NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
ट्रम्प, चीन पर मुक़दमा चलाना चाहते हैं, लेकिन इराक़ का मुआवज़ा कौन देगा?
चीन के ख़िलाफ़ ट्रम्प की हठधर्मिता में उसी पश्चिमी झूठ की झलक मिलती है, जिसने इराक़ को तबाह कर दिया था।
एजाज़ अशरफ़
02 May 2020
Trump and china

जब आप इराक़ बॉडी काउंट नामक उस वेबसाइट का होमपेज खोलते हैं, जो एक ब्रिटिश ग़ैर-सरकारी संगठन की एक परियोजना है, तो इस बात की संभावना नहीं है कि आप इन शब्दों को पढ़ने से चूक जायें,जिसमें  लोगों की मौत के आंकड़े हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि हिंसा में नागरिकों की हुई दर्ज असामयिक मौत की संख्या 185,044-207,979 है और लड़ाकों सहित कुल हिंसक मौत की संख्या-280,000 है। ये आंकड़े 20 मार्च 2003 यानी उस दिन, जिस दिन से लेकर आजतक संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगी, मुख्य रूप से यूनाइटेड किंगडम की तरफ़ से किये गये इराक़ पर लगातार हमले में मारे जा रहे इराक़ियों के हैं।

हो सकता है कि इराक़ में उस कोविड-19 से मरने वालों की तादाद ख़ासकर चौंकाने वाली न हो, जिस नोवल कोरोना वायरस की वजह से होने वाली बीमारी ने दुनिया को तबाह कर दिया है। माना जाता है कि कोरोना वायरस ने 29 अप्रैल तक 59,266 अमेरिकियों और 21,678 ब्रितानियों के जीवन को लील लिया है, और ये सभी मौत दो महीने के भीतर हुई हैं। जिस छोटे से समय में हज़ारों जिंदगियां बुझ गयी हैं, उससे साफ़ है कि कोरोनोवायरस अमेरिका के इराक़ पर हमले के मुक़ाबले अपने प्रभाव में कहीं अधिक घातक है।

इसके बावजूद इराक़ का दर्द, जिसका विस्तार भले ही 17 वर्षों के लम्बे समय के अंतराल में फैला हो, कोई शक नहीं कि वह दर्द अमेरिका या यूनाइटेड किंगडम से कम नहीं है। इराक़ की आबादी सिर्फ़ 35 मिलियन है, जो अमेरिका के 322 मिलियन की आबादी से नौ गुना कम है और यूनाइटेड किंगडम की आबादी 60 मिलियन है, जो इराक़ की आबादी से लगभग दोगुनी है। अमेरिका की तुलना में इराक़ी समाज पर सामूहिक मौत का असर अगर ज़्यादा नहीं, तो शायद बराबर है, ऐसे भी इराक़ी बॉडी काउंट के आंकड़ों को व्यापक रूप से दकियानूसी माना जाता है।

इराक़ की कहानी को याद करने का यह बिलकुल माक़ूल वक़्त है,क्योंकि होने वाले चुनाव के चंद महीने पहले अमेरिका में मौत के आंकड़े बढ़ने से अमेरिकी राष्ट्रपति, ट्रम्प घबराये हुए हैं और देश में उनके प्रशंसकों में चीन के ख़िलाफ़ नाराज़गी है। उन्होंने इस बात का दावा किया है कि नोवल कोरोनावायरस अचानक एक चीनी प्रयोगशाला से बाहर आ गया और पूरी दुनिया को संक्रमित कर दिया। हालांकि पेंटागन के शीर्ष जनरल, मार्क मिले सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि इस बात में वज़न है कि चीन अपनी जिस प्रयोगशाला की निगरानी में लापरवाही बरत रहा था, वह ‘तटस्थ’ थी।

फिर भी, 28 अप्रैल को ट्रम्प ने कहा, “हम चीन से ख़ुश नहीं हैं। हमारा मानना है कि कोरोनावायरस जहां से निकला है, उसे वहीं रोका जा सकता था। इसे जल्दी रोका जा सकता था और ऐसा करने से यह पूरी दुनिया में नहीं फैल पाता।” जबसे एक जर्मन अख़बार के संपादकीय के हवाले से बताया गया है कि चीन को जर्मनी को हुए नुकसान के एवज़ में 165 बिलियन डॉलर का भुगतान करना चाहिए, तब से ट्रम्प कहने लगे हैं, " जर्मनी जितनी रक़म के बारे में बात कर रहा है, उसकी तुलना में हम बहुत ज़्यादा रक़म की बात कर रहे हैं...हमने अभी तक अंतिम राशि का निर्धारण नहीं किया है। लेकिन यह एक बड़ी रक़म है।” लेकिन, ऐसे में हमें इराक़ पर हुए अमेरिकी हमले को भी याद कर लेना चाहिए। उस समय भी अमेरिका के इराक़ पर हमला से महीनों पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और उनकी टीम ने इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को लेकर झूठ बोला था, जिसमें कहा गया था कि उनके पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं और अल-क़ायदा नेता, ओसामा बिन लादेन के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध है, जिसने 18 महीने पहले न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर टावरों पर हमले किये थे।

उस समय भी अमेरिकी नेताओं ने ख़ुफ़िया जानकारी को दरकिनार करते हुए युद्ध के पक्ष में घरेलू भावनाओं को भुनाने के लिए बयानबाज़ी की थी। उस समय भी पश्चिमी नेताओं, ख़ास तौर पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री, टोनी ब्लेयर ने इराक़ पर वाशिंगटन के रुख़ का समर्थन किया था और युद्ध की वक़ालत की थी। उस समय भी बुश ने संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी जैसे संगठनों की अनदेखी की थी, जो इराक़ी स्थलों का इसलिए निरीक्षण कर रहे थे, ताकि जाना जा सके कि सामूहिक विनाश के हथियारों का उत्पादन किया भी जा रहा है या नहीं,  उस समय का अमेरिकी रूख़ ठीक इसी तरह का था, जैसा कि पिछले कुछ हफ़्तों से विश्व स्वास्थ्य संगठन को लेकर ट्रम्प ने अपना रखा है।

किसी नये वायरस के व्यवहार और इसकी घातकता का अनुमान लगा पाना नामुमकिन होता है।

इसके उलट, इराक़ पर अमेरिकी हमला वाशिंगटन की छल-कपट और पश्चिम एशिया में शासन-व्यवस्था बदलने की कोशिश का नतीजा था। अमेरिकी लापवाही का इराक़ और इस क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इराक़ युद्ध की 15वीं वर्षगांठ पर पत्रकार फ़िलिप बम्प ने वाशिंगटन पोस्ट के लिए एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें दिखाया गया था कि इराक़ बॉडी काउंट की मौत के आंकड़े भले ही बारीक़ी से एकत्र और पुष्ट किये गये हों, लेकिन ये आंकड़े अनुमान से कम हैं।

"लगभग 400,000 मौत संभवतः 2003 से 2011 तक [जब अमेरिकी सैनिकों को इराक़ से वापस बुला लिया गया था, हालांकि तीन साल बाद इस्लामिक स्टेट को रोकने के लिए इन सैनिकों को फिर से तैनात कर दिया गया था] के संघर्ष के कारण हुई थीं, जिनमें से लगभग 240,000 मौत हिंसा का नतीजा थी और युद्ध से जुड़ी वजह से 160,000 मौत हुई थीं”। 2018 में इराक़ बॉडी काउंट ने संघर्ष के कारण मारे जाने वाले लोगों की अतिरिक्त संख्या को 82,000 बताया था। बंप ने कहा था, "ऐसा लगता है कि पिछले 15 वर्षों में मरने वालों इराक़ियों की संख्या संभवत: आधे मिलियन से अधिक हुई हो, लेकिन इसे सुनिश्चित कर पाना बहुत मुश्किल है।"

2015 तक इराक़ में होने वाली मौत की संख्या 600,000 तक मानी  जाती है, यह वही साल है,जिसके एक साल बाद उत्तरी इराक़ के ज़्यादातर भाग से इस्लामिक स्टेट को भगा दिया गया था। बम्प बताते हैं, "मरने वाली की यह तादाद उतनी ही है,जितनी कि 2010 में वाशिंगटन, डीसी की आबादी थी। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि मानो कोलंबिया ज़िले का हर आदमी, महिला और बच्चे युद्ध में मार दिये गये हों, या फिर बुनियादी ढांचे के तहस-नहस होने से मर गये हों या इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी द्वारा मार दिये गये हों।

हालांकि कई लोगों को इस्लामिक स्टेट, इराक़ी सरकार, कट्टरपंथी लड़ाकों और बेशुमार विद्रोही समूहों की वजह से होने वाली मौत के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराना विचित्र या अन्यायपूर्ण लग सकता है। लेकिन, अमेरिका को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि इराक़ के सामाजिक बिखराव की भविष्यवाणी अमेरिकी और ब्रिटिश,दोनों ही ख़ुफ़िया एजेंसियों ने कर दी थी और इसके बावजूद उनके राजनीतिक नेतृत्व ने हमले का फ़ैसला किया था।

मिसाल के तौर पर, 2009 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री, गॉर्डन ब्राउन ने युद्ध में अपने देश की भूमिका की जांच का जिम्मा जॉन चिलकोट को सौंपा था, जिन्होंने सात साल चली जांच के बात यह निष्कर्ष निकाला कि ब्रिटेन की डिफ़ेंस इंटेलिजेंस सर्विस की आंतरिक रिपोर्ट में इराक़ के अंदर अराजकता और हिंसा की भविष्यवाणी की जा चुकी थी। इस आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया था कि कोई भी युद्ध एक ख़ूनी कट्टरपंथी संघर्ष को जन्म दे सकता है।

न केवल ब्लेयर ने इस ख़ुफिया रिपोर्ट को नज़रअंदाज किया था, बल्कि उनकी सरकार ने भी 2002 में " इराक़ के हथियारों का सामूहिक विनाश: ब्रिटिश सरकार का आकलन” नामक इस रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से जारी करने से पहले ही इस रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ कर दी थी। सितंबर डोज़ियर के रूप में लोकप्रिय दस्तावेज़ में यह दावा किया गया कि हुसैन के पास रासायनिक और जैविक हथियारों सहित बड़े विनाशकारी हथियार थे, और उन्होंने अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को फिर से शुरू किया था।

उस डोजियर में सनसनीखेज रूप से यह दावा किया गया था कि इराक़ सामूहिक विनाश के इन हथियारों को इस्तेमाल किये जाने को लेकर जारी किये वाले किसी आदेश के 45 मिनट के भीतर उन्हें तैनात कर सकता है। इसे बीबीसी ने मई 2003 में सरकार के इशारे पर पेश किया था। डोज़ियर और बीबीसी की रिपोर्ट में किये गये दावे का इस्तेमाल इराक़ के ख़िलाफ़ ब्लेयर के युद्ध किये जाने के फ़ैसले को सही ठहराने को “प्रेरित” करने के लिए किया गया था।

ब्लेयर, उस बुश से ही अपने इशारे ले रहे थे, जिन्होंने लेखक डायलन मैथ्यू के अनुसार, कई मामलों में झूठ बोला था। मिसाल के तौर पर, अक्टूबर 2002 में बुश ने दावा किया था कि हुसैन के पास "बड़े पैमाने पर जैविक हथियारों का भंडार" है। मगर,सच्चाई तो यह थी कि सीआईए ने नीति-निर्माताओं को सूचित कर दिया था कि उसके पास "बगदाद के हथियार एजेंट या शस्त्र भंडार के प्रकार या उसकी मात्रा के बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी।"

सीआईए ने बुश को यह भी बताया था कि "सद्दाम के पास परमाणु हथियार नहीं है" और शायद 2007-09 तक इसे बनाने में वह सक्षम भी नहीं हो पायेगा। हालांकि, बुश ने दिसंबर 2002 में कहा था, "हमें नहीं पता है कि (इराक़) के पास परमाणु हथियार है या नहीं।" सितंबर 2002 में, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, कोंडोलीज़ा राइस ने दावा किया था कि इराक़ ने एल्यूमीनियम ट्यूब ख़रीदी थी,जो वास्तव में केवल "परमाणु हथियार कार्यक्रमों के उपयुक्त हो सकती है।" मैथ्यूज लिखते हैं, “ऊर्जा विभाग के परमाणु विशेषज्ञ जो कुछ कह रहे थे, यह बात इसके ठीक उलट थी; उन्होंने बताया कि यह बहुत हद तक संभव था कि ये ट्यूब ग़ैर-परमाणु उद्देश्यों के लिए रही हों, लेकिन इस संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि वे उसी मक़सद के लिए रही हों। ”

अमेरिका ने इराक़ को तबाह करने के लिए ताना-बाना बुना था। 2018 में इसकी जीडीपी प्रति व्यक्ति 5834 डॉलर थी, जो 1990 में 10,326 डॉलर के उच्च स्तर के बहुत नीचे थी, यह वही साल था,जिसके एक साल बाद अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कुवैत से इराक़ी सैनिकों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म शुरू कर दिया था। इस लिहाज से भारत के मुक़ाबले इराक़ की जीडीपी की तुलना करने पर उसकी सराहना करनी होगी कि 2018 में भारत की जीडीपी प्रति व्यक्ति 2009 डॉलर के आसपास थी, यह 1990 के 367 डॉलर के निचले स्तर से एक तरह की बड़ी छलांग थी।

एक महाशक्ति के रूप में अपनी हैसियत को बरक़रार रखने के लिए चीन के ख़िलाफ़ झूठे इल्ज़ाम लगाने वाले अमेरिका को सचेत करने के लिए इराक़ की उस कहानी को फिर से कहने-सुनाने की ज़रूरत है। इससे पहले कि अमेरिका, चीन से हर्जाने की मांग करे,ट्रम्प को याद दिलाया जाना चाहिए कि उसके देश को इराक़ पर थोपे गये अन्यायपूर्ण युद्ध की भरपाई करने की ज़रूरत है, और वह उन बुश और ब्लेयर पर मुकदमा चलाये, जिन्होंने अब तक नोवल कोरोना वायरस की वजह से मारे गये लोगों की तुलना में कहीं ज़्यादा तादाद में इराक़ियों को मारने के लिए झूठ बोला था।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और उनके व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

If Trump Sues China, Iraq Should Demand Compensation for Unjust War

trump
COVID-19
China bashing
Iraq War toll

Related Stories

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

महामारी के दौर में बंपर कमाई करती रहीं फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

विश्व खाद्य संकट: कारण, इसके नतीजे और समाधान

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

कोरोना अपडेट: देश में एक हफ्ते बाद कोरोना के तीन हज़ार से कम मामले दर्ज किए गए

दिल्लीः एलएचएमसी अस्पताल पहुंचे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मंडाविया का ‘कोविड योद्धाओं’ ने किया विरोध

WHO और भारत सरकार की कोरोना रिपोर्ट में अंतर क्य़ों?


बाकी खबरें

  • fact check
    किंजल
    UP का वीडियो दिल्ली के सरकारी स्कूल में मदरसा चलाने के दावे के साथ वायरल
    30 Nov 2021
    वीडियो को गौर से देखने पर ऑल्ट न्यूज़ ने स्कूल के बोर्ड पर ‘प्राथमिक विद्यालय मिर्ज़ापुर’ लिखा हुआ पाया. प्राथमिक विद्यालय मिर्ज़ापुर, गाज़ियाबाद के विजयनगर इलाके में है. यानी, ये घटना उत्तर प्रदेश की है…
  • tripura
    संदीप चक्रवर्ती, शांतनु सरकार
    त्रिपुरा नगर निकाय चुनावों में ‘धांधली’ के चलते विपक्ष का निराशाजनक प्रदर्शन 
    30 Nov 2021
    यह पहली बार नहीं है जब राज्य को चुनाव पूर्व हिंसा और चुनाव के दिन ‘धांधली’ देखने को मिल रही है, ऐसा ही कुछ दो साल पहले पंचायत चुनावों के दौरान भी देखने में आया था।
  •  Pentagon
    सोनाली कोल्हटकर
    पेंटागन का भारी-भरकम बजट मीडिया की सुर्खियां क्यों नहीं बनता?
    30 Nov 2021
    पेंटागन का भारी-भरकम बजट आम अमेरिकियों के कल्याण के लिए मिलने वाले सरकारी लाभों से चुराया जा रहा है। लेकिन कॉरपोरेट मीडिया या नीति-निर्माता इसे मानने के लिए तैयार नहीं हैं, इस मुद्दे पर उनसे बहस की…
  • Rajya Sabha
    भाषा
    राज्यसभा की ऐतिहासिक सबसे बड़ी कार्रवाई में 12 सांसद निलंबित
    30 Nov 2021
    राज्यसभा के 12 सांसदों को वर्तमान शीत सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया है। यह उच्च सदन के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है। इससे पहले 2020 में आठ सांसदों को निलंबित किया गया था,…
  • media
    अभिषेक पाठक
    कृषि कानून वापसी पर संसद की मुहर, लेकिन गोदी मीडिया का अनाप-शनाप प्रलाप जारी!
    30 Nov 2021
    आज के दौर में मोदी सरकार शोले फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के उस सिक्के जैसी हो गई है जिसके दोनों ओर 'मास्टरस्ट्रोक' लिखा है। गोदी मीडिया के उन एंकरों पर तरस भी आता है जिन्होंने सालभर इस कानून और सरकार का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License