NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
त्रिपुरा और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की बराबरी करना क्यों बेमानी है?
त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा की संस्थागत प्रकृति, और सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इसे नियंत्रण न करना, इसे बांग्लादेश में हुए हिंदुओं के खिलाफ हालिया हमलों से अलग करती है।
वसी मनाज़िर
30 Oct 2021
Translated by महेश कुमार
Tripura

ठीक एक हफ्ता बीत चुका है जब त्रिपुरा में मुस्लिम-स्वामित्व वाली दुकानों/प्रतिष्ठानों/घरों और पूजा स्थलों पर हमलों की पहली रिपोर्ट सामने आई थी। कथित तौर पर, दुर्गा पूजा समारोहों के दौरान बांग्लादेश में हुई हिंदू-विरोधी हिंसा की प्रतिक्रिया के रूप जो शुरू हुआ था, वह प्रतिक्रिया अब व्यापक हो गई है और राज्य में बेरोकटोक जारी है। इस हिंसा के जरिए दर्जन से अधिक मस्जिदों में तोड़फोड़ की गई और कई मुस्लिम-स्वामित्व वाले घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

बांग्लादेश की सरकार ने अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर हुए हमलों के खिलाफ काफी तेजी से कदम उठाए हैं और सैकड़ों अपराधियों/हमलावरों को जेल में डाल दिया गया है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हमलों की तुरंत निंदा की और कहा कि अपराधियों का "शिकार किया जाएगा और उन्हे दंडित किया जाएगा"। एक स्पष्ट टिप्पणी में उन्होंने कहा कि सीमा के दूसरी ओर क्या होता है उसका असर उनके देश में भी पड़ता है। "हम उम्मीद करते हैं कि वहां [भारत में] ऐसा कुछ भी नहीं होगा जो बांग्लादेश में हमारे हिंदू समुदाय को प्रभावित करने वाली कोई भी घटना का असर पड़े।" शेख हसीना सरकार ने नुकसान उठाने वालों को पर्याप्त मुआवजे देने की भी घोषणा की है।

बांग्लादेश में मानवाधिकार और नागरिक समाज समूह अपने हिंदु भाइयों और बहनों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सड़कों पर उतर आए। देश के मीडिया ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने के लिए हुकूमत की ज़िम्मेदारी की वकालत की और हिंसा की निंदा करते हुए लेख और संपादकीय लिखे। त्रिपुरा में हुई हिंसा पर भारत में प्रतिक्रिया इतनी निंदनीय या कठोर नहीं थी जितनी कि बांग्लादेश में थी। 

पीएमओ और गृह मंत्रालय के इंडिया ट्विटर हैंडल ने त्रिपुरा में हुई हिंसा के बारे में एक भी ट्वीट नहीं किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पिछले एक हफ्ते में कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई दिए, लेकिन त्रिपुरा अभी तक उनके बयानों में नहीं आया है। पिछले सप्ताह त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब के ट्विटर फीड में उनकी रैलियों में भाग लेने, जन्मदिन की बधाई भेजने और शाह की कश्मीर यात्रा की हवाई तस्वीरें साझा की गई हैं, लेकिन उनके राज्य में मुसलमानों के खिलाफ चल रही हिंसा की कोई झलक या निंदा मौजूद नहीं है।

विपक्षी दलों के नेताओं ने भी चुप्पी साध रखी है। लखीमपुर खीरी में मारे गए चार किसानों के परिवारों से मिलने के लिए असाधारण जोश दिखाने वाली प्रियंका और राहुल गांधी की जोड़ी ने पूर्वोत्तर राज्य के मुसलमानों के लिए कोई चिंता नहीं जताई है। ममता बनर्जी, जिनकी पार्टी त्रिपुरा में पैठ बनाना चाहती है, लेकिन वे भी राज्य की लगभग 10 प्रतिशत आबादी की दुर्दशा पर चुप है।

राज्य से आ रहे वीडियो, अल्पसंख्यकों की तरफ से हताश कर देने वाले संदेश दे रहे रहे हैं और अधिकारियों से सुरक्षा की सख्त गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें शायद ही कोई मदद मिल रही है। राज्य सरकार की उदासीनता को देखते हुए उन्होंने अपनी संपत्तियों की खुद रक्षा करने का बीड़ा उठाया है। 27 अक्टूबर को पोस्ट किए गए एक वीडियो में एक पुलिस अधिकारी उत्तरी त्रिपुरा जिले के धर्मनगर के मुसलमानों को आश्वासन देती नजर आ रही है। वीडियो में अधिकारी कह रही है कि “हमने सभी पिकेट को नियंत्रित कर लिया है, हर मस्जिद को एक पिकेट प्रदान किया गया है। अगर आप में से किसी को कोई समस्या है, तो पुलिस को फोन करें, हम आपकी सेवा में हैं और हम आपके लिए गश्त कर रहे हैं।”

अधिकारी ने मुस्लिम समुदाय से मस्जिद की रखवाली न करने की सलाह दी और कहा कि ऐसा करने से अनाम "अन्य लोगों" को समस्या पैदा हो सकती है। “लेकिन अगर आप इस तरह एक साथ इकट्ठे होते हैं और इस तरह डर का माहौल बनाते हैं, तो इससे समस्या पूरे क्षेत्र में बढ़ सकती है। जबकि मैं भी धर्म में विश्वास करती हूं, लेकिन अगर आप अपनी मस्जिदों की रक्षा करने के लिए इकट्ठा होते हैं तो यह अन्य लोगों के लिए समस्या पैदा कर सकता है।" किसी को आश्चर्य ही लगेगा कि अधिकारी का ध्यान दर्शकों पर था या हमला करने वालों पर केंद्रित था। 

अपनी पुस्तक 'खाकी एंड एथनिक वायलेंस इन इंडिया' में, उमर खालिदी लिखते हैं: "एक विनम्र और वफादार पुलिस, एक भ्रष्ट और बेईमान सरकार की तरफ से काम करती है, और नतीजतन कोई नागरिक सुरक्षा नहीं होती है जोकि पुलिस प्रशासन की मूल अवधारणा है।"

खालिदी की खोज़ इस बात को साबित करती है कि त्रिपुरा पुलिस ने मंगलवार देर रात तक कई ट्वीट्स किए, जिसमें आश्वासन दिया गया कि राज्य में सब कुछ बढ़िया है और आगजनी, हिंसा की रिपोर्ट "फर्जी समाचार" हैं। “कुछ लोग फर्जी सोशल मीडिया आईडी का इस्तेमाल करके त्रिपुरा पर फर्जी खबरे/अफवाहें फैला रहे हैं। यह सूचित किया जाता है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिल्कुल सामान्य है।” 

पॉल आर. ब्रास अपने मौलिक अध्ययन, 'समकालीन भारत में हिंदू-मुस्लिम हिंसा' में लिखते हैं कि "पार्टी [यानी भाजपा] के राष्ट्रीय नेता इस हद तक तथ्यों को स्वीकार करते हैं कि उनकी ही पार्टी के तत्वों द्वारा स्थानीय स्तर पर दंगों को बढ़ावा दिया जाता है, और यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद एल. के. आडवाणी ने मुझे वर्षों पहले बताई थी, 'हम इन लोगों के बारे में जानते हैं', जिसका अर्थ है कि वे उन्हें पार्टी के निचले स्तरों से जल्द से जल्द साफ कर देंगे।"

ब्रास फिर उस बुरे संदर्भ के बारे में बाते हैं कि भारत में दंगे नियमित राजनीति बन गए हैं: "इसलिए, दंगे ऐसी राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दंगों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता और वे अनुचित भी होते हैं लेकिन भारत के राजनीतिक व्यवहार में यह स्वीकृत अपराध हैं।"

भाजपा को मुस्लिम विरोधी बखान हाँकने का शौक है. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बांग्लादेश के मुस्लिम प्रवासियों को "दीमक" बताया, सीएए विरोधी आंदोलन को हिंसक प्रदर्शनकारी बताया और कहा कि इन प्रदर्शनकारियों को "उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है", फिर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को "अब्बा-जान" कहकर बेज्जत करने की कोशिश की गई, जो राज्य की सारी सब्सिडी को चट कर जाते हैं।

अपने हिंदू वोट आधार में असर बनाए रखने की इच्छुक सरकार के लिए, मुसलमानों के खिलाफ दण्ड-मुक्ति की भावना से काम करने से बेहतर कुछ भी नहीं है। त्रिपुरा के वीडियो में भीड़ को तलवारों और अन्य हथियारों के साथ हिंदू धार्मिक नारे लगाते और मुस्लिम विरोधी नारे लगाते हुए दिखाया गया है और यह भीड़ त्रिपुरा की सड़कों और गलियों में निडर और बेधड़क घूम कर ऐसा कर रही थी।

यह सब एक आजमाई हुई और परखी हुई स्क्रिप्ट का हिस्सा लगता होता है; जैसा कि ब्रास लिखते हैं, "घटनाओं को उकसाया जाता है, जुलूस निकाले जाते हैं, दूसरे समुदाय के सदस्यों की संवेदनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए जानबूझकर सामूहिक लामबंदी की जाती है। तनाव और कभी-कभी इस तरह के कार्यों के बाद होने वाली हिंसा से उन्हे आर्थिक और राजनीतिक लाभ मिलता हैं।”

जहां भाजपा त्रिपुरा में स्थिति का भरपूर फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है और विपक्ष वास्तविक राजनीतिक कारणों से चुप है, वहीं मीडिया की चुप्पी हैरान करने वाली लगती है। 2014 के बाद से अधिकांश मुख्यधारा का मीडिया भाजपा शासन का चीयरलीडर्स बन गया है, बावजूद इसके इससे मौलिक उम्मीद की जाती है कि वह कम से कम समाचारों को रिपोर्ट करे, लेकिन यह विश्वास करना भी गलत साबित हो रहा है। कुछ सरसरी रिपोर्टों को छोड़कर, लगभग पूरी तरह से सन्नाटा है, जो सिर्फ पुलिस या बर्बर घटनाओं के संस्करण को साझा करते हैं, और इन सब रपटों में प्रभावित समुदाय की कोई आवाज़ सुनने को नहीं मिलती है।

जबकि त्रिपुरा में झूठी खबरों को बनाने और उसका प्रसार दक्षिणपंथी प्रचार के आउटलेट्स और सोशल मीडिया अकाउंट्स तक सीमित है, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया भी अनजाने में घृणास्पद तत्वों के हाथों में खेल रहा है और नतीजतन राज्य के 4,00,000 मुसलमान एक घेराबंदी के तहत जीने पर मजबूर हैं।

त्रिपुरा के मुसलमानों के खिलाफ चल रहे हमलों की संस्थागत प्रकृति, जैसा कि राज्य मशीनरी और देश के नागरिक समाज की प्रतिक्रिया से प्रमाणित होता है कि वे मानते हैं कि ऐसा बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा के जवाब में हुआ है। दोनों के बीच समानता लाने का कोई भी प्रयास बेईमानी की कवायद होगी।

(वसी मनाज़िर स्वतंत्र लेखक हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।) 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Why it is Disingenuous to Equate Anti-Minority Violence in Tripura and Bangladesh

Tripura
Bangladesh
minority
communal violence
Amit Shah
Narendra modi
right-wing groups
institutionalised riots system

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़


बाकी खबरें

  • sbi
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    DCW का SBI को नोटिस, गर्भवती महिलाओं से संबंधित रोजगार दिशा-निर्देश वापस लेने की मांग
    29 Jan 2022
    एसबीआई ने नयी भर्तियों या पदोन्नत लोगों के लिए अपने नवीनतम मेडिकल फिटनेस दिशानिर्देशों में कहा कि तीन महीने से अधिक अवधि की गर्भवती महिला उम्मीदवारों को ‘‘अस्थायी रूप से अयोग्य’’ माना जाएगा।
  • Yogi
    रश्मि सहगल
    यूपी चुनाव: पिछले 5 साल के वे मुद्दे, जो योगी सरकार को पलट सकते हैं! 
    29 Jan 2022
    यूपी की जनता में इस सरकार का एक अजीब ही डर का माहौल है, लोग डर के मारे खुलकर अपना मत ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर एक अलग ही लहर जन्म ले रही है, जो दिखाई नहीं देती। 
  • Pegasus
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    पेगासस मामले में नया खुलासा, सीधे प्रधानमंत्री कठघरे में, कांग्रेस हुई हमलावर
    29 Jan 2022
    अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की खबर के अनुसार, 2017 में भारत और इजराइल के बीच हुए लगभग दो अरब डॉलर के अत्याधुनिक हथियारों एवं खुफिया उपकरणों के सौदे में पेगासस स्पाईवेयर तथा एक मिसाइल…
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: कैसे करेंगे चुनाव प्रचार? जब बागों में ही नहीं है कोई बहार! 
    29 Jan 2022
    बिहार चुनाव होते हैं तो नीतीश बाबू अपने 15 साल के शासन को भुलाकर लालू-राबड़ी की सरकार को कोसते रहते हैं, लेकिन यूपी में किसको कोसेंगे? यहाँ तो उनके ही भाई-बंधुओं की सरकार है।
  • potato farming UP
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव: आलू की कीमतों में भारी गिरावट ने उत्तर प्रदेश के किसानों की बढ़ाईं मुश्किलें
    29 Jan 2022
    ख़राब मौसम और फसल की बीमारियों के बावजूद, यूपी की आलू बेल्ट में किसानों ने ऊंचे दामों की चाह में आलू की अच्छी पैदावार की है। हालांकि, मौजूदा खुदाई के मौसम में गिरती कीमतों ने उनकी उम्मीदों पर पानी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License