NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
जनजातीय गौरव सप्ताह में करोड़ों खर्च, लेकिन आदिवासियों को क्या मिला!
प्रदेश के आदिवासियों के लिए सवाल बरकरार है कि 52 करोड़, कुछ जानकारों के अनुसार 100 करोड़ सरकारी खर्च से इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर जो सम्मेलन किया गया, क्या वह भाजपा के एजेंडे का हिस्सा भर था? क्योंकि इस सम्मेलन से आदिवासियों को कुछ नहीं मिला, सिवाय बस में आना-जाना और दो वक्त के टिफिन के अलावा।
रूबी सरकार
22 Nov 2021
Tribal Pride Week

जनजातीय गौरव सप्ताह के समापन में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंडला में टोकन के रूप में आदिवासियों को वन अधिकार पट्टे प्रदान किए। उन्होंने आदिवासियों को यह संदेश देने की कोशिश की, कि भाजपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो उन लोगों का भला सोचती है। लेकिन बात तो 10158 वनग्रामों  में वन अधिकार मान्यता कानून की  हुई थी, जिसमें सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार पत्र आदिवासियों को  मिल जाने थे और अगर व्यक्तिगत पट्टे की बात की जाए, तो सुप्रीम कोर्ट में मध्यप्रदेश के तीन लाख, साठ हजार आदिवासियों के दावे लंबित हैं। 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सरकार ने वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट से दावे निपटाने के लिए समय मांगा था और न्यायालय  ने उनकी बात पर भरोसा कर उन्हें समय दिया था। बीच में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार आई, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए वन मित्र पोर्टल बना दिया। पोर्टल पर भी आदिवासियों ने वन अधिकार पट्टे के लिए आवेदन दिए, लेकिन अभी तक उस पर क्या कार्रवाई हुई, यह किसी को नहीं मालूम।

जहां तक सामुदायिक वन प्रबंधन की बात है, तो 18 सितंबर को  जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रदेश के आदिवासी नायक  शहीद शंकर शाह व उनके पुत्र रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस के दिन जनजाति गौरव के लिए कई कार्यक्रमों की घोषणा जबलपुर में कर रहे थे, तब उसमें 18 सितंबर से लेकर 15 नवंबर के बीच 58 दिनों में प्रदेश के 19158 गांवों को सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार  दिए जाने की भी घोषणा की थी। इसके लिए आदिम जाति क्षेत्रीय विकास निदेशालय की ओर से  सभी जिला कलेक्टरों को एक पत्र जारी किया गया, जिसमें 15 नवंबर 2021 तक समस्त ग्राम सभाओं को वन अधिकार कानून के तहत सामुदायिक वन अधिकारों के अधिकार पत्र सौंपे जाने को सुनिश्चित करने के लिए कहा था। जिला कलेक्टरों ने इस पत्र को कोई महत्व नहीं दिया और निश्चित तिथि तक कलेक्टरों की ओर से कोई जवाब निदेशालय को नहीं भेजा गया। इससे पता चलता है कि सरकार और अफसरशाही आदिवासियों के मसले पर कितनी गंभीर है।

दरअसल घोषणा देश के गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा हुई थी और जब कलेक्टरों द्वारा कार्रवाई किए जाने की जो अंतिम तिथि दी गई थी, उस दिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। अब सवाल यह उठता है कि बिरसा मुंडा के जन्मदिन 15 नवम्बर के दिन भाजपा आदिवासियों के लिए मार आकाश पाताल गुंजायमान कर जो सम्मेलन का आयोजन किया, क्या वह केवल आदिवासियों की भीड़ जुटाने के लिए था।

प्रदेश के आदिवासियों के लिए सवाल बरकरार है कि 52 करोड़, कुछ जानकारों के अनुसार 100 करोड़ सरकारी खर्च से इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर जो सम्मेलन किया गया, क्या वह भाजपा के एजेंडे का हिस्सा भर था क्योंकि आदिवासियों को तो कुछ मिला नहीं, सिवाय बस में आना-जाना और दो वक्त के टिफिन के अलावा। कुछ के अनुसार आने-जाने के खर्च के नाम पर बस थोडा़ बहुत नगद भी दिया गया है। इस जनजातीय गौरव सप्ताह से किसका गौरव बढ़ा। उनके आजीविका, जमीन और आवास के मसले हल तो हुए नहीं। आदिवासियों की जमीनी आवाज क्या है! 

आइए जानते हैं राजधानी से सटे सागर जिले के झीकनी वनग्राम के रामसिंह से, जो आदिवासी हैं और कई पुश्तों से इसी गांव में रह रहे हैं। कुल 4 एकड़ वन भूमि पर उसका कब्जा है, जिस पर वह चना, ज्वार, बाजरा , मसूर आदि की खेती कर गुजारा करते हैं। इसके लिए उसे वन विभाग के कर्मचारियों से लाठी खानी पड़ती है। एक बार तो उसके ऊपर वन विभाग के कर्मचारियों ने एफआईआर दर्ज करवा दी। क्योंकि उसके पास पीने के लिए पानी नहीं था, तो उसने एक छोटा सा गड्ढा खोद डाला था। आज भी वह जमानत पर है। 

रामसिंह बताते हैं, कि परिवार में 10 सदस्य हैं और सभी इसी खेती पर निर्भर हैं। कभी-कभी मजदूरी मिल जाती है, तो वह भी कर लेते हैं। खेती के लिए पर्याप्त पानी नहीं है, नाले की पानी से यहां सिंचाई होती है। पीने के लिए एक गड्ढा खोदा, तो हमारे ऊपर मुकदमा दर्ज हो गया। आज भी कोर्ट में मामला चल रहा है।

इस गांव में रामसिंह अकेले नहीं हैं, बल्कि 25 आदिवासी परिवार इसी तरह अस्थिरता का जीवन जी रहे हैं। कभी खेत में खड़ी फसल वन विभाग के कर्मचारी उखाड़ लेते हैं। कुछ कहने पर कानून की धमकी देते हैं। कहते हैं, तुम जबरन कब्जा कर रह रहे हो। यहां के सौंसर के आदिवासियों ने सालों पहले वन अधिकार के पट्टे के लिए आवेदन दिए थे। कितनी बार मुख्यमंत्री से मिले, लेकिन केवल आश्वासन ही मिला, पर पट्टा नहीं मिला। 

रूपाबाई

भरत रामसिंह की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, कि वर्ष 2006 से पहले का कब्जा है। पर सामुदायिक वन प्रबंधन तो छोडि़ए , जिस पर सालों से खेती कर रहे हैं, उसका पट्टा तक सरकार नहीं दे ही रही है। कलेक्टर, मुख्यमंत्री, पोर्टल तक में आवेदन दिया, कुछ नहीं हुआ। इन दोनों की बातों का समर्थन हनुमंत पहाड़े, रूपाबाई, तुलसा,तुलसीराम जानकी बाई आदि ने भी किया। सागर जिले के मालथौन, खुरई, बंडा विकासखंड, देवरी, राहतगढ़ जैसे दर्जन भर गांव है, जहां आदिवासी भुखमरी की हालत में जी रहे हैं। पट्टा न होने के कारण जिस जमीन पर वे खेती करते हैं, उसे वन विभाग या तो फसल आने के बाद लूट लेते हैं या फिर बीज अंकुरित होने से पहले ही उसे उजाड़ देते हैं। 

हनुमंत पहाड़े

अब तो प्लांटेशन के नाम पर भी सरकार आदिवासियों को जंगल से बाहर करने पर आमादा है। अकेले सागर जिले में करीब साढ़े चार हजार दावे और ग्वालियर में 1632 दावे ऑनलाइन सरकार के पास लंबित हैं। इसी तरह काताजर वनग्राम, विकासखंड बिछिया जिला मंडला के आदिवासी किसान जमनीबाई कुशराम, इमरत उद्दे और संपत से वन भूमि का कब्जा छीनकर, वन विभाग के कर्मचारियों ने इन लोगों को जंगल से ही भगा दिया। आज तक वे कोर्ट में इसके लिए लड़ रहे हैं।

अक्टूबर माह में ग्वालियर में 17 गांव के सहरिया आदिवासी अपनी जमीन की समस्या को लेकर कलेक्टर से मिलने गए थे। जबकि यह काम आदिम जाति कल्याण विभाग का है। विभाग को यह जिम्मेदारी दी गई है  कि वे इन सहरिया आदिवासियों की समस्या का हल करे। आदिवासियों के बीच वर्षों से काम कर रहे डोंगर शर्मा बताते हैं कि दरअसल विभाग आदिवासियों की सुध न लेकर राजनेताओं की चाटुकारिता में पूरा समय बिता देते हैं। वे बताते हैं कि यहां ष्षेर गांव में 62 परिवारों को व्यक्तिगत दावा का अधिकार तो मिल गया, लेकिन सदियों से जितनी जमीन पर वे खेती कर रहे हैं, उससे बहुत कम जमीन उन्हें दी गई। इसकी शिकायत कलेक्टर कार्यालय में की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे इनकी आजीविका का हल नहीं हो सका। जबकि मुख्यमंत्री कहते हैं कि जनजातीय गौरव सप्ताह, जनजातियों में जागरूकता लाने और उनकी जिंदगी बदलने का एक अभियान है।

आदिवासी मामलों के जानकार मंडला के राजकुमार सिन्हा बताते हैं कि सबसे शर्मनाक यह है कि प्रधानमंत्री के भाषण में सामुदायिक वन अधिकारों का कोई उल्लेख भी नहीं था। इससे साफ हो जाता है कि इस तरह का भव्य सम्मेलन आदिवासी समुदायों के बीच भाजपा की खिसकती जमीन को साधने की कोशिश है, न कि आदिवासियों के हित में कोई फैसला लेना इसका उद्देश्य था।

उन्होंने कहा कि असल में कलेक्टरों को भेजे गए जो समस्त ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार सुपुर्द करने वाला दस्तावेज तैयार किया गया, लेकिन वही गलत ढंग से तैयार किया गया है। इसमें पेसा कानून की पूरी तरह अनदेखी की गई है। वन अधिकार कानून-2006 की धारा-3 (1)(झ) के अनुसार सामुदायिक वन संसाधन का संरक्षण, पुनर्जीवित या संरक्षित या प्रबंध करने का अधिकार ग्राम सभा को पहले से ही है, जिसकी वे सतत उपयोग के लिए परंपरागत रूप से संरक्षा कर रहे हैं। अतः सक्रिय भूमिका की जगह प्रबंधन करने का अधिकार जोड़ा जाना चाहिए था। 

आदिवासी परंपराओं के अनुसार आपसी विवाद निपटाने और प्राकृतिक संसाधनों का समुदाय के हित में प्रबंधन करने का अधिकार ग्राम सभा को पहले से ही दिया गया है। लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा है। आदिवासी इतने पढ़े-लिखे है नहीं और सरकार इन्हें जागरूक करना नहीं चाहती। सिन्हा ने कहा कि वन विभाग को इन्हें तकनीकी सहयोग देकर जंगल की रक्षा और उसके संसाधनों के बारे उपयुक्त जानकारी देनी चाहिए। पारंपरिक ज्ञान आदिवासियों के पास पहले से ही है।

Madhya Pradesh
tribals
Tribal Pride Day
Tribal Pride Week
Shivraj Singh Chauhan
BJP
Narendra modi

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

सवर्णों के साथ मिलकर मलाई खाने की चाहत बहुजनों की राजनीति को खत्म कर देगी


बाकी खबरें

  • पीपल्स डिस्पैच
    नेपाल ने अमेरिका के MCC अनुदान समझौते को विरोध प्रदर्शनों के बीच दी मान्यता, अब आगे क्या?
    04 Mar 2022
    नेपाली संसद में कई हफ़्तों तक चली उठापटक नतीजा आख़िरकार अमेरिका की एमसीसी के साथ 500 मिलियन डॉलर का समझौता रहा। इस समझौते के पहले सरकार के समझौते का विरोध कर रही राजनीतिक पार्टियों ने बड़े विरोध…
  • mamta banerjee
    विजय विनीत
    यूपी चुनावः बनारस के सियासी अखाड़े में दिग्गजों पर भारी पड़ीं ममता, भाजपा को दे गईं गहरी चोट
    04 Mar 2022
    बंगाली समाज के लोग बनारस में पीढ़ियों से बंग संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। पिछले कई चुनावों से वह बीजेपी को वोट देते आए हैं। इस बार ममता बनर्जी का अपमान और उनको यह कहना कि वो हिन्दू नहीं हैं, अंदर…
  • पीपल्स डिस्पैच
    यूक्रेन में चल रहे संघर्ष और युद्ध-विरोधी आंदोलन के परिपेक्ष्य
    04 Mar 2022
    शांति के लिए काम करने वाले एबी मार्टिन और ब्रायन बेकर रूस-यूक्रेन संघर्ष के सिलसिले में युद्ध विरोधी आंदोलन की दिशा में चर्चा करने के लिए आपस में मिले
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 6,396 नए मामले, 201 मरीज़ों की मौत
    04 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.16 फ़ीसदी यानी 69 हज़ार 897 हो गयी है।
  • mbbs
    रवि कौशल
    सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की बजाय मंदिरों को प्राथमिकता दी,  इसी का ख़ामियाज़ा यूक्रेन में भुगत रहे हैं छात्र : मेडिकल विशेषज्ञ
    04 Mar 2022
    विशेषज्ञों का कहना है कि रूस, चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों में मेडिकल की डिग्री हासिल करने के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की बड़ी तादाद की मुख्य वजह देश के निजी चिकित्सा संस्थानों की मोटी फीस है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License