NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
व्यंग्य
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते
उधर अमरीका में और इधर भारत में भी ऐसी घटनाएं होने का और बार बार होने का कारण एक ही है। वही कि लोगों का सिर फिरा दिया गया है। सिर फिरा दिया जाता है और फिर एक रंग, एक वर्ण या एक धर्म अपने को दूसरे से अधिक श्रेष्ठ समझने लगता है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
29 May 2022
satire

(यह एक व्यंग्य लेख है। यह लेख किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करता है। अपितु व्यंग्य द्वारा हर तरह की हिंसा का विरोध करना ही इस लेख का मंतव्य है-लेखक)

ये कहां आ गए हम? मन तो यही पूछने को करता है। कम से कम अब तो बस यही पूछने को मन करता है कि हम कहां आ गए हैं। अमरीका में भी और भारत में भी। कहां आ गए हैं हम?

अमरीका में अभी, इसी सप्ताह एक घटना घटी। एक अट्ठारह वर्षीय सिरफिरे नौजवान ने एक स्कूल में घुस कर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। रिपोर्ट्स हैं कि उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में हिस्पैनिक नस्ल के बच्चे अधिक थे। वैसे वह नौजवान सिरफिरा नहीं था, बस उसका सिर फिरा दिया गया था। उसके दिलो-दिमाग में एक रंग विशेष के प्रति नफ़रत भर दी गई थी। उसका सिर फिरा दिया गया था उसके दिमाग में यह भर कर कि गोरे श्रेष्ठ होते हैं। और साथ ही यह भी कि काले और हिस्पैनिक नस्ल के लोग इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि गोरे कुछ दिनों में कम हो जाएंगे।

लेकिन हम अमरीकियों की तरह से गिरे हुए नहीं हैं कि गोरे रंग पर गुमान करें। हम तो गुमान करते हैं अपनी जाति पर, अपने धर्म पर। अभी मध्यप्रदेश में एक बुजुर्ग की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि बुजुर्ग, जो कि शायद मानसिक रूप से ठीक नहीं थे, अपना नाम नहीं बता पा रहे थे। और नाम नहीं बता पा रहे थे तो उनका धर्म कैसे पता चलता। तो एक व्यक्ति ने, जिसका सिर फिरा दिया गया था, उस बुजुर्ग पुरुष को इतने थप्पड़ मारे कि वह बुजुर्ग मर गया। अब बताओ, कोई व्यक्ति जो नाम भी न बताए, आधार भी न दिखाए, और इस प्रश्न का उत्तर भी न दे कि क्या तू मोहम्मद है, तो उसको जीने का अधिकार है क्या? कम से कम इस सिर फिरे माहौल में तो नहीं ही है।

उधर अमरीका में और इधर भारत में भी ऐसी घटनाएं होने का और बार बार होने का कारण एक ही है। वही कि लोगों का सिर फिरा दिया गया है। सिर फिरा दिया जाता है और फिर एक रंग, एक वर्ण या एक धर्म अपने को दूसरे से अधिक श्रेष्ठ समझने लगता है। वहां गोरा रंग अपने को श्रेष्ठ समझता है तो यहां सवर्ण और हिन्दू धर्म। वहां गोरों को यह बताया जाता है कि दूसरे तेजी से बढ़ रहे हैं तो यहां हिन्दुओं को भी यही समझाया जाता है कि दूसरे यानी मुसलमान तेजी से बढ़ रहे हैं। ये बातें कितनी भी झूठी क्यों न हों, पर जब सिर फिराया जाता है तो बड़े बड़े पढ़े-लिखों का सिर फिर जाता है।

यह सिर फिरना कोई नई बात नहीं है। न यहां भारत में और न ही वहां, अमरीका में। पर हमारे यहां यह सिर फिरने की बात पिछले सात आठ साल से अधिक बढ़ गई है और अमरीका में तो पहले से ही काफी अधिक बढ़ी हुई है। जहां अमरीका में सिर फिरने के बाद बस गोलियां चलाई जाती हैं, वहीं हमारे यहां भारत में यह काम पीट कर, कूट कर, लाठी डंडों से मार कर, चाकू छूरी घोंप कर, जला कर, यानी कई तरीकों से किया जाता है। अमरीका और अमरीकीयों को आजादी भी हिंसा से ही मिली है इसलिए वे तो हिंसा के समर्थक हैं लेकिन हमारा देश और हमारे देश के निवासी तो पहले महात्मा बुद्ध और अब महात्मा गांधी के जमाने से ही अहिंसा के पुजारी हैं।

हमारी अहिंसा जरा अजीब सी है। महात्मा बुद्ध और गांधी की अहिंसा से अलग। भगवान महावीर की अहिंसा से अलग। हम यहां गरीबों के प्रति, दलितों के प्रति, अल्पसंख्यकों के प्रति, विधर्मियों के प्रति हिंसा को अहिंसा ही कहते हैं। हमारा अहिंसक धर्म और समाज हिंसा के मामले में दलितों के प्रति हमेशा से ही दयालु रहा है। दलितों के कान में पिघलता हुआ सीसा डलवाने की बातें भी हमारी अहिंसा में ही शामिल रही हैं और शंम्बूक की कहानी भी। आज भी दलितों को मंदिर में न घुसने देना, कूएं से पानी न भरने देना, घोड़ी पर सवार हो तो गोली मार देना, इस तरह की सारी बातें अहिंसा ही तो हैं। और यही है हमारी अहिंसा, हम सबकी अहिंसा।

पर अब हमारी अहिंसा ने जरा और जोर मारा है। अब हम विधर्मियों के प्रति भी अहिंसक हो गए हैं। उनके लंचबॉक्स खुलवा कर देखने लगे हैं। उनके फ्रिज में रखे मांस के टुकड़े में गौमांस की कल्पना करने लगे हैं। अगर वे गौवंश ले कर जा रहे हों तो गौकशी की सोचने लगते हैं। नाम पूछ कर, आधार देख कर, पेंट उतरवा कर उनकी पहचान करने में लगे हैं। और फिर उन पर भी अपनी अहिंसा दिखाने में जुट जाते हैं।

बात हम कर रहे हैं अमरीका में हो रही और भारत में हो रही हिंसा की। दोनों की तुलना कर रहे हैं। अमरीका में हिंसा होती है बंदूक से। अमरीका में बंदूक रखना कानूनी है। संविधान ने ही उनको यह आजादी दी हुई है। किसी का सिर फिर जाता है तो स्कूल में गोलीबारी कर देता है। कोई दूसरा सिर फिरने पर मॉल में गोलियां चला देता है। कोई रेस्तरां में गोलीबारी करता है तो कोई चर्च में। पर भारत में बंदूक और गोलियां जरा मुश्किल से ही मिलती हैं। पर हमारे पास तो मात्र लाठी है, भाला है, त्रिशूल है, चाकू छुरी है, और कुछ नहीं तो थप्पड़ तो हैं ही, मुक्के घूंसे भी हैं। सिर फिरने लगे तो हम तो उनसे ही अपना सिरफिरापन दिखा सकते हैं।

सरकार जी, आपसे से बस एक गुजारिश है। अगर आप देश के संविधान में बदलाव कर दें और हमें भी अमरीका की तरह से बंदूक रखने की आजादी दिला दें तो देश की बहुसंख्यक जनता को बड़ी सहूलियत हो जाएगी। अहिंसा के पालन में जो दिक्कतें आ रही हैं वे खत्म हो जाएंगी। थप्पड़ जड़ने, मुक्के घूंसे मारने, हाथों लातों से कूटने में समय तो लगता ही है, हाथ पैर में दर्द भी हो जाता है। एक बार बंदूक मिल जाए तो तो फिर सरकार जी, आपकी सरकार और आपकी पार्टी जितना भी सिर फिरायेगी, फिरा लेंगे। एक बार बंदूक मिल जाए तो फिर सिर फिराये गये लोग कपड़ों से पहचानते ही, खाने से पहचानते ही, दाढ़ी से पहचानते ही, हाथ पर 786 पढ़ते ही, फटाफट गोली चला देंगे। आपके और आपकी पार्टी के सपनों का हिन्दू राष्ट्र बना देंगे।

ये जो सिरफिरापन हम दिखाते हैं, जो हमारा सिर फिरा दिया जाता है न, उससे हमारा कोई भी भला हो न हो पर उनका भला जरुर हो जाता है जो हमारा सिर फिराते हैं। सिर हमारा फिराया जाता है और मजे कोई और लूट रहा है। हमारा सिर फिराने से उन्हें पावर भी मिलती है, पैसा और सत्ता भी। और हमें क्या मिलता है? हम कहां से कहां पहुंच जाते हैं बस यूं ही सिर फिराते फिराते।

(व्यंग्य स्तंभ तिरछी नज़र के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Communal Hate
Hatred
BJP
Modi government
Communalism

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

तिरछी नज़र: 2047 की बात है

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कटाक्ष: एक निशान, अलग-अलग विधान, फिर भी नया इंडिया महान!

तिरछी नज़र: हम सहनशील तो हैं, पर इतने भी नहीं

कटाक्ष : बुलडोज़र के डंके में बज रहा है भारत का डंका


बाकी खबरें

  • UAPA
    सुहित के सेन
    सुप्रीम कोर्ट को राजद्रोह क़ानून ही नहीं,यूएपीए और एनएसए के दुरुपयोग पर भी विचार करना चाहिए
    22 Jul 2021
    राजद्रोह क़ानून को हटाने में मदद तभी मिलेगी, जब अदालत का ध्यान नागरिकों के असहमति और स्वतंत्रता के अधिकार पर होगा
  • नए अध्ययन में पाया गया कि आधुनिक मानवों में है 7% जीनोम की विशेषता
    संदीपन तालुकदार
    नए अध्ययन में पाया गया कि आधुनिक मानवों में है 7% जीनोम की विशेषता
    22 Jul 2021
    प्राचीनकाल से ही आधुनिक मानव डीएनए में बदलाव होने से लगातार विकसित हो रहे हैं। मगर सवाल यह है कि हम कितने अनोखे हैं?
  • पेगासस का खुलासा भारत की ताक़त को कमज़ोर करता है  
    प्रज्ञा सिंह
    पेगासस का खुलासा भारत की ताक़त को कमज़ोर करता है  
    22 Jul 2021
    हमारा देश जो ख़ुद को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में परिभाषित करता है, वह अपने नागरिकों की ग़ैर-क़ानूनी निगरानी करने के गुनाह की उपेक्षा नहीं कर सकता।
  • बिहार: 'ज़हरीली शराब से लगातार होती मौतों पर सरकार नहीं है गंभीर'
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार: 'ज़हरीली शराब से लगातार होती मौतों पर सरकार नहीं है गंभीर'
    22 Jul 2021
    पश्चिम चंपारण के रामनगर व लौरिया क्षेत्र में विगत दिनों जहरीली शराब के कारण 15 लोगों की दर्दनाक मौत की खबर सुनने के बाद सिकटा विधायक वीरेन्द्र प्रसाद गुप्ता के नेतृत्व में भाकपा-माले की एक उच्च…
  • भारत एक मौज में संजय राजौरा और अनुराग माइनस वर्मा
    न्यूज़क्लिक टीम
    भारत एक मौज में संजय राजौरा और अनुराग माइनस वर्मा
    22 Jul 2021
    भारत एक मौज के इस एपिसोड में संजय राजौरा अनुराग माइनस वर्मा से उनके सोशल मीडिया कंटेंट के बारे में बात कर रहे हैं। इसके साथ ही वह उनसे एक दलित व्यक्ति के रूप में उनके अनुभवों, बॉलीवुड में सवर्ण और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License