NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या यूपी में भी 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ ‘खेला होई’?
इस नारे को लेकर समाजवादी पार्टी का कहना है कि बंगाल में जिस तरह बीजेपी के साथ खेला हुआ। उससे बड़ा खेला और बीजेपी का विदाई समारोह उत्तर प्रदेश में होगा। बंगाल सिर्फ शुरुआत है, यूपी के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी जी भी नहीं रहेंगे।
सोनिया यादव
28 Jun 2021
खेला होई

‘खेला होबे’ के नारे ने बंगाल में बीजेपी के लिए पूरा खेल पलट कर रख दिया था। 200 सीटों से ज्यादा का दावा करने वाली बीजेपी 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी। अब इसी नारे की ताकत समाजवादी पार्टी अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में आजमाने को तैयार दिख रही है। कानपुर और वाराणसी में समाजवादी पार्टी के कुछ पोस्टर देखने को मिल रहे हैं जिन पर ‘खेला होबे’ के तर्ज पर ‘खेला होई’ वाला स्लोगन, साइकिल और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की फोटो लगी है।

इस नारे को लेकर समाजवादी पार्टी का कहना है कि बंगाल में जिस तरह बीजेपी के साथ खेला हुआ। उससे बड़ा खेला और बीजेपी का विदाई समारोह उत्तर प्रदेश में होगा। पार्टी के नेशनल सेक्रेटरी और प्रवक्ता राजीव राय ने मीडिया को बताया कि इस नारे से ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बंगाल सिर्फ शुरुआत है, यूपी के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी जी भी नहीं रहेंगे।

बंगाल में बीजेपी के विकास के साथ खेला हो गया!

आपको बता दें कि साल 2016 में पहली बार ‘खेला होबे’ का इस्तेमाल बांग्लादेश के ढाका में सांसद शमीम ओस्मान ने देश में स्वतंत्रता मुक्ति विरोधी ताकतों के खिलाफ किया था। बंगाल में इस नारे ने गीत का रूप लिया। फिर टीएमसी नेता देबांग्शु भट्टाचार्य ने जनवरी में मूल रूप से यह गीत लिखा था और यूट्यूब पर अपलोड किया था, जो काफी हिट रहा। सीएम ममता बनर्जी अपनी रैलियों में खेला होबे का जिक्र करती थीं। बीजेपी इस स्लोगन के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत भी करा चुकी है। इसके जवाब में बीजेपी ने अपना ‘विकास होबे’ का नारा दिया था, जो सफल नहीं हो सका।

एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने कहा था कि खेला होबे का सीधा मतलब था कि बंगाल में इस बार खेल होगा। प्रशांत के मुताबिक बीजेपी जब चुनाव लड़ती है, तो अपने सामने वाली पार्टी को तोड़ती है। इसके बाद जीत का गलत दावा करने लगती है, जिससे माहौल खराब हो जाए। खेला होबे का नारा इसलिए दिया है कि तुम कुछ भी कर लो, लेकिन तुम्हारे साथ खेला होगा।

उत्तर प्रदेश की राजनीति और चुनावी मुद्दे

हालांकि पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश की राजनीति और चुनावी मुद्दे दोनों अलग हैं। कोरोना संकट के कारण पिछले कुछ महीनों में प्रदेशवासियों ने बुनियादी सुविधाओं के आभाव को लेकर काफ़ी संकट झेला है। लॉकडाउन की वजह से तमाम गतिविधियां बाधित रहीं, मज़दूर और कामगार लोग बेरोज़गार हो गए, तो खेती-किसानी भी लगभग तबाह ही रही। इसी दौरान प्रदेश में कई बार युवाओं, महिलाओं और किसानों का ज़ोरदार प्रदर्शन भी देखने को मिला। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की आड़ में सरकार पर विरोध की आवाज़ दबाने के आरोप भी लगे। सांप्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप तो सरकार बहुत पहले से झेल रही है।

लेकिन एक सच्चाई ये भी है राज्य में विपक्षी दलों की गतिविधियां पिछले काफ़ी समय से इतनी सक्रिय नहीं दिख रही हैं जितनी कि बीजेपी जैसी मज़बूत पार्टी के मुक़ाबले में उतरने लायक दिखें। सपा और कांग्रेस कई बार सड़कों पर जरूर उतरी हैं लेकिन ज्यादातर पार्टी नेतृत्व और बड़े चेहरे सोशल मीडिया पर ही आवाज़ बुलंद करते दिखाई देते हैं। वहीं बहुजन समाज पार्टी तो लगभग पूरे सीन से ही गायब लगती है।

विपक्ष के पास मुद्दों की कोई कमी नहीं

हालांकि योगी आदित्यनाथ की चार साल पुरानी सरकार में विपक्ष के पास मुद्दों की कोई कमी नहीं है। किसान आंदोलन, टीकाकरण की नीति और कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान महामारी से मुक़ाबले की रणनीति को लेकर सरकार पहले ही आलोचनाओं के घेरे में रही है। हाल ही में हुए पंचायत चुनाव में विपक्षी पार्टियां, ख़ासकर समाजवादी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन देखने को मिला लेकिन जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में भी कुछ इसी तरह के परिणाम देखने को मिले ये इतना भी आसान भी नहीं है।

वैसे पिछले कुछ दिनों में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म दिखा है। पार्टी ने इन चर्चाओं को नकारा जरूर है, लेकिन दिल्ली और लखनऊ में बीजेपी और संघ नेताओं की मुलाक़ातों से ये तो संकेत मिल ही रहे हैं कि यूपी की राजनीति में भीतरखाने बहुत कुछ चल रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी यूपी में अभी भी अंदरूनी संकट में फंसी है? और अगर हां, तो क्या इसका फायदा विपक्षी दल उठा पाएंगे।

आपको बता दें कि साल 2017 यानी बीते विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का नारा था ‘काम बोलता है’। फिर पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद एक और नारा दिया था ‘यूपी को ये साथ पसंद है’। लेकिन सपा का काम न कमाल दिखा पाया और न ही यूपीवासियों को सपा और कांग्रेस का साथ ही पसंद आया। नतीजा सपा को सत्ता गंवानी पड़ी और बीजेपी की भारी बहुमत से सरकार बन गई। अब अगले साल 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी ने ‘बाइस में बाइसिकल’ का नारा दिया है। ये नारा कितना खेल दिखा पाता है ये तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे लेकिन इतना तो तय है कि ‘2022 में खेला होई।’

Uttar pradesh
UP ELections 2022
SAMAJWADI PARTY
AKHILESH YADAV
Yogi Adityanath
BJP
Khela Hoi
Khela Hobe
communal politics

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

आजमगढ़ उप-चुनाव: भाजपा के निरहुआ के सामने होंगे धर्मेंद्र यादव

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • JP Nadda in Chamoli PC DIPR
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड: सैन्य धाम ही नहीं स्वास्थ्य धाम भी ज़रूरी, चुनाव में सेहत मुद्दा नहीं
    23 Nov 2021
     “कोविड के बीच चुनाव में स्वास्थ्य मोर्चे पर सुधार का मुद्दा कौन उठाएगा? मुद्दा तो राजनीतिक दल ही उठाते हैं। यहां न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष ज़मीनी मुद्दों पर बात कर रहा है। सवाल मतदाता पर भी है…
  • kisan
    अफ़ज़ल इमाम
    कृषि कानूनों की वापसी का कारण सिर्फ़ विधानसभा चुनाव नहीं
    23 Nov 2021
    ऐतिहासिक किसान आंदोलन महज 3 काले कानूनों की वापसी और एमएसपी के कानून बनाने आदि की कुछ मांगों तक सीमित नहीं रह गया है। यह हर किस्म के दमन, नाइंसाफी, देश की संपत्तियों व संसाधनों की लूट और सत्ता के…
  • fiscal
    प्रभात पटनायक
    मोदी सरकार की राजकोषीय मूढ़ता, वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी की मांगों से मेल खाती है
    23 Nov 2021
    राजकोषीय मूढ़ता मेहनतकश जनता पर दो तरह से हमला करती है। वह एक ओर तो बेरोज़गारी को ज़्यादा बनाए रखती है और दूसरी ओर मुद्रास्फ़ीति को बढ़ाने के ज़रिए, उनकी प्रति व्यक्ति वास्तविक आय को घटाती है।
  • MSRTC
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमएसआरटीसी हड़ताल 27वें दिन भी जारी, कर्मचारियों की मांग निगम का राज्य सरकार में हो विलय!
    23 Nov 2021
    एमएसआरटीसी कर्मचारियों के एक समूह ने बिना शर्ट पहने मुंबई मराठी पत्रकार संघ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया और ठाकरे सरकार से प्रत्येक डिपो के एक कर्मचारी प्रतिनिधि से सीधे बात करने को कहा।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में करीब 10 महीने बाद कोरोना के 8 हज़ार से कम नए मामले सामने आए 
    23 Nov 2021
    देश मेंएक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.33 फ़ीसदी यानी 1 लाख 13 हज़ार 584 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License