के वेतन की आधी राशि ट्रांसफ़र की जाय। चौथा, जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं,उन सभी को भी मुफ़्त राशन दिया जाय।

हां, आख़िर में इस महामारी के दौरान नीति तैयार करते समय गांधीजी के उस मूलमंत्र को भी याद रखा जाय,जिसमें उन्होंने कहा था-आप उस सबसे ग़रीब व्यक्ति का ख़्याल करें, जिसे आपने कभी देखा हो और अपने आप से पूछें कि आपकी नीति से उस व्यक्ति को क्या लाभ होगा। अब इस पर काम करने का समय आ गया है।

(डॉ. टी एम थॉमस इसाक केरल के वित्त मंत्री हैं। यह आलेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुका है। लेखक की स्वीकृति से इसे हिन्दी में अनूदित कर प्रकाशित किया जा रहा है।)

Thomas Isaac
Narendra modi
Nirmala Sitharaman
Economic package
20 lakh Crore
modi sarkar
Lockdown
economic crisis
Economic Recession
Coronavirus
Epidemic corona Virus

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के घटते मामलों के बीच बढ़ रहा ओमिक्रॉन के सब स्ट्रेन BA.4, BA.5 का ख़तरा 

कोरोना अपडेट: देश में ओमिक्रॉन वैरिएंट के सब स्ट्रेन BA.4 और BA.5 का एक-एक मामला सामने आया

कोरोना अपडेट: देश में फिर से हो रही कोरोना के मामले बढ़ोतरी 

कोविड-19 महामारी स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में दुनिया का नज़रिया नहीं बदल पाई

कोरोना अपडेट: अभी नहीं चौथी लहर की संभावना, फिर भी सावधानी बरतने की ज़रूरत

कोरोना अपडेट: दुनियाभर के कई देशों में अब भी क़हर बरपा रहा कोरोना 

कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब पहुंची 

देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, PM मोदी आज मुख्यमंत्रियों संग लेंगे बैठक


बाकी खबरें

  • Uttarakhand
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तराखंड चुनाव : क्या है युवाओं के मुद्दे
    10 Feb 2022
    उत्तराखंड चुनाव के बीच हमने गढ़वाल के सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दौरा किया और नौजवानों से उनके मुद्दे जानने चाहे ?गढ़वाल के सेंट्रल यूनिवर्सिटी एक तरह से इस राज्य का शिक्षा का केन्द्र है यहां राज्य के…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव का पहला चरण संपन्न, 58 सीटों पर 60.17% मतदान; शामली, खतौली, कैराना में रिकॉर्ड वोटिंग
    10 Feb 2022
    खतौली, शामली और कैराना में इस बार सर्वाधिक मतदान हुआ। कैराना में 76% वोटिंग हुई, तो खतौली में 70 प्रतिशत और शामली में 67.50%  मतदान हुआ। सबसे निचले पायदान पर 52.43% के साथ गाज़ियाबाद रहा।
  • Hijab
    एम.ओबैद
    कर्नाटक के बाद अब यूपी पहुंचा हिजाब-विवाद, चुनाव से पहले ध्रुवीकरण की कोशिश?
    10 Feb 2022
    यूपी के जौनपुर स्थित तिलकधारी सिंह डिग्री कॉलेज की एक मुस्लिम छात्रा ने आरोप लगाते हुए कहा है कि राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर ने उसे हिजाब पहनने को लेकर फटकार लगाई है। 
  • Vijayan and yogi
    भाषा
    विजयन ने केरल के ‘खिलाफ’ टिप्पणी करने पर योगी आदित्यनाथ को आड़े हाथ लिया
    10 Feb 2022
    योगी आदित्यानाथ पर हमला करते हुए माकपा के वरिष्ठ नेता विजयन ने कहा कि अगर उत्तर भारत का राज्य उत्तर प्रदेश केरल की तरह विकास करता तो अधिक शांति और बेहतर जीवन के हालात होते।
  • Madhya Pradesh
    सतीश भारतीय
    मध्य प्रदेश के एक गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अब तक किसी को नहीं मिला आवास
    10 Feb 2022
    आवास योजना को लेकर बिहारीखेड़ा गांव के लोगाें को सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। लेकिन 2011 से पीएम आवास का एक भी व्यक्ति को लाभ नहीं मिला है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License