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यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और उंगली पर स्याही लगवा लीजिए।
विजय विनीत
19 Feb 2022
Bahubali in UP politics

उत्तर प्रदेश के चुनाव में राजनीति का अपराधीकरण एक बहुत बड़ा मुद्दा है। फिर भी राजनीतिक दलों में माफ़िया और बाहुबलियों का बोलबाला है। कोई भी दल इनसे अछूता नहीं है। पूर्वांचल की राजनीति में संगठित माफ़िया सरगनाओं का दबदबा दशकों से रहा है। कुछ राजनीतिक दल चोर दरवाजे से, तो कुछ खुलआम उन प्रत्याशियों को गले लगाते आ रहे हैं, जिनके हाथ खून से सने हैं। कुछ-एक बाहुबलियों ने तो विधिवत अपनी पार्टी ही खड़ी कर ली है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर माफ़िया और बाहुबली यूपी के चुनाव में जरूरी क्यों हो गए हैं?

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से 130 विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंचते हैं। यह इलाका हर बार अपने भौगोलिक दायरे से आगे बढ़कर नतीजों और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता रहा है। सियासी नक़्शे को उठाकर देखें तो माफ़ियाओं के प्रभाव वाले कई इलाके उभरते हैं और देखते ही देखते पूरे पूर्वांचल का नक़्शा रंग देते हैं। साल 1980 के दशक में गोरखपुर के 'हाता वाले बाबा' के नाम से पहचाने जाने वाले हरिशंकर तिवारी से शुरू हुए राजनीति के अपराधीकरण का यह सिलसिला बाद के सालों में मुख़्तार अंसारी, बृजेश सिंह, विजय मिश्रा, सोनू सिंह, विनीत सिंह और फिर धनंजय सिंह जैसे कई हिस्ट्रीशीटर बाहुबली नेताओं से गुज़रता हुआ आज भी पूर्वांचल में फल-फूल रहा है।

गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज से शुरू होने वाला राजनीतिक बाहुबल का यह प्रभाव फ़ैज़ाबाद, अयोध्या, प्रतापगढ़, मिर्ज़ापुर, ग़ाज़ीपुर, मऊ, बलिया, भदोही, जौनपुर, सोनभद्र और चंदौली से होता हुआ बनारस और प्रयागराज तक जाता है। अक्सर पुलिस जांच के कमज़ोर होने, साक्ष्यों के साथ छेड़-छाड़ होने और गवाहों के पलट जाने की वजह से बाहुबलियों के ऊपर दर्ज मुक़दमे निचली अदालतों में ही ख़त्म हो जाते हैं। चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और उंगली पर स्याही लगवा लीजिए।

चुनावी मैदान फिर कूदे बाहुबली

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े बाहुबलियों में शुमार मदन भैया को सपा-रालोद गठबंधन ने गाजियाबाद की लोनी सीट मैदान में उतारा तो भाजपा और बसपा ने खूब हमले किए। यही चुनाव जब पूर्वांचल की ओर लौटा तो बाहुबलियों से कोसों दूर होने का दम भरने वाली भाजपा ने पूर्व बाहुबली विधायक खब्बू तिवारी की पत्नी आरती तिवारी को अयोध्या की गोसाईंगंज सीट से मैदान में उतार दिया। भाजपा के इस पूर्व विधायक को एक मामले में सजा हो चुकी है। आरती को टक्कर देने के लिए सपा ने बाहुबली अभय सिंह को प्रत्याशी बनाया है। वहीं, बीएसपी ने बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी के हत्यारोपित बेटे अमनमणि त्रिपाठी को महराजगंज की नौतनवा सीट पर टिकट दिया है। अमनमणि पहले भाजपा के सहयोगी दल निषाद पार्टी से टिकट की जुगत में थे, लेकिन बात नहीं बनी।

भाजपा ने जेल में बंद बाहुबली बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह को दोबारा सैयदराजा से टिकट दिया है। पिछले लोकसभा के चुनाव के दौरान मतदान को प्रभावित करने के लिए कई गांवों में गरीब तबके के वोटरों की अंगुलियों पर अमिट स्याही लगाई गई थी। इस मामले में भाजपा के विधायक सुशील सिंह का नाम उछला था। इस मामले में आरोपितों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

समाजवादी पार्टी ने अबकी बाहुबली हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय तिवारी को गोरखपुर की चिल्लूपार सीट से प्रत्याशी बनाया है। बीएसपी ने सुल्तानपुर की इसौली सीट से बाहुबली चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू सिंह को टिकट दिया है। बाहुबली रमाकांत यादव को सपा ने आजमगढ़ की फूलपुर पवई सीट से प्रत्याशी बनाया है। पिछले चुनाव में रमाकांत का पुत्र यही से भाजपा का विधायक बना था।

गुजरात जेल में बंद बाहुबली माफ़िया अतीक अहमद अपनी पत्नी को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से टिकट दिलवाने के जुगाड़ में थे, लेकिन बात नहीं बनी। बांदा जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी के पुत्र अब्बास अंसारी को सपा के सहयोगी दल सुभासपा ने टिकट दिया है। जौनपुर के बाहुबली धनंजय सिंह पहले निषाद पार्टी और बाद में अपना दल से चुनाव लड़ने की जुगत में थे। कामयाब नहीं हुए तो बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली पार्टी जदयू का टिकट ले आए। इस बार भी उन्होंने मलहनी से अपनी दावेदारी की है। अंबेडकरनगर का बाहुबली अजय सिपाही भी निषाद पार्टी से टिकट की जुगत में था, लेकिन वो कामयाब नहीं हो सका।

माफ़िया और बाहुबलियों के आतंक से उकता चुके लोगों ने पिछले एक दशक से उन्हें नकारना शुरू कर दिया है, जिससे उन्हें सियासी ठौर तलाशना थोड़ा मुश्किल हो गया है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल के बाहुबली हरिशंकर तिवारी, डीपी यादव, अतीक अहमद, बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी, मदन भैया, यशभद्र सिंह उर्फ सोनू, अमरमणि के बेटे अमनमणि और धनंजय सिंह की पत्नी जागृति सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा था। कुछ ऐसा ही सीन साल 2014 के लोकसभा चुनाव में था। धनजंय सिंह, अतीक अहमद, मित्रसेन यादव, डीपी यादव, अकबर अहमद डंपी, रमाकांत यादव, अरुण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना, जितेंद्र सिंह बबलू, कादिर राणा, कपिल मुनि करवरिया, अजय राय, रिजवान जहीर, विनोद कुमार सिंह पंडित और बाल कुमार पटेल जैसे बाहुबलियों की हार हुई थी। साल 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वोटरों ने माफ़िया-बाहुबलियों को नकार दिया था।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बाहुबलियों को लेकर खूब खींचतान हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जेल में बंद मुख्तार अंसारी और उनके परिवार को समाजवादी पार्टी में शामिल नहीं होने दिया था। इसे लेकर अखिलेश और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच तलवारें खिंच गई थीं। क्लीन इमेज को लेकर अखिलेश ने इलाहाबाद के बाहुबली अतीक अहमद, भदोही के विजय मिश्र और एमएलसी चुनावों में क्रॉस वोटिंग करने वाले बुलंदशहर के गुड्डू पंडित व उसके भाई मुकेश शर्मा और अमनमणि का टिकट काट दिया था। इसके बाद ज्यादातर बाहुबलियों ने छोटे दलों के टिकट पर चुनाव लड़ा। कृष्णा पटेल के अपना दल (कमेरा) से चुनाव लड़ने वाली माफ़िया मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह मड़ियाहूं सीट से चौथे स्थान पर रहीं, तो इस बार वो मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं।  

जौनपुर के बाहुबली धनंजय सिंह निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद पार्टी) से चुनाव लड़े, लेकिन दूसरे स्थान पर रहे। अजय सिपाही भी निषाद पार्टी से कटेहरी सीट से चुनाव लड़ा और चौथे नंबर पर रहा। गुड्डू पंडित और उसका भाई मुकेश शर्मा रालोद के टिकट पर बुलंदशहर और शिकारपुर से चुनाव लड़े, लेकिन करारी हार हुई। संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा ने अपनी पत्नी पायल को रालोद के टिकट पर मुजफ्फरनगर से लड़वाया और हार गईं। बाहुबली उमाकांत यादव ने बेटे दिनेश कांत को रालोद के टिकट पर जौनपुर की शाहगंज सीट से मैदान में उतारा तो उन्हें भी पराजय का मुंह देखना पड़ा। सुल्तानपुर की इसौली सीट से रालोद के टिकट पर लड़ने वाले यशभद्र सिंह उर्फ मोनू तीसरे स्थान पर रहे। पूर्वांचल में कुछ ऐसे दागी और बाहुबली भी हैं, जो अब चाहकर भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इसमें सपा सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति हैं, जिन्हें हाल ही में सजा हुई है। इसी तरह करवरिया बंधु, अशोक सिंह चंदेल, इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी, कुलदीप सिंह सेंगर अब चुनावी ताल नहीं ठोक पाएंगे।

पिछली मर्तबा जीते थे 143 दाग़ी

उत्तर प्रदेश की पिछली विधानसभा में 403 में से 143 ऐसे विधायक थे, जिनके खिलाफ कई जनपदों में आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं। 143 विधायकों में से 101 विधायकों पर तो गंभीर धाराओं-हत्या,  हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी और छेड़खानी जैसे केस दर्ज थे। एडीआर रिपोर्ट के आंकड़ों की माने तो उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा के 114,  समाजवादी पार्टी के 14, बसपा के पांच और कांग्रेस के एक विधायक पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज था। इनमें आठ विधायक ऐसे थे, जिनपर हत्या का मुकदमा और 34 अन्य विधायकों पर हत्या की कोशिश का मुकदमा चल रहा था। एक विधायक पर तो महिला से छेड़छाड़ का आरोप लगा। 58 विधायकों के खिलाफ अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज थे। इस फेहरिस्त में मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, राजा भैया, सुशील सिंह, विजय मिश्रा समेत कई विधायक शामिल थे। मुख्तार अंसारी और विजय मिश्र पर 16-16 मुकदमे दर्ज थे। बहुजन समाज पार्टी से एमएलए असलम अली पर 10 मुकदमें दर्ज रहे। इस चुनाव के बाबत एजडीआर की मुकम्मल रिपोर्ट आनी बाकी है।

भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर उम्रकैद की सजा पा चुका है। उम्रकैद की सजा के बाद भी भाजपा उसे बचाती रही। काफी छीछालेदार के बाद उसे पार्टी से निकाला जा सका। इनके अलावा हरिशंकर तिवारी, रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ राजा भइया, अतीक अहमद, अमरमणि त्रिपाठी, धनंजय सिंह, ब्रजेश सिंह, सुशील सिंह आदि माफ़िया राजनीति में हाथ आजमा चुके हैं।

सियासी जमीन को सींचने के लिए खून बहाने का चलन यूपी में नया नहीं है। पूर्वांचल का इतिहास तो तमाम ऐसी घटनाओं से पटा पड़ा है, जहां राजनीतिज्ञों पर उंगलियां उठती रही हैं। चाहे वह गाजीपुर का कृष्णानंद राय हत्याकांड हो, इलाहाबाद के विधायक राजूपाल की हत्या का मामला हो या फिर बसपा सरकार में मंत्री रहे नंदगोपाल नंदी पर जानलेवा हमले का मामला। हर बार खादी पहनकर अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले ही यहां आरोपों के घेरे में रहे हैं। दरअसल, अपने दुश्मनों को रास्ते से हटाने के लिए नेताओं ने माफ़ियाओं का इस्तेमाल किया और बाद में वो माफ़िया राजनीति में सक्रिय हो गए।

प्रतापगढ़ स्थित कुंडा के राजा भैया साल 1993 से लगातार निर्दलीय विधायक चुने जा रहे हैं। सपा और भाजपा के सहयोग से वे मंत्री भी बने हैं। सूबे में भाजपा के कल्याण सिंह से लेकर राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह की सरकार में मंत्री रहे तो मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने भी उन्हें लालबत्ती वाली गाड़ी दी। पिछले ढाई दशक से सपा कुंडा में राजा भैया के समर्थन में कई प्रत्याशी नहीं उतारती रही, जिसके चलते वो आसानी से कुंडा सीट से जीतते रहे हैं। लेकिन, अब राजा भैया ने खुद अपनी पार्टी खड़ी कर ली है, जिसका नाम है जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी। यह पार्टी खुद अपना प्रत्याशी मैदान में उतार रही है।

पूर्वांचल के बाहुबली विधायक राजा भैया के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने डीएसपी जियाउल की सरेआम हत्या में आरोपी गुलशन यादव को भी टिकट दिया है। गुलशन पहले राजा भैया के लिए काम करते थे। करीब दो दशक पहले मायावती सरकार ने बहुबली राजा भैया पर पोटा लगाया तो राजा भैया के खिलाफ गवाही देने वाले राजेंद्र यादव की हत्या के मामले में गुलशन यादव को जेल जाना पड़ा। सपा ने जेल में बंद आजम खान और जमानत पर बाहर आए आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम को भी मैदान में उतारा है। इतना ही नहीं कौराना से नाहिद हसन, मेरठ से रफीक अंसारी, असलम चौधरी, किठौर से शाहिद मंजूर, मोहर्रम अली उर्फ पप्पू समेत सपा के कई उम्मीदवारों पर गंभीर धाराओं में मुकदमें दर्ज हैं।

कैसे पांव पसारे माफ़िया ने?

उत्तर प्रदेश पुलिस में डिप्टी एसपी रहे बनारस के वीके सिंह बताते हैं, "संगठित अपराध में शामिल होना तो माफ़िया होने की पहली शर्त है। फिर स्थानीय राजनीति व प्रशासन में दख़ल रखना और ग़ैर-क़ानूनी काले धन को क़ानूनी धंधों में लगाकर सफ़ेद पूंजी में तब्दील करना दूसरी दो ज़रूरी बातें हैं। जब यह तीनों फ़ैक्टर मिलते हैं, तभी किसी गैंगस्टर या अपराधी को 'माफ़िया' कहा जा सकता है। अगर किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता है, तो माफ़िया की भूमिका काफ़ी सीमित हो जाती है। बिखरे हुए नतीजे आने पर इनकी भूमिका अचानक बढ़ जाती है, क्योंकि इनका असर भले ही क्षेत्रीय हो लेकिन राष्ट्रीय चुनाव में अक्सर ऐसे स्थानीय प्रत्याशी बड़ी तस्वीर की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा जाते हैं।"

वीके सिंह यह भी बताते हैं, "ज़िला पंचायत से लेकर ब्लॉक अधिकारियों तक, निर्वाचन आधारित हर स्थानीय प्रशासनिक संस्था पर उस इलाक़े के माफ़िया के परिजनों और चेलों का क़ब्ज़ा होता है। माफ़िया का डर ऐसा होता है कि इलाकाई खबरनवीस भी इनके बारे में कुछ नहीं लिखते। लिखते भी हैं तो सिर्फ उनके मनमाफ़िक लिखते हैं। 1990 के दशक के आखिर तक पूर्वांचल के माफ़िया ने ख़ुद को राजनीति में लगभग स्थापित कर लिया। मुख़्तार के बड़े भाई अफ़जाल अंसारी पहले से ही राजनीति में थे, इसलिए उनके लिए राजनीति में आना बेहद आसान था। बृजेश ने अपने बड़े भाई उदय नाथ सिंह उर्फ़ चुलबुल को राजनीति में उतारा। पहले उदय नाथ सिंह विधान परिषद के सदस्य रहे और उनके बाद उनके बेटे और बृजेश के भतीजे सुशील सिंह विधायक हुए।"

"एक-दो अपवादों को छोड़कर अफ़जाल गाज़ीपुर से और मुख़्तार मऊ सीट से लगातार विधानसभा चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं। मुख़्तार और बृजेश आज जेल में हैं, लेकिन दोनों ही निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। बृजेश विधान परिषद के सदस्य हैं, उनके भतीजे सुशील चंदौली से भाजपा के विधायक हैं। मुख़्तार मऊ सीट से बसपा के विधायक हैं। उनके बेटे और भाई भी राजनीति में सक्रिय हैं। बिना राजनीतिक शह के माफ़िया नहीं पनप सकता। राजनीति में जाने का एक कारण अपने व्यापारिक निवेशों को सुरक्षित करना, उन्हें बढ़ाना और राजनीतिक पार्टियों में अपना दख़ल बढ़ाना भी होता है। माफ़िया को लगता है कि अगर वो चुनाव जीत गया तो पुलिस ज्यादा परेशान नहीं कर पाएगी।"

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार अमित मौर्य कहते हैं, "साल 2000 के बाद संगठित माफ़िया का केंद्र गोरखपुर से बनारस शिफ़्ट हुआ और उनकी कार्यप्रणाली में भी कई बड़े परिवर्तन आए। ज़मीन के विवाद से शुरू हुआ गैंगवार बाद में रेलवे और कोयले के टेंडरों की लड़ाई में तब्दील हो गया। बनारस में आज भी मछली और टैक्सी स्टैंड के ठेके ज़िला पंचायत के ज़रिए क्षेत्र के एक बड़े माफ़िया के प्रभाव में ही तय होते हैं। इस सिस्टम की शुरुआत सबसे पहले इंदिरा जी ने की। उनके पास गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी थे और सिवान-गोपालजंग के इलाक़े में काली पांडे जैसे लोग। बाद में मुलायम सिंह ने इस सिस्टम को ज़्यादा व्यवस्थित कर दिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश को भौगोलिक खेमों को बांट कर उन्होंने एक रणनीति के तहत हर इलाक़े में अपने बाहुबली नेता खड़े किए।"

अमित मौर्य यह भी बताते हैं, " अपराधियों को राजनीति में खींचने में सबसे अहम भूमिका अदा की पूर्व मुख्यमंत्री मायवती ने। उन्होंने खुलकर बाहुबलियों को टिकट बांटना शुरू कर दिया। बाहुबली अपनी उगाही से चुनाव के लिए पार्टी फ़ंड का इंतज़ाम भी करते और साथ ही अपने डर व प्रभाव को वोटों में तब्दील कर चुनाव भी जिताते थे। आज का बाहुबली नेताओं से भी ज़्यादा पेशेवर नेता है। वोटों के लिए वह जनता के पैर पकड़ने से लेकर तोहफ़े बांटने तक सब कर रहा है। आज पूर्वांचल के लोग डर से नहीं, माफ़िया के ग्लैमर से प्रभावित होकर उन्हें वोट देते हैं।  पूरब का एक आम शूटर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े गैंगस्टरों से ज़्यादा बढ़िया निशाना लगाता है और लंबे समय तक टिका रहता है। यहां एके-47 की गोलियां बर्बाद करने की नहीं, कम-से-कम गोलियों में काम ख़त्म करने की ट्रेनिंग दी जाती है।"

अमित के मुताबिक,  "पूर्वांचल के सभी बाहुबली अपने इलाक़े में होने वाली शादियों में लोगों की मदद करते हैं। ख़ासतौर पर ग़रीबों की बेटियों की शादी में तो दिल खोलकर। इसी तरह लोगों के मरने पर, इलाज पर और कभी-कभी तो यूं ही। शायद इसे ही स्ट्रैटीजिक इन्वेस्टमेंट कहा जाता है। ज़्यादातर निर्वाचित माफ़िया अपनी रॉबिनहुड की छवि को पुख़्ता रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। वह लोगों की मदद करके उन्हें अपनी छत्र-छाया में रखते हैं और इस तरीक़े से अपने लिए एक ऐसा वोट बैंक तैयार करते हैं जो कई बार धर्म और जाति से परे भी उनका वफ़ादार रहता है। अपराध एक ऐसा दलदल है जिसमें एक बार घुसने के बाद कई बार ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए अपराधी नए अपराध करता चला जाता है।"

माफ़िया के आगे कानून बेबस

काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव "न्यूजक्लिक" से कहते हैं, "एक दौर था जब राजनीतिक दल अपराधियों की मदद लिया करते थे, लेकिन उनके हाथों में राजनीति की कमान नहीं सौंपते थे। पिछले तीन दशक में ये अपराधी राजनीति सभी दलों की पसंद बने हुए हैं। अपराधियों के दखल को रोकने के लिए चुनाव आयोग के पास कई  बार सुझाव आए, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सख्त कानून की जरूरत है, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? आज तक कोई ऐसा कानून नहीं बन सका, जिससे उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जा सके। चुनाव आयोग ने अब तक सिर्फ इतना किया है कि उम्मीदवार यह डिक्लेरेशन जरूर भरें कि उनके ऊपर कितने आपराधिक मामले चल रहे हैं?"

श्रीवास्तव कहते हैं, "दर्जनों गंभीर मुकदमों के बावजूद माफ़िया और दबंगों की उम्मीदवारी नहीं रुकती है। उनका तो नामांकन भी कभी रद्द नहीं होता है। कुछ माफ़िया जेल से बैठे-बैठे नामांकन दाखिल कर देते हैं। कुछ दलों ने नया चोर दरवाजा इजाद कर लिया है, जो छोटे दलों से गठजोड़ इसीलिए करते हैं ताकि उनके जरिए माफ़िया और बाहुबलियों बेटों व उनकी पत्नियों चुनाव मैदान में उतार सकें। जाहिर है कि माफ़िया का आतंक उनकी पत्नी और बेटों के साथ चलता रहता है और वह सियासत को प्रभावित करते रहते हैं। जब तक पार्लियामेंट के जरिए सख्त कानून नहीं आएगा, तब तक चुनाव आयोग के भरोसे या राजनीतिक दलों की सोई हुई नैतिकता के जागने की उम्मीद में सुधार संभव नहीं है।"

प्रदीप के मुताबिक "यूपी के चुनाव में इस बार भी चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है। मतदान केंद्रों पर कब्जे के लिए पूर्वांचल के बाहुबलियों ने नए-नए तरीके इजाद कर लिए हैं। मिसाल के तौर पर मतदान केंद्रों के कुछ दूरी पर इनके गुर्गे खड़े हो जाते हैं, जिन्हें देखकर गरीब तबके का सामान्य वोटर मतदान करने जाता ही नहीं है। अच्छी बात यह है कि पूर्वांचल के माफ़िया कई बेहतरीन नियमों पालन भी करते हैं। इस इलाका का कोई भी माफ़िया ड्रग्स और हथियारों का कारोबार नहीं करता। ये न तो पत्रकारों पर हमले करते हैं और न ही वकीलों पर। महिलाओं और बूढ़ों को भी गोलियों का निशाना नहीं बनाते। आमतौर पर माफ़िया शराब भी नहीं पीते। इनकी छवि रॉबिनहुड सरीखी है और वो सरकार के समानांतर सत्ता चलाते रहते हैं। राजनीतिक दलों का हाल यह है कि उनकी नजर में दूसरे दलों अपराधी, अपराधी होती हैं और खुद के दल का अपराधी संत हो जाता है। सियासी दलों के नेताओं को भी शर्म नहीं आती। कई बार वह खुलकर अपने पक्ष के माफ़िया और बाहुबलियों को चरित्र प्रमाण-पत्र बांटते नजर आते हैं। राजनीतिक अपराध के आंकड़ों को जुटाने वाली एजेंसियों और संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि संसद और विधानसभाओं में अपराधी चरित्र के लोगों के चुनकर जाने का दौर लगातार बढ़ता जा रहा है।"

(लेखक विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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