NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
त्रासदी: उत्तराखंड के पहाड़ों से खिलवाड़!
चमोली हादसे को प्राकृतिक कैसे माना जाए? प्राकृतिक कह देना तो भोलेपन की निशानी है। अगर इसे प्रकृति का कोप भी मानें तो यह तय है कि प्रकृति किसी वजह से कुपित हुई होगी। यह वजह मनुष्य निर्मित ही रही होगी, वर्ना जाड़े में ग्लेशियर नहीं गिरते।
शंभूनाथ शुक्ल
19 Feb 2021
त्रासदी: उत्तराखंड के पहाड़ों से खिलवाड़!

धौलीगंगा रुष्ट हो गईं और उन्होंने भारी विनाश कर दिया। चमोली स्थित तपोवन विष्णुगाड का पॉवर प्लांट तहस-नहस हो गया। और उसकी टनल्स में मौजूद क़रीब डेढ़ सौ लोगों का अभी तक पता नहीं चला है। जबकि इस हादसे को दो हफ़्ते से ऊपर हो चुके हैं। आईटीबीपी और एनडीआरएफ एवं एसडीआरएफ की टीमों ने खूब प्रयास किया लेकिन लापता लोगों में से कुल 40 शव ही ढूँढ़ सकी। तपोवन हाइडिल परियोजना और उसके समीप बना डैम सब तबाह हो गए।

सात फ़रवरी की सुबह सवा दस बजे एक धमाका हुआ और उसके बाद पानी और मलबे का जो बीस फुट ऊँचा सैलाब उमड़ा, उसने जोशीमठ से ऊपर के इलाक़े के गाँव, पुल, सड़क और पॉवर प्लांट्स आदि सबको नष्ट कर दिया। इस हादसे के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का एक विचित्र बयान आया कि चमोली में आई इस विपदा को मैन-मेड विपदा न बताया जाए। यह एक प्राकृतिक आपदा है। उनका कहना था कि इसे मैन-मेड हादसा बताने से उत्तराखंड के विकास कार्यों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

लेकिन मुख्यमंत्री महोदय यह स्पष्ट नहीं कर सके, कि कभी कोई प्राकृतिक हादसा स्वतः नहीं होता, उसके पीछे मनुष्यों के अपने कर्म होते हैं। लाखों वर्ष से पहाड़ ऐसे ही खड़े हैं। बारिश, तूफ़ान और क्लाउड बर्स्ट (बादल फटना) को झेलते हुए। और इसकी वजह रही कि पहाड़ की वनोपज का संतुलन कभी नहीं बिगड़ा। यानी पहाड़ की जैव विविधता व प्राकृतिक संतुलन से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई। लेकिन जैसे ही पहाड़ों का व्यापारिक लाभ के लिए दोहन शुरू हुआ, उसका संतुलन गड्ड-मड्ड हो गया। एक दशक के भीतर यह दूसरा बड़ा हादसा था। अगर छोटे-मोटे भूकंपों को छोड़ दिया जाए तो भी 2013 और 2021 में इतना बड़ा हादसा हुआ, जिसकी मिसाल ढूँढ़नी मुश्किल है। इन दोनों ही हादसों को मिलाकर कई हज़ार जानें गईं।

उत्तराखंड में पिछले 2016 के बाद से इस तेज़ी से उत्खनन हुआ है, कि हिमालय के कच्चे पहाड़ लगभग रोज़ ही दरकते हैं। ख़ासकर गढ़वाल रीज़न में चार धाम परियोजना के तहत 900 किमी तक 15 मीटर चौड़ी सड़क बनाने का लक्ष्य है। ये सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बनवाएगा। यह सड़क दो लेन की होगी और बद्रीनाथ-केदारनाथ तथा यमुनोत्री-गंगोत्री को परस्पर जोड़ेगी। ज़ाहिर है, इसके लिए पहाड़ों को खोदा जा रहा है। ऊपर से पत्थर सड़क पर न गिरें इसलिए 15-20 फ़िट ऊँची पत्थरों की दीवाल बनाई जा रही है और इस ऊँचाई के ऊपर लोहे के तारों का जाल। एक नज़र में यह परियोजना बड़ी अच्छी लगती है। पहाड़ों की यात्रा सुगम और सरल हो जाएगी तथा पत्थरों के गिरने का ख़तरा भी कम होगा। ऋषिकेश से चंबा तक का क़रीब 68 किमी की सड़क इस परियोजना के तहत बन चुकी है और यह दूरी अब मात्र सवा घंटे में पूरी हो जाती है, जिसे तय करने में पहले दो-ढाई घंटे लगते थे। मगर इसके लिए जिस तरह पहाड़ों का स्वरूप बिगाड़ा गया है, उनकी हरियाली नष्ट की गई है तथा पानी बाहर जाने के रास्ते बंद हो चुके हैं, उससे ये चमाचम सड़कें कितने दिन चल पाएँगी, यह कहना बहुत कठिन है।

इसे भी पढ़ें : चमोली आपदा : सर्वोच्च न्यायालय नियुक्त विशेषज्ञ के अनुसार चार धाम परियोजना भी हो सकती है बड़ी तबाही का कारण

यात्री तो आया और चला गया। किंतु वहाँ के गाँवों और क़स्बों का क्या हाल होगा, इसकी चिंता सरकारों को नहीं होती। क्योंकि राजनेताओं को कमीशन मिलता है और इज़ारेदार कारपोरेट घरानों को व्यापार की सुविधा। बर्बाद हो जाते हैं वहाँ के रहवासी। सात फ़रवरी को जो हादसा हुआ उससे चमोली ज़िले का रेणी गाँव पूरी तरह समाप्त हो गया। उसको जोड़ने वाला पुल भी। हिमालय का एक ग्लेशियर शिखर से टूट कर ऋषिगंगा में गिरा और उसके बाद जो भयानक पानी उमड़ा वह धौलीगंगा के संगम पर जाकर बीस फुट ऊँचा हो गया। इसके बाद उछाल मारते हुए इस पानी ने अपने साथ आसपास के पहाड़ों से गिरे मलबे को लपेटे में लिया। तेज़ी से हरहराता हुआ यह पानी तपोवन पहुँचा। वहाँ पर डैम के गेट बंद थे। इस पानी ने डैम के किनारों को तोड़ते हुए उससे कुछ दूरी पर स्थित पॉवर प्लांट के टनल्स पर निशाना साधा। पंद्रह फुट ऊँचे गेट वाले इन टनल्स के भीतर पानी और मलबा घुस गया। इनमें से टनल नंबर एक ज़्यादा लम्बी है और नंबर दो कम। लेकिन लोग दोनों टनल्स के अंदर थे। उनकी निकासी का दरवाज़ा बंद हो गया। इसी के साथ ऑक्सीजन जाने का रास्ता भी। कुछ ही लोग बचाए जा सके।

इस हादसे को प्राकृतिक कैसे माना जाए? प्राकृतिक कह देना तो भोलेपन की निशानी है। अगर इसे प्रकृति का कोप भी मानें तो यह तय है कि प्रकृति किसी वजह से कुपित हुई होगी। यह वजह मनुष्य निर्मित ही रही होगी, वर्ना जाड़े में ग्लेशियर नहीं गिरते। और वह भी लाखों टन वज़नी ग्लेशियर। हालात ये हैं, कि यदि आप ऋषिकेश से जोशीमठ की तरफ़ जाने वाली रोड पर बढ़ें तो देवप्रयाग तक के पूरे रास्ते पर तोड़-फोड़ जारी है। दासियों ज़ेसीबी लगी हैं, जो पहाड़ खोद रही हैं। जगह-जगह ऊपर से पत्थर गिर रहे हैं। देव प्रयाग से रुद्र प्रयाग तक चार धाम परियोजना की सड़क बन गई है। मगर आगे कर्ण प्रयाग और नंद प्रयाग तक हाल वैसा ही ख़राब है। इतनी ऊँचाई पर पहाड़ काटने का मतलब प्रकृति को बर्बाद करना ही है।

इसे भी पढ़ें: चमोली हादसे के सवाल और सबक़ क्या होंगे, क्या अब भी हिमालय में हज़ारों पेड़ कटेंगे!

नदी का अपना एक प्रवाह होता है और इसे समझना बहुत ज़रूरी है। जगह-जगह उस पर डैम बनाना उसकी धारा को अवरुद्ध करना है। पहाड़ पर सिंचाई के लिए पानी की ज़रूरत नहीं लेकिन बड़े-बड़े बाँध बना कर उनसे बिजली उत्पादन एक बड़ा मुनाफ़े का सौदा है। एक-एक पॉवर प्लांट का ठेका हासिल करने के लिए कंपनियों में खूब युद्ध होते हैं। प्रति मेगावाट नेताओं का कमीशन तय है। अब इस युद्ध और कमीशनखोरी में कौन क्या कर जाए, पता नहीं। मज़े की बात कि उत्तराखंड को बिजली की ज़रूरत नहीं। उसके छोटे-छोटे बाँधों से ही पर्याप्त बिजली मिल जाती है। किंतु बिजली का देशव्यापी मार्केट है। इसलिए हर छोटी बड़ी नदी पर बाँध बनाकर पानी रोका जाता है। ऋषिगंगा जब धौलीगंगा में गिरती है तो आगे इसका नाम धौलीगंगा हो जाता है। जब दो नदियों का संगम होता है तो जो नदी ज़्यादा गहरी और विशाल होती है, उसी का नाम आगे की धारा को मिलता है। किंतु यदि गहराई सामान है तो दूसरा नाम मिलता है।

यह धौलीगंगा जोशीमठ के क़रीब विष्णु प्रयाग में बद्री पर्वत से नक़ल कर आई विष्णुगंगा से मिलती है। चूँकि दोनों की गहराई सामान है इसलिए अब बढ़ी नई धारा को नाम मिला अलकनंदा। इसके बाद नंद प्रयाग में नंदाकिनी नदी इसमें मिली किंतु नाम अलकनंदा ही रहा। कर्ण प्रयाग में पिंडारी नदी इसमें मिलती है और रुद्र प्रयाग में केदार पर्वत से निकल कर आई मंदाकिनी मिलती है। पर नाम अलकनंदा ही रहता है। देव प्रयाग में इस अलकनंदा में भागीरथी नदी मिलती है। मगर यहाँ दोनों की गहराई और विशालता समान है इसलिए नाम मिला गंगा। अब गंगा का जन्म होने के पहले ही हर 20 किमी पर बाँध बनाकर उनका पानी रोक लिया जाता है। पहाड़ों के धसकने के कारण पॉवर हाउस पहाड़ों को खोखला कर उनके अंदर बनाए गए हैं। इस तरह हिमालय के कच्चे पहाड़ों को इस तरह खोद दिया गया है, कि कभी भी कोई हादसा हो सकता है। अभी 2013 की केदार त्रासदी को लोग भूले नहीं हैं। जब मंदाकिनी ने हज़ारों लोगों को लील लिया था। अगर विकास की इस कारपोरेटी प्रतिद्वंदिता को न रोका गया तो कैसे रुकेंगे हादसे!

इस त्रासदी के चलते गंगा तक इतनी गाद आ गई है, कि सैकड़ों प्रकार के जलीय जंतु नष्ट हो गए। जैव विविधता को भारी नुक़सान पहुँचा है। पर मुख्यमंत्री इस विनाशकारी विकास को नहीं रोकना चाहते। न ही केंद्र में बैठी सरकार।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Uttarakhand Tragedy
Chamoli disaster
Enviornment impact
development
Ecological Damage

Related Stories

'विनाशकारी विकास' के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है देहरादून, पेड़ों के बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग

उत्तराखंड: विकास के नाम पर विध्वंस की इबारत लिखतीं सरकारें

जलवायु परिवर्तन और प्रलय का कारण बन रहा कॉरपोरेट लाभ और लोभ

जब जम्मू-कश्मीर में आर्द्रभूमि भूमि बन गई बंजर

स्पेशल रिपोर्ट: बनारस की गंगा में 'रेत की नहर' और 'बालू का टीला'

क्या उत्तराखंड में लगातार हो रही अतिवृष्टि के लिये केवल प्रकृति ज़िम्मेदार है? 

चमोली के सुमना में हिम-स्खलन से 10 की मौत, रेस्क्यू जारी, जलवायु परिवर्तन का असर है असमय बर्फ़बारी

चमोली आपदा : इकोलोजी, सुरक्षा को ध्यान में रख विकास परियोजनाओं की समीक्षा करने की ज़रूरत  

चमोली हादसे के सवाल और सबक़ क्या होंगे, क्या अब भी हिमालय में हज़ारों पेड़ कटेंगे!

ग्लेशियर टूटने से तो आपदा आई, बांध के चलते मारे गए लोगों की मौत का ज़िम्मेदार कौन!


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 11,499 नए मामले, 255 मरीज़ों की मौत
    26 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.28 फ़ीसदी यानी 1 लाख 21 हज़ार 881 हो गयी है।
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, पांचवां चरण: अयोध्या से लेकर अमेठी तक, राम मंदिर पर हावी होगा बेरोज़गारी का मुद्दा?
    26 Feb 2022
    पांचवें चरण के चुनावों में अयोध्या, प्रयागराज और चित्रकूट.... तीन-तीन धर्म नगरी शामिल हैं, जो हमेशा से चुनावों में भाजपा का बड़ा हथियार रही हैं, इसके बावजूद इस बार बेरोज़गारी और महंगाई भाजपा के लिए…
  • pak
    श्रिया सिंह
    पाकिस्तानी छात्रों का छात्र संगठन पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष को सिंह प्रांत में मिली बड़ी जीत
    26 Feb 2022
    क़रीब 38 साल पहले जनरल ज़िया उल हक़ की सैन्य तानाशाही सरकार के दौरान छात्र संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया था। अब अगर सिंध के गवर्नर इमरान इस्माइल सिंध स्टूडेंट यूनियंस बिल 2019 पर हस्ताक्षर कर देते हैं…
  • human
    संदीपन तालुकदार
    सबसे बड़ा फ़ैमिली ट्री बनने से आसान हुई पलायन और वंशावली की खोज
    26 Feb 2022
    शोधकर्ताओं ने जेनेटिक्स का इस्तेमाल कर अब तक का सबसे बड़ा फ़ैमिली ट्री तैयार किया है। इसके बनने से पूर्वजों की जानकारी और अभी जो ज़िंदा हैं उनसे उनके संबंधों के बारे में जानकारी मिलना आसान हो गया है।
  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव चक्र: उत्तर प्रदेश का आधे से ज़्यादा रास्ता तय, मणिपुर में भी वोट की जंग
    25 Feb 2022
    इस बार उत्तर ही नहीं पूर्वोत्तर में भी वोट की जंग है। उत्तर प्रदेश अपने चार चरण पूरे कर चुका है और 27 फरवरी को पांचवें चरण का वोट करेगा, जबकि पूर्वोत्तर का अहम राज्य मणिपुर पहले चरण के मतदान के लिए…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License