NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
‘सरकार जी’ का संदेश- रोको, टोको और समझाओ
देश की जनता को समझाने का सारा काम अभी तक प्रधानमंत्री जी ने स्वयं ही सम्हाला हुआ था। पर लगता है अब प्रधानमंत्री जी के पास नया काम, दुश्मन से उसका नाम लिए बिना लड़ने का, आ गया है। अतः समझाने का काम उन्होंने "लोकल" लेवल पर छोड़ दिया है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
05 Jul 2020
Satire
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : Hindustantimes

इस सप्ताह भी प्रधानमंत्री जी ने देश को संबोधित किया। वैसे प्रधानमंत्री जी देश को कई बार संबोधित करते हैं। रेडियो पर 'मन की बात' तो साठ से अधिक बार कर चुके हैं। इसलिए उसका कोई खास महत्व रह नहीं गया है। पहले तो रेडियो पर आने वाली 'मन की बात' समाचार पत्रों में हेडलाइन बनाती भी थी लेकिन अब सिर्फ एक कॉलम की खबर बन कर रह जाती है। वह भी कभी कभी तो बीच के पृष्ठों पर।

tirchi nazar_1.jpg

तो अब प्रधानमंत्री जी ने सोचा है कि टीवी पर देश को संबोधित किया जाये। प्रधानमंत्री जी टीवी पर संबोधित सिर्फ खास मौकों पर करते हैं इसलिए लोग इंतजार भी करते हैं और हेडलाइन भी बनती है। भले ही कुछ भी बोला हो, या कुछ नहीं भी बोला हो, टीवी चौबीसों घंटे वही दिखाता रहता है। अखबारों में भी अगले दिन वही प्रमुख समाचार होता है। वैसे भी प्रधानमंत्री जी टीवी पर प्रमुख घोषणाएं ही करते रहे हैं। शुरुआती रुझान बताते हैं कि जब भी प्रधानमंत्री जी द्वारा लोगों को टीवी पर संबोधित करने की पूर्व घोषणा होती है, लोगों की रूह कांप उठती है, न जाने क्या घोषणा कर दी जाये।

टीवी पर सबसे पहली बार प्रधानमंत्री जी द्वारा आठ नवंबर 2016 की रात आठ बजे जनता को संबोधित कर नोटबंदी की घोषणा की गई, रात बारह बजे से नोट बंद। उस घोषणा ने लोगों का दिन का चैन और रात की नींद उड़ा दी। अगला ऐसा टीवी संबोधन जिससे लोग बेचैन हो उठे, भी रात को आठ बजे ही किया गया। 24 मार्च, इसी वर्ष फिर रात को आठ बजे ही लॉकडाउन यानी कि तालाबंदी की घोषणा की गई। रात बारह बजे से, कोरोना के वायरस पर विजय पाने के लिए इक्कीस दिन की संपूर्ण तालाबंदी। लोग तो घबरा ही गए, वायरस भी घबरा गया होगा।

अभी इसी सप्ताह प्रधानमंत्री जी ने फिर से लोगों को टेलीविजन पर संबोधित किया। यह कोरोना काल में किया गया छठा संबोधन था। लेकिन पूरे कोरोना काल में रात आठ बजे चौबीस मार्च को किये गए एकमात्र संबोधन के अलावा कोई भी संबोधन ऐसा नहीं निकला जिसमें कहने, सुनने या करने लायक कुछ हो, सिवाय थाली-ताली, दिया-बाती की नौटंकी के। लोगबाग अब समझ चुके हैं कि ऐसा संबोधन जो उनकी जिन्दगी दुश्वार कर सके, रात को आठ बजे ही किया जाता है। बाकी सारे संबोधन जो किसी और समय किये जाते हैं, बेकार हैं।

इस मंगलवार, तीस जून को दोपहर बाद, चार बजे किया गया टीवी संबोधन भी बेकार की बातों से भरा हुआ था। वही आत्मनिर्भरता, वही वोकल फॉर लोकल जैसी पुरानी बातों से भरा हुआ था। ये बातें प्रधानमंत्री जी पिछली सभी मीटिंग्स में बोल रहे हैं। हम भले ही सुन सुन कर थक चुके हों पर प्रधानमंत्री जी बोल बोल कर नहीं थके हैं। हाँ, एक बात अवश्य ही नई थी। "रोको, टोको और समझाओ"।

वैसे तो प्रधानमंत्री जी ने गरीबों के लिए बनाई गई प्रधानमंत्री अन्न वितरण योजना को भी तीस जून से छठ पूजा तक के लिए बढा़ दिया। उन्होंने इस बीच में पड़ने वाले सभी त्योहारों का नाम लेकर जिक्र किया। छठ मईया की पूजा का तो शायद छह बार नाम लिया गया। शायद छठ मईया का छह बार नाम लेना कोई जादू टोटका हो, जिससे बिहार चुनाव जीता जा सके। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि देश में अस्सी करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें इस मुफ्त के अनाज की आवश्यकता है। सरकार सिर्फ पाँच किलो अनाज और एक किलोग्राम चना देगी। नून-तेल और आग के इंतजाम के लिए जनता को आत्मनिर्भर बनना होगा। 

देश की जनता को समझाने का सारा काम अभी तक प्रधानमंत्री जी ने स्वयं ही सम्हाला हुआ था। नोटबंदी के समय भी जनता को समझाया था कि इसके अनेकों लाभ होंगे। लॉकडाउन व अन्य टोटकों से कोरोना पर विजय प्राप्त करने की बात भी उन्होंने ही जनता को समझाई थी। इससे पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक के लाभ भी जनता को प्रधानमंत्री जी ने ही समझाये थे। पर लगता है अब प्रधानमंत्री जी के पास नया काम, दुश्मन से उसका नाम लिए बिना लड़ने का, आ गया है। अतः समझाने का काम उन्होंने "लोकल" लेवल पर छोड़ दिया है।

इस सारे संबोधन में सरकार जी ने जो सबसे इंटरैस्टिंग बात कही वह यही थी, "रोको, टोको और समझाओ"। और अपनी व्यस्तता के कारण इसकी जिम्मेदारी उन्होंने सौंपी लोकल अफसरों को। मतलब प्रधानमंत्री जी स्वयं बने "लोकल के लिए वोकल"। वैसे तो लोकली रोकने, लोकली टोकने और लोकली समझाने की सारी जिम्मेदारी हमेशा से ही लोकल पुलिस की ही होती है। लोकल पुलिस उस जिम्मेदारी को, प्रधानमंत्री जी द्वारा सौंपे जाने से बहुत पहले से ही बहुत ही जिम्मेदारी से निभा रही है। शायद तब से ही जब से पुलिस बनी है। 

उसी जिम्मेदारी को निभाते हुए ही तूतिकोरिन पुलिस ने पी जयराज और उसके बेटे जे बेनिक्स को रोकते टोकते हुए अल्टीमेटली समझा दिया। वहां हुआ यह कि पुलिस अनलॉक 1.0 के दौरान बाजार में रोकने और टोकने गई। जयराज की दुकान खुली थी। पुलिस के रोकने, टोकने के ढंग पर शायद जयराज ने भी कुछ रोका टोका होगा। तो पुलिस जयराज को समझाने थाने ले गई। पीछे पीछे जयराज का पुत्र बेनिक्स भी मामला समझने थाने पहुंचा। पुलिस उसे भी समझाने में लग गई। पुलिस ने जयराज और उसके पुत्र बेनिक्स को इतना अधिक समझा दिया है कि अब उनको कोई भी कुछ भी नहीं समझा सकता है। 

अभी हाल में ही, कोरोना काल में ही, लॉकडाउन के दौरान अपने घर वापस लौट रहे मजदूरों और अन्य को, रोका, टोका और फिर अपने ढंग से समझाया। कहीं दौड़ा दौड़ा कर लाठियों से पीट कर समझाया तो कहीं मात्र उठक बैठक लगवा कर समझा दिया। कहीं मुर्गा बना कर समझा दिया तो कहीं मेंढक की तरह कुदवा कर समझाया। पर पुलिस ने सबको समझाया जरूर, भले ही अपनी समझ से समझाया।

पुलिस द्वारा समझाये जाने के कई तरीके हैं। किसी को ऑन द स्पॉट समझा दिया जाता है तो किसी को थाने ले जाकर समझाते हैं। किसी को एंकाउंटर कर समझाते हैं तो किसी को कुछ ले दे कर ही समझा दिया जाता है। पर पुलिस समझाती हर एक को है। कई बार तो शिकायत दर्ज कराने आये व्यक्ति को ही पुलिस समझाने में लग जाती है, पीड़ित को ही अपराधी घोषित कर उसके विरुद्ध ही एफआईआर दर्ज कर दी जाती है। पहले समझाना कुछ हद तक संप्रदाय निरपेक्ष होता था पर अब समझने समझाने में संप्रदाय की भूमिका बढ़ती जा रही है। पुलिस समझाने की इस प्रक्रिया में एक संप्रदाय विशेष को समझाने का ध्यान विशेष रूप से रखती है।

प्रधानमंत्री जी अपने गृहमंत्री जी से कहें कि यदि अनलॉक 2.0 में  यह रोकने, टोकने और समझाने के काम को आम पुलिस की बजाय ट्रैफिक पुलिस करे तो हिंसा जरा कम होगी। ट्रैफिक पुलिस को ले दे कर समझाने का काम करने में अधिक महारत हासिल है। ट्रैफिक पुलिस के कर्मचारी आपको हर चौराहे पर यह रोकने, टोकने और समझाने का काम करते हुए दिख जायेंगे पर मजाल है कि जरा सी भी हिंसा होती हो। तब सारा समझने समझाने का कार्य अहिंसक ढंग से, क्षत्रिय धर्म का पालन करने की बजाय वैश्य धर्म का पालन करते हुए ही, गांधीवादी तरीक़े से हो जायेगा।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Narendra modi
indo-china
Amit Shah
Coronavirus
Lockdown

Related Stories

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

बना रहे रस: वे बनारस से उसकी आत्मा छीनना चाहते हैं

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...

कटाक्ष: नये साल के लक्षण अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं...

तिरछी नज़र: ...चुनाव आला रे


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,568 नए मामले, 97 मरीज़ों की मौत 
    15 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.08 फ़ीसदी यानी 33 हज़ार 917 हो गयी है।
  • tree
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु के चाय बागान श्रमिकों को अच्छी चाय का एक प्याला भी मयस्सर नहीं
    15 Mar 2022
    मामूली वेतन, वन्यजीवों के हमलों, ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य कारणों ने बड़ी संख्या में चाय बागान श्रमिकों को काम छोड़ने और मैदानी इलाक़ों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया है।
  • नतालिया मार्क्वेस
    अमेरिका में रूस विरोधी उन्माद: किसका हित सध रहा है?
    15 Mar 2022
    संयुक्त राज्य अमेरिका का अपनी कार्रवाइयों के सिलसिले में सहमति बनाने को लेकर युद्ध उन्माद की आड़ में चालू पूर्वाग्रहों को बढ़ाने का एक लंबा इतिहास रहा है।
  • डॉ. राजू पाण्डेय
    डिजिटल फाइनेंस: कैशलेस होती दुनिया में बढ़ते फ़्रॉड, मुश्किलें भी आसानी भी..
    15 Mar 2022
    हर साल 15 मार्च के दिन विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष कंज़्यूमर इंटरनेशनल के 100 देशों में फैले हुए 200 कंज़्यूमर समूहों ने "फेयर डिजिटल फाइनेंस" को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस की थीम…
  •  Scheme Workers
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों आंदोलन की राह पर हैं स्कीम वर्कर्स?
    14 Mar 2022
    हज़ारों की संख्या में स्कीम वर्कर्स 15 मार्च यानि कल संसद मार्च करेंगी। आखिर क्यों हैं वे आंदोलनरत ? जानने के लिए न्यूज़क्लिक ने बात की AR Sindhu से।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License