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राजनीति
यूपी चुनाव : क्या ग़ैर यादव ओबीसी वोट इस बार करेंगे बड़ा उलटफेर?
2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लगभग 39 प्रतिशत वोट शेयर में कुर्मी और कोइरी के साथ-साथ नॉन डॉमिनेंट ओबीसी ने भी भारी संख्या योगदान दिया था। हालांकि इस बार समाजवादी पार्टी की ग़ैर यादव ओबीसी वोट को एकजुट करने की रणनीति काम करती दिख रही है।
सोनिया यादव
14 Jan 2022
cartoon

विधानसभा चुनाव 2022 से ठीक पहले कड़ाके की ठंड़ के बीच उत्तर प्रदेश की सियासत में अलग ही गरमाहट दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में केंद्रीय मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य सहित अन्य बीजेपी नेताओं का इस्तीफा चर्चा में है तो वहीं ग़ैर यादव ओबीसी वोट बैंक पर भी सभी पार्टियों की नज़र है। चुनावी समर से पहले इस पूरे घटनाक्रम को जहां ट्रेलर बताया जा रहा है, वहीं पूरी पिक्चर का इंतज़ार अब सबको है।

बता दें कि बीते तीन दिन में बीजेपी के 14 विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया है जिसमें तीन मंत्री भी शामिल हैं। ये सब कुछ टिकट बंटवारे की घोषणा के ठीक पहले हो रहा है। मौर्य गुट का दावा है कि अभी और इस्तीफे होंगे। उनके साथ जाने वाले मंत्री और विधायकों की लिस्ट लंबी है। इस वजह से कहा जा रहा है कि आने वाले चुनाव में बीजेपी का 'जातीय अंकगणित' थोड़ा कमज़ोर होने की संभावना है।

यूपी में ग़ैर यादव ओबीसी वोट बैंक कितना बड़ा है?

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक जानकारों के अनुमान को मानें तो प्रदेश में ओबीसी वोट लगभग 35 से 40 फ़ीसदी हैं जिसमें डॉमिनेंट यादव ओबीसी 10 से 15 फ़ीसदी के आस-पास हैं, वहीं बाक़ी के 25 फ़ीसदी नॉन-डॉमिनेंट ओबीसी (मौर्य, लोध, शाक्य आदि) हैं। मंडल पॉलिटिक्स के बाद एक दौर में ओबीसी की बात राजनीति में ख़ूब हुई। उस दौर में ओबीसी पार्टियाँ उभर कर आईं, चुनावी राजनीति में उन्हें एक वोट बैंक के तौर पर देखा जाने लगा। इस समय ओबीसी में कोई बंटवारा खास तौर पर नहीं था। लेकिन पिछले 10-15 सालों में ओबीसी में भी दो तरह के ओबीसी की बात होने लगी है। डॉमिनेंट ओबीसी और नॉन-डॉमिनेंट ओबीसी यानी उत्तर प्रदेश में यादव बनाम मौर्य, लोध, शाक्य आदि।

आँकड़ों की बात करें तो 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के पीछे सवर्णों के साथ साथ नॉन-डॉमिनेंट (लोअर) ओबीसी बहुत बड़ा कारण रहे हैं। जहां साल 2009 से पहले तक बीजेपी के पास 20-22 फ़ीसदी ओबीसी वोटर थे। वहीं साल 2014 में ओबीसी वोट 33-34 फ़ीसदी हो गए। साल 2019 में ये और बढ़कर 44 फ़ीसदी हो गए।

2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी को लगभग 39 प्रतिशत वोट शेयर मिला था। जिसमें कुर्मी और कोइरी के साथ साथ नॉन-डॉमिनेंट ओबीसी ने भी भारी संख्या में बीजेपी का साथ दिया था।

सवर्ण बनाम ओबीसी

स्वामी प्रसाद मौर्य की पैठ पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ प्रदेश के कुछ अन्य इलाकों में ग़ैर यादव ओबीसी आबादी में भी है। 2016 में जब बसपा छोड़ कर मौर्य बीजेपी में आए थे तो 15 सीटों पर उन्होंने अपने उम्मीदवार को टिकट दिए जाने की डील की थी जिसमें से 12 उम्मीदवार जीते भी थे। स्वामी के अलावा पार्टी छोड़ने वालों में कैबिनेट मंत्री दारा सिंह चौहान, बांदा जिले की तिंदवारी विधानसभा से बीजेपी विधायक ब्रजेश प्रजापति भी शामिल हैं, जो कुम्हार जाति से आते हैं।

शाहजहांपुर की तिलहर सीट से रोशनलाल वर्मा जो लोध बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं उन्होंने भी पार्टी को अलविदा कह दिया है। बिधूना औरैया से विधायक विनय शाक्य, कानपुर के बिल्हौर से भगवती सागर भी पार्टी से अलग होने का ऐलान कर चुके हैं। इन सभी का जाना भी जातियों के लिहाज से बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं इसका फायदा समाजवादी पार्टी को मिस सकता है। पूर्वांचल से लेकर बुंदेलखंड और वेस्ट यूपी तक अखिलेश यादव गैर यादव पिछड़े-अति पिछड़े नेताओं को जोड़ने की कोशिश में लगे हैं।

बहरहाल, इस चुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्य का बीजेपी से जाना सत्ता में कितना बड़ा उलटफेर करता है ये तो चुनावी नतीजे ही बता सकते हैं, फिलहाल मामला सवर्ण बनाम ओबीसी का बनता नज़र आ रहा है जिसकी काट बीजेपी ढूंढने में लगी है। हालांकि समाजवादी पार्टी की तरफ़ देखें तो वो ग़ैर यादव ओबीसी वोट को एकजुट करने की रणनीति पर इस बार काम करती दिख रही है, जो पार्टी के जातीय अंकगणित को और मज़बूती दे रहा है।

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