NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन: भारत पर इसका असर और नागरिक समाज के बहिष्कार का कारण
“विश्व आर्थिक मंच (WEF) के उन मंचों में लोकतांत्रिक वैधता की कमी है, जिनसे बहुत सारे लोगों के हितों पर असर पड़ता है और इस कमी से पार पाने के बजाय अंतर्राष्ट्रीय निगमों (TNC) और वैश्विक वित्तीय पूंजी के फ़ायदे के लिए चौथी औद्योगिक क्रांति के अवसरों के इस्तेमाल करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।”'
दित्सा भट्टाचार्य
28 Jun 2021
संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन: भारत पर इसका असर और नागरिक समाज के बहिष्कार का कारण
प्रतीकात्मक फ़ोटो।

पीपल्स हेल्थ मूवमेंट (PHM) के खाद्य और पोषण से जुड़े विषयगत सर्कल ने कॉरपोरेट के असर और नागरिक समाज के स्वरों को दरकिनार किये जाने की वजह से संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन, 2021 का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। संयुक्त राष्ट्र समिति के साथ सम्बन्धों को लेकर सिविल सोसाइटी एंड इंडिजीनस पीपल्स मैकेनिज़्म (CSM) ने भी इस शिखर सम्मेलन को चुनौती देने और खाद्य प्रणालियों पर लोगों के आधिपत्य को फिर से हासिल करने के लिहाज़ से लामबंद होने का आह्वान किया है।

2019 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने विश्व आर्थिक मंच (WEF) के एक सुझाव के बाद 2021 में एक खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन का आह्वान किया था। यह शिखर सम्मेलन इस साल सितंबर में आयोजित किया जायेगा, जबकि इससे पहले यह सम्मेलन रोम में 26 से 28 जुलाई तक ऑनलाइन स्वरूप में आयोजित किया जायेगा; यह शिखर सम्मेलन के लक्ष्य और नतीजों के सिलसिले में निर्णायक होगा। खाद्य और पोषण पर अपने विषयगत समूह के ज़रिये सैकड़ों दूसरे पब्लिक सिविल सोइटी ऑर्गनाइज़ेशन (PICSO) और सामाजिक आंदोलनों के साथ-साथ पीपल्स हेल्थ मुवमेंट(PHM) दिसंबर 2019 से ही कृषि कारोबार के हितों को बढ़ावा देने वाले गठबंधनों से जुड़े इस शिखर सम्मेलन को लेकर चिंता जताते रहे हैं।

पब्लिक सिविल सोइटी ऑर्गनाइज़ेशन (PICSO) की तरफ़ से जतायी जा रही सबसे अहम चिंताओं में से एक विश्व आर्थिक मंच (WEF) की भागीदारी है, और इस शिखर सम्मेलन के लिए विशेष दूत के रूप में अफ़्रीकी हरित क्रांति गठबंधन (AGRA) के अध्यक्ष, एग्नेस कालीबाता की नियुक्ति है। ग़ौरतलब है कि अफ़्रीकी हरित क्रांति गठबंधन (AGRA) एक ऐसा गठबंधन है,जो कृषि व्यवसाय के हितों को बढ़ावा देता है। उन्होंने अपने एक बयान में कहा, "डब्ल्यूईएफ़ के बहु-हितधारक मंचों में लोकतांत्रिक वैधता की कमी है और इस कमी को दूर करने के इसके बजाय अंतर्राष्ट्रीय निगमों (TNC) और वैश्विक वित्तीय पूंजी के फ़ायदे के लिए चौथी औद्योगिक क्रांति के अवसरों का इस्तेमाल करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।"

सिविल सोसाइटी एंड इंडिजीनस पीपल्स मैकेनिज़्म (CSM) ने मार्च 2020 में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव को एक चिट्ठी लिखी थी। इस पर 550 से ज़्यादा विरोध करने वाले संगठनों ने हस्ताक्षर किये थे और गंभीर चिंताओं को उठाया था, जिसका जवाब भी दिया गया है। इसमें कहा गया, "खाद्य प्रणालियों को आकार देने में कृषि व्यवसाय की भूमिका को दुनिया भर में आबादी के बड़े-बड़े क्षेत्रों और लगातार बढ़ते अनुसंधान संस्थाओं की तरफ़ से चुनौती दी गयी है। औद्योगिक कृषि, मछली पकड़ने और पशुधन-पालन से मुनाफ़ाखोरी करने वाले अंतर्राष्ट्रीय निगम (TNC) और निवेशक पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह करने; ज़मीन, जल और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करने; मूल निवासियों, ग्रामीण समुदायों की आजीविका को नष्ट करने; शोषण करने वाले कामकाजी हालात को बनाये रखने; स्वास्थ्य समस्यायें पैदा करने; और बड़े अनुपात में ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं।"

इसमें आगे बताया गया है कि कृषि व्यवसाय का ध्यान मुख्य रूप से उत्पादकता और पैदावार पर केंद्रित होता है, जबकि खाद्य प्रणालियों की धारणा का ज़ोर भोजन के उन अनेक पहलुओं पर होना चाहिए, जिनमें से ज़्यादातर सार्वजनिक उद्देश्य के लक्ष्यों से जुड़े होते हैं और जिन्हें कॉर्पोरेट हितों के ज़रिये बिल्कुल पूरा नहीं किया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि किसान परिवार क़ीमतों के लिहाज़ से दुनिया के 80% से ज़्यादा भोजन का उत्पादन करते हैं और उन्हें इस शिखर सम्मेलन के केंद्र में होना चाहिए।

सिविल सोसाइटी एंड इंडिजीनस पीपल्स मैकेनिज़्म (CSM) ने नवंबर 2020 के एक बयान में कहा था, “...अब तक की पूरी तैयारी प्रक्रिया के दौरान मानवाधिकार वाला नज़रिया बेहद कमज़ोर बना हुआ है। ख़ास तौर पर मुख्य भूमिका निभाने वालों, अधिकार-धारकों की केन्द्रीय अहमियत को लगातार नकारा गया है,जिनमें चरवाहे, किसान, स्वदेशी लोग, महिलायें, नौजवान, श्रमिक, मछुआरे, उपभोक्ता, भूमिहीन लोग और शहरों में खाद्य असुरक्षा से प्रभावित लोग आते हैं और इनसे जुड़े अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और मंचों को शुरू से ही हाशिये पर रखा गया है।”

सिविल सोसाइटी एंड इंडिजीनस पीपल्स मैकेनिज़्म (CSM) ने 9 फ़रवरी, 2021 को विश्व खाद्य सुरक्षा पर गठित संयुक्त राष्ट्र समिति के अध्यक्ष को लिखा, " कॉर्पोरेट की तरफ़ से पड़ रहे ग़ैर-मुनासिब दबाव में इस शिखर सम्मेलन की तैयारी में बुनियादी मानवाधिकार की ग़ैर-मौजूदगी; उस बदलाव की वास्तविक सीमा पर ज़ोर देने की कमी, जिसे कॉर्पोरेट खाद्य प्रणालियों को लोगों,देशों और इस धरती की अधिकतम अनिवार्यताओं के साथ फिर से संतुलित करने की ज़रूरत है; बहुहितधारकवाद(multilateralism) की ओर से लोकतांत्रिक सार्वजनिक संस्थानों और समावेशी बहुपक्षवाद को होने वाले ख़तरे को कम करके आंका जा रहा है।”

इस शिखर सम्मेलन के सचिवालय जिस तरह पब्लिक सिविल सोइटी ऑर्गनाइज़ेशन (PICSO) की बातों को अनसुनी कर रहा है,उसे देखते हुए सीएसएम ने उसी तारीख़ पर एक समानांतर पूर्व-शिखर सम्मेलन का आह्वान किया है। सभी भौगोलिक क्षेत्रों में क्षेत्रीय समितियों का गठन किया गया है और एक संचार अभियान स्थापित किया गया है। सभी सीएसएम सदस्य इस खाद्य प्रणाली सम्मेलन(FSS) में भाग नहीं लेंगे और खाद्य प्रणालियों पर अपने ख़ुद के नज़रिये का प्रचार-प्रसार करेंगे, और प्रत्येक क्षेत्र एफ़एसएस के उन वास्तविक इरादों को सरेआम करने के लिए आंदोलन करेगा,जो कॉर्पोरेट हितों को आगे बढ़ाते हैं।

भारत पर पड़ने वाले संभावित असर

भारत में कृषि आजीविका का सबसे बड़ा स्रोत है। कृषि व्यवसाय के हितों को बढ़ावा देने का  अहम असर देश की आबादी के एक बड़े हिस्से पर यह देखते हुए पड़ेगा कि भारत सरकार पहले से ही कृषि क्षेत्र के निगमीकरण के लिए काफ़ी उत्साहित है। विवादास्पद कृषि क़ानूनों को लेकर देश की खाद्य प्रणाली पर कृषि व्यवसाय की पकड़ को बढ़ावा देने के लिहाज़ से बार-बार चिंता जतायी गयी है। हालांकि,जानकारों के मुताबिक़, इस शिखर सम्मेलन का भारत के लिहाज़ से कई अन्य गंभीर निहितार्थ हो सकते हैं।

इस बात का डर है कि यह शिखर सम्मेलन भारत में बेहतर पोषण को लेकर की जा रही सालों की क़वायद को ख़त्म कर सकता है, और कॉर्पोरेट संचालित शुद्ध शाकाहारी या पौधे आधारित आहार खाद्य दिशानिर्देशों को सामने ला सकता है। इस सम्मेलन को कार्रवाई के जिन रास्तों पर चलना है, उनमें से एक है- "इस अहम चुनौती और अवसर के इर्द-गिर्द एक व्यापक, बहु-हितधारक गठबंधन बनाने और ईएटी प्लेटफ़ॉर्म का पूरा-पूरा फ़ायदा उठाने के लिए व्यापक शासनादेश वाले सतत उपभोग के स्वरूप में बदलाव।" स्वस्थ आहार और स्थायी खाद्य उत्पादन के लक्ष्यों को परिभाषित करते हुए वैज्ञानिक सहमति तक पहुंचने के लिए ईएटी-लैंसेट आयोग बनाया गया था।

यह आयोग मात्रात्मक रूप से एक ऐसे सार्वभौमिक स्वास्थ्य के लिहाज़ से उन आहारों के बारे में बात करता है, जो स्वस्थ खाद्य पदार्थों (जैसे सब्ज़ियां, फल, साबुत अनाज, फलियां, और बादाम आदि) की खपत में बढ़ोत्तरी और नुक़सान करने वाले खाद्य पदार्थों (जैसे गाय या भेड़ के मांस, चीनी और परिष्कृत अनाज) की खपत में कमी पर आधारित है और जिन खाद्य पदार्थों से स्वास्थ्य लाभ मिलता है, और जिनसे स्थायी विकास लक्ष्यों को पाने की संभावना भी बढ़ जाती है।

हालांकि,जानकार मानते हैं कि भारत जैसे देशों में यह मांग पहले से ही मौजूद खराब राजनीतिक हालात और पहले से ही कुपोषित आबादी को दबाव में डालने का एक ज़रिया बन सकती है। ईएटी-लैंसेट आयोग की 2019 की इस रिपोर्ट में भारत को बनस्पति-आधारित आहारों के लिए एक अच्छा खाद्य मॉडल वाले देश के रूप में तारीफ़ की गयी थी। यह रिपोर्ट अपनी प्रस्तावना में इस ग़लत धारणा को पुष्ट करती है कि भारत जैसे देशों में "पारंपरिक आहार" में थोड़ा लाल मांस शामिल होता है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ़ ख़ास मौक़ों पर या फिर मिश्रित व्यंजनों में मामूली सामग्री के तौर पर किये  जाने की संभावना होती है। ईएटी-लैंसेट आयोग के प्रतिनिधि, ब्रेंट लोकेन ने 2019 में नई दिल्ली में इस रिपोर्ट को सामने रखने के कार्यक्रम के दौरान कहा था कि पौधों से प्रोटीन प्राप्त करने में "भारत एक बड़ी मिसाल" के तौर पर हमारे सामने है।

हालांकि, भारत के पोषण से जुड़े आंकड़ों पर एक नज़र डालने से पता चल जाता है कि जिस शाकाहार की इतनी तारीफ़ की जा रही है,दरअस्ल वह आहार देश के लिए उतना अच्छा नतीजा नहीं दे रहा है। 2020 वैश्विक भूख सूचकांक (GHI) में भारत 2020 जीएचआई अंकों की गणना के लिहाज़ से 107 देशों में 94वें स्थान पर है। 27.2 अंकों के साथ वैश्विक भूख सूचकांक (GHI) में भारत को  ‘गंभीर’ स्तर पर भूख ग्रस्त देश के रूप में दर्ज किया गया है। 2016 और 2018 के बीच स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) की तरफ़ से कराये गये व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण ने देश भर में कुपोषण के गंभीर स्तर को सामने रखा था। उस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि भारत में दो साल से कम उम्र के सिर्फ़ 6.4% बच्चों को न्यूनतम मानक आहार मिल पाता है।

पांच साल से कम उम्र के तक़रीबन 38% भारतीय बच्चों का विकास उचित तरीक़े से नहीं हो पाता है। पांच में से लगभग एक महिला और पुरुष का वज़न मानक स्तर से कम है, इसी अनुपात में ख़ास तौर पर शहरी इलाक़े में या तो ज़्यादा वज़न वाले लोग हैं या मोटापे से ग्रस्त लोग हैं। छह से लेकर 59 महीने की आयु वाले लगभग 60% बच्चे और 15 से लेकर 49 साल की आयु की आधी से ज़्यादा महिलायें और उसी आयु वर्ग के चार पुरुषों में से तक़रीबन एक पुरुष ख़ून की कमी से प्रभावित हैं। स्कूल जाने से पहले के आयु वर्ग के 62% बच्चों में विटामिन ए की कमी है और यह कमी कुपोषण और प्रोटीन की कम खपत के साथ नज़दीकी से जुड़ी हुई है। यूनिसेफ़ की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़, 10 से 19 साल के आयु वर्ग के 50% भारतीय किशोर (लगभग 6.3 लाख लड़कियां और 8.1 लाख लड़के) कुपोषित हैं।

ईएटी-लांसेट आयोग की रिपोर्ट को एक आलोचक ने इसकी तरफ़ से अनुशंसित आहार को पश्चिम के समृद्ध देशों से निर्देशित बताया है और कहा है कि आयोग यह चिह्नित करने में नाकाम रहा है कि “कम आय वाले देश कुपोषित बच्चों के बीच दूध और अन्य पशु स्रोत वाले खाद्य पदार्थों की खपत, मानवशास्त्रीय सूचकांकों और बोध से जुड़े कार्यों में सुधार सहित पोषण से जुड़ी कमियों के साथ-साथ रुग्णता और मृत्यु दर के प्रसार को कम करने के लिए भी जाने जाते हैं। इसमें आगे कहा गया है कि भारत में हड्डियों की टूट-फूट और कम ऊंचाई को दूध की कम खपत के साथ जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है, “जिस चीज़ को आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, वह है पश्चिमी देशों से मीट्रिक टनों में सूक्ष्म पोषक तत्वों को स्थायी आधार पर स्थानांतरित करने की पर्यावरणीय और आर्थिक लागत, जबकि इसके साथ ही स्थानीय खाद्य प्रणालियों को नष्ट किया जा रहा है। पौष्टिकता का यह मॉडल आने वाली पीढ़ियों के लिए ख़तरे से भरा हुआ मॉडल है।"

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

UN Food Systems Summit: Implications for India and Why Civil Societies are Boycotting it

UN Food Summit
UN Food Systems
Agribusinesses
Nutrition
Diet
Eating Patterns
Peoples Health Movement
United nations
CSM
EAT Lancet Commission

Related Stories

मानवाधिकार संगठनों ने कश्मीरी एक्टिविस्ट ख़ुर्रम परवेज़ की तत्काल रिहाई की मांग की

मुज़फ़्फ़रनगर महापंचायत सिर्फ़ खेती-किसानी की पंचायत नहीं, रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा की भी पंचायत है!

विश्व आदिवासी दिवस पर उठी मांग, ‘पेसा कानून’ की नियमावली जल्द बनाये झारखंड सरकार

बच्चों और महिलाओं को कैसे मिले पोषण: देश में आंगनवाड़ी के 1.93 लाख पद खाली

दुनिया में हर जगह महिलाएँ हाशिए पर हैं!

चावल से एथनॉल बनाना, गरीबों पर चोट करना है

खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं

खोरी गांव: मकानों को टूटने से बचाने के लिए यूनाइटेड नेशन को भेजा ज्ञापन

दुनिया की हर तीसरी महिला है हिंसा का शिकार : डबल्यूएचओ रिपोर्ट

सिकुड़ते पोषाहार बजट के  त्रासद दुष्प्रभाव


बाकी खबरें

  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ख़बर भी-नज़र भी: …लीजिए छापेमारी के साथ यूपी चुनाव बाक़ायदा शुरू!
    18 Dec 2021
    आयकर विभाग की टीम ने आज सपा नेताओं के घर और कैंप कार्यालयों पर छापेमारी की है। इसपर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि “भाजपा का हार का डर जितना बढ़ता जायेगा, विपक्षियों पर छापों का दौर भी उतना…
  • sudan
    पवन कुलकर्णी
    सूडान के दारफुर क्षेत्र में हिंसा के चलते 83,000 से अधिक विस्थापित: ओसीएचए 
    18 Dec 2021
    सूडान की राजधानी खार्तूम, खार्तूम नार्थ, ओम्डुरमैन सहित देशभर के कई राज्यों के कई अन्य शहरों में गुरूवार 16 दिसंबर को विरोध प्रदर्शनों के दौरान “दारफुर का खून बहाना बंद करो” और “सभी शहर दारफुर हैं”…
  • air india
    भाषा
    पायलटों की सेवाएं समाप्त करने का निर्णय खारिज किये जाने के खिलाफ एअर इंडिया की अर्जी अदालत ने ठुकराई
    18 Dec 2021
    अदालत ने कहा, ‘‘सरकार और उसकी इकाई एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य हैं और इसलिए, उसे पायलटों को ऐसे समय संगठन (एअर इंडिया) की सेवा करने के अधिकार से वंचित करते नहीं देखा जा सकता…
  • Goa Legislative Assembly
    राज कुमार
    गोवा चुनाव 2022: राजनीतिक हलचल पर एक नज़र
    18 Dec 2021
    स्मरण रहे कि भाजपा ने जिन दो पार्टियों के बल पर सरकार बनाई थी वो दोनों ही पार्टियां भाजपा का साथ छोड़ चुकी है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी कांग्रेस का समर्थन कर रही है तो महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी तृणमूल…
  • Nuh
    सबरंग इंडिया
    नूंह के रोहिंग्या कैंप में लगी भीषण आग का क्या कारण है?
    18 Dec 2021
    हरियाणा के नूंह में लगी आग में रोहिंग्याओं की 32 झुग्गियां जलकर खाक हो गईं। उत्तर भारत के रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में इस साल इस तरह की यह तीसरी आग है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License