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भारत
राजनीति
यूपी चुनाव 2022: तो क्या महागठबंधन की योजना बना रहे हैं अखिलेश
अखिलेश यादव का यह कहना कि कांग्रेस और बसपा तय करे कि वे किस के पक्ष में हैं, उनकी रणनीति में एक बदलाव का संकेत लगता है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
03 Aug 2021
यूपी चुनाव 2022: तो क्या महागठबंधन की योजना बना रहे हैं अखिलेश

जिस समय लखनऊ में फारेंसिक लैबोरेटरी का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के शक्तिशाली नेता अमित शाह योगी आदित्यनाथ की तारीफ के पुल बांध रहे थे और यह कह रहे थे कि जीत का सपना देखने वाले हार के लिए तैयार रहें, उसी समय समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस और बसपा को सचेत करते हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2022 के चुनाव के लिए महागठबंधन का संकेत दे रहे थे। अखिलेश यादव का कहना था कि कांग्रेस और बसपा तय करे कि वे किस के पक्ष में हैं, उनकी रणनीति में एक बदलाव का संकेत लगता है।

अखिलेश यादव का यह बयान एक होशियार रणनीति भी हो सकती है और गैर भाजपा वोटों को बिखरने से रोकने की एक पहल भी हो सकती है। हाल में विपक्षी एकता के लिए दिल्ली के दौरे पर आईं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी ऐसा ही संकेत दिया था कि उत्तर प्रदेश के लिए कोशिश यही होगी कि वहां गैर भाजपाई वोटों का बिखराव न हो। जाहिर सी बात है कि भाजपा के वोटों की जो गठरी बनी है उसमें सिर्फ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रभावित जनमत और जातियां ही नहीं हैं। उस गठरी में मंडल विरोधी जातियों के साथ मंडल समर्थक जातियों की बड़ी संख्या है। छोटे छोटे दलों की पुड़िया बांधने का काम भाजपा ने खूब किया है। उसने यह काम तब भी किया है जब उसके पक्ष में 2014 से 2019 तक लहर चल रही थी और नरेंद्र मोदी जैसा ध्रुवीकरण वाला नेता था।

इस बार 2022 के चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह समेत भाजपा के सारे केंद्रीय नेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को महान उपलब्धियों का चाहे जितना प्रमाण पत्र बांटें लेकिन स्थिति वैसी एकदम नहीं है जैसी 2017 में थी। क्योंकि तब भारतीय जनता पार्टी को कुछ सीटों पर अस्सी हजार से एक लाख तक के मतों से जीत मिली थी। लेकिन उस विजय ने भारतीय जनता पार्टी को अहंकारी बना दिया और संयोग से प्रदेश को जो मुख्यमंत्री मिला उसने समाजवादी सरकार पर लगी गुंडागीरी की तोहमत को धो डाला। अमित शाह भले दावा करें कि प्रदेश में योगी ने कानून का राज कायम किया है लेकिन हकीकत यह है कि उन्होंने भारतीय संविधान और भारतीय समाज की भावना के विरुद्ध जाकर अध्यादेश के माध्यम से कई आपत्तिजनक और विभाजनकारी कानून बनाए हैं और उन्हीं का राज कायम किया है। बल्कि उन्हीं के माध्यम से राज किया है। आंदोलनकारियों की संपत्ति कुर्क करने वाली उनकी कार्रवाई तो अंग्रेजी राज की याद ताजा करती रही है।

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने अपने तमाम दमनकारी कानूनों और कार्रवाई के प्रचार के लिए 160 करोड़ रुपए खर्च करके देश की राजधानी दिल्ली से लेकर प्रदेश तक में पोस्टर लगवाए हैं। जबकि इस सरकार के शासन में न तो दलित सुखी हुआ है और न ही ब्राह्मण। न किसान की आय बढ़ी है और न ही मजदूर की। किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करने वाली योगी सरकार ने न तो गन्ने का दाम बढ़ाया है और न ही छुट्टा जानवरों से किसानों को कोई सुरक्षा दी है। ऊपर से डीजल के दाम बढ़ने के कारण किसानों के लिए सिंचाई और जुताई करना महंगा पड़ रहा है। इस बीच कोरोना में मचे हाहाकार ने लोगों को सरकारी दमन और महामारी का गहरा घाव दिया है। गंगा किनारे पड़ी लाशें और ऑक्सीजन की कमी से तड़पते लोग सब कुछ इतनी जल्दी भूल जाएंगे यकीन नहीं होता।

इन सारी स्थितियों ने प्रदेश में एक मर्यादित किस्म का सरकार विरोध का वातावरण निर्मित किया है। वह विरोध अगर किसानों के रूप में सड़क पर दिखता है तो मध्यवर्ग के दिलों में भी है। आप गाजियाबाद से लेकर देवरिया और बलिया तक चले जाइए, न तो सड़क पर लगे पोस्टरों में कहीं योगी आदित्यनाथ का विरोध दिखाई देगा और न ही प्रदेश के किसी हिंदी अखबार में उनके विरुद्ध कोई आलोचनात्मक समाचार या आलेख दिखेगा। लेकिन जैसे ही आप जनता के दिलों को कुरेदेंगे तो आपको गहरे जख्मों का पता चलेगा। सवाल सिर्फ सताए गए अल्पसंख्यकों का ही नहीं है बल्कि आम शिक्षक, कर्मचारी, किसान, मजदूर सभी का है।

यह सारा तबका मिलकर प्रदेश की भाजपा सरकार के विरुद्ध एक लहर निर्मित कर रहा है। वह लहर निश्चित तौर पर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के पक्ष में है। पूरे प्रदेश में घूमने वाले कई महत्वपूर्ण एजेंसियों के सर्वेकर्ता कह रहे हैं कि अखिलेश यादव ने पिछले छह महीनों में प्रदेश में कुछ बड़े कार्यक्रम नहीं किए हैं। सिर्फ प्रदेश के कुछ बड़े शहरों में कार्यकर्ता सम्मेलन किए हैं। इसके बावजूद अगर आज चुनाव हो जाए तो उनकी पार्टी को डेढ़ सौ से ज्यादा सीट पाने से कोई रोक नहीं सकता। यह बात अपने में मायने रखती है और प्रदेश के बदले माहौल का संकेत है। क्योंकि 2017 के चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को महज 47 सीटें मिली थीं।

अखिलेश यादव के प्रति यह शिकायत आम है कि जिस तरह से योगी सरकार का विरोध करना चाहिए वे वैसा नहीं कर रहे हैं। यह बात वे लोग कह रहे हैं जो योगी सरकार से बहुत नाराज हैं और चाहते हैं कि जिस तरह ममता बनर्जी नरेंद्र मोदी से लड़ती हैं वैसे ही लड़ाई अखिलेश यादव योगी से लड़ें। लेकिन लगता है अखिलेश यादव एक दूसरी रणनीति पर काम कर रहे हैं। शायद यह वही रणनीति है जिस पर काम करते हुए भाजपा ने विभिन्न जातियों को जोड़ा और अपना जनाधार बनाया। शायद वे कांग्रेस के नेता मोइली की उस बात को समझ रहे हैं कि वैकल्पिक राजनीति सिर्फ मोदी विरोध से नहीं खड़ी होगी।

समाजवादी पार्टी और उसके नेता कांग्रेस के नेताओं की तरह न तो नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते हैं और न ही योगी आदित्यनाथ से सीधे टकराते हुए दिखते हैं। हालांकि वे पेगासस से लेकर किसान बिल और सीएए एनआरसी पर आलोचना करने से चूकते भी नहीं। इसी बात को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कुमार लल्लू कुछ अलग तरह से रखते हुए कहते हैं कि सपा-बसपा ने नहीं विपक्ष का धर्म कांग्रेस ने निभाया। यानी उग्र और सनसनीखेज विरोध का काम कांग्रेस ने प्रदेश में किया। उसके उदाहरण के तौर पर प्रियंका गांधी का उन तमाम जगहों पर दौरा करना है जहां कहीं दलितों पर अत्याचार हुआ या महिला का शोषण हुआ। उसमें हाथरस से सहारनपुर तक जाना शामिल है। लेकिन कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि उसका उत्तर प्रदेश में कोई पुरसाहाल नहीं है। अगर आप सौ लोगों से बात कीजिए तो उसमें से दो लोग भी कांग्रेस का नाम लेने वाले नहीं हैं। न तो कांग्रेस के पास संगठन है और न ही कांग्रेस के बड़े नेताओं तक उसके कार्यकर्ताओं की पहुंच है। प्रियंका के लखनऊ आने का समाचार जरूर छप जाता है लेकिन उनके कार्यकर्ताओं को मिलने में कितनी निराशा होती है इसका जिक्र कम होता है। यह सब बड़े नेताओं को घेर कर बैठे चापलूसों का काम है। उन्होंने कांग्रेस की लुटिया डुबोने में कसर नहीं छोड़ी है।

यह सही है कि बहुजन समाज पार्टी ने विपक्ष की भूमिका बिल्कुल नहीं निभाई। लेकिन दो साल से चल रहे कोरोना काल के दौरान भी समाजवादी पार्टी खामोश नहीं रही है। वह किसानों के मुद्दे पर भी मुखर रही है और महंगाई और दमन अत्याचार के मुद्दे पर भी विरोध करती रही है। अखिलेश यादव राकेश टिकैत और दूसरे किसान नेताओं के संपर्क में रहते हैं और उनके पार्टी के दूसरे नेता उनकी पूरी मदद करते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान जिस तरह से सरकारी मशीनरी ने पार्टी बनकर चुनाव को एकतरफा कर दिया उसका विरोध सपा ने किया। यह बात अलग है कि उसने पूरी ताकत से विरोध नहीं किया। वैसा करने में हिंसा का भी खतरा था। या फिर सपा अपनी ताकत और संसाधन को विधानसभा चुनावों के लिए बचाकर रखना चाहती थी।

लेकिन समाजवादी पार्टी खामोशी से जो खास काम कर रही है वो यह है कि वह बसपा के जनाधार में सेंध लगा रही है। 2017 के विधानसभा चुनावों में सपा को 47 और बसपा को 19 सीटें मिली थीं। आज बसपा के 11 विधायक निष्कासित हो चुके हैं और विधानसभा में उसकी संख्या इकाई तक आ चुकी है। बसपा के छह निष्कासित विधायक समाजवादी पार्टी में आ चुके हैं। उनके अलावा कई महत्वपूर्ण विधायक सपा में आने की तैयारी में हैं। वे विधायक ऐसे हैं जो जाटव, वाल्मीकि, पासी और राजभर जातियों में मौजूद बसपा के आधार को सपा की ओर ला सकते हैं। इन नेताओं में इंदरपाल सिंह, चौधरी असीम अली, हाकिम लाल बिंद, मोहम्मद मुजतबा सिद्दीक,सुषमा पटेल और हरगोविंद भार्गव शामिल हैं। उनके अलावा लालजी वर्मा और रामअचल राजभर जैसे नेता आने का इंतजार कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी भाजपा के स्वाभाविक मतदाता पटेल बिरादरी को भी लुभाने में लगी है। खेतिहर समाज से जुटी यह बिरादरी मौजूदा सरकार से बहुत खुश नहीं है।

अब इस बीच समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने यह कहकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि बसपा और कांग्रेस तय करें कि उन्हें किससे लड़ना है, सपा से या भाजपा से। यानी वे चाहते हैं कि भाजपा से सीधी लड़ाई हो और विपक्ष की रणनीति ऐसी बने कि गैर- भाजपाई वोट बिखरे नहीं। लेकिन उन्होंने इसके लिए अभी तक कोई ठोस पहल नहीं की है। इसके लिए त्याग करना पड़ेगा और उसके अभी तक कोई संकेत नहीं हैं। अभी तक वे यही कहते रहे हैं कि उनका चुनावी समझौता सिर्फ छोटे दलों से होगा क्योंकि 2017 में कांग्रेस और 2019 में बसपा के साथ उनके समझौते का अनुभव ठीक नहीं रहा। इस बीच उनकी पार्टी की ओवैसी की पार्टी आल इंडिया मजलिसे-इत्तेहादे मुसलमीन से भी समझौते की चर्चा चल रही है। हालांकि उस बारे में भी अभी तक किसी बातचीत का अखिलेश ने खंडन किया है।

पर जिस तरह से बसपा और कांग्रेस के बारे में उन्होंने बयान दिया है उससे यह भी लगता है कि वे उनके जनाधार में यह संदेश देना चाहते हैं कि वे पार्टियां भाजपा को हरा नहीं सकतीं। यानी वे चुनाव जीतने वाली नहीं हैं। इसलिए विकल्प सपा ही है और उन्हें उसे चुनना चाहिए। अभी चुनाव में समय है और संयुक्त विपक्ष के मार्ग में पड़े कांटों के बावजूद वह प्रयास ममता बनर्जी और दूसरे राष्ट्रीय नेता जारी रखे हुए हैं। भाजपा उसमें विघ्न डालेगी और उसका समर्थक मीडिया बहुत सारे भ्रम भी पैदा करेगा। लेकिन एक बात तय है कि इस बारे में अखिलेश यादव की बदली हुई भाषा कुछ कह रही है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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