NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूपी चुनावः कॉरपोरेट मीडिया के वर्चस्व को तोड़ रहा है न्यू मीडिया!
पश्चिमी यूपी में एक अहम बात यह देखने को मिल रही है कि कई जगहों पर वहां के तमाम लोग टीवी न्यूज के बजाए स्थानीय यूट्यूब चैनलों व वेबसाइट्स पर खबरें देखना पसंद कर रहे हैं। यह सिलसिला किसान आंदोलन के समय से चल रहा है। न्यू मीडिया के प्रासंगिक होने का ही असर है कि किसान आंदोलन के दौरान ही कुछ टीवी चैनलों ने इसके खिलाफ जोरदार मुहिम शुरू की थी।
अफ़ज़ल इमाम
27 Jan 2022
alternative media

किसान आंदोलन के बाद यूपी चुनाव दूसरा मौका है, जब स्वतंत्र रूप से काम करने वाली न्यूज वेबसाइट्स, स्थानीय यूट्यूब चैनल्स, सिटीजन जर्नलिज्म व सोशल मीडिया (न्यू मीडिया) सत्ता के भोंपू कार्पोरेट मीडिया (गोदी मीडिया) के वर्चस्व को तोड़ता नज़र आ रहा है। कोई भी खबर हो या नेता का बयान, टीवी पर आने से पहले ही ट्विटर, फेसबुक व इंस्टाग्राम आदि के जरिए उसकी जानकारी आम जनता तक पहुंच जा रही है। विपक्ष के नेता भी जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए गोदी मीडिय़ा को आमंत्रित कर प्रेस कांफ्रेंस करने के बजाए सोशल मीडिया का सहारा ज्यादा ले रहे हैं। वे साफ और सरल शब्दों में अपनी बात कह रहे हैं, ताकि उसे तोड़ने-मरोड़ने की गुंजाइश ही न रहे। 

ताजा उदाहरण रालोद अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह का है। 26 जनवरी को जब उनके बारे में एक बयान देकर जाट व किसान समुदाय में भ्रम फैलाने की कोशिश की गई तो उन्होंने बिना समय गंवाए हुए ट्वीट कर उसका जवाब कुछ इस तरह दिया ‘न्योता मुझे नहीं, उन 700 से ज्यादा किसान परिवारों को दो, जिनके घर आपने उजाड़ दिए हैं’। इसी दिन शाम को जब गोदी मीडिया अपने एजेंडे पर लगा हुआ था, तो उसी समय जयंत का यह एक लाइन का ट्वीट न्यू मीडिया में भी सुर्खियां बना हुआ था। तमाम लोकल चैनल्स व वेबसाइट्स ने भी इस पर प्रमुखता से खबर चलाई और सोशल मीडिया पर शेयर भी किया, जिससे चंद मिनटों में लाखों लोगों तक उनकी बात पहुंच गई। 

इस चुनाव में भी यह साफ दिख रहा है कि गोदी मीडिया में विपक्षी पार्टियों की खबरों को न के बराबर जगह मिल रही है। जो थोड़ा बहुत दिखाया भी जा रहा है तो उसमें उनकी छवि को नकारात्मक रूप से पेश करने व कमजोर दिखाने का प्रयास हो रहा है। ऐसी सूरत में न्यू मीडिया की भूमिका काफी अहम हो गई है। वह निष्पक्ष रूप से सही व सटीक खबरें दे रहा है। यही कारण है कि कई वेबसाइट्स व यू-ट्यूब चैनलों आदि पर लोगों का भरोसा मजबूत हुआ है। यह बात भी सही है कि सोशल मीडिया पर बहुत सारी फेक न्यूज फैलाई जाती हैं और सुल्ली डील, बुल्ली बाई व कल्ब हाऊस चैट जैसे घिनौने कृत्य भी इसी पर हो रहे हैं। इसी पर वीडियो जारी कर दंगे भी भड़काए जाते हैं, लेकिन पुलिस-प्रशासन सक्रियता दिखाए और ईमानदारी से काम करे तो इस तरह की गतिविधियों पर नकेल कसी जा सकती है। दूसरे गलत इरादे या षडयंत्र के तहत फैलाई गई किसी अफवाह को इसी प्लेटफार्म पर ध्वस्त भी किया जा सकता है। 

बहरहाल, न्य़ू मीडिया एक मजबूत विकल्प के रूप में लोगों के सामने आया है। हाल के दिनों में एनआरसी-सीएए आंदोलन के समय भी इसकी भूमिका महत्पूर्ण रही थी। जामिया मिल्लिया से लेकर जेएनयू पर हुए हमलों के दौरान असली तस्वीर सोशल मीडिया व न्यू मीडिया के माध्यम से ही सामने आई। एक चैनल ने तो जामिया की लाइब्रेरी की एक तस्वीर जोरशोर से चलाई और सवाल उठाया कि आखिर पढ़ने-लिखने वाली जगह पर छात्र के हाथ में पत्थर क्यों है? फिर न्यू मीडिया ने ही प्रमाणित रूप से बताया कि उस छात्र के हाथ में पत्थर नहीं बल्कि उसका बटुआ था। आंदोलन के दौरान राजधानी में स्थित दोनों केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जो भी घटनाएं हुईं, उसका सच न्यू मीडिया के जरिए ही बाहर आ सका। इसके बाद किसान आंदोलन में तो कॉरपोरेट मीडिया को बुरी तरह से मुंह की खानी पड़ी। किसानों को आंदोलन जीवी, मवाली, आतंकवादी, खालिस्तानी, विपक्ष द्वारा प्रायोजित व विदेशी चंदा लेने वाले... और न जाने क्या-क्या कहा गया, जिसका जवाब देने के लिए उन्होंने 'ट्राली टाइम्स' नामक अखबार निकाला और अपना सोशल मीडिया सेल गठित किया। फिर इसी न्यू मीडिया के जरिए उनके खिलाफ गढा गया सारा ‘नरेटिव’ ध्वस्त हुआ। अंततः देश में एक ऐसा माहौल बना कि सरकार को तीनों काले कानून वापस लेने पड़े। 

अब यह दूसरा मौका है जब जब कॉरपोरेट मीडिया और सत्ताधारी दल की ट्रोल आर्मी पर न्यू मीडिया भारी पड़ता नज़र रहा है। उदाहरण के तौर पर यूपी के उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य को उन्हीं के चुनाव क्षेत्र के एक गांव से खदेड़े जाने की ब्रेकिंग न्यूज़ किसी चैनल पर नहीं आई थी, लेकिन यह सिटीजन जर्नलिज्म और सोशल मीडिया का ही कमाल है कि यह बात अब पूरे देश को पता हो चुकी है। इसी तरह सीतापुर मे भाजपा विधायक सुरेश राही व मुजफ्फरनगर में विक्रम सैनी समेत कुछ और लोगों के बारे में ऐसे ही वीडियो सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहे हैं। इस बीच शामली के कई गावों से ऐसी फोटो आईं हैं, जिनमें घरों के गेट पर चाक से लिखा है ‘ इस मकान के अंदर भाजपा वालों का आना मना है...।’ किसान आंदोलन के समय भी ठीक इसी तरह की इबारतें हरियाणा और पंजाब के अनेक गांवों में दिखाई पड़ी थीं। इन सबके बीच अभी तक कोई ऐसा वीडियो नहीं आया जिसमें विपक्षी पार्टी का कोई प्रत्याशी को भागता हुआ नजर आया हो।

जहां तक पार्टियों की सोशल मीडिया पर सक्रियता का सवाल है, तो भाजपा और कांग्रेस के पास तो अपनी मजबूत व प्रशिक्षित टीमें हैं, लेकिन सपा, बसपा और यहां तक कि ओम प्रकाश राजभर की पार्टी एसबीएसपी भी बहुत ज्यादा पीछे नहीं है। वैसे इनके कार्यकर्ताओं की सक्रियता ज्यादातर फेसबुक व व्हाट्सऐप पर नजर आती है। उनके अपने ग्रुप बने हुए हैं, जिन पर हर दिन पार्टी के कार्यक्रम, प्रचार, फोटो और विचारों का आदान-प्रदान होता है। इन पार्टियों के कार्यकर्ता अपने नेताओं के वक्तव्यों व वीडियो को विभिन्न ग्रुप्स में शेयर भी कर रहे हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा मुफ्त बिजली व पेंशन स्कीम से लेकर की गई अन्य घोषणाएं कुछ घंटे के भीतर गांवों और कस्बों के चाय की दुकानों पर चर्चा का विषय बन जा रही हैं। गांव का जो व्यक्ति स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करता है, उसे भी यह सारी जानकारी मिल जा रही है। दूसरी अहम बात यह है कि स्मार्ट फोन का इस्तेमाल ज्यादातर युवा वर्ग करता है,जो वर्तमान में बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। इस चुनाव की खास बात यह भी है कि विपक्ष का कोई भी बड़ा नेता किसी दूसरे विपक्षी पर हमले नहीं कर रहा है। यहां तक कि अखिलेश और मायावती भी एक दूसरे पर हमला करने से बच रहे हैं। इन सभी के निशाने पर भाजपा है और इनके मुद्दे भी अलग नहीं हैं। 

पश्चिमी यूपी में एक अहम बात यह देखने को मिल रही है कि कई जगहों पर वहां के तमाम लोग टीवी न्यूज के बजाए स्थानीय यू ट्यूब चैनलों व वेबसाइट्स पर खबरें देखना पसंद कर रहे हैं। यह सिलसिला किसान आंदोलन के समय से चल रहा है। न्यू मीडिया के प्रासंगिक होने का ही असर है कि किसान आंदोलन के दौरान ही कुछ टीवी चैनलों ने इसके खिलाफ जोरदार मुहिम शुरू की थी। उस समय कुछ एंकर यह बोलते हुए सुने गए थे ‘कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा माइक उठा कर पत्रकार बन जाता है’....। वास्तव में यह उनकी खीज थी, क्योंकि न्यूज वेबसाइट्स व यूट्यूब चैनल्स के लोगों ने खबरों के मामले में कॉरपोरेट मीडिया को बहुत पीछे छोड़ दिया है। सही मायनों में देश के दूरदराज के क्षेत्रों से ग्राउंड रिपोर्ट अब इन्हीं प्लेटफार्म पर आ रही है, जिसके चलते लोग इन्हें अहमियत दे रहे हैं। कॉरपोरेट मीडिया भी अपनी खबरों व बहसों के वीडियो ट्विटर व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जोरशोर से शेयर कर रहा है, लेकिन वहां उसे पाठकों व दर्शकों की तीखी प्रतिक्रिया भी मिल रही है। सोशल मीडिया की एक खास बात यह है कि जब इस पर किसी की खिंचाई या आलोचना की जाती है तो उसे समर्थन भी मिलता है। इसका ताजा उदाहरण भोजपुरी गायिका नेहा राठौर हैं, जिनका गीत ‘यूपी में का बा....’ सुपर हिट हुआ। चंद घंटों में इसे लाखों लाइक मिले। इससे उत्साहित हो कर वे कुछ और गीत भी तैयार करने में जुट गई हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल वर्षों से हो रहा है, लेकिन वर्ष 2013-14 में यह बड़ा राजनीतिक हथियार बना। ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की मुहिम के तहत अन्ना आंदोलन के लिए समर्थन इसी से जुटाया गया था। उसी समय भाजपा ने लोकसभा चुनाव में इसका इस्तेमल जमकर किया, जिसके बाद मोदी सरकार बनी। वैसे पीएम मोदी ने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार के इंटरव्यू  में बताया था कि वे तो सन 2009 में ही सोशल मीडिया से जुड़े गए थे। वे इसे बहुत बड़ी ताकत मानते हैं, क्योंकि इसके जरिए जमीनी स्तर पर आम लोगों की सोच और प्रतिभा की जानकारी मिलती है। भाजपा ने वर्ष 2014 के बाद 2019 और विधानसभा चुनावों में भी इसका जमकर इस्तेमाल किया। अब विपक्षी पार्टियां भी इस हथियार को आजमा रही हैं। यूपी में भी कॉरपोरेट मीडिया के शोरगुल के बावजूद विपक्ष सोशल मीडिया के जरिए ‘परसेप्शन वार’ में बढ़त हासिल करता नजर आ रहा है।

Alternative Media
Social Media
journalism
Godi Media

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

ज़ोरों से हांफ रहा है भारतीय मीडिया। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पहुंचा 150वें नंबर पर

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

पत्रकारिता की पढ़ाई के नाम पर महाविद्यालय की अवैध वसूली

कैसे चुनावी निरंकुश शासकों के वैश्विक समूह का हिस्सा बन गए हैं मोदी और भाजपा

गणेश शंकर विद्यार्थी : वह क़लम अब खो गया है… छिन गया, गिरवी पड़ा है

आर्थिक मोर्चे पर फ़ेल भाजपा को बार-बार क्यों मिल रहे हैं वोट? 

रामदेव विरोधी लिंक हटाने के आदेश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया की याचिका पर सुनवाई से न्यायाधीश ने खुद को अलग किया

क्या आपको पता है कि ₹23 हजार करोड़ जैसे बैंक फ्रॉड भी महंगाई के लिए जिम्मेदार है? 

सिर्फ साम्प्रदायिक उन्माद से प्रचार होगा बीजेपी?


बाकी खबरें

  • लुइज़ा राइट
    वैज्ञानिकों के अनुमान से भी ज़्यादा जल्दी ठंडा हो रहा है धरती का कोर
    23 Jan 2022
    पृथ्वी के बीच में एक कोर है, जिसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें लगता है कि वह अधिक तेज़ी से अपनी गर्मी खो रहा है।
  • सट झाली, रॉजर वॉटर्स
    एमा वॉटसन को बदनाम करने का कैंपेन
    23 Jan 2022
    कोई भी जो कभी भी फिलिस्तीनी लोगों के प्रति इजरायल की कार्रवाइयों की आलोचना करता रहा है, उसको यही कहा जाता है कि इजरायल की उनकी आलोचना नस्लवाद और यहूदी-विरोधी से प्रेरित है। नवीनतम उदाहरण अभिनेत्री
  • Netaji Subhash Chandra Bose
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों वर्तमान में भी ज़रूरी है नेता जी को समझना?
    23 Jan 2022
    इस साल गणतंत्र दिवस मनाने की शुरुआत 23 जनवरी से होगी। नेता जी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन के दिन से। 'इतिहास के पन्ने' के इस एपिसोड में नीलांजन बात कर रहे हैं इतिहासकार अनिर्बान से नेता जी सुभाष चंद्र…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : साहिर लुधियानवी की नज़्म '26 जनवरी'
    23 Jan 2022
    हिंदुस्तान के 73वें गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में इतवार की कविता में आज पढ़िये देश से सवाल पूछती साहिर लुधियानवी की नज़्म 26 जनवरी...
  • Neha Singh Rathore
    न्यूज़क्लिक टीम
    ‘यूपी में सब बा’ के जवाब में नेहा सिंह राठौर का ‘ यूपी में का बा’
    23 Jan 2022
    यूपी विधानसभा चुनाव में वोटरों को रिझाने के लिए सांसद और अभिनेता रवि किशन भाजपा की तारीफ़ में एक वीडियो लेकर आए, जिसके बोल हैं ‘ यूपी में सब बा’। भाजपा की उपलब्धियों का बखान वाला यह वीडियो घर-घर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License