NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
अक्टूबर में आये जीएसटी में उछाल को अर्थव्यवस्था में सुधार के तौर पर देखना अभी जल्दबाज़ी होगी
1.30 लाख करोड़ रूपये की कर वसूली को सरकार द्वारा दिवाली से पहले उपभोक्ता मनोदशा को प्रोत्साहित करने के लिए एक नैरेटिव गढ़ने के तौर पर इस्तेमाल किया गया है।
वी श्रीधर
06 Nov 2021
GST
प्रतीकात्मक उपयोग

एक अबाबील का दर्शन मात्र ही गर्मी के मौसम का संकेत नहीं हो सकता, किंतु लंबे वक्त से मंदी की मार से परेशान नरेंद्र मोदी सरकार जो कि इससे उबरने के जरा से भी संकेत को दोनों हाथों से भींचने के लिए बैचेन है, के लिए अक्टूबर महीने के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के आंकड़े बेहद काम आये हैं।

1.30 लाख करोड़ रूपये मूल्य के अप्रत्यक्ष करों के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत के संग्रह के साथ, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने तत्काल इन आंकड़ों को अर्थव्यवस्था के बार फिर से पटरी पर लौटने के संकेत की पुष्टि के तौर पर हथिया लिया है। मंत्रालय की ओर से इशारा किया गया है कि ये आंकड़े जीएसटी वसूली के अब तक के दूसरे सबसे बड़े आंकड़े हैं, जो अप्रैल में इकट्ठा किये गए 1.40 लाख करोड़ रूपये के बाद से सबसे अधिक हैं।

हालाँकि, कुछ एहतियात के साथ इस आनंदोत्सव के साथ बर्ताव समझदारी भरा हो सकता है। अप्रैल में 1.40 लाख करोड़ रूपये के शिखर को छूने के बाद अगले दो महीनों में जीएसटी राजस्व 30% से अधिक गिर गया था (नीचे दर्शाए गये चार्ट पर नजर डालें)। इसके अलावा, इस वित्तीय वर्ष में कुलमिलाकर जीएसटी संग्रह की राशि 8.06 लाख करोड़ रूपये है, जो दो वर्ष पहले सात महीनों में जुटाए गए राजस्व की तुलना में मात्र 15% अधिक है। चूँकि कर संग्रह को हमेशा सांकेतिक सन्दर्भ में दिखाया जाता है, ऐसे में लगभग 7.5% की औसत वार्षिक वृद्धि दर बमुश्किल से मुद्रास्फीति के साथ चल पाती है।

महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था की एक अनोखी विशेषता इसके लंबवत विकास प्रक्षेपवक्र के नुकसान के तौर पर देखने को मिला है। अर्थव्यवस्था अपने त्वरित आवेश और विशेष रूप से शुरू हो गई है क्योंकि भारत अपने स्वंय के खर्चों के जरिये इसे आगे बढ़ाने वालों में से सबसे कंजूस रहा है।

अर्थव्यवस्था की पुनर्वापसी के कयास लगाना तीन कारणों से बेहद जोखिमभरा है। पहला, जैसा कि साक्ष्य से पता चलता है, आय के धराशायी होने और इसके फलस्वरूप उपभोग व्यापक रूप से हुआ है। दूसरा, उपभोग में असमानता, जिसे महामारी के दौरान आय और धन के असमान वितरण ने काफी बढ़ा दिया है (जैसा कि शेयर बाजार में इसे लगातार उछाल में देखा जा सकता है)। तीसरा, चूँकि महामारी के सबसे बुरे दौर के दौरान अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों द्वारा पसंद किये जाने वाली वस्तुओं की खपत को भी दरकिनार कर दिया गया था, बाद के दौर में मांग में वृद्धि के चलते उसके कुछ हिस्से में उछाल आना स्वाभाविक है- जिसे उदहारण के तौर पर वर्तमान में जारी त्योहारी सीजन में देखा जा सकता है। 

ठीक एक साल पहले की घटनाओं को याद करना शायद इस बात को बेहतर तरीके से उजागर कर सकता है। अक्टूबर 2020 में, सरकार ने अक्टूबर 2019 की तुलना में जीएसटी संग्रह में 10% की उछाल को इस बात के प्रमाण के तौर पर खूब बढ़चढ़कर दर्शाया था कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है। वास्तव में, तत्कालीन वित्त सचिव अजय भूषण पांडेय ने दावा किया था कि राजस्व में यह बढ़ोत्तरी न सिर्फ यह संकेत दे रही थी कि आर्थिक स्थिति में सुधार शुरू हो गया है बल्कि यह एक स्थाई आधार पर आगे बढ़ रही है। आश्चर्यजनक ढंग से आज की तरह तब, नार्थ ब्लॉक के दिग्गजों के द्वारा माल की आवाजाही के इलेक्ट्रोनिक पंजीकरण - ई-वे बिलों के मासिक उत्पादन में बढ़ोत्तरी की प्रवत्ति को अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के संकेत के तौर पर प्रचारित किया गया था। 

इस विषय पर बेंगलुरु स्थित चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिलाष आर ने न्यूज़क्लिक को बताया है कि ई-वे बिलों की मात्रा में बढ़ोत्तरी को “किसी भी सूरत में आवश्यक तौर पर उच्च जीएसटी वसूली के परिणाम के तौर पर नहीं समझा जाना चाहिए।” चूँकि ई-वे बिल माल की आवाजाही के लिए अनिवार्य हैं, इसलिए इसकी उच्च मात्रा का आशय सिर्फ इतना है कि माल को ग्राहकों के पास भेजा जा रहा है। उन्होंने समझाया “राजस्व के दृष्टिकोण से ई-वे बिल को राजस्व-तटस्थ समझना चाहिए।”

अभिलाष इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं कि, चूँकि ई-वे बिल आम तौर पर विभिन्न पार्टियों द्वारा एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय के लिए जारी किये जाते हैं और इसके जरिये दोनों पार्टियाँ अपने जीएसटी भुगतान को सेट करती हैं, ऐसे में सरकार के लिए आय प्राप्ति सिर्फ उसी सूरत में संभव हो पाती है जब अंतिम उपभोक्ता असल में सामान की खरीद करता है। इसलिए ई-वे बिलों की अधिक मात्रा किसी भी सूरत में उच्च राजस्व की गारंटी नहीं है। उनका मानना है कि ई-वे बिलों और जीएसटी राजस्व के बीच में सिर्फ 30% का सहसंबंध हो सकता है। उनका कहना था कि ई-वे बिलों को जीएसटी राजस्व के लिए प्रॉक्सी के तौर पर इस्तेमाल करना या मांग के तौर पर प्रोजेक्ट करना - और इसलिए इसे विकास बताना - गंभीर जोखिमों से भरा है।

अभिलाष ने अपने स्वंय के अनुभव की और भी इंगित करते हुए बताया कि उच्च जीएसटी संग्रह की एक बड़ी वजह पिछले कुछ महीनों से आक्रामक टैक्स ऑडिट से भी काफी हद तक प्रभावित हो सकती है। वास्तव में, मंत्रालय ने दावा किया है कि इन उपायों ने मई 2021 के बाद से रिटर्न फाइल दाखिल करने के प्रतिशत में बढोत्तरी करने में मदद की है। हालाँकि, उनका मानना था कि इस प्रकार के उपायों से कुछ लाभ हासिल कर पाने की भी एक सीमा है। उनका मानना है कि कर प्रशासन में सुधार के जरिये राजस्व में किसी भी प्रकार की बढ़ोत्तरी बेहद मामूली ही हो सकती है।

अन्य स्रोतों से प्राप्त साक्ष्य भी अर्थव्यवस्था के बारे में धूमिल तस्वीर की ही पुष्टि करते हैं, जबकि इसके उलट मंत्रालय हमें विश्वास दिलाने में जुटी हुई है। उदाहरण के लिए, उधार पर हालिया आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि बैंकों द्वारा ‘रिटेल’ क्षेत्र में उधार ने अब उद्योग जगत को उधारी देने के मामले में पछाड़ दिया है। रिटेल क्षेत्र में उधारी, बैंकिंग की बोलचाल की भाषा में एक विस्तृत शब्द है, जिसे कंज्यूमर ड्यूरेबल या घरों की खरीद के साथ-साथ क्रेडिट कार्ड-आधारित खरीद के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। सबसे गौर करने वाली बात या है कि इसमें पर्सनल लोन भी शामिल है। 

सरकार की ओर से मौद्रिक नीति के साधनों का इस्तेमाल करने पर लगातार जिद, जैसे कि ब्याज दरों को लगातार कम रखने के कारण बैंक ऋण को धनी व्यक्तियों के हाथों में हस्तांतरित कर दिया है। महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इनमें से किसी भी उपाय के जरिये अर्थव्यवस्था को पटरी पर नहीं लाया जा सका है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है उद्योगों को दिए जाने वाले बैंक कर्जों में तीव्र गिरावट न सिर्फ बैंकरों के ऋण देने की अनिच्छा को दर्शाता है बल्कि उद्योगपतियों की ओर से निवेश करने की इच्छा की कमी की ओर भी इंगित करता है। ऐसे में निवेश के अभाव में आखिर विकास कहाँ से होने जा रहा है यह एक स्पष्ट प्रश्न बना हुआ है।

सेंटर ऑफ़ मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) द्वारा उपभोक्ता संवेदी सूचकांक (अक्टूबर के लिए) के ताजा आंकड़े मंत्रालय के अर्थव्यवस्था में सुधार के दावों का खंडन करते हैं। सूचकांक (सितंबर-दिसंबर 2015 में आधार 100) के मुताबिक फरवरी 2020 में 105.3 की तुलना में मात्र 59.4 पर था, जो भारत में महामारी की चपेट में आने से ठीक पहले था। खपत में भारी गिरावट विकास के लिए महत्वपूर्ण दुष्परिणामों का सूचक है। उदाहरण के लिए, जीडीपी को देखने का एक तरीका यह भी है इसे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से होने वाले खर्चों के सन्दर्भ में विभाजित कर दिया जाये। चूँकि निजी अंतिम उपभोग खर्च सकल घरेलू उत्पाद के तकरीबन 60% हिस्से के आसपास बैठता है, ऐसे में अर्थव्यवस्था में सुधार के सतत स्तर पर बनाए रखने के लिए खपत की दर में आवश्यक सुधार बेहद जरुरी है। 

सीएमआईई के प्रबंध निदेशक और सीइओ, महेश व्यास ने हाल ही सूचित किया था कि दीवाली से पहले के कुछ हफ्तों के दौरान कंज्यूमर सेंटिमेंट में पिछले दो वर्षों की तुलना में कोई सुस्पष्ट सुधार देखने को नहीं मिला है। वस्तुओं और कारों की बिक्री को तो भूल ही जाइए, लोग तो इस मौजूदा त्योहारी सीजन में कपड़े और जूते-चप्पल जैसे नॉन-ड्यूरेबल वस्तुओं तक की खरीद के मूड में नहीं हैं। उनका कहना था “आधे से अधिक परिवारों को लगता है कि एक साल पहले की तुलना में कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल वस्तुओं की खरीद करने का यह सबसे खराब समय है।”

ऐसे में यह स्पष्ट है कि जीएसटी पर नवीनतम आंकड़े का इस्तेमाल मंत्रालय द्वारा दिवाली से पहले सेंटिमेंट को बढ़ावा देने की एक बैचेन कोशिश में एक नैरेटिव खड़ा करने से अधिक कुछ नहीं है। हमेशा की तरह सच्चाई जल्द ही इसे साबित कर देगी।

मासिक जीएसटी संग्रह 

स्रोत: वित्त मंत्रालय 

लेखक ‘फ्रंटलाइन’ के पूर्व एसोसिएट संपादक रहे हैं, और इसके अलावा आप तीन दशकों से अधिक समय तक द हिन्दू ग्रुप के लिए काम कर चुके हैं। व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Too Early to Celebrate GST October Jump as Economic Recovery

GST
GDP
Economy India
Finance Ministry
BJP
Nirmala Sitharaman
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License