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मज़दूर-किसान
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यूपी: लॉकडाउन से बेहाल अन्नदाता पर मौसम की भी मार, गेहूं को भारी नुकसान!
उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमण के चलते गेहूं की सरकारी खरीद देरी से शुरू की गई है और इसकी गति भी बहुत धीमी है। साथ ही किसानों को पेमेंट भी 72 घंटे के सरकारी वादे के अनुरूप नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में किसानों के सामने नगदी का संकट आ गया है।
पीयूष शर्मा, अजीत सिंह
03 May 2020
 अन्नदाता पर मौसम की भी मार

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है
छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है

मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है
वसन कहां? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है..

 
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974) द्वारा करीब आधी शताब्दी पूर्व लिखी गयी यह पंक्तियां देश में किसानों के हालात और उनकी दुर्दशा को बखूबी बयां कर रही हैं। वर्तमान दौर में भी देश का अन्नदाता जिन परिस्थितियों और हालातों से गुजर रहा है। उस पर भी एकदम सटीक बैठतीं हैं।
 
कोविड 19 के खौफ से पूरे विश्व में स्थिति गंभीर बनी हुई है, वहीं दुनियाभर की अर्थव्यवस्था का पहिया भी थम गया है। हमारा देश भी लॉकडाउन होकर इस कोरोना नाम की महामारी से जूझ रहा है। उधर देश का अन्नदाता भी इससे अछूता नहीं है, लॉकडाउन के कारण जहां किसान अपनी फ़सलों को नहीं बेच पा रहा है तो वहीं फ़सल का उचित दाम या बेची गयी फ़सल का भुगतान समय पर न मिलने से अन्नदाता बदहाल होता जा रहा है। किसानों के प्रति सरकार के उपेक्षा और उदासीनता पूर्ण रवैये के चलते देश का अन्नदाता किसान बैंकों और साहूकारों के चंगुल में घिरता जा रहा है।
 
उत्तर प्रदेश का किसान इस वक्त नक़दी की भारी तंगी के दौर से गुजर रहा है। रात-दिन कड़ी मेहनत से काम करने के बावजूद किसान क़र्ज़ के मकड़जाल में फंसता जा रहा है। वहीं पहले ही लॉकडाउन से परेशान और बदहाल हुए किसानों पर मौसम की भी दोहरी मार पड़ी है। बेमौसम बारिश और तेज़ हवाओं ने गेहूं की पकी और कटी हुई फ़सल को चौपट कर दिया है, बारिश और ओलों से गेहूं की फ़सल को हुए भारी नुकसान ने अन्नदाता के चेहरे का रंग उड़ा दिया है।

प्रदेश सरकार द्वारा इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य 1925 रुपये प्रति कुंतल तय है और राज्य में गेहूं की खरीद 1 अप्रैल से 15 जून तक विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से होना तय किया गया था परंतु कोविड-19 संक्रमण के कारण 15 अप्रैल से गेहूं की खरीद क्रय केंद्रों पर शुरू की गयी है।  

उत्तर प्रदेश सरकार अपनी विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रदेशभर में किसानों के गेहूं को खरीद कर उसका भंडारण करती हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के खाद्य एवं रसद विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सरकार गेहूं खरीद विपणन वर्ष 2019-20 में खाद्य विभाग की विपणन शाखा के 902 गेहूं क्रय केंद्रों पर, भारतीय खाद्य निगम (FCI) के 102 क्रय केंद्रों पर, उत्तर प्रदेश सहकारी संघ (PCF) के 3064 क्रय केंद्रों पर, उप्र राज्य कृषि एवं औद्योगिक निगम (UPAGRO) के 190 क्रय केंद्रों पर, उप्र राज्य खाद्य एवं आवश्यक वस्तु निगम (SFC) के 78, उप्र कर्मचारी कल्याण निगम (KNN) के 132, भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ (NCCF) के 90, नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (NAFED) के 179, उप्र कोऑपरेटिव यूनियन (UPCU) के 551 और उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ (UPSS) के 447 गेहूं क्रय केंद्रों सहित पूरे राज्य में 5,735 गेहूं क्रय केंद्रों पर 1 अप्रैल से गेहूं की खरीद कर रही है।

सरकार ने चालू विपणन वर्ष 2019-20 में कुल 55 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा है, जिसके सापेक्ष 1 मई तक 666883.80 मीट्रिक टन गेहूं की खरीद 1,20159 किसानों  से  की है।
 
किसानों से खरीदें गए इस गेहूं के लिए सरकार ने RTGS के माध्यम से कुल 2,83,74,39,481.06 रुपये की धनराशि का भुगतान भी कर दिया है। दिनांक 1 मई तक कुल 1.20 लाख (120159) किसानों से ही गेहूं की खरीद हो पायी है जबकि प्रदेश में 4.53 लाख (453897) किसानों ने गेहूं बेचने के लिए पंजीकरण कराने के लिए आवेदन किया था पंजीकृत किसानों के सापेक्ष किसानों की संख्या जिनसे अभी तक गेहूं की खरीद हुई है वह मात्र 26.5 प्रतिशत है।

UP wheat Purchase summary as on 1 May 2020.JPG

इस वर्ष प्रदेश में किसानों को गेहूं की फ़सल के अच्छे उत्पादन की उम्मीद थी, बल्कि प्रदेश सरकार द्वारा जारी  ‘रबी अभियान 2019 की फसलोत्पादन की रणनीति”  दस्तावेज़ में इस वर्ष के लिए उत्पादन का लक्ष्य 39145.511 हजार मीट्रिक टन रखा था।
 
पिछले साल विधानसभा में एक सवाल का जबाब देते हुए मुख्यमंत्री ने बताया था कि प्रदेश सरकार द्वारा 55 लाख मीट्रिक टन के सापेक्ष 37.04 लाख मीट्रिक टन ही गेहूं ख़रीदा था, प्रदेश सरकार अपने तय लक्ष्य के अनुसार भारी उत्पादन के बावजूद अपने तय लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पायी थी और अब इस साल जब हालत सामान्य नहीं है सभी जगह कोरोना संक्रमण के कारण लोकडाउन है तो ऐसे में क्या सरकार इस वर्ष के गेहूं क्रय करने के 55 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य को प्राप्त कर पायेगी यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण सवाल है।

सारणी: मंडलवार गेहूं क्रय के लिए पंजीकृत किसान व गेहूं खरीद की स्थिति
 सारणी  मंडलवार गेहूं क्रय के लिए पंजीकृत  किसान व गेहूं खरीद की स्थिति 1 May.JPG

स्रोत: गेहूं खरीद सारांश ( विपणन वर्ष: 2019-20 ), खाद्य एवं रसद विभाग, उत्तर प्रदेश ई-क्रय प्रणाली, 1 May, 2020
 
बिजनौर के डिप्टी आरएमओ घनश्याम वर्मा का कहना है कि बिजनौर में जिला कृषि विभाग के अनुसार करीब 15000 हेक्टेयर गेहूं का रकबा था। जिसकी पैदावार की खरीद के लिए जनपद की पांच तहसील क्षेत्रों के 11 ब्लाकों में 43 गेहूं खरीद केंद्र बनाए गए हैं। जिन पर किसान अपना गेहूं सरकार को बेच सकता है। 15 अप्रैल से सभी क्रय केंद्रों पर गेहूं की खरीद जारी है। वर्ष 2019- 20 में उनका लक्ष्य 43500 मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का है, गेहूं खरीद केन्द्रों पर अब तक किसानों का 2667 मीट्रिक टन गेहूं ही ख़रीदा जा सका है।
 
उधर गेहूं की खरीद कम होने को लेकर वो बताते हैं कि लॉकडाउन का असर है। जिस कारण किसान क्रय केन्द्रों तक नही पहुंच पा रहा है। पिछले चार पांच दिनों से गेहूं की आवक भी नही के बराबर हो गयी है, पूरे यूपी में यही हालात हैं। किसानों का करीब 25 प्रतिशत गेहूं कटाई के बाद गहाने के लिए तैयार था, बेमौसम बारिश ने खेतों में कटे पड़े गेहूं को खराब कर दिया है। जनपद में अभी करीब 40 प्रतिशत गेहूं खेतों में खड़ा है, या कटा हुआ पड़ा है। जिसकी अभी गहाई होनी है। जिसमें अभी वक्त लगेगा।
 
नांगल सोती क्षेत्र के किसान रुकन सिंह ने बताया कि किसान सेवा सहकारी समिति नांगल, जीतपुर खानपुर को पिछले कई वर्षों की भांति इस बार भी गेहूं खरीद केन्द्र बनाया गया है। जहां 15 अप्रैल से गेहूं की खरीद शुरू हो चुकी है। पिछले 15 दिनों में यहां पर कुल 205.50 क्विंटल गेहूं की खरीद हुई है। लेकिन इस बार भी यहां खरीदे गये गेहूं को सुरक्षित रखने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। अभी तक खरीदा गया गेहूं खाद के गोदाम में रखा हुआ है। यदि खाद के गोदाम में गेहूं रखने की जगह नहीं होती, तो ये गेहूं रविवार, सोमवार को हुई बारिश में बुरी तरह भीग गया होता। चूंकि उस गोदाम में और गेहूं रखने की जगह शेष नहीं है, इसलिये यहां पिछले तीन दिनों से खरीद बंद पड़ी हुई है। पहले अब खरीदा गया गेहूं वहां से उठेगा, तब और गेहूं खरीदा जा सकेगा।
 
स्थानीय गेहूं खरीद केन्द्र के प्रभारी/ समिति के एमडी विरेन्द्र कुमार का कहना है कि केन्द्र का लक्ष्य 500 क्विंटल गेहूं खरीद का है। केन्द्र पर खरीदे गये गेहूं को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। खरीदा गया गेहूं अभी तक उठ न पाने के कारण यहां पिछले तीन दिनों से गेहूं की खरीद बंद पड़ी हुई है। अब तक यहां 205.50 क्विंटल गेहूं खरीदा जा चुका है। जल्दी ही खरीदा गया गेहूं यहां से उठ जाने की उम्मीद है, उसके बाद ही खरीद पुनः शुरू हो सकेगी।
 
किसान सभा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डी पी सिंह का कहना है कि सरकार की मंशा किसानों का गेहूं खरीदने की है ही नहीं, अगर सरकार की तैयारी किसानों का गेहूं खरीदने की होती, तो सरकार किसानों को बारदाना (गेहूं भरने का खाली बोरा) उपलब्ध कराती। सरकार ने क्रय केंद्र तो खोल दिये है पर बारदाना पास है नही। उधर लॉकडाउन के चलते क्रय केन्द्रों पर मजदूरों की भी कमी है। खाली कांटे लगाकर छोड़ दिए हैं ऐसे में किसान गेहूं को खरीद केन्द्रों तक नही लेजा पा रहा है।

डीपी सिंह आगे कहते हैं कि किसान को अपना गेहूं न्यूनतम समर्थन मूल्य से 150 से 200 रुपये कम पर बिचौलियों के हाथ बेचना पड़ रहा है। सरकारी क्रय केन्द्रों पर तो गेहूं की खरीद बहुत कम है। दूसरे सरकार ने किसानों का गेहूं खरीदने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अपनाई है। इस योजना के तहत किसान अपना पंजीकरण करवा कर टोकन प्राप्त करके इसका लाभ उठा सकते हैं, जिस दिन का टोकन मिलेगा किसान को उसी दिन अनाज लेकर जाना है। जिस कारण छोटा किसान अपनी फ़सल क्रय केन्द्रों पर बेचने के बजाय बिचौलियों के हाथों बेचने को मजबूर है और उनके चंगुल से नही निकल पा रहा है। सरकार को बाज़ार चलाना है, अगर सरकार गेहूं खरीदेगी तो फिर बाज़ार कैसे चलेगा। लेकिन सरकार को अनाज का भण्डारण तो करना ही होगा, इसलिए वो अब गेहूं की खरीद किसी ना किसी तरह बिचौलियों की मदद से करेगी।

वो आगे कहते हैं कि किसान का भुगतान भी बहुत रुका हुआ है, गन्ने के तो पहले ही अरबों रुपये बकाया थे और अब करोड़ों रुपये गेहूं का पेमेंट भी नही मिल रहा है। ऐसे हालात में किसान बिल्कुल बैठ गया है और वो बहुत बुरी स्थिति से गुजर रहा है। अगर किसान घाटे में रह कर भी खेती न कर रहा होता, तो सरकार के पास अन्न के भंडार नही भरे होते। किसान की वज़ह से ही आज कोरोना जैसी महामारी के चलते लॉकडाउन जैसे हालातों में भी देश में भुखमरी नही फैली।

डीपी सिंह कहते हैं कि सरकार किसानों को खेती से हतोत्साहित करने में लगी है ताकि किसान तंग होकर खेती को छोड़ दें। और सरकार मल्टीनेशनल कंपनियों को किसानों के खेत हवाले कर सके और किसान अपने ही खेतों में कॉन्ट्रेक्ट पर खेती करे।
 
उधर बेमौसम तेज बारिश और ओलों ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए, उनके माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। पानी से लबालब खेतों में डूबी गेहूं की पूलियों को देख किसानों में निराशा छा गयी है। बारिश के साथ आई तेज़ आंधी में जहां भूसा भी उड़ गया। तो वहीं किसानों को अब गेहूं काटने में और उसकी थ्रेशिंग करने में कुछ दिन और लग जाएंगे।
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चन्दक क्षेत्र के किसान महेन्द्र सिंह का कहना है कि बेमौसम हुई बरसात से किसान को कोई फ़ायदा नही, बल्कि नुकसान ही नुकसान है। गेहूं की 50 प्रतिशत से भी ज्यादा फ़सल बारिश में भीग जाने से खराब हो चुकी है। इस समय किसान गेहूं की कटाई और थ्रेशिंग के काम में व्यस्त होने के साथ साथ गन्ने की बुआई, निराई और गुड़ाई के काम में भी लगा था जो अब बिल्कुल थम गया है।
 
किसान इस वक्त बेहद नाज़ुक दौर से गुजर रहा है चीनी मिलों ने किसान के गन्ने के बकाया भुगतान पर कोई ध्यान नहीं दिया है। ऊपर से बारिश ने गेहूं की फ़सल को बर्बाद कर दिया है। इस बारिश से किसान के सामने चारे का संकट भी आने को है क्योंकि जो खेत गेहूं की गहाई के बाद खाली होने थे। उन खेतों में अब बारिश से भीगी हुई गेहूं की फ़सल पड़ी है, जिसको खाली करने में अभी हफ़्तों का वक्त लगेगा। वहीं किसान खेत खाली न होने के कारण पशुओं के लिए चारा नहीं बो पायेगा। जिसके चलते अब किसान के सामने चारे की समस्या भी मुंह बाए खड़ी होगी।
 
बिजनौर के झालू के किसान अनिल चौधरी बताते हैं कि अभी तक लगभग 70% गेहूं की ही कटाई हो पायी है, खेतों में भी 25% के करीब कटे हुए गेहूं गहाने के लिए पड़े थे। जो तेज़ बारिश से खेतों में पानी भर जाने के कारण भीग गये, कई जगह बारिश के साथ ओले भी पड़े हैं। जिससे खेतों में खड़ी गेहूं की फ़सल को भी काफ़ी नुकसान हुआ है। खेतों में जो गेहूं कटा पड़ा था वो भीगने के बाद काला पड़ जायेगा और उसकी जड़ें भी निकल आएंगी। किसानों को अब ज्यादा श्रम करना होगा, वैसे ही लॉकडाउन के चलते किसान अपनी फ़सल नहीं बेच पा रहें हैं, जिससे किसान चिंतित है। और उसे तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही का कहना है कि आंधी, वर्षा और ओलावृष्टि से हुई क्षति का बीमा कंपनियों द्वारा जल्द से जल्द आंकलन का निर्देश दिया गया है। साथ ही सभी अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि खरीफ फ़सलों के लिए प्रदेश सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध हैं इसलिए उर्वरक की आपूर्ति एवं बिक्री केंद्रों को खोले जाने की व्यवस्था की जाए।

न्यूज़क्लिक से बातचीत में उन्होंने कहा कि किसानों को 72 घंटे में गेहूं का भुगतान न मिलने की जानकारी मिली है। सरकार जल्द ही इस दिशा में कार्य करके सभी का तत्काल भुगतान सुनिश्चित करेगी। 

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