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चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र का पूजा-पाठ जिसने पूरे वर्ष पढ़ाई ही न की हो।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
19 Dec 2021
modi
प्रतीकात्मक तस्वीर। 

बीते सप्ताह सोमवार के दिन सरकार जी वाराणसी गए और वहां काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण किया। लोकार्पण तो किया ही, बहुत ही सारी, बहुत ही लंबी, पूजा-अर्चना भी की। 

सरकार जी जब भी पूजा-अर्चना करते हैं, पूरे विधि-विधान से करते हैं। पूजा करते हुए सब बातों का ध्यान रखते हैं। पहले किस मंदिर में जाना है और फिर किस में। पहले किस भगवान की पूजा करनी है और फिर किस भगवान की। किस दिशा में मुंह कर के बैठना है और कहां जल चढ़ाना है। सरकार जी को सब बातों का पता है और जिन बातों का पता नहीं है, उन बातों का पुजारी आदि से पूछ कर ध्यान रखते हैं।

रेड कार्पेट प्रेम

सरकार जी ने सरकार जी बनते ही 'लाल बत्ती' की कल्चर समाप्त कर दी थी पर रेड कार्पेट कल्चर अभी भी चालू है। सरकार जी कहीं भी जाते हैं, रेड कार्पेट के बिना नहीं जाते हैं। सरकार जी मंदिर भी रेड कार्पेट पर ही चल कर जाते हैं, और वह भी बिना किसी हिचक के। सो, काशी विश्वनाथ धाम में भी रेड कार्पेट पर चले। वैसे 'लाल बत्ती' कल्चर भी तब ही समाप्त की गई थी जब सरकार जी को स्वयं लाल बत्ती की जरूरत नहीं रही थी। सरकार जी अब सिर्फ हवाई जहाज पर ही चलते हैं, और वहां लाल बत्ती की जरूरत होती ही नहीं है। जब कभी कार में चलते भी हैं, तो आगे पायलट कार तो होती ही है, आगे-पीछे अन्य कई कारें भी होती हैं। तो वहां भी लाल बत्ती की जरूरत नहीं होती है। हां! जमीन पर जब चलते हैं, रेड कार्पेट जरूरी होता है। उसके बिना तो सरकार जी के पांव जमीन पर पड़ते ही नहीं हैं। भगवान जी के मंदिर में भी नहीं।

तो सरकार जी रेड कार्पेट पर चलते हुए विधि अनुसार पहले काल भैरव मंदिर गए और वहां पूजा की। उसके बाद गंगा जी में डुबकी लगाकर विश्वनाथ धाम के लिए रवाना हुए। मंदिर के गर्भगृह में पहुंच भगवान शिव का गंगा जल से अभिषेक किया और पूरा पूजा-पाठ किया। पूजा-पाठ पूरा होने के बाद स्वर्ण शिखर को प्रणाम किया और अपने कल्याण के लिए प्रार्थना की। रात में महाआरती में भी शामिल हुए। यानी कि सब कुछ किया और विधि-विधान से किया, क्रम से किया, क्रोनोलोजी के अनुसार किया। आखिर पूजा-अर्चना की भी एक क्रोनोलॉजी तो होती ही है न।

...देखो चूक न हो जाए

सरकार जी पूजा करने के तरीकों की पूरी जानकारी रखते हैं। पूजा ढंग से ही होनी चाहिए, विधि- विधान से ही होनी चाहिए। पूजा-पाठ में जरा सी भी चूक सरकार जी को बर्दाश्त नहीं है। चूक हुई नहीं कि कुछ बुरा हो सकता है। सरकार जी का बुरा हो सकता है। और सरकार जी का बुरा होगा तो समझिए, राष्ट्र का भी बुरा हो सकता है। आखिर सरकार जी ही तो राष्ट्र हैं। तो पूजा-पाठ ठीक-ठाक हो, यह राष्ट्र कल्याण की ही तो बात है।

यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र का पूजा-पाठ जिसने पूरे वर्ष पढ़ाई ही न की हो। पूजा करने के साथ ही सरकार जी यह ध्यान भी रखते हैं कि यह पूजा-पाठ सारी जनता तक पहुंचे। जब सारी जनता तक पहुंचेगा तभी तो इसका पूरा लाभ मिलेगा। इसीलिए इस बार पचपन कैमरे लगा कर हर एंगल से वह पूजा प्रसारित की गई।

55 कैमरे और पूजा

और ये पचपन कैमरे भगवान जी के लिए नहीं, सरकार जी के लिए ही थे। सरकार जी के कार्यक्रम के प्रसारण के लिए ही थे। सरकार जी का कार्यक्रम जनता तक पहुंचे, अलग-अलग कोणों से पहुंचे, इसलिए ही थे। और जब सरकार जी वहां से चले गए, तो कैमरे हटा ही लिए गए होंगे। उनकी फिर जरूरत ही क्या थी भला!

पूजा ही काम है!

सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। वे जानते हैं, जब देश की जनता ही पूजा-पाठ चाहती है तब पूजा-पाठ ही तो गंभीरता से करना होगा। जनता उसी से खुश होगी। सरकार तो जैसे तैसे चल ही जाएगी। पूजा- पाठ करते हुए तो सब कुछ ध्यान रखते हैं परन्तु सरकार चलाते हुए कुछ भी ध्यान नहीं रखते हैं। पूजा करते हुए तो सरकार जी पूजा के विशेषज्ञों जैसे पुजारियों, पंडितों और महंतों की सलाह मानते हैं, उनके निर्देशों पर अमल भी करते हैं कि कहीं कुछ गलत न हो जाए। पर सरकार चलाते हुए विशेषज्ञों की बिल्कुल भी नहीं सुनते हैं। 

सरकार चलाने में तो सरकार जी सबसे बड़ा विशेषज्ञ अपने आप को ही मानते हैं। कुछ गलत हो भी गया तो सरकार जी का क्या है, जनता ही तो झेलेगी। और जनता तो झेलने के लिए ही बनी है। इसीलिए न तो नोटबंदी के समय विशेषज्ञों से सलाह ली गई और न ही जीएसटी लागू करते समय पूरी तैयारी की गई। न तो धारा 370 हटाते समय कश्मीरियों को विश्वास में लिया गया और न ही सीएए कानून बनाते समय अल्पसंख्यंकों को। न तो अचानक ही लॉकडाउन लागू करते हुए आम जनता की मुश्किलों को समझा गया और न ही किसानी के काले कानून बनाते समय कृषि विशेषज्ञों या किसानों की राय ली गई।

चुनाव में पूजा, पुजारी का चुनाव!

यह सब देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे जब प्रदेश में चुनाव होता है तो चुनाव प्रदेश के मुख्यमंत्री का नहीं, मुख्य पुजारी का हो रहा हो। और जब देश में चुनाव होता है तो लगता है कि चुनाव देश के प्रधानमंत्री का नहीं, प्रधान महंत का हो रहा है। और जब तक हम काम को पूजा मानने वाले की बजाय पूजा को काम मानने वालों को चुनते रहेंगे, जब तक हम लोग ही ऐसे हैं, तब तक ऐसा ही होता रहेगा।

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Narendra modi
UP election 2022
Yogi Adityanath
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