NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
प्रधानमंत्री निवास में मोर नाचा…किसने देखा? हमने देखा हमने देखा
अभी सब ठीक है, सब अच्छा है और अच्छा ही नहीं, बहुत ही अच्छा है। अगर सब अच्छा न होता तो क्या हमारे प्रधानमंत्री जी मोर के साथ शूटिंग कर रहे होते।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
06 Sep 2020
प्रधानमंत्री निवास में मोर नाचा
Image courtesy: Hindustan Times

देश के हालात चंगे हैं। सब भोत ही चंगा सी। नहीं, नहीं यह मैं नहीं, हमारे लोकप्रिय नेता कह रहे हैं। अरे बबुआ, यह हमारे नेता जी सिर्फ कह ही नहीं रहे हैं अपितु जी भी रहे हैं। अब उन्होंने बोलना कम कर दिया है। अब वे भाषण नहीं देते हैं, भाषण जीते हैं।

tirchi nazar_8.png

देश में कोरोना का कहर तो जारी है ही, यह जीडीपी का रोना और शुरू हो गया है। लेकिन अभी सब ठीक है, सब अच्छा है और अच्छा ही नहीं, बहुत ही अच्छा है। अगर सब अच्छा न होता तो क्या हमारे प्रधानमंत्री जी मोर के साथ शूटिंग कर रहे होते। और उस शूटिंग को जनता को दिखाया जा रहा होता। वैसे भी आखिर कब तक प्रधानमंत्री जी जनता के दुख में दुखी होते रहेंगे। देखो, तुम कोरोना को रो रहे हो, गरीबी को रो रहे हो, बेरोजगारी को रो रहे हो, गिरती जीडीपी को रो रहे हो। पर हमारे प्रधानमंत्री जी जब चाय बेचते थे तो वे इससे भी अधिक गरीबी में रह चुके हैं। अपना घर त्यागने के बाद वे इससे भी लम्बी बेरोजगारी झेल चुके हैं। वे स्वयं बताते हैं कि उनको तो जीवन यापन के लिए भिक्षा तक मांगनी पड़ी थी। और एक तुम हो कि बस इतने मात्र से ही परेशान हो गए हो।

मोदी जी ने जो मोर के साथ शूटिंग की, उसमें पूरा एक दिन तो लगा ही होगा। हो सकता है ज्यादा समय भी लगा हो। अब जो व्यक्ति इतने वर्षों से दिन में बीस इक्कीस घंटे जनता के लिए, देश के लिए काम करता है। जो कुछ करता और सोचता है, सिर्फ आप ही के लिए ही। क्या वह अपने लिए एक दो दिन भी नहीं निकाल सकता है। यह शूटिंग इतना आसान काम नहीं है, प्रधानमंत्री जी तक को चार चार बार ड्रेस बदलनी पड़ी। तब जा कर शूटिंग मुक्कमल हुई। ठीक है, थोड़ा बहुत स्पेशल इफेक्ट्स का भी कमाल था, पर मोर बहुत ही खुश थे, नृत्य कर रहे थे, प्रधानमंत्री जी के हाथों से दाना चुग रहे थे। फिर भी प्रधानमंत्री जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं। तुम्हारे दुखों का गम उन्हें मोरों की संगति का लुत्फ भी नहीं उठाने नहीं दे रहा था। बेचारे प्रधानमंत्री जी। तुम्हारे दुखों पर दुखी होने के अलावा वे कर ही क्या सकते हैं।

माना कि तुम दुखी हो। हो सकता है तुम्हारा रोजगार छूट गया हो, आमदनी का कोई साधन नहीं हो। यह भी संम्भव है कि कोरोना के कारण तुम्हारे घर खानदान में कोई मर गया हो। उसे समय पर और उचित इलाज नहीं मिल पाया हो। मिला होता तो शायद बच जाता। पर सरकार इस मामले में क्या करे। अब यह तो कर नहीं सकती है कि सबको समय पर  उचित इलाज मिल ही जाये। पर इतना इंतजाम तो किया ही हुआ है न कि जिन्हें समय पर उचित इलाज मिलना चाहिए, उन्हें तो मिल ही जाता है। मेहनत करो, तुम भी उन खास लोगों में शामिल हो जाओ, तो तुम्हें भी समय पर और उचित इलाज मिलेगा। मेहनत खुद नहीं करोगे और दोष सरकार को दोगे।

प्रधानमंत्री जी तो आपके गम में शरीक होना चाहते हैं। आपका गम गलत करना चाहते हैं। इसीलिए तो उन्होंने मोर की शूटिंग की और वीडियो इस विपत्ति काल में भी आपको दिखाया जिससे आपका मन बहल सके, थोड़ा गम दूर हो सके। जरा सोचिए, जो व्यक्ति पक्षियों से इतना प्रेम करता है वह संपूर्ण मानव जाति से, जी हाँ, आपसे कितना प्रेम करता होगा। जो व्यक्ति इतना प्रकृति प्रेमी है, उसमें क्या राग द्वेष भरा हो सकता है। प्रकृति से इतना प्रेम करते हुए भी मोदी जी आपके कल्याण के लिए प्रकृति को, नेचर को कुरबान करने के लिए तत्पर रहते हैं। आप उनके भाषणों में भी प्रकृति, भाषणों में ही प्रकृति के प्रति प्रेम देख सकते हैं। यदि उनके कार्यकलाप में प्रकृति का बलिदान दिखता है तो यह अपने लिए नहीं, सिर्फ और सिर्फ आपके लिए है, आपके कल्याण के लिए है।

मोर से खेलने के बाद मोदी जी ने 'मन की बात' की। मन की बात में उन्होंने अपने मन की दो बातें बताईं। पहली तो यह कि आप खिलौने बनाइये। रफाल हम असली भले ही फ्रांस से मंगवायें या बुलेट ट्रेन जापान से, पर उनका खिलौना तो यहाँ बना ही सकते हैं न। उससे हमारा देश कितना आत्मनिर्भर बनेगा। और रफाल ही क्यों, टैंक, असॉल्ट राइफल, बुलेट ट्रेन, सभी के खिलौने हम यहीं बना सकते हैं। हमें, सभी को खिलौने बनाने के मामले में देशभक्त और आत्मनिर्भर बनना बहुत ही जरूरी है। हमारे बच्चे अगर देश में बने खिलौनों से खेलेंगे तो उनमें देशभक्ति और आत्मनिर्भरता की तीव्र भावना जाग्रत होगी और वे बडे़ हो कर देश में और भी बड़े बड़े खिलौने बनायेंगे।

दूसरी 'मन की बात' जो मोदी जी ने कही वह थी देसी कुत्ते पालो। यह बात वे अमीरों से नहीं गरीबों से कह रहे थे। 'मन की बात' गरीबों का प्रोग्राम है। रेडियो पर जो प्रसारित होता है। तो 'मन की बात' में प्रधानमंत्री जी ने देश की जनता से कहा कि कुत्ते पालो, और कुत्ते देसी पालो। घर में खाने के लिए कुछ नहीं है, बच्चे भूखे पेट सो रहे हैं, पर कुत्ते पालो। देखा कितना पशु प्रेम है, नेता जी के निर्मल हृदय में। और जो हृदय इतना निर्मल हो, क्या वह आपसे, अपनी प्रजा से प्रेम नहीं करता होगा? आप क्यों चाहते हैं कि वह कोरोना की, भुखमरी की, बेरोजगारी की, छात्र छात्राओं की, गिरती जीडीपी की बात 'मन की बात' में कर अपने को भी दुखी करे और आपको भी।

आपको जो देसी कुत्ते पालने के लिए कहा गया है, आप देखिए, वहाँ भी देशभक्ति और आत्मनिर्भरता कूट कूट कर भरी है। कुत्ता पालो, वह भी देशी यानी भारतीय। यही देशभक्ति और आत्मनिर्भरता है। अमीर लोग भले ही न मानें। वे जर्मन, ऑस्ट्रेलियाई या अंग्रेजी कुत्ता पालें, पर आपको मोदी जी की बात माननी ही है। आपको देशी ही पालना है। वैसे अभी अखबार में खबर आई है कि सीआईएसएफ मेट्रो रेल की सुरक्षा के लिए बेल्जियन नस्ल के कुत्ते खरीद रही है। लेकिन बुरा मत मानिये, मोदी जी जो कहते हैं उस पर सिर्फ हमें, आम लोगों को अमल करना होता है। खास लोग जो मरजी कर सकते हैं।

'जब रोम जल रहा था तब नीरो भी तो बांसुरी बजा रहा था'। और अब भी...

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Narendra modi
BJP
Coronavirus
COVID-19

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कथित शिवलिंग के क्षेत्र को सुरक्षित रखने को कहा, नई याचिकाओं से गहराया विवाद

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

उर्दू पत्रकारिता : 200 सालों का सफ़र और चुनौतियां

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला


बाकी खबरें

  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड: विकास के नाम पर विध्वंस की इबारत लिखतीं सरकारें
    18 Sep 2021
    देहरादून में जोगीवाला से पेसिफिक गोल्फ सिटी तक, सहस्त्रधारा रोड को फोर लेन सड़क में बदलने का कार्य शुरू हो चुका है, इसके लिए लगभग 2,200 पेड़ों को काटा जायेगा, जिसके लिये प्रशासन द्वारा पेड़ों को चिह्नित…
  • जांच पर और सवाल करते हैं 9/11 मामले में एफबीआई के सार्वजनिक हुए दस्तावेज 
    अमिताभ रॉय चौधरी
    जांच पर और सवाल करते हैं 9/11 मामले में एफबीआई के सार्वजनिक हुए दस्तावेज 
    18 Sep 2021
    9/11 हमलों की साजिश में सऊदी अरब की कथित सांठगांठ के बारे में लंबे समय से गोपनीय रखे गए एफबीआई के दस्तावेजों का खुलासा कर दिया गया है, जिसके मुताबिक अमेरिका में रह रहे सऊदी के कुछ धार्मिक अधिकारियों…
  • Moplah Rebellion
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    भारतीय मुसलमानों से 'ख़तरे' को भड़काने के लिए संघ परिवार कर रहा है मोपला विद्रोह का इस्तेमाल
    18 Sep 2021
    मोपला विद्रोह पर राम माधव की टिप्पणी भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाने और जीने के बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए यह आरएसएस की इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने वाली ही एक ओर साज़िश है।
  • Cartoon click
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: सबकुछ बिक जाएगा... काग़ज़ के मोल...
    18 Sep 2021
    जब ऐसे उपहारों या स्मृति चिह्न की भी नीलामी हो जिसे राष्ट्रीय संग्रालय में सहेज कर रखना चाहिए, ताकि आने वाली नस्लें प्रेरणा लें, तो कई सवाल और शंकाएं मन में उठती हैं।
  • Mahendra Pratap
    अनिल सिन्हा
    राजा महेंद्र प्रतापः इतिहास से मोदी का वही खिलवाड़ 
    18 Sep 2021
    असल में मोदी और उनका संघ परिवार आज़ादी की एक सांप्रदायिक कथा तैयार करने में लगे हैं। इसमें क्रांतिकारियों के नाम का इस्तेमाल ख़ासतौर पर होता  है जिनमें से शायद ही किसी का वास्तविक संबंध आरएसएस या…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License