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कोविड-19
भारत
राजनीति
यूपी: कोविड-19 के असली आंकड़े छुपाकर, नंबर-1 दिखने का प्रचार करती योगी सरकार  
यूपी सरकार कोविड से लड़ाई में यूपी को नंबर वन दिखाने का प्रचार कर रही है, लेकिन राज्य में मिल रही ज़मीनी रिपोर्ट से घोर कुप्रबंधन और मामलों की कम रिपोर्टिंग की निराशाजनक तस्वीर सामने आती हैं।
ऋचा चिंतन
09 Oct 2021
Translated by महेश कुमार
UP covid mismanagement
Image Courtesy: NDTV

उत्तर प्रदेश ने 25 सितंबर को 10 करोड़ के टीकाकरण के निशान को हासिल कर लिया है, इसे लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रशासन आत्म-बधाई मोड में दिखे, साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इकाई के ट्विटर हैंडल में पोस्ट किया गया कि “यूपी ने एक रिकॉर्ड बनाया है क्योंकि वह 10 करोड़ वैक्सीन की खुराक देने वाला देश में नंबर एक राज्य बन गया है।’’

हालांकि, आंकड़ों पर करीब से नज़र डालने से पता चलता है कि यूपी अन्य राज्यों की तुलना में उन लोगों की संख्या में काफी पीछे है, जिन्हें पूरी तरह से टीका लगाया जा चुका है। 5 अक्टूबर तक, बिहार की 17 प्रतिशत और केरल की 43 प्रतिशत आबादी के टिकाकरण की तुलना में यूपी ने वयस्क आबादी के केवल 15 प्रतिशत ही पूरी तरह से टीकाकरण किया है।

सही तस्वीर पेश नहीं करने वाली संख्याओं को बताना यूपी सरकार के लिए कोई नई बात नहीं है, जिसने महामारी के दौरान अक्सर इस तरह के हथकंडे अपनाए गए हैं- चाहे वह कोविड-19 की जांच किए गए लोगों की संख्या हो, बुनियादी चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता हो, जैसे कि ऑक्सीजन इत्यादि या यहां तक कि कोविड से मरने वालों के आंकड़े भी सही नहीं बताए गए हैं।

प्रशासन लगातार यूपी को एक उदाहरणात्मक राज्य के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, और बताया जा रहा है कि आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। हालांकि ज़मीनी हकीकत इन दावों के उलट है।

ये भी पढ़ें: यूपी में दूसरी लहर में हर गांव में कम से कम दस लोगों की मौत हुई : भाजपा नेता

उदाहरण के लिए, अप्रैल में, यूपी सरकार और आदित्यनाथ के ट्विटर हैंडल ने जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय द्वारा किए गए कुछ अध्ययन को आधार बना कर “कोविड प्रबंधन में टॉपर्स के बीच उत्तर प्रदेश” के नाम को उद्धृत किया है। बाद में, द क्विंट ने बताया कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने इस बात से इनकार किया है कि अध्ययन ने राज्यों या देशों के बीच कोई तुलनात्मक विश्लेषण किया था, इसलिए यूपी को नंबर देने का सवाल नहीं उठता है। वास्तव में, यूपी सरकार के अधिकारियों द्वारा सह-लेखक के रूप में किए गए अध्ययन में राज्य में केवल कोविड-19 से सबक लेने के लिए उठाए गए कदमों को बताया गया है और इसके लिए बेहतर स्वास्थ्य आपातकालीन प्रतिक्रिया या कार्यवाही की सिफारिशें की गईं हैं।

जांच कम की गई

सरकार ने साढ़े चार साल पूरे करने के बारे में पेश की गई रिपोर्ट कार्ड में कई उपलब्धियों का हवाला दिया है, जिनमें से एक का दावा है कि यूपी ने सबसे अधिक कोविड-19 की जांच की है। यह जानते हुए कि यूपी देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, संख्या में दावा सही हो सकता है लेकिन जनसंख्या के पैमाने पर इसे मापने से एक उलट तस्वीर मिलती है।

यूपी उन राज्यों में से एक है जहां प्रति मिलियन वयस्क आबादी की बहुत कम जांच की गई है। यहां तक कि बिहार ने भी हाल के महीनों में इसे पछाड़ दिया है। तालिका-1 में 2021 में प्रति मिलियन अनुमानित वयस्क जनसंख्या की गई जाँचों की संख्या में यूपी की बिहार, केरल और महाराष्ट्र से तुलना की गई है। यहां किए गए कुल परीक्षणों का साप्ताहिक औसत दिया गया हैं।

तालिका-1: प्रति मिलियन वयस्क जनसंख्या पर की जांच

केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तुलना में यूपी लगातार कम जांच कर रहा है। उदाहरण के लिए, आगरा में, यह बताया गया कि निजी अस्पतालों को जांच न करने का आदेश दिया गया था। 9 मई को, "यूपी को मौतों की संख्या के हिसाब से तीसरे स्थान पर रखा गया था, इसमें विशाल बेशुमार अनगिनत संख्या शामिल नहीं है, लेकिन की गई जांचों के अनुसार यूपी 25 वें नंबर पर है"। 

ये भी पढ़ें: गुजरात के बाद बनारस मॉडल : “भगवान बचाए ऐसे मॉडल से”

रिपोर्ट के अनुसार कुछ निजी अस्पतालों ने गुप्त रूप से एंटीजन किट खरीदी और 800 रुपये या उससे अधिक पर जांच की पेशकश की, क्योंकि उन्हें जांच करने की अनुमति नहीं थी। डॉक्टरों में से एक ने कथित तौर पर अपने रोगियों की हालत का पता लगाने के लिए अपने अस्पताल में गुप्त एंटीजन जांच की और आईसीयू में सभी 11 रोगी कोविड के लिए सकारात्मक पाए गए।

जांच की संख्या में हेराफेरी?

प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट और चिकित्सा विज्ञान में उनके योगदान के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार हासिल करने वाले डॉ. शाहिद ज़मील ने कहा कि यूपी ने स्पष्ट रूप से जांच के डेटा में हेराफेरी की है। “चौथे आईसीएमआर सेरो सर्वेक्षण के अनुसार, औसतन 67 प्रतिशत भारतीयों में सार्स- कोविड-2 के प्रति एंटी बॉडी पाए गए थे, जो एक बड़े जोखिम/संक्रमण का संकेत है। यह प्रभावी रूप से दर्शाता है कि कुल जनसंख्या में लगभग 92 करोड़ भारतीय सकारात्मक हैं। चूंकि भारत में 3.38 करोड़ मामले दर्ज किए गए हैं, यह 27 संख्या का एक कारक है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जांच किए गए प्रत्येक भारतीय में से 26 लोग जांच में छूट गए थे।”

दूसरी ओर, “यूपी में, सेरो सर्वेक्षण के अनुसार, औसतन 71 प्रतिशत आबादी में एंटीबॉडी पाए गए थे। यह प्रतिशत यूपी में 16.33 करोड़ पॉजिटिव लोगों के समान है। चूंकि यूपी में 17 लाख मामले दर्ज किए गए हैं, यह 96 का एक कारक है। डॉ ज़मील ने कहा कि, दूसरे शब्दों में, यूपी में सकारात्मक परीक्षण किए गए प्रत्येक व्यक्ति में से, 95 छूट गए थे। यह तभी हो सकता है जब डेटा में हेराफेरी की गई हो।“

बीजेपी सांसदों/विधायकों ने किया 'उप्र सरकार का पर्दाफाश' 

कथित तौर पर, कई सांसदों और विधायकों ने सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री से ऑक्सीजन, बिस्तर, चिकित्सा उपकरणों की कमी और हर किस्म की चिकित्सा सहायता की कमी की शिकायत की थी। केंद्रीय श्रम और रोजगार राज्य मंत्री संतोष गंगवार ने यूपी में ऑक्सीजन की कमी, अस्पताल में भर्ती में देरी और चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी जैसी चिंताओं को उजागर किया था।

ये भी पढ़ें: यूपी के गांव; एक पड़ताल: 1 अप्रैल से 20 मई- कोरोना के मामलों में 277% की वृद्धि

भाजपा के बरेली विधायक केसर सिंह, जिन्होंने वायरस के कारण दम तोड़ दिया था, ने भी आदित्यनाथ को इस बाबत एक पत्र लिखा था। कथित तौर पर उन्हें लिखने वाले अन्य लोगों में यूपी के कैबिनेट मंत्री और लखनऊ के विधायक बृजेश पाठक, मोहनलालगंज के विधायक कौशल किशोर, जिन्होंने अपने भाई को कोविड-19 के कारण खो दिया था शामिल थे, बस्ती के सांसद हैश द्विवेदी, भदोही के विधायक दीनानाथ भास्कर और कानपुर के सांसद सत्यदेव पचौरी भी पत्र लिखने में शामिल हैं।

भाजपा के फिरोजाबाद विधायक पप्पू लोधी, जो जांच में सकारात्मक पाए गए थे, ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया था जिसमें कहा गया था कि उनकी कोविड-19-पॉजिटिव पत्नी को एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा में बिस्तर न मिलने की वजह से जमीन पर लेटकर दो से तीन घंटे बिताने पड़े। आगे की रिपोर्ट्स के मुताबिक श्रम कल्याण राज्य मंत्री सुनील भराला ने मेरठ के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी, बेड और इलाज के संबंध में पत्र लिखा था। मेरठ-हापुड़ से सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने आदित्यनाथ को अपने इलाके में ऑक्सीजन की कमी के बारे में बताया था। रुधौली बस्ती से बीजेपी विधायक संजय प्रताप जायसवाल ने अपने संसदीय क्षेत्र में दवा और बेड की कमी को लेकर लिखा था।

भदोही के विधायक दीनानाथ भास्कर ने आरोप लगाया था कि भाजपा के जिला महासचिव लाल बहादुर मौर्य की मौत आईसीयू इंजेक्शन में जगह की कमी के कारण हुई है। ऑक्सीजन की कमी के कारण आम लोगों के अपनों को खोने की कई खबरें आई हैं।

मौतों के आधिकारिक रिकॉर्ड में विसंगति

दूसरी लहर के चरम पर, कई जिलों में नदियों के किनारे कई शव पाए गए थे। लेकिन आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक यूपी में मरने वालों की संख्या ज्यादा नहीं थी। हालांकि, श्मशान घाट ने कुछ और ही कहानी बयां कीं। कई पत्रकारों ने श्मशान घाटों का सर्वेक्षण किये और पाया कि यह संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक है।

जैसा कि एक पत्रकार ने बताया, "आधिकारिक तौर पर, 16 अप्रैल से 5 मई के बीच कानपुर में वायरस से 196 लोगों की मौत हुई थी, लेकिन सात श्मशान घाटों के आंकड़ों में लगभग 8,000 दाह संस्कार दिखाए गए थे"। डाउन टू अर्थ ने बताया कि लखनऊ में कोविड-19 मृतकों के लिए चुने गए इलेक्ट्रिक श्मशान में से सिर्फ एक में, 6 से 8 अप्रैल के बीच 58 शवों का अंतिम संस्कार किया गया था, जबकि राज्य सरकार ने इस अवधि के दौरान केवल 24 मौतों की सूचना दी थी।

ये भी पढ़ें: यूपी: कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच सरकारी आंकड़ों की लीपापोती

गाजियाबाद, आगरा और झांसी से भी विसंगति की ऐसी ही कहानियां मौजूद हैं। जबकि राज्य सरकार ने अप्रैल के दौरान कई दिनों तक शून्य या बहुत कम मौतों की सूचना दी थी, जबकि श्मशान घाट के श्रमिकों ने बताया कि "वे बड़ी संख्या में शवों का अंतिम संस्कार करने के मामले में दैनिक संघर्ष कर रहे थे"। आगरा से एक विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दिखाती है कि कैसे कोविड-19 स्थिति को पहले गलत तरीके से प्रबंधित किया गया और फिर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि तथ्य सामने न आए।

दूसरी लहर के दौरान व्यक्तिगत नुकसान की दर्दनाक यादों को याद करते हुए, डॉ. ज़मील ने पत्रकारों द्वारा रिपोर्ट की गई कहानियों की ओर इशारा किया, जो यूपी में मौतों की बड़े पैमाने पर कम रिपोर्टिंग को दर्शाती हैं। ‘’अखिल भारतीय आंकड़े बताते हैं कि अनुमानित मौतों में से 29.9 प्रतिशत और 86.5 प्रतिशत क्रमशः नागरिक पंजीकरण और चिकित्सा प्रमाणन का हिस्सा नहीं थे। यूपी में ये आंकड़े 56.7 प्रतिशत और 97.7 प्रतिशत हैं। उन्होंने कहा, कि इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि यूपी में कोविड-19 से जितने लोगों की मौत बताई गई है, उससे कहीं अधिक लोगों की मौत हुई है।”

महामारी के दौरान, रिपोर्ट की गई और वास्तविक मौतों के बीच विसंगति को पकड़ने के सबसे सामान्य तरीकों में से एक सामान्य से अतिरिक्त मृत्यु दर की गणना करना है। अत्यधिक मृत्यु दर से तात्पर्य किसी संकट के दौरान सभी कारणों से होने वाली मौतों की संख्या से है, जो सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षित से ऊपर होती है।

अपनी एक जमीनी रिपोर्ट में, आर्टिकल 14 वेबसाइट ने 1 जुलाई, 2020 और 31 मार्च, 2021 के बीच यूपी के 24 जिलों का अध्ययन किया था और बताया कि अधिक मौतें आधिकारिक कोविड-19 मौतों की तुलना में 10 से 335 गुना अधिक हैं। इनमें से कुछ जिलों के आंकड़े नीचे दिए गए हैं। 

इस तरह की विनाशकारी ज़मीनी रिपोर्टों के बावजूद, इस बात को प्रचारित करने के लिए एक बड़ा प्रचार प्रयास चल रहा है कि यूपी में सब कुछ अच्छा है, खासकर ऐसा तब किया जा रहा है जब विधानसभा चुनाव कुछ महीने ही दूर हैं।

(पुलकित शर्मा ने साप्ताहिक औसत जांच संख्या का डेटा उपलब्ध कराया है)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

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