NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
साहित्य-संस्कृति
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
अमेरिकी बहुत ही चालाक हैं, हमें ट्विटर पर आंदोलन करना सिखा दिया और खुद सड़क पर निकले हैं
“मेरे अमेरिकी भाईयों, हमारे यहां तो आज भी कई जगह ऐसी हैं जहां कोई दलित, कोई शूद्र घोड़े पर भी नहीं चढ़ सकता, कुर्सी पर तो छोड़ो स्टूल या चारपाई पर भी नहीं बैठ सकता। देश में इतने लोग गाय को लेकर मार दिये गये, पुलिस कस्टडी में मारे गए, पर हमने चूं तक नहीं की। गहन तप कर हमने अपने हृदय और मस्तिष्क को इतना मजबूत बना लिया है कि वह बेकार की बातों से विचलित न हो। इसीलिए हम अपने को विश्व गुरु मानते हैं।”
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
07 Jun 2020
America Protest
Image Courtesy:NBC News

अमेरिका में इन दिनों कोरोना के अतिरिक्त एक और मुसीबत आई हुई है। वहां पर, पूरे अमेरिका के करीब चालीस राज्यों में, जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहा है। यह विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं वहां के नागरिक, वहां की रंगभेद नीति के खिलाफ। अरे, आप गलत समझे। वहां पर सरकारी रूप से कोई रंगभेद नीति नहीं है। जैसे हमारे देश में भी सरकारी रूप से कोई जाति प्रथा नहीं है और न ही अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति कोई भी भेदभाव है। पर वहां भी बहुसंख्यक गोरे समाज के एक बड़े तबके के मन में कालों के प्रति भेदभाव है।

tirchi nazar_2.JPG

घटना तब शुरू हुई जब एक काले, जार्ज फ्लॉयड को, जो एक दुकान पर कथित रूप से नकली डॉलर चलाने की कोशिश कर रहा था, पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया। हथकड़ी लगा दी गई। फिर पता नहीं क्या हुआ, पुलिस ने उसे नीचे, वहीं सड़क पर गिरा दिया। हो सकता है उसने भागने की कोशिश की हो। सड़क पर गिराने के बाद एक सफेद रंग वाले पुलिस वाले ने अपने घुटने से उस काले फ्लॉयड की गरदन दबानी शुरू कर दी। उस गोरे पुलिस वाले ने तब तक उस काले नागरिक की गरदन दबानी जारी रखी जब तक उसकी मौत नहीं हो गई। देखने वाले और वीडियो बनाने वाले बताते हैं कि उस काले व्यक्ति के अंतिम शब्द थे, "आय कांट ब्रीद", जो उसने अपना शरीर शिथिल पड़ने से पहले कई बार बोला। अगर यह व्यक्ति ब्लैक फ्लायड की बजाय व्हाइट फ्लायड या पिंक फ्लायड होता तो पुलिस वाले ऐसा हरगिज नहीं करते। अब इस घटना को लेकर आंदोलन शुरू हो गया जो पूरे अमेरिका में और धीरे धीरे अब विश्व के एक बड़े भाग में फैल चुका है।

माना अमेरिका एक अमीर, शक्तिशाली देश है। आज पूरे विश्व में उसकी तूती बोलती है, कोरोना संकट से पहले तो ज्यादा ही बोलती थी। वहां की जिंदगी पर हर एक की लालची निगाह रहती हैं। यहां तक कि भारत जैसे प्राचीन, संस्कृति प्रधान, विश्व गुरु देश का मध्य वर्ग भी अपना जीवन तभी सफल मानता है जब उसकी कम से कम एक औलाद अमरीका में सैटल हो जाये। अब उसी अमेरिका में यह हाल हो रहा है। अमेरिका के लोगों को हमारे देश के लोगों से सीख लेनी चाहिए। हम विश्व गुरु हैं और अमरीकी नागरिक हमारे नागरिकों से सीख सकते हैं कि इस तरह की घटनाओं की उपेक्षा कैसे की जाती है।

हम विश्व गुरु ऐसे ही नहीं बन गये हैं। सदियों की त्याग और तपस्या है इस विश्व गुरु बनने के पीछे। ऐसी छोटी छोटी बातों से तो हमनें हजारों साल पहले ही मोक्ष प्राप्त कर लिया था। तब से अब तक हमें न दलितों और निम्न जातियों पर ढहाया जाने वाला जुल्म विचलित करता है और न ही महिलाओं की की जाने वाली प्रताड़ना। न हम आदिवासियों के दमन से शोक ग्रस्त होते और न गरीबों के अभाव से। और तो और, विधर्मियों पर ढहाया जाने वाले कहर से हमें कहीं न कहीं संतुष्टि मिलती है। अभी हाल में ही लाखों करोड़ों मज़दूरों की पैदल घर वापसी, उनकी भूख-प्यास और दुर्घटना से सड़कों पर होती मौतें भी हममें करूणा नहीं जगा सकीं। हमारे विश्व गुरु बने रहने का यह हालिया सबूत है।

अब हमारे देश में न जाने कितनी मौत पुलिस कस्टडी में होती हैं। कभी भी हमने उस पर देश व्यापी तो छोड़ो, राज्य व्यापी आंदोलन भी नहीं किया। अधिक से अधिक थाने पर एक दो दिन प्रदर्शन कर लिया या फिर किसी सड़क पर रास्ता रोक लिया। अभी फरवरी में ही एक वीडियो आई थी जिसमें पुलिस वाले कुछ युवकों को मार रहे थे और "जन गण मन" गाने के लिए कह रहे थे। उनमें से एक युवक की बाद में मृत्यु भी हो गई। पर फिर भी हमने कोई प्रदर्शन नहीं किया। भाई लोगों ने तो उसकी वीडियो भी बड़े गर्व से फारवर्ड की।

मेरे अमेरिकी भाईयों, हमारे यहां तो आज भी कई जगह ऐसी हैं जहां कोई दलित, कोई शूद्र घोड़े पर भी नहीं चढ़ सकता, कुर्सी पर तो छोड़ो स्टूल या चारपाई पर भी नहीं बैठ सकता। अगर वह ऐसा कर दे तो जान से हाथ खो बैठे। पर हमने तो कोई आंदोलन नहीं छेड़ा। सब सहन किया। गहन तप कर हमने अपने हृदय और मस्तिष्क को इतना मजबूत बना लिया है कि वह बेकार की बातों से विचलित न हो। इसीलिए हम अपने को विश्व गुरु मानते हैं।

पिछले छह साल में देश में इतने लोग गाय को लेकर मार दिये गये पर हमने जरा सी भी चूं नहीं की। बहुत हुआ तो जंतर मंतर के पीछे वाली सड़क पर दो चार घंटे का धरना प्रदर्शन कर लिया। अगर लिखना आता था तो ट्वीटर पर लिख दिया या फिर फेसबुक पर पोस्ट लिख मारी। पर कोई देश व्यापी आंदोलन चलाया क्या, नहीं चलाया न। वैसे ये अमेरिकी बहुत ही चालाक हैं। हमें ट्विटर पर आंदोलन करना सिखा दिया और खुद सड़क पर आंदोलन करने निकले हैं।

हम जगत गुरु हैं, विश्व गुरु हैं। इन छोटी छोटी बातों पर कोई आंदोलन नहीं करते हैं, और देशव्यापी आंदोलन तो हरगिज नहीं। अरे अमरीकियों, कुछ हम से सीखो, विश्व गुरु से सीखो। ये किसी काले का मारा जाना आंदोलन का विषय न होना चाहिये और न हो सकता है। आंदोलन करना है तो किसी मंदिर या चर्च को बनाने के लिए कीजिए। गाय, सॉरी आप तो गाय खा भी जाते हैं। हां, आंदोलन गाय नहीं तो किसी और जानवर पर कीजिये। और फिर चर्च या उस जानवर की आड़ में जिसे मरजी मारिये। कोई आंदोलन नहीं होगा।

यह गोरे काले का भेद हमारे यहां भी है। सारे वैवाहिक विज्ञापनों में गोरी बहू ही चाहिए होती है। बच्चा पैदा हो तो सुना जाता है कि "कितना गोरा बच्चा है"। आज तक किसी भी अख़बार के मलिक या संपादक ने, भले ही वह कितना भी प्रगतिशील हो, यह नहीं कहा कि हम गोरी बहू के लिए विज्ञापन नहीं छापेंगे और न ही कोई मां बाप गोरे बच्चे के लिए इच्छुक नहीं हुए हैं।

अंत में: ये अमेरिका वाले हम विश्व गुरु भारतीयों से कुछ सीखें या न सीखें, पर राष्ट्रपति ट्रंप जी को अपने अभिन्न मित्र और हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी से कुछ सीख अवश्य लेनी चाहिए। अब मोदी जी ने जब से एक बार बोल दिया है कि गरीब मजदूरों की मुसीबतों को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है तब से मोदी जी स्वयं और उनके सभी मंत्री और अफसर गरीब मजदूरों की मुसीबत पर बिलकुल ही खामोश हैं, एक भी शब्द नहीं बोले हैं, वैसे पहले भी नहीं बोल रहे थे। इसे कहते हैं डिसिप्लिन। अमेरिका की तरह से नहीं है कि एक राज्य का पुलिस अधिकारी राष्ट्रपति को कह दे कि कुछ ढंग का नहीं बोल सकते हो तो चुप रहिये। और तो और, अमेरिकी सेना ने भी बोल दिया है कि वह राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए नहीं, संविधान की सुरक्षा के लिए है। हमारे यहां तो सभी संस्थायें प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे हैं। प्रधानमंत्री सुरक्षित रहेगा तो संविधान अपने आप बच जायेगा। राष्ट्रपति ट्रम्प, आप भी अपने यहां भारत की तरह डिसिप्लिन लाइये, डिसिप्लिन। 

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Protest in USA
Racism
Donand Trump
twitter
George Floyd
George floyd Murder
Black Lives Matter

Related Stories

अमेरिका में फ्लॉयड की बरसी पर रखा गया मौन, निकाली गईं रैलियां

तिरछी नज़र: 26 जनवरी बिल्कुल ही सरकार जी की प्लानिंग के मुताबिक रही

...लो जी, फिर नई तारीख़

व्यंग्य: रे किसान! तू तो बड़ा चीटर निकला 

तिरछी नज़र: ताऊ, तू तो बहुत ही लकी निकला

लो कर लो बात… अब किसान भी देशद्रोही और आतंकवादी हो गये!

अमेरिकी नागरिक समाज समूह ने "प्रोटेक्ट द रिज़ल्ट" के लिए देशव्यापी प्रदर्शन की योजना बनाई

अमेरिका में पुलिस द्वारा एक किशोर की हत्या के बाद ताज़ा विरोध प्रदर्शन

सूडान में लगातार हो रही नस्लीय हत्या के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

अमेरिका में नस्लवाद-विरोध तेज़ होने के साथ प्रदर्शनकारियों पर हिंसा बढ़ी


बाकी खबरें

  • Russia Draws Red Lines for US
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस ने अमेरिका के सामने खींची लाल लकीर 
    18 Oct 2021
    मान्यता देने से पहले हम कुछ क्षेत्रीय पहल की उम्मीद कर सकते हैं। मान्यता के लिए मानदंड आमतौर पर पूरे देश पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण होना ज़रूरी होता है।
  • ald
    सरोजिनी बिष्ट
    आख़िर जनांदोलनों से इतना डर क्यों...
    17 Oct 2021
    लखीमपुर खीरी हत्याकांड के विरोध में, उत्तर प्रदेश और केंद्र की सरकार से सवाल करने का दम रखने वाली संघर्षशील ताकतें लगातार सड़कों पर उतर रही हैं तो उनके ख़िलाफ़ संविधान के विरुद्ध जाकर बेहद दमनात्मक…
  • press freedom
    न्यूज़क्लिक टीम
    आज़ाद पत्रकारिता से सत्ता को हमेशा दिक्कत रही
    17 Oct 2021
    हाल के सालों में भारत में प्रेस की आज़ादी कमज़ोर होती गई हैI इतिहास के पन्ने के इस अंक में लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने पत्रकार मासूम मुरादाबादी और जयशंकर गुप्ता से खास चर्चा की जिसमें प्रेस की आज़ादी…
  • संदीपन तालुकदार
    चीन द्वारा चाँद से धरती पर लाए पत्थरों से सामने आया सौर मंडल का नया इतिहास
    17 Oct 2021
    वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह से एकत्र किए गए पत्थरों के नमूनों के निष्कर्षों को साझा किया है, जिससे इसके कुछ आवश्यक पहलुओं के बारे में नई चीज़ें पता चली हैं।
  • अज़हर मोईदीन
    केरल बीजेपी में बदलाव से भी नहीं कम हुए बढ़ते फ़ासले
    17 Oct 2021
    हाल ही में संगठनात्मक नेतृत्व में फेरबदल और पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रत्याशियों की घोषणा ने भाजपा की केरल इकाई के भीतर दरार को और बढ़ा दिया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License