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अमेरिका
ट्रंप की विदाई के अंतिम मुहर के दिन ट्रंप समर्थकों ने किया अमेरिका को शर्मसार!
अमेरिका जिस आक्रामकता को पूरी दुनिया में रोपता है, उसी आक्रामकता ने ट्रंप समर्थकों का चोला पहना। अमेरिकी चुनावी नतीजों को खारिज किया। अमेरिकी संसद को तहस-नहस किया।
अजय कुमार
07 Jan 2021
अमेरिका

....तो यह इस तरह से अंत की तरफ बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल नफरत, बंटवारा और दूसरों के खिलाफ झूठा लांछन लगाने वाला कार्यकाल रहा है। जब चुनाव के नतीजे आ रहे थे तभी से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनाव में धांधली के आरोप लगाते आ रहे थे। उन्होंने अभी तक अपनी हार नहीं स्वीकार की थी। ना ही निर्वाचित होने वाले राष्ट्रपति को अभी तक बधाई दी थी। अमेरिका की सभी संस्थाओं ने उनके हर आरोपों को खारिज किया। चुनाव में धांधली को लेकर उन्होंने अमेरिकी राज्य के अधिकारियों से शिकायत की तो अधिकारियों ने उनकी शिकायत खारिज कर दी। अमेरिकी अदालत गए तो अमेरिकी अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अमेरिकी मीडिया ने उनके हर झूठ का पर्दाफ़ाश किया। खुद ट्रंप के सहयोगी उनके बर्ताव पर खफा थे। जब कुछ भी नहीं हुआ। तो अपने समर्थकों को इतना भड़का दिया कि उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस की बैठक से जुड़ी जगह कैपिटल हिल पर ही हमला बोल दिया।

बुधवार यानी 6 जनवरी के दिन भावी राष्ट्रपति जो बाइडेन के निर्वाचन पर अंतिम मुहर लगने वाली थी। बहुत सारी तकनीकी बातों में न उलझे और स्पष्ट शब्दों में समझें तो यह कि कांग्रेस के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट के सदस्य मिलकर अंतिम तौर पर जो बाइडेन के भावी राष्ट्रपति होने पर संवैधानिक मुहर लगाने जा रहे थे।

लेकिन तभी ट्रंप समर्थकों ने बवाल मचा दिया। ट्रम्प नहीं चाहते थे कि कांग्रेस बाइडेन के 20 जनवरी के शपथ ग्रहण समारोह को हरी झंडी दे।

6 जनवरी को इलेक्टोरल वोटों की गिनती के दौरान ही ट्रंप समर्थक उस बिल्डिंग में घुस आए जहां कांग्रेस की बैठक चल रही थी। इसे कैपिटल बिल्डिंग कहा जाता है। पुलिस ने ट्रंप समर्थक प्रदर्शनकारियों को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं माने और ये झड़प हिंसा में बदल गई।

मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक इन प्रदर्शनकारियों की तादाद हजारों में थी। कुछ प्रदर्शनकारी तो हाथ में बड़ी-बड़ी बंदूकें लेकर घूम रहे थे। ये सब चुनाव नतीजों को रद्द करने की मांग कर रहे थे।

ट्रम्प समर्थकों ने हंगामा और तोड़-फोड़ शुरू की तो पुलिस ने मोर्चा संभाला। हंगामा करने वालों को हटाने के लिए संसद में पुलिसकर्मी रिवॉल्वर ताने नजर आए। सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों को पहले बैरिकेड लगाकर रोका, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए। जब प्रदर्शनकारी नहीं माने तो सुरक्षाकर्मियों को आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठी चार्ज करना पड़ा।

ट्रम्प के ज्यादातर समर्थक लाल टोपी और नीले कपड़ों में पहुंचे हुए थे। ये दो रंग ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के झंडे के रंग हैं। हिंसा करने वालों के हाथों में नीले बैनर थे, जिन पर लिखा था “KEEP AMERICA GREAT”, यानी अमेरिका को महान बनाए रखें।

CNN के मुताबिक संसद के बाहर और अंदर हिंसा में चार लोग मारे गए। मिलिट्री की स्पेशल यूनिट ने दंगाइयों को खदेड़ा। कई घंटों के बाद सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई। हाल फिलहाल की खबर है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के तौर पर जो बाइडेन और कमला हैरिस के नाम पर अमेरिकी कांग्रेस की तरफ से अंतिम मुहर लग चुकी है।

इस पूरे मामले पर भावी राष्ट्रपति जो बाइडेन का भी गुस्सा फूट पड़ा। बाइडेन ने कहा, ''लोकतंत्र अप्रत्याशित रूप से ख़तरे में है. मैं राष्ट्रपति ट्रंप से अपील कर रहा हूं कि वो नेशनल टीवी पर जाएं और अपनी शपथ का पालन करते हुए संविधान की रक्षा करें और कैपिटल को कब्जे से मुक्त कराएं. कैपिटल में घुसकर खिड़कियाँ तोड़ना, फ्लोर पर कब्जा कर लेना और उथल-पुथल मचाना विरोध नहीं फसाद है.''

इसके बाद वाशिंगटन प्रशासन ने वाशिंगटन में कर्फ्यू लगा दिया। तब राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्विटर पर एक वीडियो जारी करके प्रदर्शनकारियों से घर लौटने की अपील की। यह अपील कम भड़काने वाली भाषा ज्यादा थी। उन्होंने कहा, ''एक चुनाव हुआ, जिसे हमसे चुरा लिया गया। वह एक जबरदस्त चुनाव था और ये बात सबको पता है। ख़ासकर दूसरे पक्ष को लेकिन अब आपको घर जाना होगा। हमें शांति बनाए रखनी है. हमें कानून व्यवस्था बनाए रखना है। हम नहीं चाहते किसी को क्षति पहुंचे.''

वॉशिंगटन की गंभीर स्थिति को देखते हुए टि्वटर, फेसबुक और यूट्यूब ने ट्रंप द्वारा दिए भाषण, जिसमें उन्होंने दंगाइयों को “स्पेशल” कह कर संबोधित किया था, उसे तत्काल प्रभाव से हटा दिया।

इससे पहले भी सोशल मीडिया से जुड़े तमाम प्लेटफार्म ट्रंप की गैर जिम्मेदाराना बयान पर कार्रवाई कर चुके हैं। लेकिन ट्रंप हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं लेते। सुरक्षा कारणों का हवाला देकर ट्विटर ने ट्रंप के अकाउंट को 12 घंटे के लिए बंद कर दिया और कठोर शब्दों में चेतावनी दे डाली कि अगर आगे से उन्होंने ऐसे कोई भी भड़काऊ बयान दिए तो उनका अकाउंट जीवन भर के लिए डिलीट कर दिया जाएगा।

भावी राष्ट्रपति के निर्वाचन पर संवैधानिक तौर से मुहर लगाने से जुड़ी अमेरिकी कांग्रेस की सभा की अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति ट्रंप के  रिपब्लिकन पार्टी के सहयोगी और मौजूदा समय के उपराष्ट्रपति माइक पेंस कर रहे थे। ट्रंप के बाद इनका ही नंबर आता है। ये भी ट्रम्प समर्थकों की हरकत से बेहद खफा दिखे। कहा-यह अमेरिकी इतिहास का सबसे काला दिन है। हिंसा से लोकतंत्र को दबाया या हराया नहीं जा सकता। यह अमेरिकी जनता के भरोसे का केंद्र था, है और हमेशा रहेगा।

अब चूंकि यह घटना खुद को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहने वाले अमेरिका से जुड़ी हुई थी। तो इसकी गूंज की प्रतिक्रिया दुनिया के दूसरे मुल्कों से भी आनी तय थी।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चिंता जाहिर की। मोदी ने ट्विटर पर लिखा- वॉशिंगटन डीसी में हुई हिंसा और दंगा-फसाद से चिंतित हूं। सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्ण और तय प्रक्रिया के मुताबिक होना चाहिए। लोकतांत्रिक तरीकों पर गैरकानूनी प्रदर्शनों का असर नहीं पड़ना चाहिए।

भारत की तरह अमेरिका के दूसरे सहयोगी देश ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने भी अमेरिका पर हुए इस हमले पर चिंता जताई।  लेकिन वह देश जो अमेरिका के धुर विरोधी हैं और अमेरिका के प्रतिबंध का सामना डटकर करते आए हैं। उन्होंने कुछ अलग रुख अपनाते हुए अपनी बात रखें। वेनेजुएला ने कहा कि अमेरिका ने अपने हमलावर रवैया से जो दूसरे देशों में रोपा है, अब उसी का सामना खुद कर रहा है। इटली के लेफ्ट पार्टी के बड़े नेता ने ट्वीट करते हुए कहा कि ट्रंप के शासन के बाद तो ऐसा होना ही था। जब राजनीति की जगह धोखाधड़ी होने लगती है। लोगों को गुमराह किया जाने लगता है। कट्टरता हावी हो जाती है। तब तो समाज में खतरनाक दरार पड़ जाती है। यह महज आज ही खत्म नहीं होगा। यह बहुत लंबे समय तक चलेगा।

अंत में चलते-चलते एक और बात पर गौर कीजिए। अमेरिका में हुए इस घटना पर अमेरिका और अमेरिका से प्रभावित दुनिया के कई हिस्सों से यह  प्रतिक्रिया आ रही है कि यह लोकतंत्र पर हमला है। राजद्रोह है। अगर यही घटना एशिया और किसी अफ्रीका मुल्क में हुई होती तो दुनिया के दूसरे मुल्कों में सरकारें बदलने में माहिर अमेरिका की तरफ से प्रतिक्रिया आती कि यह डेमोक्रेटिक मूवमेंट है। जनता की आवाज है। जनता की नाराजगी की वजह से चुनी हुई सत्ता पर हमला हुआ है। यह अमेरिकी नैतिकता का दोहरा मापदंड है। जिसका सामना हाल फिलहाल अमेरिका खुद कर रहा है।

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