NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र: 'सरकार जी' ने भक्तों के साथ की वर्चुअल मीटिंग
दीपावली के शुभ अवसर पर आयोजित उस मीटिंग में सरकार जी ने सबसे पहले भक्तों को भक्त होने का महत्व बताया। भक्तों को बताया कि वह चमचों से किस तरह अलग हैं।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
31 Oct 2021
satire
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार

पर्वों का मौसम है। सभी भक्त लोग अपने अपने प्रभु की पूजा में लीन हैं। तो इस बार ‘सरकार जी’ ने सोचा कि क्यों न अपने भक्तों से मिला जाए, अपने भक्तों से बातचीत की जाए। इसलिए सरकार जी ने इस दिवाली के शुभ अवसर पर अपने भक्तों से बातचीत के लिए वर्चुअल मीटिंग रख ली। उस वर्चुअल मीटिंग में पूरे देश से हजारों भक्त आए।

वैसे तो सरकार जी को सुनने की आदत बिल्कुल भी नहीं है। सरकार जी को सुनने की नहीं, सिर्फ और सिर्फ सुनाने की, मतलब अपने मन की बात सुनाने की आदत है। सरकार जी तो अपने सभासदों की भी नहीं सुनते हैं, तो भक्तों की क्या सुनते। सरकार जी बात-चीत में भी सिर्फ बातें करते हैं, चीत को उससे दूर ही रखते हैं। सरकार जी तो साक्षात्कार भी सिर्फ उन्हीं को देते हैं जो सरकार जी से कुछ खास पूछते नहीं हैं बल्कि सिर्फ सरकार जी की ही सुनते हैं।

दीपावली के शुभ अवसर पर आयोजित उस मीटिंग में सरकार जी ने सबसे पहले भक्तों को भक्त होने का महत्व बताया। भक्तों को बताया कि वह चमचों से किस तरह अलग हैं। सरकार जी ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा, "भक्तों, तुम मेरी वजह से ही भक्त हो। मेरे से पहले तुम्हें, नेताओं के चमचों को भक्त नहीं, चमचा ही कहा जाता था। पर अब मेरी वजह से ही तुम्हें, सिर्फ मेरे चमचों को ही भक्त कहा जाने लगा है। अन्य नेताओं के चमचों को अभी भी चमचा ही कहा जाता है। भक्त तो सिर्फ मेरे चमचों को ही कहा जाता है। मुझ सरकार जी की वजह से ही तुम्हें भक्त कहा जाता है।"

सरकार जी ने अपने भक्तों को आगे समझाया, "चमचों को थोड़ी बहुत स्वतंत्रता होती है पर भक्तों को तो बिल्कुल भी स्वतंत्रता नहीं होती है। भक्तों को तो अपने प्रभु की सभी बातें माननी होती हैं, सभी बातों की प्रशंसा करनी होती है। चमचा अपने नेता को छोड़ सकता है, उसकी आलोचना कर सकता है। पर भक्त अपने मालिक को, अपने प्रभु को कभी भी नहीं छोड़ सकता है। वह अपने मालिक की आलोचना करने की बात तो छोड़ो, आलोचना सुन भी नहीं सकता है। अपनी भक्ति निभाने के लिए भक्त अपने प्रभु की आलोचना करने वालों के प्राण तक ले सकता है। और यदि भक्त को प्रभु के लिए अपने प्राण भी न्योछावर करने पड़ें तो भी वह पीछे नहीं हटता है"।

इतनी बात के बाद, यहां पर कुछ बातचीत हुई। सरकार जी ने एक बुजुर्ग भक्त से पूछा कि आप कहां से हैं। 

भक्त ने जवाब दिया, "जी, जयपुर से"। 

सरकार जी ने आगे पूछा, "आप कब से मेरे भक्त हैं"। 

बुजुर्ग ने जवाब दिया, "जी, जन्म से"।

सरकार जी को आश्चर्य हुआ, "जन्म से"! 

उस बुजुर्ग भक्त ने कहा, "जी, हम सभी को यही उत्तर रटाया गया है"।

"मुझे पता है कि मेरे भक्तों ने कभी भी मेरा साथ नहीं छोड़ा है"। सरकार जी ने वार्ता को आगे बढ़ाया, "मेरे भक्त हमेशा मेरे हर कार्य को उचित ठहराते रहे हैं। मेरे द्वारा की गई नोटबंदी से आप भक्तों को भी बहुत कष्ट हुआ होगा। आप लोग भी लाइनों में लगे रहे होंगे। पर आपने उफ़ तक नहीं की। बल्कि नोटबंदी के लाभ ही गिनाते रहे। उसके बाद जीएसटी लगाने से भी बहुत सारे भक्तों का कारोबार ठप हो गया था। परंतु मेरे भक्त मेरे ही बने रहे। हालिया महामारी में भक्तों को भी अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिला, आक्सीजन भी नहीं मिली, भक्तों तक को दवाइयां नहीं मिलीं पर वे विचलित नहीं हुए। लाखों भक्तों के परिजन परलोक सिधार गए। लाशों की पंक्तियां लग गईं। मेरे भक्तों को क्लेश तो हुआ पर उनकी भक्ति मुझ में कम नहीं हुई"।

अब फिर बीच में वार्तालाप का सैशन प्रायोजित था। एक अन्य भक्त उठा। सरकार जी ने उससे पूछा, "आप कहां से हैं"।

उसने उत्तर दिया, "जी आगरा से"। 

सरकार जी ने मजाक किया, "आगरा की तो दो ही चीजें प्रसिद्ध है, ताजमहल और पागल खाना। आप इनमें से कहां से हैं"। 

"जी पागल खाने से", भक्त ने उत्तर दिया। 

"अच्छा! तो आप पागल खाने में नौकरी करते हैं"।

"जी नहीं, मैं तो वहां इलाज के लिए भर्ती हूं"। भक्त ने बताया। सारे भक्त हंसने लगे।

तभी एक और भक्त उठ खड़ा हुआ। वह बीच में ही बोलने लगा, "सरकार जी, सरकार जी, यह महंगाई बहुत ही बढ़ गई है। पेट्रोल डीजल और खाने के तेल के दामों ने तो जीना ही दूभर कर दिया है..."। वह आगे कुछ बोलता इससे पहले ही पीछे से कोई आया और उसने उसे दबा कर बैठा दिया। 

"भक्तों", सरकार जी ने आगे कहा, "मेरी लीला अपरंपार है। मैं अंतर्यामी हूं। मुझे सब कुछ पता है। तुम्हारे बिना बताए ही मैं तुम्हारे सभी कष्ट समझता हूं। मुझे पता है कि आजकल तुम लोग महंगाई नाम के दानव से परेशान हो लेकिन अभी भी मेरे साथ ही हो। भक्तों, तुम्हें तो पता ही है कि भगवान भक्तों का परीक्षा लेते रहते हैं। तो यह महंगाई मेरे द्वारा ली गई तुम भक्तों की परीक्षा ही है। यदि मैं चाहूं तो इस महंगाई को जब चाहूं समाप्त कर सकता हूं परंतु मैं अभी यह चाह नहीं रहा हूं। अभी मेरे भक्तों की परीक्षा बाकी है"। 

सरकार जी ने कहा, "इस महंगाई को घटाना, इस मंहगाई को कंट्रोल करना तो मेरे बाएं हाथ का खेल है। पर मैं अभी अपने दाएं हाथ से काम कर रहा हूं। या सच में कहा जाए तो काम ही नहीं कर रहा हूं। बस अभी चुनाव आने दो, मैं काम करना शुरू कर दुंगा। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं, उत्तराखंड और पंजाब में भी चुनाव हैं, अन्य राज्यों में भी चुनाव हैं। चुनाव आते ही महंगाई तो अपने आप ही कंट्रोल में आ जाएगी"।

सरकार जी ने भक्तों को संबोधित करते हुए आगे कहा कि सिर्फ यह मंहगाई ही नहीं, ये बेरोजगारी, ये भुखमरी, जगह-जगह चल रहे ये आंदोलन, और बाकी सभी दुख और कष्ट भक्तों की परीक्षा के लिए ही हैं। भगवान भक्तों की, उनकी सहनशक्ति की परीक्षा लेते ही रहते हैं। इन सब परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो तुम जल्द ही परलोक में स्वर्ग के सुख भोगोगे"। 

इतना कहते हुए सरकार जी ने वर्चुअल मीटिंग समाप्त कर दी। भक्तों ने भी मीटिंग खत्म होने के बाद अपने मित्रों को मीटिंग के बारे में बढ़-चढ़कर बताया। मीटिंग में बोलने वाले भक्तों का चयन करने वाले अफसरों का आगे चलकर क्या हुआ, यह अलग ही विषय है। 

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Diwali
Narendra modi
modi bhakt

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

बना रहे रस: वे बनारस से उसकी आत्मा छीनना चाहते हैं

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...

तिरछी नज़र: ...चुनाव आला रे

चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू

कटाक्ष: इंडिया वालो शर्म करो, मोदी जी का सम्मान करो!


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License