NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
“दिल्ली चलो” का सफ़र: यूपी के किसानों की अग्निपरीक्षा से कम नहीं है पुलिस की चौकसी 
यूपी के किसानों का साफ़ कहना है ये कृषि सुधार उनके फ़ायदे के लिए नहीं बल्कि नुक़सान के लिए हैं। इसी वजह से वे इसके विरोध के लिए दिल्ली बॉर्डर पर आए हैं। लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा और अब भी पुलिस उन्हें बार-बार फ़ोन करके परेशान कर रही है।
रौनक छाबड़ा
19 Dec 2020
चिल्ला बॉर्डर
चिल्ला बॉर्डर से गुज़रने वाले दिल्ली-नोएडा लिंक रोड पर डेरा डाले उत्तर प्रदेश के किसान। फ़ोटो: रौनक छाबड़ा

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के "मुख्य प्रवेश द्वार" को पीछे छोड़ते हुए दिल्ली में प्रवेश करते ही दिल्ली-नोएडा लिंक रोड पर एक नीला होर्डिंग आगंतुकों का अभिवादन करता है। इस होर्डिंग पर लिखा है, “दिल्ली आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है।

हालांकि, यह आतिथ्य सत्कार उत्तर प्रदेश के उन किसानों के लिए नहीं है,जो चिल्ला बॉर्डर के तौर पर जाने जाते इस अंतर्राज्यीय सीमा स्थल पर डेरा जमाये हुए हैं, लेकिन उन्हें प्रवेश की इजाज़त नहीं है।

कई यूनियनों की अगुवाई में जो किसान यहां तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं, वे भी बताते हैं कि अपने मूल जिल़ों से दिल्ली तक का यह सफ़र उनके लिए किसी "बुरे सपने" से कम नहीं था, क्योंकि इन विवादास्पद कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध में शामिल होने के इच्छुक लोगों को पिछले कुछ दिनों से राज्य का पुलिस प्रशासन "उत्पीड़ित" कर रहा है।

राजमार्गों पर राज्य पुलिस अवरोध से बचने के लिए कुछ किसानों को तो "ख़ुद को छुपाने" या "ज़्यादा समय लेने वाले रास्ते" का सहारा लेने की ज़रूरत पड़ी है। किसानों ने अफ़सोस जताया कि जो लोग पुलिस की पकड़ में आ गये, उनसे ‘हस्ताक्षरित नोट’ वाला संपर्क विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा जा रहा है। इस नोट में आम तौर पर यूपी पुलिस को दिया हुआ एक ‘आश्वासन’ होता है कि वे दिल्ली की सीमा पर चल रहे इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होंगे और पुलिस इस रिपोर्ट को योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार को सौंपे देती है।

किसानों की यह सख़्त जांच-पड़ताल किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में एक अन्य भाजपा शासित राज्य में भारी पुलिस चौकसी की एक झलक देती है।

बुलंदशहर के अनूप सिंह ने बताया, "अपने दो साथियों के साथ मंगलवार को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मैं अपने गांव से निकला था।” वह आगे बताते हैं कि भारतीय किसान यूनियन (भानू) का झंडा उनकी कार की खिड़कियों पर फ़हरा रहा था, जिसके आगे पीछे हमारे यूनियन के स्टिकर चिपके हुए थे। इसी बॉर्डर पर पहले से चल रही नाकेबंदी को हटाये जाने के बाद चिल्ला सीमा पर बुधवार को नोएडा से दिल्ली में प्रवेश-निकास स्थलों को अवरुद्ध करने का आह्वान किया गया था।

हालांकि,इस विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए जा रहे सिंह को इस बात की जानकारी नहीं थी। 70 वर्षीय इस बुज़ुर्ग ने गुरुवार को न्यूज़क्लिक को बताया,“हमें दोपहर एक बजे ग्रेटर नोएडा के बाड़ी चौक पर रोक लिया गया।” उन्होंने कहा कि पुलिस उन्हें इस रास्ते से गुज़रने की इजाज़त इसलिए नहीं देगी,क्योंकि पुलिस को डर है कि वे किसानों के विरोध प्रदर्शन में शामिल हो जायेंगे।

आख़िरकार,छह घंटे तक हिलने-डुलने नहीं देने के बाद उन्होंने पुलिस को आश्वासन दिया कि वे वापस लौट जायेंगे। उन्होंने आगे बताया, “इसके बाद हमने लम्बे रूट से जाने का फ़ैसला किया। हम किसी तरह आधी रात को यहां पहुंचने में कामयाब रहे। हम इस मायने मे भाग्यशाली रहे कि दूसरे रास्ते पर फिर से हमें (पुलिस द्वारा) नहीं रोका गया। लेकिन,यह सब किसी बुरे सपने की तरह था।”

हालांकि, भाग्य का ऐसा साथ चिल्ला बॉर्डर पर मौजूद उन दूसरे किसानों को नहीं मिला,जिनका आरोप है कि उनके पास "उनके ज़िले के पुलिस अधिकारियों की तरफ़ से लगातार फ़ोन आते रहे।"

उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर न्यूज़क्लिक को बताया,"वे मुझसे पूछ रहे हैं कि विरोध स्थल पर मेरी कार कैसे खड़ी है।" सवाल है  कि यह सब अधिकारियों को कैसे पता? उन्होंने इसका जवाब देते हुए आरोप लगाया, "ऐसा इसलिए है,क्योंकि जब हम अपने रास्ते में थे, तो हमारी गाड़ी अलीगढ़ के पास एक चेकपोस्ट पर रुकी थी। पुलिस ने तभी हमें आगे बढ़ने की इजाज़त दी, जब उसने हमसे हमारे विवरण एकत्र कर लिये और हमने उन्हें लिखित में दे दिया कि हम विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होंगे।” यह मामला सिंह से बिल्कुल अलग था, क्योंकि जिस कार में तीन अन्य लोगों के साथ ये किसान यात्रा कर रहे थे, उस पर किसी भी किसान संगठन के साथ जुड़े होने का कोई निशान नहीं था।

उन्होंने कहा, "लेकिन मुझे नहीं पता था कि उन्हें हमारे यहां होने का पता चल जायेगा।" उन्होंने चिंतित होते हुए कहा कि विरोध स्थलों पर मौजूद कारों की जानकारी ज़िला पुलिस स्टेशनों के साथ साझा की गयी थी। उन्होंने कहा, " यह तो हमें अपनी ख़ुद की नाराज़गी में आवाज़ मिलाने को लेकर हमें परेशान करने की तरह है। मैं अपने परिवार को लेकर चिंतित हूं।”

कम से कम तीन अन्य किसान जो आस-पास खड़े थे, उन्होंने भी इस बाबत न्यूज़क्लिक से इसकी पुष्टि की। हालांकि, उनमें से कोई भी अपने नाम या विवरण अधिकृत तौर पर साझा करने में सहज नहीं थे। उनमें से एक ने बताया, “यहां तक पहुंचने के लिए हममें से कई लोगों को ख़ुद को छुपाने के लिए किसी न किसी तरीक़े का सहारा लेना पड़ा। अन्यथा हमें इस बात का यक़ीन था कि हमें यहां तक पहुंचने की इजाज़त तो नहीं ही मिलती।” 

ग़ौरतलब है कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के ज़िला प्रशासन की तरफ़ से कम से कम किसान नेताओं को व्यक्तिगत बॉन्ड जमा कराने के नोटिस थमा दिये गये हैं, ऐसा इसलिए ताकि किसानों को विरोध में शामिल होने के लिए कथित तौर पर "उकसाने" से उन्हें रोका जा सके।

बीकेयू (भानु) की यूपी इकाई के प्रदेश अध्यक्ष,योगेश प्रताप सिंह ने न्यूज़क्लिक को बताया कि राज्य में किसान यूनियनों से जुड़े कई नेताओं को या तो "नज़रबंद" करके रखा गया है या फिर उन्हें अपने-अपने ज़िलों के बाहर उनकी मुक्त आवाजाही से मना किया जा रहा है। उनका आरोप है,“उत्तर प्रदेश में चल रहे विरोध प्रदर्शनों में किसानों की भागीदारी को सीमित करने के लिए यूपी प्रशासन हर संभव कोशिश कर रहा है।”

न्यूज़क्लिक ने हाल ही में इस बात को सामने रखा था कि भाजपा शासित एक और राज्य-गुजरात के किसानों को राजस्थान-हरियाणा सीमा पर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए किस तरह राज्य से बाहर निकलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। बड़े-बड़े समूहों तक को भी इस तरह की परेशानियों का इसलिए सामना करना पड़ा, क्योंकि गुजरात प्रशासन ने सीआरपीसी की धारा 144 लागू कर दी थी, जिससे कि राज्य भर में किसी एक जगह पर चार या इससे ज़्यादा लोगों के जमा होने पर रोक लगती है।

अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष, अशोक धावले ने कहा कि भाजपा का "एजेंडा" एकदम “साफ़” है। उन्होंने कहा कि वे चल रहे किसान आंदोलन को अखिल भारतीय विरोध के रूप में सामने आने से रोकना चाहते हैं। धावले ने न्यूज़क्लिक से कहा,“लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम हो रहे हैं। क्योंकि,किसानों को रोके जाने के तमाम हथकंडों के बावजूद, किसान उत्तर प्रदेश और गुजरात और दूसरे राज्यों से भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय राजधानी का सफ़र अब भी कर रहे हैं।” 

किसानों को कम भुगतान किया जायेगा, आम जनता को ज़्यादा भुगतान करना होगा

इस बीच, दिल्ली पुलिस कर्मियों के साथ-साथ केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CRPF) की कंपनियों की तरफ़ से लगाये गये पीले बैरिकेड के साथ दिल्ली-नोएडा लिंक रोड को क़िले में तब्दील कर दिया गया है।

चिल्ला बॉर्डर पर दिल्ली पुलिस के साथ सीआईएसएफ़ और सीआरपीएफ़ की कंपनियां। फ़ोटो: रौनक छाबड़ा 

यहां आंदोलनकारी किसानों की प्रमुख आशंका यही है कि सरकार आवश्यक माने जाने वाले सामानों के स्टॉक पर लगायी जाने वाली सीमा को इन "कृषि सुधारों" के ज़रिये ख़त्म करने जा रही है। आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 में अनाज और दालों सहित खाद्य पदार्थों को विनियमित करने का प्रयास किया गया है। मुख्य रूप से आगरा, मथुरा, फ़िरोज़ाबाद, और एटा जैसे ज़िलों से आये चिल्ला बॉर्डर पर मौजूद किसान आलू, गेहूं, चावल, मक्का और सरसों की बुवाई करते हैं।

जमाखोरी को लेकर निजी व्यापारियों को खुली छूट देने के इस क़दम को फ़सल की क़ीमतों को और कम करने की चाल के तौर पर देखा जा रहा है, ख़ासकर तब,जब उत्पादक मंडियों में अपने सामान बेचने के लिए मंडी पहुंचेंगे,यह एक ऐसा डर है,जो पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है।

पिछले सीज़न में फ़िरोज़ाबाद के नरेंद्र पाल सिंह ने 200 बीघा जमीन में आलू बोया था, और इसके एक हिस्से में उन्होंने गेहूं और सरसों की फ़सल भी लगायी थी। 65-वर्ष के इस किसान ने कहा, “पहले तो मुझे आलू को एक निजी व्यापारी को ऐसी दर पर बेचना पड़ा, जो बाज़ार की औसत क़ीमत से बहुत कम थी। इसके बाद,उस निजी कोल्ड स्टोरेज के मालिक को मुझे भंडारण शुल्क के साथ 2.5% कमीशन का भी भुगतान करना पड़ा,जहां मेरी उपज को बेचने से पहले उसका भंडारण किया गया था।” उन्होंने आगे बताया कि स्टोरेज के मालिक अगले साल गोदाम को खाली कराने के लिए हर साल अक्टूबर से पहले अपने स्टॉक को साफ़ करने के लिहाज़ से "दबाव" भी डालेगा। इस दबाव का नतीजा यह होगा कि निजी जोतदार को वह क़ीमत स्वीकार करना पड़ेगा,जिस क़ीमत की पेशकश की जायेगी।

तक़रीबन 18 बीघे ज़मीन के मालिक और लखनऊ ज़िले के रहने वाले 40 साल के उमेश कुमार वर्मा ने बताया, "हम सरकार से किसानों के लिए सहकारी समितियों के गठन की मांग करते रहे हैं। एक समिति में पास के तीन से चार गांवों के किसान शामिल हों और हम इस बात की मांग भी करते रहे हैं कि हमारी फ़सल के उत्पाद के लिए भंडारण सुविधा का निर्माण किया जाये, जिसका संचालन ख़ुद यह समिति करे।" 

वर्मा को इस बात की आशंका है कि वस्तु अधिनियम में होने वाले बदलाव से कालाबाज़ारी करने वालों को जमाखोरी का "लाइसेंस" मिल जायेगा। उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया,“किसान को उनकी मेहनत के एवज़ में कम पैसे मिलेंगे, लेकिन आम जनता को कहीं ज़्यादा भुगतान करना  होगा। इससे सिर्फ़ बिचौलियों को ही फ़ायदा होगा।” उन्होंने आगे बताया, “कॉरपोरेट घराने देर-सवेर इस मौक़े का इस्तेमाल भारी मुनाफ़ा कमाने में करेंगे।”

वर्मा के बिल्कुल बगल में खड़े कासगंज ज़िले के अट्ठाईस वर्षीय धरमवीर सिंह यादव ने किसानों के इन संकटों को लेकर संक्षेप में बताया, “पहले नोटबंदी, अब ये। जब अनाज का दाम ही गिराती जायेगी सरकार,तब,फिर तो हो गयी किसानो की आय डबल।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Travelled for ‘Delhi Chalo’: UP Farmers’ Ordeal Provides Peek into Police Surveillance

farmers
farmers protest
Delhi-Noida Link Road
Chilla Border
Delhi
Uttar pradesh
Bharatiya Kisan Union – Bhanu
All India Kisan Union

Related Stories

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

दिल्ली : फ़िलिस्तीनी पत्रकार शिरीन की हत्या के ख़िलाफ़ ऑल इंडिया पीस एंड सॉलिडेरिटी ऑर्गेनाइज़ेशन का प्रदर्शन

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

यूपी : महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा के विरोध में एकजुट हुए महिला संगठन

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग


बाकी खबरें

  • Mohan Bhagwat
    अनिल जैन
    संघ से जुड़े संगठन अपने प्रमुख मोहन भागवत की ही बातों को क्यों नहीं मानते?
    17 Dec 2021
    संघ प्रमुख की बातों के विपरीत अल्पसंख्यकों और दलितों पर हमले की जो घटनाएं होती हैं उसकी औपचारिक निंदा भी कभी संघ की ओर से नहीं की जाती है। आख़िर क्यों?
  • manikpur
    सौरभ शर्मा
    यूपी चुनाव: बुंदेलखंड से पलायन जारी, सरकारी नौकरियों का वादा अधूरा
    17 Dec 2021
    बेहिसाब खराब मौसम ने इस क्षेत्र में कृषि को अव्यवहारिक या नुकसान का सौदा बना दिया है, जियाके कारण नौकरियों की तलाश में युवाओं का बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र से पलायन कर रहा जो चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 7,447 नए मामले, ओमिक्रॉन से अब तक 87 लोग संक्रमित 
    17 Dec 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 47 लाख 26 हज़ार 49 हो गयी है।
  • Hindutva
    अशोक कुमार पाण्डेय
    हिंदू दक्षिणपंथियों को यह पता होना चाहिए कि सावरकर ने कहा था "हिंदुत्व हिंदू धर्म नहीं है"
    17 Dec 2021
    उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि जैसे ही सावरकर ने हिंदुओं को 'अपने आप में एक राष्ट्र' कहा था, तो वे जातीय-धार्मिक आधार पर दो राष्ट्रों के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले पहले व्यक्ति बन गये थे।
  • bank strike
    न्यूज़क्लिक टीम
    निजीकरण के खिलाफ़ बैंक कर्मियों की देशव्यापी हड़ताल
    16 Dec 2021
    यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) ने दो सरकारी बैंकों के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ 16 दिसंबर से दो दिन की देशव्यापी हड़ताल पर है । इसके तहत देशभर में बैंक कर्मी सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License