NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
टिकटॉक पर प्रतिबंध और ट्रंप की जबरन उगाही की नीतियां
एक तरफ़ चीन के बाज़ार को खोलने की मांग की जाती है, दूसरी तरफ़ बाइटडांस पर टिकटॉक को बेचने या अपना काम बंद करने का दबाव बनाया जाता है, इस पूरी प्रक्रिया को चीन अफीम युद्ध की तरह ही देखते हैं। अगर टिकटॉक का अपने यूज़र्स का डाटा रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है, तो फ़ेसबुक या गूगल का उनके यूज़र्स का डाटा इकट्ठा करना भी ऐसा ही ख़तरा पैदा करता है।
प्रबीर पुरकायस्थ
31 Aug 2020
टिकटॉक पर प्रतिबंध और ट्रंप

ट्रंप प्रशासन ने बाइटडांस को टिकटॉक को बेचने या फिर अपनी दुकान बंद करने के लिए 90 दिन का वक़्त दिया है। बाइटडांस एक चीनी कंपनी है, जो टिकटॉक की मालिक है। टिकटॉक के अमेरिकी क्षेत्र व्यापार (जिसमें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भी शामिल हैं) को खरीदने के लिए माइक्रोसॉफ्ट, ओरेकल और ट्विटर जैसी कंपनियां बाइटडांस के साथ बातचीत कर रही हैं। जुलाई में बाइटडांस की कीमत 140 बिलियन डॉलर आंकी गई थी। इसमें से अमेरिका में कंपनी के व्यापार की हिस्सेदारी करीब़ 20 से 50 बिलियन डॉलर की मानी गई थी। चूंकि बाइटडांस को सिर्फ 90 दिन दिए गए हैं, इसलिए उसे अपनी संपत्ति को तेजी से बेचना होगा। ट्रंप की व्यापार और तकनीकी नीतियां किसी जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय साझेदार के बजाए, जबरदस्ती उगाही करने वाली राज्य नीतियों जैसी लगती हैं।

भारत ने जब टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाया था, तब भी बाइटडांस द्वारा भारत में अपनी संपत्तियों को बेचने के लिए रिलायंस के साथ बातचीत की बात सामने आ रही थी। भारत, टिकटॉक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय बाज़ार था, यहां उसके 20 करोड़ पंजीकृत उपोयगकर्ता थे।

भारत और अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों में राष्ट्रीय सुरक्षा को आधार बनाया गया। कहा गया कि एक चीनी सोशल मीडिया कंपनी, उपयोगकर्ताओं के डाटा को चीन की सरकार को उपलब्ध करवा सकती है। अमेरिकी सरकार द्वारा नागरिक डाटा पर राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल खड़ा करना बेहद विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका ने कभी दूसरे देशों की तरफ से उठाए गए इस तरह के सवालों को मान्यता नहीं दी। ना ही अमेरिका ने अपनी कंपनियों के पास इकट्ठा विदेशी नागरिकों के डाटा पर, गुप्तचर संस्थाओं की पहुंच को नियंत्रित करने वाली किसी अंतरराष्ट्रीय नीति पर सहमति जताई है। इन अमेरिकी कंपनियों में फ़ेसबुक और गूगल जैसी कंपनियां शामिल हैं। पिछले साल ही अमेरिका ने भारत को डाटा के स्थानीयकरण (डाटा लोकलाइज़ेशन) करने पर "US ट्रेड रेगुलेशन 301" के तहत धमकी दी थी।

अगर भारतीयों के निजी डाटा को गैर-भारतीय कंपनियों द्वारा इकट्ठा किया जाना खतरा माना जाता है, तो सिर्फ़ चीन की कंपनियों पर ही नियंत्रण क्यों, अमेरिका या दूसरे किसी देश की कंपनी के ऊपर लगाम क्यों नहीं लगाई गई? डाटा स्थानीयकरण के नियमों को कमजोर करने से सीधे तौर पर फ़ेसबुक और गूगल जैसी अमेरिका कंपनियों को फायदा होता दिख रहा है। जस्टिस श्रीकृष्णा कमेटी ने मजबूत डाटा स्थानीयकरण नियमों की पैरवी की थी। हमें सभी देशों और कंपनियों पर समान नियम लागू करना चाहिए। या मोदी सरकार को अमेरिकी या यूरोपीय एकाधिकार से कोई ख़तरा महसूस नहीं होता। आखिर यह एकाधिकार अमेरिका के रणनीतिक ब्लॉक वाले राष्ट्रों का हिस्सा हैं।

टिकटॉक केवल एकमात्र गैर अमेरिकी ऐप थी, जिसने दुनिया भर के सोशल मीडिया क्षेत्र में बड़ा बाज़ार बनाने में कामयाबी पाई। अपने होठ हिलाने वाले डांस वीडियो और मजेदार मीम्स के ज़रिए टिकटॉक ने दुनियाभर में तहलका मचा दिया था। यह दुनिया की सबसे ज़्यादा डाउनलोड की जाने वाली ऐप बन गई, जो फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और यू ट्यूब से भी आगे थी। टिकटॉक के पास 800 मिलियन का एक्टिव यूजर्स बेस था, जबिक फ़ेसबुक के पास 2.7 बिलियन और यू ट्यूब के पास दो बिलियन का एक्टिव यूजर्स बेस है।

बाइटडांस के अलावा वीचैट को भी ट्रंप प्रशासन ने बंद करने का आदेश दिया है। वीचैट बड़े पैमाने पर चीनी छात्रों और अमेरिका में रह रहे प्रवासी चीनियों द्वारा अपने दोस्तों और संबंधियों से मेल-मिलाप करने में उपयोग होता था। इसकी मालिक कंपनी टेंसेंट, दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों में से एक है। टेंसेंट का बाज़ार पूंजीकरण 600 से 700 बिलियन डॉलर है। अपने सोशल मीडिया और संदेश पहुंचाने में उपयोग के अलावा, वीचैट को व्यवासायिक गतिविधियों के लिए भी उपयोग किया जाता था। यह अपने विकसित अनुवाद उपकरणों द्वारा चीन और अन्य जगह के व्यापारियों को आपस में बात करने में मदद करता था। भारत में वीचैट पर प्रतिबंध लगने का मतलब यह है कि हमारे यहां के व्यापारियों को अब चीन के व्यापारियों से बातचीत करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

जब तक अमेरिका सोशल मीडिया और टेलीकॉम में प्रभुत्वशाली था, तब तक तकनीक और बाज़ारू शक्ति पर अमेरिका का पर्याप्त नियंत्रण था। जैसे ही अमेरिका का तकनीक में पिछड़ना शुरू हुआ और वह टेलीकॉम में कीमतों के मोर्चे पर मात खाने लगा, तब राष्ट्रीय सुरक्षा और "पूर्वी एशिया के लोगों से डर" का शिगूफा बनाना शुरू हो गया। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि चीन की कंपनियों को ज़्यादातर बाज़ारों से बाहर रखा जा सके।

एक वीडियो प्लेटफॉर्म को अमेरिका द्वारा तकनीकी जंग का मैदान बनाना अजीबोगरीब लग सकता है। लेकिन जब हम इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से उपजने वाले आर्थिक आंकड़ों का परीक्षण करते हैं, तो हमें यह प्रासंगिक दिखाई पड़ता है। यह प्लेटफॉर्म अपने ऐप्स और उपकरणों का उपोयग मुफ़्त में देने की सुविधा देते हैं। सिर्फ चार सालों में ही बाइटडांस की कीमत 100-140 बिलियन डॉलर तक हो चुकी है, तो यह नई डिजिटल दुनिया में हमारे डाटा की कीमत के बारे में क्या बताता है? इस चीज को समझने के लिए वॉल्ट डिज़्नी कंपनी का उदाहरण लीजिए। 100 से ज़्यादा सालों में इस कंपनी का बाज़ार पूंजीकरण 180-190 बिलियन डॉलर है। जबकि अपने बनने के कुछ ही सालों में बाइटडांस इस आंकड़े को छूती हुई नज़र आ रही थी। वॉल्ट डिज़्नी मिकी माउस पर अधिकार के ज़रिए, "बौद्धिक संपदा एकाधिकारों" की पुरोधा कंपनी रही है।

वॉल्ट डिज़्नी का प्रभुत्व और उभार उत्पादों पर एकाधिकार के ज़रिए सुनिश्चित हुआ। पेटेंट, डिज़ाइन पर कॉपीराइट और दूसरे कानूनी ज़रियों से एकाधिकार बनाया जाता है। वहीं हमारे अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर किए गए व्यवहार का आंकड़ा डिजिटल प्लेटफॉर्म इकट्ठा करते हैं। अब तक इस डाटा के ऊपर अमेरिका का वैश्विक एकाधिकार था। इसकी कंपनियों के केवल चीन का ही डाटा उपलब्ध नहीं था। चीन का बाज़ार एक तरफ बंद था, वहीं टेंसेंट, अलीबाबा और अब बाइटडांस जैसी कंपनियों ने वैश्विक टक्कर और पहुंच की ऐप्स बनाने की अपनी क्षमता दिखाई। कई लोग सोचते हैं कि चीन का अपने डिजिटल क्षेत्र को बंद रखना लोगों पर सेंसरशिप लगाने के लिए किया जाता है। दरअसल लोग यह नहीं समझते कि ऐसा कर चीन अपने डिजिटल बाज़ार को बाहरी कंपनियों से सुरक्षित रखता है और स्थानीय कंपनियों के लिए स्थान बनाता है।

चीन की ऐप्स ने अमेरिकी कंपनियों के वैश्विक प्रभुत्व को जो चुनौती दी है, उसी की वजह से टिकटॉक और वीचैट के ऊपर प्रतिबंध लगाया गया है। सोशल मीडिया क्षेत्र में किसी तरह की हलचल से सबसे ज़्यादा ख़तरा फ़ेसबुक को है, क्योंकि इसका 98,5 फ़ीसदी राजस्व विज्ञापन से आता है, दूसरे शब्दों में कहें तो यह राजस्व फ़ेसबुक अपने ग्राहकों को विज्ञापनदाताओं को बेचकर कमाती है। जैसा हाल में एकाधिकार पर कांग्रेस की एक सुनवाई (US हॉउस ज्यूडीशियरी कमेटी एंटी ट्रस्ट हियरिंग) से पता चलता है, प्रतिस्पर्धा खत्म करने के लिए फ़ेसबुक अपने संभावी प्रतिस्पर्धी को खरीद लेती है, या उसे दबाने के लिए दूसरे तरीके अपनाती है। ऐसे ही एक तरीके के तहत ट्रंप प्रशासन को टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने के लिए उकसाया गया। टिकटॉक को फ़ेसबुक ने अपने लिए अहम खतरे के तौर पर पहचाना था।

चार दिन पहले 'वाल स्ट्रीट जर्नल' ने एक रिपोर्ट में विस्तार से बताया कि कैसे फ़ेसबुक ने बाइटडांस और दूसरी चीनी कंपनियों के खिलाफ कैंपेन चलाया। रिपोर्ट में फ़ेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग की अहम सीनेटर्स और सदन में शामिल लोगों समेत ट्रंप के साथ बैठकों का जिक्र है। इसमें संदेश दिया गया कि चीन अब तेजी से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका के लोगों और उनकी आज़ादी के बीच सिर्फ अमेरिकी तकनीकी कंपनियां ही खड़ी हैं। जर्नल के मुताबिक़, फ़ेसबुक ने 'अमेरिकन एज' नाम के एक समूह को पैसा भी दिया, "जो अमेरिकी आर्थिक शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक प्रभाव में अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के योगदान की प्रशंसा का विज्ञापन करवा रहा था।" फिलहाल पैसा खर्च करने और लॉबिंग के मामले में फ़़ेसबुक सारी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों का नेतृत्व करती है। बाइटडांस और टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने से सबसे ज़्यादा फायदा भी फ़ेसबुक को होगा।

अमेरिका और पश्चिमी देश, दुनिया को नियम आधारित व्यवस्था और कानून के शासन पर उपदेश देते रहते हैं। औपनिवेशिक ताकतों ने तब तक अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों को मान्यता दी, जब तक उन्हें इनसे मदद मिलती रही, जब इनसे उन्हें मदद मिलना बंद हो जाती, तो वे इन्हें फाड़कर फेंक देते। चीन के खिलाफ़ अफीम युद्ध, मुक्त व्यापार की आड़ में लड़ा गया था, मतलब चीन में अफीम बेचने की यूरोपियन कंपनियों की आजादी, जिन्हें उनके साम्राज्यवादी संरक्षकों का समर्थन हासिल था। जबकि उनके खुद के देशों में अफीम बेचना प्रतिबंधित था। यह अफीम भारत से आ रहा था, जो औद्योगिक घराने अफीम का व्यापार कर रहे थे, वे भी भारत की बड़ी पूंजी के अहम हिस्सेदार बन गए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, जो औद्योगिक घराने और बैंक इस अफीम व्यापार के दौर में पैदा हुए, वे वैश्विक वित्त के अग्रणी बन गए।

दुनिया अफीम युद्धों को भूल चुकी है, लेकिन चीन नहीं भूला है। एक तरफ उनके बाज़ार को खोलने की मांग की जाती है, दूसरी तरफ बाइटडांस पर टिकटॉक को बेचने या अपना काम बंद करने का दबाव बनाया जाता है, इस पूरी प्रक्रिया को चीन के लोग अफीम युद्धों की तरह ही देखते हैं। लेकिन यह चुनौती सिर्फ चीन के सामने नहीं है। भारत जैसे देशों को भी समझना होगा कि यह अमेरिका और चीन के बीच की ही लड़ाई नहीं है, जिसमें हमारा कुछ दांव नहीं लगा है। या हमारा दांव चीन के खिलाफ़ लगा है। हमारे सामने जो बड़ी चुनौती है, टिकटॉक तो उसका एक छोटा सा हिस्सा है। चीनी, अमेरिकी या भारतीय- किसी भी एकाधिकारवादी कंपनी को हमारे डाटा का मालिकाना अधिकार देना हमारे लोकतंत्र और डिजिटल अधिकारों के लिए चुनौती है। यह वह मुख्य सवाल है, जिसका हमें समाधान खोजना है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

TikTok Ban and Trump’s Extortionist Policies

Tiktok Ban
Srikrishna Committee
Chinese Companies
Mark Zuckerberg
Facebook
google
data privacy
Opium war
China-US
ByteDance
Monopoly
Digital Rights
alibaba
European Monopolies
US Monopoly

Related Stories

आधार को मतदाता सूची से जोड़ने पर नियम जल्द जारी हो सकते हैं : मुख्य निर्वाचन आयुक्त

क्या ट्विटर के पास केवल शिकायतों के आधार पर सामग्री को हटाने और यूज़र्स को ब्लॉक करने की शक्ति है?

विज्ञापन में फ़ायदा पहुंचाने का एल्गोरिदम : फ़ेसबुक ने विपक्षियों की तुलना में "बीजेपी से लिए कम पैसे"  

बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल

फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये

कानून का उल्लंघन कर फेसबुक ने चुनावी प्रचार में भाजपा की मदद की?

भारती एयटेल में एक अरब डॉलर का निवेश करेगी गूगल, 1.28 फीसदी हिस्सेदारी भी खरीदेगी

अफ़्रीका : तानाशाह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कर रहे हैं

मोदी का मेक-इन-इंडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा श्रमिकों के शोषण का दूसरा नाम

नया बिल, मतदान से वंचित करने के साथ लोकतंत्र पर है हमलाः अपार गुप्ता


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License