NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
त्रिपुरा: सांप्रदायिक हिंसा पर हमारा मौन घातक
साम्प्रदायिक वैमनस्य का कोई इतिहास न होते हुए भी त्रिपुरा अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह में साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलसता रहा।
डॉ. राजू पाण्डेय
07 Nov 2021
Tripura issue

त्रिपुरा में भी साम्प्रदायिक हिंसा का जहर पहुंच ही गया। मुख्यधारा के मीडिया ने इस दुःखद एवं दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम पर मौन बनाए रखा। प्रदेश की सरकार का कहना था कि अव्वल तो कुछ हुआ ही नहीं और अगर कुछ हुआ भी तो वह अत्यंत मामूली था और उस पर नियंत्रण पा लिया गया है। अनेक न्यूज़ पोर्टल्स ने ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए अल्पसंख्यक समुदाय में व्याप्त भय और असुरक्षा को चित्रित किया तथा उग्र भीड़ द्वारा संपत्ति को पहुंचाए गए नुकसान की तस्वीरें साझा कीं। स्थानीय सरकार यह मानती दिखी कि ऐसी हर रपट एकांगी और अतिरंजित है जो अल्पसंख्यक समुदाय के साथ हुई हिंसा को उजागर करती है तथा इससे शांति और व्यवस्था बनाए रखने के उसके प्रयासों को नुकसान ही होगा।

मुस्लिम समुदाय त्रिपुरा की कुल जनसंख्या का लगभग  9 प्रतिशत मात्र है। त्रिपुरा सरकार का स्वयं का 2014 का एक सर्वेक्षण यह बताता है कि सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व 2.69 प्रतिशत है। इसी वर्ष उच्च शिक्षा विषयक एक सर्वेक्षण में ज्ञात हुआ कि महाविद्यालयों में केवल 3.6 प्रतिशत छात्र एवं 1.5 प्रतिशत छात्राएं ही मुस्लिम समुदाय की हैं। अर्थात यहां मुस्लिम समुदाय न तो जनसंख्या की दृष्टि से न ही आर्थिक-प्रशासनिक-शैक्षणिक रूप से ही वर्चस्व की स्थिति में है। यहां तक कि राजनीतिक दृष्टि से भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समेत  सभी पार्टियों में ऊंची जातियों के हिंदुओं का बोलबाला है, मुस्लिम समुदाय यहां भी उपेक्षित है।

त्रिपुरा अब तक बंगाली हिंदुओं एवं स्थानीय आदिवासी समुदाय के मध्य होने वाले संघर्षों एवं विवादों के लिए जाना जाता था। माणिक्य वंश के काल से बंगाली हिंदुओं को प्रशासन चलाने के लिए और बंगाली मुसलमानों को खेती के लिए शासकों द्वारा निमंत्रित और प्रोत्साहित किया जाता था जबकि अंग्रेजों की बेजा मांगों की पूर्ति के लिए आदिवासियों पर अतिरिक्त करारोपण किया जाता था। 

देश के विभाजन और रियासतों के विलीनीकरण के दौर में त्रिपुरा के शासकों ने भारत के साथ रहने का निर्णय किया। इस समय हजारों बंगाली हिन्दू शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से यहां आए ऐसा ही तब हुआ जब 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष चल रहा था। जबकि मुसलमानों की आबादी के एक हिस्से ने तब पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के लिए पलायन किया।

धीरे धीरे स्थानीय आदिवासी समुदाय अल्पसंख्यक हो गया और बंगाली भाषी त्रिपुरा में बहुसंख्यक बन गए। मुसलमानों की आबादी भी 1941 के  24.09 प्रतिशत से घटकर आज के 9 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है। स्वतंत्रता के बाद त्रिपुरा के आदिवासी बहुल इलाके विकास की दृष्टि से पिछड़ते चले गए और इनमें व्याप्त असंतोष ने उग्रवाद को जन्म दिया। अर्थात यहां हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष की परिस्थिति पहले नहीं थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक पहले एक संपन्न ठेकेदार अब्दुल बारिक उर्फ गेन्दू मियां ने अंजुमन ए इस्लामिया नामक पार्टी का गठन किया। यह पार्टी त्रिपुरा को पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहती थी। लेकिन स्थानीय लोगों एवं राजनीतिक दलों के समर्थन के अभाव में वे नाकामयाब रहे। यहां भी साम्प्रदायिक विभेद का कारक गौण ही रहा।

त्रिपुरा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ लंबे समय से सक्रिय है। जब बैप्टिस्ट चर्च को मानने वाले नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा ने चर्च पर विश्वास न जताने वाले बंगालियों और आदिवासियों पर हमले किए तब से संघ वहां कार्य कर रहा है। एक  अवसर ऐसा भी आया जब उग्रवादियों ने संघ के तीन प्रचारकों को अपहृत कर उनकी हत्या कर दी। इस प्रसंग में भी मुस्लिम समुदाय धर्मांतरण में शामिल नहीं था।

साम्प्रदायिक वैमनस्य का कोई इतिहास न होते हुए भी त्रिपुरा अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह में साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलसता रहा। अक्टूबर माह में ही कुछ पहले बांग्लादेश में नवरात्रि के दौरान दुर्गा पूजा पंडालों में तोड़फोड़ की गई थी। इसका विरोध करने के लिए उत्तरी त्रिपुरा के पानीसागर उपमंडल में विश्व हिंदू परिषद द्वारा एक रैली आयोजित की गई थी जिसमें लगभग 3500 लोग सम्मिलित थे। इसी दौरान हिंसा भड़की और अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाने की खबरें सामने आईं।

इसके बाद एक सप्ताह तक अनेक न्यूज़ पोर्टल्स में उग्र दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठनों द्वारा त्रिपुरा के विभिन्न स्थानों में साम्प्रदायिक हिंसा और तोड़फोड़  के समाचार प्रकाशित होते रहे और प्रदेश की सरकार ऐसी किसी भी घटना से इनकार करती रही। यहां तक कि प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय द्वारा इस संबंध में कोई ट्वीट तक नहीं किया गया।

चुनाव आयोग ने इसी बीच त्रिपुरा में 25 नवंबर से नगरीय निकायों के चुनावों का एलान किया है। बंगाली हिंदुओं के निर्णायक वोटों पर सभी राजनीतिक दलों की नजर है। यही कारण है कि इन घटनाओं पर इनका विरोध प्रतीकात्मक रहा है और इनके शीर्ष नेता घटनास्थल पर जाने से भी परहेज करते रहे हैं।

राज्य में विधानसभा चुनाव 2023 में होंगे। 2018 के चुनावों  में बीजेपी आदिवासियों के असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने में कामयाब रही थी। उसने इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट के साथ गठबंधन भी किया। किंतु बीजेपी ने आदिवासियों का भरोसा तोड़ा है। नागरिकता संशोधन कानून के कारण 1971 के बाद त्रिपुरा में आने वाले बंगाली हिंदुओं की राह आसान हुई है। त्रिपुरा की जनजातियां बीजेपी के प्रति आक्रोशित हैं। तृणमूल कांग्रेस इस गुस्से का लाभ लेना चाहेगी। तृणमूल कांग्रेस को मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलने के भी आसार हैं। अतः बंगाली हिन्दू वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए साम्प्रदायिक रणनीति बीजेपी के लिए सरल और जांचा-परखा विकल्प है।

त्रिपुरा उत्तर, दक्षिण और पश्चिम की ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ है। त्रिपुरा के जिन इलाकों में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ है वे बांग्लादेश से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित हैं। बांग्लादेश में उत्पन्न साम्प्रदायिक तनाव बीजेपी हेतु साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए एक आदर्श अवसर बनकर आया है एवं विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू जागरण मंच और आरएसएस जैसे संगठन अपनी सक्रियता बढ़ाकर इसमें बीजेपी की सहायता कर रहे हैं।

बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने उपद्रवियों और अराजक तत्वों पर सख्त कार्रवाई की है जबकि त्रिपुरा की भाजपा सरकार तो किसी घटना के होने से ही इनकार कर रही है तो दोषियों की गिरफ्तारी का तो प्रश्न ही नहीं उठता। 

त्रिपुरा अपने आर्थिक हितों के लिए अनेक प्रकार से बांग्लादेश पर निर्भर है। किंतु बांग्लादेश सरकार द्वारा त्रिपुरा में आयोजित होने वाले त्रिदिवसीय बांग्लादेश फ़िल्म फेस्टिवल को रद्द करना दर्शाता है कि अब पारस्परिक संबंधों में सब कुछ सामान्य नहीं है।

बांग्लादेश सरकार द्वारा निकट स्थित चिट्टागोंग पोर्ट के उपयोग की अनुमति त्रिपुरा को देने के कारण प्रदेश के व्यापारिक केंद्र बनने की संभावना थी। 2019 में हुए एक समझौते के बाद त्रिपुरा को बांग्लादेश की फेनी नदी से 1.82 क्यूसेक पानी लेने का अधिकार मिला था। क्या बांग्लादेश से यह सहयोग उसे अब भी प्राप्त होगा? इस प्रश्न का उत्तर भविष्य ही देगा।

त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने उनाकोटी एवं सिपाहीजाला जिलों  में  हुई हिंसा पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य  द्वारा उठाए गए निवारक उपायों की जानकारी चाही है और राज्य सरकार से  पूछा है कि सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की साजिश को असफल बनाने के लिए सरकार की क्या कार्य योजना है?

राज्य सरकार को उत्तर देने के लिए दस नवंबर 2021 तक का समय दिया गया है। राज्य सरकार को यह भी बताना होगा कि उसने गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की है और जिनकी आजीविका पर असर पड़ा है उन्हें क्या राहत दी गई है।

माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को यह स्मरण दिलाया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त नागरिकों को उनके जीवन, आजीविका और संपत्तियों की सुरक्षा प्रदान करने का उत्तरदायित्व राज्य सरकार का ही है।

राज्य सरकार ने माननीय उच्च न्यायालय को बताया कि जनता को उत्तेजित करने के लिए सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे लेख या दृश्य एवं फुटेज शेयर किए जा रहे हैं, जिनसे या तो छेड़छाड़ की गई है अथवा वे त्रिपुरा राज्य से संबंधित नहीं हैं। माननीय न्यायालय ने ऐसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए और सोशल मीडिया से अधिक जिम्मेदार बनने को कहा। 

त्रिपुरा की साम्प्रदायिक हिंसा क्या इस बात की सूचक है कि हिंसा की रणनीति अब एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है जब इच्छानुसार बिना किसी स्थानीय विवाद के निहित स्वार्थों की सिद्धि के लिए सोशल मीडिया जैसे सूचना माध्यमों की सहायता से हिंसा फैलाई जा सकती है? शायद ऐसा है भी और नहीं भी। पहले अफवाहें चोरी छिपे बांटे जाने वाले या दीवारों चस्पा किए जाने वाले पर्चों के जरिए फैलती थीं। या शायद कोई कम और कभी कभार छपने वाला गैर जिम्मेदार अखबार कोई भ्रामक और भड़काऊ खबर छाप देता था। अब सोशल मीडिया के आने के बाद झूठ को अधिक प्रामाणिक ढंग से, बार बार और जल्दी जल्दी लोगों के मानस पर प्रक्षेपित किया जा सकता है।

ऐसे वीडियो और समाचार भी वायरल हो रहे हैं जिनमें बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार होते दिखाया-बताया गया है और जांच करने पर यह गलत पाए गए हैं। त्रिपुरा में मुस्लिम समुदाय के साथ हो रही हिंसा के वीडियो भी सामने आएंगे और इनके सच-झूठ का निर्धारण होते होते ही होगा। 

यदि त्रिपुरा सरकार साम्प्रदायिक हिंसा को रोकना चाहती थी तो उसे इस तरह के जुलूसों और प्रदर्शनों की अनुमति नहीं देनी थी। यदि अनुमति दी भी गई तो संख्या पर अंकुश लगाया जा सकता था या संवेदनशील इलाकों से ऐसी रैलियों को गुजरने से रोका जा सकता था। संभव है कि सरकार से स्थिति के आकलन में चूक हुई हो और इस कारण साम्प्रदायिक हिंसा हुई हो। किंतु अगर सरकार हिंसा की सही परिस्थिति को प्रस्तुत करती, दोषियों पर कार्रवाई करती, पीड़ितों को राहत देती और स्थायी शांति एवं सद्भाव की स्थापना हेतु प्रयत्नशील होती तो सोशल मीडिया की अफवाहें स्वतः महत्वहीन हो जातीं। किंतु सरकार का मौन भय और भ्रम उत्पन्न करने वाला है। दुःखद है कि हम किस पक्ष ने कितने झूठे और भड़काऊ वीडियो सोशल मीडिया में डाले जैसी निरर्थक बहस में लगे हैं।

उन कारणों को समझना होगा जिन्होंने सोशल मीडिया को इतना शक्तिशाली और विश्वसनीय बना दिया है कि सूचनाओं की प्राप्ति के लिए आम जन इस पर निर्भर होने लगे हैं। जब सरकार वस्तुनिष्ठ और प्रामाणिक सूचनाएं उपलब्ध कराने में रुचि न ले और मुख्यधारा का मीडिया सरकारी प्रचार तंत्र का रूप ग्रहण कर ले तब सूचनाओं का जो संकट उत्पन्न होता है वह सोशल मीडिया की शरण में जाने हेतु लोगों को बाध्य करता है। सूचनाओं की तलाश में सोशल मीडिया की ओर धकेले गए लोगों पर मानक-अमानक, सत्य-असत्य, अतिरंजित-काल्पनिक समाचारों की ऐसी बमवर्षा होती है कि इसका धुआं केवल भ्रम ही पैदा कर सकता है। सोशल मीडिया का अराजक स्वभाव अशान्तिकामी और हिंसाप्रिय शक्तियों को बहुत रास आता है। हमें धीरे धीरे साम्प्रदायिक हिंसा का अभ्यस्त बनाया जा रहा है। हम किसी भी हिंसा की घटना के वीडियो को सांप्रदायिक चश्मे से देखने के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे हैं। हमें इस लायक नहीं छोड़ा गया है कि हम अपनी तर्क बुद्धि का प्रयोग करें।

हिंसा को न्यायोचित ठहराने के नित नूतन तर्क गढ़े जा रहे हैं, इनमें अधिकांश अतीत का आश्रय लेते हैं और काल्पनिक इतिहास पर आधारित होते हैं- अल्पसंख्यकों के साथ जो हो रहा है वह तो प्राकृतिक न्याय है, विभाजन के दौरान जो क्रूरता हुई थी उसका फल कभी न कभी तो मिलना ही था, आक्रांताओं के अत्याचारों की तुलना में आज जो हो रहा है वह कुछ भी नहीं, पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है वैसा ही यहां मुसलमानों के साथ होना चाहिए- कुछ ऐसे ही तर्क हैं।

सरकार पता नहीं इस बात को समझ रही है या नहीं कि बहुसंख्यकवाद को राष्ट्रवाद सिद्ध करने और अल्पसंख्यकों को उपेक्षित करने की उसकी जिद विश्व  के 48 देशों में फैले 2 करोड़ प्रवासी भारतीयों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है। हो सकता है कि विश्व के 85 देशों में अध्ययनरत 10 लाख से ज्यादा भारतीय छात्रों को नस्ली और धार्मिक आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़े।

संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े बताते हैं कि लगभग एक करोड़ सत्तर लाख भारतीय दूसरे देशों में कार्यरत हैं जो भारी मात्रा में धन भारत को भेजते हैं। यदि अन्य देश भी संकीर्णता का आश्रय लेने लगें तो कैसी कठिन परिस्थिति पैदा हो जाएगी।

एक प्रश्न जो बार बार इन दिनों बुद्धिजीवियों को आंदोलित कर रहा है फिर उपस्थित हो रहा है क्या सरकार के लिए सांप्रदायिकता  महज अपनी असफलताओं और बुनियादी मुद्दों से ध्यान हटाने का एक जरिया है अथवा साम्प्रदायिक दृष्टि से असहिष्णु समाज बनाना ही इसकी पहली प्राथमिकता है और अन्य विषय महत्वहीन हैं? आने वाले दिन शायद इस प्रश्न का उत्तर दे सकें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Tripura
Tripura Violence
Tripura Violence Fact Finding
Communal Hate
Religion Politics
Religious Hate
Tripura Police

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

पूर्वोत्तर के 40% से अधिक छात्रों को महामारी के दौरान पढ़ाई के लिए गैजेट उपलब्ध नहीं रहा

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

त्रिपुरा: बिप्लब देब के इस्तीफे से बीजेपी को फ़ायदा या नुक़सान?


बाकी खबरें

  • DDA के पास दिल्ली के गांवों के विकास के लिए कोई योजना नहीं
    न्यूज़क्लिक टीम
    DDA के पास दिल्ली के गांवों के विकास के लिए कोई योजना नहीं
    18 Aug 2021
    दिल्ली मास्टर प्लान 2041 पर दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी डीडीए ने लोगों से अपने सुझाव देने को कहा है, पर क्या दिल्ली के गाँव में रहने वाले लोगों की राय इसमें शामिल होगी? क्योंकि इन गाँवो की बड़ी…
  • quit india
    एस एन साहू 
    अपने आदर्शों की ओर लौटने का आह्वान करती स्वतंत्रता आंदोलन की भावना
    18 Aug 2021
    स्वतंत्रता आंदोलन ने प्रेस की स्वतंत्रता और सबको साथ लेकर चलने के विचारों का समर्थन किया था और ये आदर्श भारत छोड़ो आंदोलन की विरासत हैं। ये इसलिए भी प्रासंगिक हैं क्योंकि भारत इस समय लोकतांत्रिक…
  • DUTA
    रौनक छाबड़ा
    केंद्रीय विश्वविद्यालयों में तदर्थ शिक्षकों की तादाद का सरकारी आंकड़ा “गुमराह” करने वाला
    18 Aug 2021
    डूटा ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जोर दे कर कहा कि पिछले महीने लोक सभा में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के विपरीत मौजूदा समय में दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 4500 तदर्थ शिक्षक…
  • anil deshmukh
    भाषा
    भ्रष्टाचार के मामले में दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की अनिल देशमुख की याचिका ख़ारिज
    18 Aug 2021
    मामले में सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की गुहार लगाई थी।
  • lakshmibai college teacher Dr Neelam
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    डीयू : दलित शिक्षक का आरोप विभागाध्यक्ष ने मारा थप्पड़, विभागाध्यक्ष का आरोप से इनकार
    18 Aug 2021
    "शिक्षण संस्थानों में यह कोई पहली ऐसी घटना नहीं है बल्कि इससे पहले भी समाज के निचले तबके से आने वाले छात्र और शिक्षक इस प्रकार के जातिगत हमलों और जातिसूचक टिप्पणियों का सामना करते आये हैं।…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License