NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र: जनाब!, एक नोबेल इधर भी
हमारे प्रधानमंत्री ने पिछले कुछ सालों में में लोगों का जीवन सरल बनाने के लिए जितनी खोजें की हैं शायद ही कोई वैज्ञानिक कर सकता है...।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
18 Oct 2020
modi
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार: newslaundry

इस बार के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। हमारे देश में इतनी सारी नैसर्गिक प्रतिभाएं होते हुए भी सारे के सारे पुरस्कार पश्चिमी वैज्ञानिकों को दे दिए गए। बहुत नाइंसाफी है। आइये, हम इनकी एक एक करके विवेचना करते हैं।

tirchi nazar_14.png

सबसे पहले तो चिकित्सा शास्त्र का नोबेल पुरस्कार हिपेटाइटिस सी के वायरस की खोज करने के लिए तीन तीन वैज्ञानिकों को दे दिया गया। उनमें से एक ने तो सिर्फ यह ही बताया था कि हिपेटाइटिस सी का वायरस एक अलग वायरस है। सालों पुरानी खोज। आजकल फैली हुई नई बीमारी पर खोज करने के लिए कोई नोबेल नहीं। अरे भई! कोविड-19 पर हमारे यहाँ जितनी खोज हुईं, कहीं और नहीं हुई। कोविड पर नोबेल पुरस्कार देते तो हमें ही मिलना था। पर इस नोबेल पुरस्कार देने वालों को सिर्फ अमरीका और यूरोप ही दिखाई देता है। हमें क्या! अपनी ही भद्द पिटवा रहे हैं।

कोरोना पर सबसे प्रमुख खोज जो हमारे देश में हुई वह यह थी कि कोरोना का कारण कोई वायरस नहीं है और न ही उसके देश में अधिक फैलने का कारण बदइंतजामी, बदहाली और स्वास्थ्य सेवाओं में कमी है। कोरोना तो ईश्वर की कारस्तानी है, ईश्वरीय प्रकोप है, एक्ट आफॅ गॉड है। यह खोज की, हमारी आदरणीय वित्त मंत्री सीतारमन जी ने। सीतारमन जी ने खोज कर निष्कर्ष निकला कि यह जो कोविड-19 है यह दैवीय प्रकोप है। सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती है। तो क्या सीतारमन जी यह कहना चाहती हैं कि जिस तरह से वायरल बुखार से बचने के लिए वायरस से दूर रहना चाहिए उसी तरह से एक्ट आफॅ गॉड से भी बचाव करने के लिए भगवान से भी दूर हो जायें? जिस तरह से नोबेल पुरस्कार समिति ने माना कि हिपेटाइटिस सी के वायरस की खोज करने से उसके इलाज में मदद मिलेगी उसी तरह से नोबेल पुरस्कार समिति को यह भी मानना चाहिए था कि निर्मला सीतारमन जी द्वारा कोविड-19 का कारण खोजने से कोरोना को समाप्त करने में मदद मिलेगी।

कोरोना को लेकर दूसरी बड़ी खोज रामदेव ने उस समय की जब उन्होंने कोरोना की दवा ढूंढ निकाली। इसके अतिरिक्त अन्य लोगों ने भी अनेको खोज कीं। आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने भी कोरोना को लेकर बहुत सारी खोजें कीं जिनका सबको पता ही है। वैसे तो नोबेल पुरस्कार समिति किसी भी भारतीय को कोविड को लेकर कई गई खोजों के कारण चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दे सकती थी पर इस पर सबसे अधिक अधिकार हमारी वित्त मंत्री जी का ही था। 

फिर आता है अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार। ये पुरस्कार इस बार मिला है दो अमरीकी अर्थशास्त्रियों को। नीलामी के तरीके ढूंढने के लिए। नीलामी के हजारों तरीके तो हमारे यहाँ के अफसरों को सालों से पता हैं। वे तो बिना नीलामी किये ही नीलामी कर देते हैं। इस बार का अर्थशास्त्र का नोबेल तो हमारे यहां के टीवी चैनलों को मिलना चाहिए था क्योंकि उन्होंने देश में गरीबी उन्मूलन में विशेष योगदान दिया है। उन्होंने विश्व को बताया कि किस तरह से गरीब लोगों को घर में एक विशेष टीवी चैनल को चलाये रखने पर चार पांच सौ रुपये हर रोज दिये जा सकते हैं।

फिर आता है भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार। इस बार यह पुरस्कार एक बेकार की खोज के लिए दे दिया गया। काले छेद (ब्लैक होल) से लोगों के जीवन में ऐसा क्या अंतर पड़ सकता है जो हमारे प्रधानमंत्री जी द्वारा की गयी खोजों से नहीं पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने पिछले कुछ सालों में में लोगों का जीवन सरल बनाने के लिए जितनी खोजें की हैं शायद ही कोई वैज्ञानिक कर सकता है। उनके द्वारा की गई कुछ प्रमुख खोजों में शामिल हैं कि पृथ्वी पर प्रदूषण के कारण ठंड नहीं बढ़ रही है अपितु लोगों को उम्र बढ़ने के कारण ठंड अधिक लगने लगती है। उन्होंने यह भी बताया कि हवाई जहाज बादलों के पीछे छुप जाते हैं और रडार उन्हें देख नहीं पाती हैं। लेकिन उनकी अधिक काम में आने वाली खोज यह थी कि गंदे नाले की बदबूदार गैस से चाय बनाई जा सकती है, खाना पकाया जा सकता है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण खोज थी। इससे नालों की सफाई पर होने वाला खर्च तो बचेगा ही, खाना बनाने वाली गैस की किल्लत भी कम हो जायेगी। लेकिन नासमझ नोबेल पुरस्कार समिति ने इस महान खोज को नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं माना। 

लेकिन जैसे कर्मठ वैज्ञानिक किसी पुरस्कार के न मिलने से विचलित हुए बिना निरंतर अनुसंधान में लगे रहते हैं, मोदी जी भी उसी तरह निरंतर अनुसंधान में लगे हुए हैं। उनके द्वारा की गई हालिया खोज बहुत ही काम की हैं। वह है, हवा से शुद्ध पानी और ऑक्सीजन बनाना, पवन चक्की की मदद से। इस खोज के बाद पवन चक्की की मदद से हवा से शुद्ध पानी और ऑक्सीजन बनाई जा सकेगी, वह भी लगभग बिना किसी लागत के। इस खोज को तो एक साथ भौतिकी और रसायन शास्त्र, दोनों के नोबेल पुरस्कार दिये जाने चाहिये थे। नोबेल पुरस्कार के इतिहास में ऐसा पहली बार होता पर नोबेल पुरस्कार समिति के पूर्वाग्रहों के कारण ऐसा न हो सका। 

शांति का नोबेल पुरस्कार। अब क्या बतायें। अगर खाना खिलाने से ही शांति स्थापित हो जाये तो कहना ही क्या। हम तो जब मरजी जहाँ मर्जी भंडारा चलाते रहते हैं। उससे तो कहीं शांति नहीं फैलती। उससे तो लोगों में जल्दी से जल्दी खाना लेने के लिए होड़ मच जाती है। गंदगी फैलती है सो अलग। इस वर्ष शांति के लिए जितना कुछ मोदी जी ने किया है उतना किसी और ने नहीं किया। पूर्वी लद्दाख में चीन अंदर तक आ गया था। शायद थोड़ी बहुत जमीन पर कब्जा भी कर लिया था। पर मोदी जी कहते रहे "न वहाँ कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न घुसा हुआ है, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है"। ऐसा मोदी जी ने चीन से डर कर नहीं कहा और न ही दोस्ती में कहा। ऐसा तो सिर्फ और सिर्फ शांति के लिए कहा। देश के नागरिकों का खून न खौले, अशांति न फैले सिर्फ इसलिए कहा। 

मोदी जी और उनका अनुसरण करने वाले पहले से ही शांति के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं। गौरक्षा कर रहे हैं भले ही उसके लिए कुछ भी करना पड़े। बेटियों की रक्षा के लिए बलात्कार के खिलाफ नहीं, तथाकथित लव जिहाद के खिलाफ मुहिम चलाई हुई है। "धर्म की रक्षा हो" के साथ साथ "विधर्मियों का नाश हो" भी गाते हैं। विश्व शांति के लिए इतना अधिक प्रयास कर रहे व्यक्ति को छोड़कर नोबेल वालों ने नोबेल शांति पुरस्कार खाना खिलाने वालों को दे दिया। धिक्कार है उन्हें। 

पुरस्कार तो साहित्य के लिये भी है। लेकिन वह और लोगों को भी मिल जाने दो। हम सारे के सारे पुरस्कार अपने लिए नहीं रखना चाहते हैं। हम अमरीका नहीं हैं कि सभी नोबेल हमें मिल जायें। हम फिलहाल साहित्य का नोबेल पुरस्कार औरों के लिए छोड़ते हैं। 

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Narendra modi
BJP
COVID-19
Baba Ramdev

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • तिरछी नज़र: सो सॉरी, सेल नहीं, रेंट
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: सो सॉरी, सेल नहीं, रेंट
    29 Aug 2021
    अब देश की संपत्तियां सेल पर हैं, बेची जा रही हैं, सॉरी! मतलब, किराये पर दी जा रही हैं। सरकार जी खुद ही दे रहे हैं। और हम भी उम्मीद से हैं कि कभी ना कभी हमारा भी मौका आएगा और हम भी कुछ खरीद पाएंगे।
  • गुजरात: धर्म-परिवर्तन क़ानून को लेकर हाईकोर्ट और सरकार के बीच क्या विवाद है?
    सोनिया यादव
    गुजरात: धर्म-परिवर्तन क़ानून को लेकर हाईकोर्ट और सरकार के बीच क्या विवाद है?
    29 Aug 2021
    धर्म-परिवर्तन के नए क़ानून पर हाईकोर्ट की सख़्ती से गुजरात सरकार सकते में है। कानून के कई प्रावधानों पर हाईकोर्ट की रोक के ख़िलाफ़ राज्य की विजय रुपाणी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है।
  • 200 हल्ला हो: अत्याचार के ख़िलाफ़ दलित महिलाओं का हल्ला बोल
    रचना अग्रवाल
    200 हल्ला हो: अत्याचार के ख़िलाफ़ दलित महिलाओं का हल्ला बोल
    29 Aug 2021
    "जाति के बारे में क्यों ना बोलूं सर जब हर पल हमें हमारी औक़ात याद दिलाई जाती है..."
  • रोटी के लिए जद्दोजहद करते खाना पहुंचाने वाले हाथ
    समृद्धि साकुनिया
    रोटी के लिए जद्दोजहद करते खाना पहुंचाने वाले हाथ
    29 Aug 2021
    नई श्रम सुधार संहिता के दायरे में गिग वर्कर्स को लाए जाने और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के लाभ प्रदान करने के बावजूद फुड डिलीवरी कर्मचारियों का शोषण बदस्तूर है, खासकर महामारी के बाद से। समृद्धि साकुनिया…
  • अफ़गानिस्तान: ‘ग्रेट गेम’  खेलने की सनक में अमेरिका ने एक देश को तबाह कर दिया
    जॉन पिलगर
    अफ़गानिस्तान: ‘ग्रेट गेम’  खेलने की सनक में अमेरिका ने एक देश को तबाह कर दिया
    29 Aug 2021
    कुछ दशक पहले अफ़गानिस्तान की अवाम ने अपनी आज़ादी ली थी, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों की महत्वाकांक्षाओं ने उसे तबाह कर दिया
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License