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विधानसभा चुनाव
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उत्तर प्रदेश चुनाव: ज़मीन का मालिकाना हक़ पाने के लिए जूझ रहे वनटांगिया मतदाता अब भी मुख्यधारा से कोसों दूर
उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान इस इलाक़े में होना है। ज़मीन के मालिकाना हक़, बेरोज़गारी और महंगाई इस क्षेत्र के कुछ अहम चुनावी मुद्दे हैं।
अब्दुल अलीम जाफ़री
24 Feb 2022
up elections

गोरखपुर/मराजगंज (उत्तर प्रदेश): आप महायोगी गोरखनाथ हवाई अड्डे की चारदीवारी ख़त्म होते ही गोरखपुर-कुशीनगर मार्ग पर जैसे ही दायें मुड़ेंगे,आप प्रकृति की मनोरम सुंदरता में खो जायेंगे। यहां वन विभाग से संरक्षित हरे भरे खेत और क़तारों में खड़े और आकाश को चूमते बड़े-बड़े सखू (साल) के पेड़ से बने दृश्य आपको सम्महित कर लेते हैं।

मिट्टी की पगडंडी पर सीधे चले चलते हैं और फिर आप घने जंगलों में दाखिल हो जाते हैं। लेकिन, इन जंगलों में दाखिल होते ही परिदृश्य अचानक बदल जाता है। आपको इन जंगलों में जहां-तहां बिखरे हुए छोटे-छोटे ऐसे गांव मिलेंगे, जो आपको जीवन के कठोर अंतर्विरोधों का एहसास करा जायेंगे।

घरों के ऊपर लगे डिश एंटेना, बिजली, ईंट या खड़ंजे वाले सड़कों और दोपहिया वाहनों के रूप में आधुनिक जीवन की झलक के बीच आपको यहां घोर ग़रीबी, ज़रूरी कपड़ों के बिना बच्चे और लोगों के निराश-हताश चेहरे नज़र आयेंगे।

ये बस्तियां उन वनटांगिया लोगों की हैं, जिन्हें लार्ड माउंटबेटन ने औपनिवेशिक शासन के दौरान पेड़ लगाने के लिए म्यांमार से यहां लाया था। 'वन' का अर्थ है जंगल, और 'टांगिया' पहाड़ों पर जगह बदल-बदलकर वन लगाने की बर्मी तकनीक के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है।

वनटांगिया कोई समुदाय नहीं है, बल्कि निषाद, मौर्य, गौर, यादव और दलितों जैसे विभिन्न अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से जुड़े वनवासियों का एक समूह है। इनमें सबसे ज़्यादा तादाद निषादों और गौरों की है।

राजगढ़, राजही, चारगवां ब्लॉक के आमबाग़ के रहने वाले विशंभर मौर्य ने न्यूज़क्लिक को बताया, “ज़मीन का मालिकाना हक़ हमारा अहम चुनावी मुद्दा है। हमें 2011 में तत्कालीन मायावती सरकार की ओर से पट्टे (दर्ज हक़दारी) आवंटित किये गये थे। लेकिन, हम अभी भी खतौनी (दर्ज हक़दारी) से वंचित हैं। हमारे कब्ज़े की ज़मीन अब भी हमारे स्वामित्व में नहीं है, क्योंकि उन पर वन विभाग का हक़ है। हम उसकी दया पर जी रहे हैं, और विभाग जब चाहे हमें बेदखल कर सकता है।”

उन्होंने कहा कि खतौनी के नहीं होने से न तो हमें इस पट्टे के बदले बैंक से कोई क़र्ज़ मिल सकता है और न ही कोई स्वास्थ्य सेवायें ही हासिल हो सकती हैं।

इस गांव में तक़रीबन 750 परिवारों वाले 150 घर हैं। ज़्यादतर मकान नये बने हुए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि पक्के घरों के लिए मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री आवास योजना से पैसे मिले हैं।

वह शिकायत के लहज़े में कहते हैं, “बेरोज़गारी यहां के लोगों की दूसरी बड़ी समस्या है। हम में से ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूर हैं, जो ज़िले या दिल्ली जैसे बड़े शहरों में निर्माण मज़दूर के रूप में काम करते हैं। स्थानीय स्तर पर काम करने वालों को महीने में 15 दिन भी काम नहीं मिलता। इसके अलावा, मज़दूरी हर रोज़ तीन सौ पचास रुपये से लेकर चार सौ रुपये के बीच मिलती है।लेकिन, महंगाई के इस ज़माने में चार (पति, पत्नी और अपने दो बच्चों) लोगों के परिवार के गुज़ारा करने के लिहाज़ से ये पैसे बहुत कम पड़ जाते हैं।”

मौर्य को निर्वाचित ग्राम प्रधान नहीं, बल्कि वनटांगियों का मुखिया कहा जाता है। उन्होंने कहा कि उनके गांव को अभिनेता से नेता बने गोरखपुर के सांसद रवि किशन ने गोद लिया था। ग्रामीणों का यही आरोप था कि वह 2019 के बाद वह यहां कभी नहीं आये।बस एक बार वह एक प्राथमिक विद्यालय का उद्घाटन करने के लिए गांव आये थे।

उन्होंने बताया, “2019 के बाद वह 2021 में एक फ़िल्म की शूटिंग के लिए यहां आये थे, लेकिन गांव का दौरा करने का उन्होंने कोई कष्ट नहीं उठाया। वह वन विभाग के गेस्ट हाउस में रुके थे और वहीं से लौट गये थे। सिर्फ़ नाम के लिए गोद लिया था।”

यहां के ग्रामीण भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वफ़ादार मतदाता हैं, उनता कहना है कि पक्के मकानों का निर्माण, बिजली की आपूर्ति, पक्की सड़कों का निर्माण आदि जैसे जो भी छोटे-मोटे विकास के काम हुए हैं, वह योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से पिछले पांच सालों में ही हुए हैं।

24 साल के कमलेश निषाद ने कहा, “पहले तो हमें इस देश का नागरिक भी नहीं माना जाता था, क्योंकि हमारे पास मतदाता पहचान पत्र नहीं थे। हमें हाल ही में अपने राशन कार्ड मिले हैं। सड़कें और प्राथमिक विद्यालय भाजपा के शासन में ही आये हैं। यह काम पिछली सरकारें भी कर सकती थीं।”

वह पहली बार मतदान करने जा रहे हैं और यूपी चुनाव के छठे चरण में 3 मार्च को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने को लेकर बेहद उत्साहित हैं।

जब वह बता रहे थे कि पिछले पांच सालों में उन्हें क्या-क्या मिला है, तो उनके पास जो अपनी ज़मीन के क़ानूनी स्वामित्व वाले दस्तावेज़ (पट्टा कागजात) था, उसे पेश करते हुए उन्होंने कहा कि पहले वे खानाबदोशों की तरह जीवन जीते थे। वे पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए पांच साल तक ज़मीन के एक टुकड़े पर रहते थे, और जब पौधे बड़े हो जाते थे, तो उन्हें वन विभाग पेड़ लगाने के लिए दूसरी जगह भेज देता था। घूम-घूमकर उन्होंने जो पेड़ लगाये हैं, इसी से यह जंगल अपने वजूद में आया है।

उन्होंने कहा, "लेकिन, हमें वोट डालने के लिए आठ किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है।"

गांव वालों की अगली शिकायत है कि वनटांगिया गांवों में सभी के पास ज़मीन का क़ानूनी स्वामित्व नहीं है, और जिसे मिला भी है, उसे पूरे भूखंड का पट्टा नहीं मिला है।

सम्बन्धित विभाग के पास सभी काग़ज़ात जमा करा देने के बावजूद मौर्य के पास एक इंच भी क़ानूनी ज़मीन नहीं है।

40 साल के श्याम यादव क़ानूनी तौर पर अपने कब्ज़े की 25 कट्ठा (0.77 एकड़) ज़मीन में से 15 कट्ठे (0.46 एकड़) ज़मीन के मालिक हैं। काग़ज़ पर कमलेश के पास कुल 30 डेसिमल (0.29 एकड़) में से 26 डेसिमल (0.25 एकड़) है। कलावती देवी के पास अपने चार बच्चों के बीच 16 कट्ठे (0.49 एकड़) में से 10 कट्ठे (0.30 एकड़) ज़मीन का पट्टा है। विजय निषाद भूमिहीन हैं और खेती-बाड़ी के लिए उनके पास अवैध रूप से 10 कट्टे (0.30 एकड़) ज़मीन हैं, जिन पर उनका क़ानूनी स्वामित्व नहीं है। 65 साल के रामदेव के पास 15 कट्ठे (0.46 एकड़) से ज़्यादा ज़मीन तो है, लेकिन उनके पास महज़ आठ कट्ठे (0.24 एकड़) का क़ानूनी स्वामित्व वाला दस्तावेज़ है।

कमोवेश यही कहानी वनटांगियों के तक़रीबन सभी पांच गांवों की है। गोरखपुर ज़िले में पांच गांव और पड़ोसी महाराजगंज ज़िले में 18 वंतांगिया गांव हैं। इसके अलावा गोंडा में पांच, बलरामपुर में पांच और बहराइच में एक गांव है।

राजाही आमबाग़ में 720 मीटर की दूरी पर एक नयी बनी खड़ंजे वाली सड़क है। इसका निर्माण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत दो साल पहले किया गया था, लेकिन यहां के लोगों को अब भी उनके वेतन का इंतज़ार है। मौर्य ने कहा कि उनके गांव में 53 लोगों के पास मनरेगा जॉब कार्ड हैं, लेकिन उन्हें पिछले दो साल में एक बार ही काम मिला है।

गांव से कुछ किलोमीटर दूरी पर पीछे की ओर दूसरा वन गांव तिनकोनिया जंगल-3 है, जिसे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने गोद लिया था। यह कच्चे-पक्के घरों वाला ऐसा गांव है,जो बाक़ी गांवों के मुक़ाबले ज़्यादा घना बसा हुआ है।

राशन की दुकान से अपनी रोज़ी-रोटी चलाने वाले सोनू निषाद ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए अपना ग़ुस्सा कुछ इस तरह निकाला-

"क़ीमतें आसमान छू रही हैं। कोई नौकरी नहीं है। लोगों को मनरेगा में काम मिलना दूज की चांद बन गया है। चुनाव से ठीक पहले पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर की कमी कर दी गयी है। चुनाव ख़तम होंगे ही तेल की रेट बढ़ेगी और सूद समेत बढ़ेगी।।

हालांकि, यहां के ग्रामीणों ने भी ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर शिकायत की है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अगर सरकार दोबारा चुन ली जाती है, तो यह काम भी हो जायेगा।

प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका संध्या देवी को उम्मीद है कि आने वाले सालों में लम्बे समय से रुके हुए कार्य पूरे हो जायेंगे।वह कहती हैं, “हम फूस की छत वाले कच्चे घरों में रहते थे। कोई रोशनी, स्कूल या स्वास्थ्य सुविधा नहीं थी। रातों में हमें हमेशा डर सताया करता था, क्योंकि हमारे जानवर और छोटे-छोटे बच्चे जंगली जानवरों का निशाना बन जाते थे। लेकिन ज़िंदगी अब बदल गयी है।”

मुख्यमंत्री ने यहां रहने वालों को मुख्यधारा में लाने के लिए जनवरी 2018 में इस इलाक़े के 18 वनटांगिया बस्तियों को राजस्व ग्राम घोषित कर दिया था।

राजस्व ग्राम निर्धारित सीमाओं वाला एक छोटा प्रशासनिक क्षेत्र होता है। एक राजस्व ग्राम में कई बस्तियां हो सकती हैं। ग्राम अधिकारी इस राजस्व ग्राम का प्रधान अधिकारी होता है। लेकिन, यह फ़ैसला भी बहुत मददगार साबित नहीं हो पा रहा है।

लोगों को अब भी अपनी रोज़-रोज़ की जरूरतों को पूरा करने के लिए फल, शहद, मोम, लकड़ी और पत्तियों जैसी प्राकृतिक वन उत्पाद के इस्तेमाल से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनके बसाये जंगलों को अनुसूचित जनजातियों और वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम और अन्य पारंपरिक प्रावधानों के तहत राजस्व ग्राम नहीं माना जाता है। । इसका मक़सद प्रशासन को इन गांवों में स्कूल, डिस्पेंसरी और अन्य सुविधाओं की स्थापना जैसे विकास उपायों को अपनाने में सक्षम बनाना था। लेकिन, यहां रहने वालों के लिए ये ज़्यादतर सुविधायें अब भी एक दूर का सपना है।

ग़ौरतलब है कि सौ सालों में हज़ारों एकड़ क़ीमती सखू-सागौन के जंगल को रोपकर पूर्वी यूपी के गोरखपुर-महाराजगंज ज़िले को हरा-भरा बना देने वाले इन वनटांगियों के बच्चे अब अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मुंबई, पुणे, हैदराबाद, दिल्ली जैसे शहरों में टाइल्स लगाने, पेंट- पॉलिश करने जैसे दैनिक मज़दूरी के काम में लगे हुए हैं।

कोविड-19 महामारी की पहली और दूसरी लहर के दौरान महाराजगंज और गोरखपुर ज़िले के 20 से ज़्यादा वन गांवों में हज़ारों मज़दूर इन शहरों से वापस लौट आये थे।

वनटांगिया समुदाय के बीच तीन दशक से लगातार काम कर रहे सर्वहितकारी सेवा संस्थान के विनोद तिवारी ने कहा कि वनटांगिया गांव के लोगों को उनका हक़ दिलाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में 15 साल लग गये।

वनटांगिया मज]दूरों के प्रतिनिधिमंडल के साथ कई दौर की बातचीत के बाद राज्य सरकार ने उन्हें अधिकार देने के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति और पारंपरिक निवासी अधिनियम 2006 बनाने का ऐलान किया था। इसकी नियमावली 2007 में तैयार की गयी थी, और इसे दिसंबर 2008 में लागू कर दिया गया था। इस क़ानून में इस बात का प्रावधान किया गया था कि जो परिवार तीन पीढ़ियों से इन जंगलों में रहने का सुबूत पेश कर देंगे, उन्हें इस वन भूमि पर उनका उचित अधिकार दे दिया जायेगा। इस क़ानून के बनने के बाद भी उसमें कुछ तकनीकी ख़ामियां रह जाने की वजह से वानटांगिया के मज़दूरों को ये अधिकार नहीं मिल पा रहे थे।

इस समुदाय के लिए वन खेती एक मुश्किल भरा कार्य

वन विभाग टांगिया पद्धति के लिए लोगों को ख़ाली ज़मीन देता है। ज़मीन टिकाऊ हो,इसके लिए उन्हें ज़मीन को साफ़ करना होता है और बैलों की मदद से जोतना होता है। पौधों को एक क़तार में बोया जाता है, और दो पेड़ों के बीच 15 फीट की दूरी रखी जाती है। उन्हें इतनी ही दूरी में अपनी फ़सल उगानी होती है। वन विभाग कुल उपज का आधा हिस्सा लिया करता था, और दूसरे आधे हिस्से पर उन्हें अपना गुज़ारा करना होता था। दूसरे साल में जब पेड़ बढ़ने लगते थे, तब पेड़ों के बीच की खेती को फावड़े से साफ़ करना होता था, और पांचवें साल में उन्हें अपने खेती वाली ज़मीनों को साफ़ करना होता था और इसी प्रक्रिया को दूसरी ख़ाली पड़ी ज़मीन पर भी दोहराना होता था। इसके लिए कई लोग अपने-अपने खेतों में ही रहते थे और कहीं-कहीं तो टांगिया मज़दूरों के लिए सामुदायिक आवास भी बनाया गया होता था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

UP Elections: Vantangiya Voters Still Miles Away from Mainstream, Struggling to Get Land Titles

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