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कोरोना और घटिया महंगी किट: हमें बस हाथ धोने का, कुछ पूछने का नहीं!
हम जनता को तो जो सरकार कहे, प्रधानमंत्री जी कहें, वो सब करने का। बस एक काम नहीं करने का। सरकार से, प्रधानमंत्री जी से कुछ भी पूछने का नहीं।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
03 May 2020
कोरोना वायरस
Image Courtesy: Hindustan

भाइयों और बहनों, आइये हम सब मिल कर कोविड-19 अर्थात कोरोना से लड़ाई करते हैं। यह लड़ाई हम सब जनता को मिल कर लड़नी है। कोरोना से यह लड़ाई जनता को प्रधानमंत्री जी के साथ मिल कर लड़नी है।

सबसे पहले यह देखते हैं कि जनता को इस लडा़ई के लिए क्या क्या करना है। कोरोना से जीतने के लिए जनता को घरों में बंद रहना है। जनता के घर में जो काम करने वाली जनता आती है उसे भी अपने अपने घर पर बंद होकर रहना है। पर इस जनता को उस जनता की तनख्वाह बंद नहीं करनी है। जनता को अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देते रहना है। जनता में बहुत सारे छोटे मोटे दुकानदार भी हैं। दवाई, पंसारी, दूध-ब्रेड-अंडे की दुकानों को छोड़कर अन्य सभी को अपनी दुकानें बंद रखनी हैं। पर अपने यहां काम करने वाली जनता को वेतन अवश्य देना है। जनता को किरायेदारों से भी किराया नहीं लेना है।

जनता को यह भी देखना है कि उनके घर के आसपास कोई जनता भूखी न रहे। कोई भूखा दिखाई दे तो उसे खाना खिलाना है। लॉकडाउन को तो सफल बनाना ही है। और प्रधानमंत्री जी के आदेशों का पालन करते हुए जनता को थाली और ताली भी बजानी है। जनता को ही दीये और मोमबत्ती भी जलानी है। जनता को सरकार को दान भी देना है, जिससे कि सरकार कोरोना से लड़ सके। इस दान के लिए सरकार ने एक नया फंड भी बना दिया है।

इधर जनता अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। और उधर सरकार भी अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। सरकार ने सबसे पहले तो कोरोना से लड़ने के लिए एक नया फंड बना दिया है, जिसमें जनता दान दे सके। वैसे तो आपदाओं से लड़ने के लिए एक फंड, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष पहले से ही मौजूद है। उसमें पैसा भी मौजूद है। पर सरकार ने कोविड-19 से लडा़ई के लिए एक नया फंड बना दिया है, पीएम केयर फंड। 

अब यह जो पुराना फंड, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष है, उसमें बड़ा झमेला है। पुराना फंड है तो पुराने ही नियम हैं। उसका ऑडिट होता है और वह आरटीआई (सूचना के अधिकार) के अंतर्गत भी आता है। यानी कि जनता भी मामूली सी फीस जमा कर उसके बारे में  कैसी भी जानकारी प्राप्त कर सकती है। यहां तक कि जनता यह भी पूछ सकती है कि जनता के द्वारा दान दिया गया पैसा कैसे और कहाँ खर्च हुआ।

लेकिन जनता के जो कर्तव्य हैं उसमें दान देना तो शामिल है पर जनता द्वारा कुछ भी पूछना शामिल नहीं है। इसलिए कोविड-19 से लड़ने के लिए एक नया फंड शुरू किया गया है, पीएम केयर फंड। पीएम केयर फंड में इस तरह के कोई झंझट नहीं हैं। न तो तो लेखा परीक्षण (ऑडिट) की औपचारिकता और न ही आरटीआई का झगड़ा। जैसे मर्जी वैसे खर्च करो और चाहे तो मत खर्च करो। वैसे भी इस जैसी ईमानदार सरकार के खर्च करने पर कोई रोक टोक लगनी ही नहीं चाहिये। 

रोक टोक तो रैपिड टैस्ट किट पर भी नहीं होनी चाहिये थी। सरकार जैसी मर्जी खरीदे और जितने की मर्जी खरीदे, किसी को क्या। पर बुरा हो ममता बनर्जी की सरकार का और राजस्थान सरकार का। उन्होंने पकड़ ही लिया कि टैस्ट किट खराब है। बीमारी को पकड़ ही नहीं रही है। हमें बीमारी को पकड़ने वाली किट चाहिए ही नहीं थी। हमें तो ऐसी ही किट चाहिए थी जो बता सके कि बीमारी कम है। यह किट चीन से इसी मकसद से मंगवाई गई थी और किट अपने मकसद में कामयाब भी थी।

ऐसी किट जो बीमारी को कम करके बताये वह बहुत ही काम की किट है। ऐसी किट से लोगों का सरकार में विश्वास बना रहता है। लोगों को लगता है कि सरकार बीमारी से अच्छी तरह से लड़ रही है। वैसे भी जब बीमारी कम निकलेगी तो बीमारी से मरेंगे भी कम लोग। अमेरिका ने, जर्मनी ने, दक्षिणी कोरिया ने ज्यादा टेस्ट कर कौन सा तीर मार लिया। हमारी तरह कम लोगों का टेस्ट करते और कम ही लोगों को बीमार दिखाते। न बीमारी इतनी फैली हुई दिखाई देती और न ही कोविड-19 से इतनी सारी मौतें होतीं। जिसका टेस्ट नहीं हुआ या फिर टेस्ट में नहीं आया (खराब टेस्ट किट की वजह से), वह कोई कोरोना से थोड़ी ही न बीमार हुआ और न ही मरा। मरने की तो और बहुत सी वजह होती हैं। और आजकल किसी भी सरकार की सफलता कोरोना की रोकथाम से ही नापी जा रही है। अमेरिका, चीन, इटली, फ्रांस, यूके, जर्मनी कोई भी कोरोना को मैनेज नहीं कर पाया। आखिर हमारी सरकार ने कोरोना को मैनेज कर ही लिया है।

जहां तक उस टेस्ट किट की कीमत की बात। यह सरकार तो कुछ भी करे, फिर भी ईमानदार ही है। अगर यूपीए सरकार होती तब पता चलता बेईमानी क्या होती है। वैसे भी सारा कसूर तो उन लोगों का है जो लोग कोर्ट में गये। अरे अकल के अंधों, सुप्रीम कोर्ट में जाने की क्या जरूरत थी। आपस में मिल बांट कर खा लेना था और पार्टी फंड में भी दे देना था। बिल्लियां भी खुश रहतीं और बंदर भी खुश होता। अब चार सौ रुपये में क्या खुद कमाओगे और क्या पार्टी फंड में दोगे। 

वैसे भी कोई आपदा आये तो नेता और अफसर पैसा बनाने से बाज नहीं आते हैं। पहले सूखे, बाढ़ और भूकंप से ही नेता और अफसर पैसा बनाते रहे हैं पर अब तो उनके जीवन काल में एक ऐसा अवसर आया है कि कोई प्रकोप पूरे विश्व को परेशान किये हुए है। अब सरकारी नेता और सरकारी अफसर ऐसा सुअवसर हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं। इसी से समझ आया कि जब तक मध्यप्रदेश में सरकार नहीं पलट दी, तब तक लॉकडाउन क्यों नहीं घोषित किया गया। एक और राज्य से कमाने धमाने का मौका मिल गया।

हम जनता को तो जो सरकार कहे, प्रधानमंत्री जी कहें, वो सब करने का। बस एक काम नहीं करने का। सरकार से, प्रधानमंत्री जी से कुछ भी पूछने का नहीं। न ये पूछने का कि घटिया किस्म की किट क्यों खरीदने का। न यह पूछना कि सस्ती किट के ज्यादा पैसा क्यों देने का। जनता को तो बस हाथ धोने का। बार बार हाथ धोने का। इस हाथ धोकर पीछे पड़े कोरोना को हाथ धो धो कर ही हराने का।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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