NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
पड़ताल: पश्चिमी यूपी में दलितों के बीजेपी के ख़िलाफ़ वोट करने की है संभावना
साल भर चले किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी समीकरण बदल दिए हैं।
महेश कुमार
17 Jan 2022
Dalit Movement
(फाइल) तस्वीर केवल प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बावली गांव के सोनू अपने विचार में बहुत दृढ़ हैं: आगामी विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में दलित मतदाता सपा-लोक दल गठबंधन को वोट देने जा रहे हैं।

“पिछले विधानसभा चुनाव में, हमने (दलितों) ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था। लेकिन पिछले पांच सालों में दलितों के मुद्दों पर कोई काम नहीं हुआ है। सोनू ने शिकायत करते हुए कहा कि, न तो हमें नौकरी मिली और न ही वेतन में कोई सुधार हुआ ऊपर से बढ़ती कीमतें हमारे संकट को बढ़ा रही हैं”।

क्षेत्र के दलितों का एक बड़ा वर्ग ईंट भट्टों या ऊंची जाति के किसानों के खेतों में काम करता है। उनके वेतन में या तो गिरावट आई है या लंबे समय से कोई वृद्धि नहीं हुई है। सोनू ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, इसके साथ उन्हें जातिगत उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है और प्रशासन कभी उनका समर्थन नहीं करता है।

"अब, चूंकि किसान आंदोलन ने कुछ हद तक सभी वर्गों के बीच एकता पैदा की है, दलित वर्ग भी सपा-लोक दल गठबंधन को मतदान करने के बारे में सोच रहा है।"

राज्य के विभिन्न हिस्सों से मिले तमाम संकेतों के अनुसार भाजपा को आगामी चुनाव में कड़ी चुनावी टककर का सामना करना पड़ सकता है। इसके दो प्रमुख कारण हैं: एक, उच्च मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी और खेतिहर मजदूरों और किसानों की दुर्दशा के कारण आर्थिक उत्पन्न संकट; और दूसरा, भाजपा में दरार जिसके कारण कई वरिष्ठ मंत्री और विधायक सपा में शामिल हो गए हैं। अब लगता है कि मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा गठबंधन के बीच होने जा रहा है।

लेकिन इस गतिशील चुनावी परिदृश्य में, एक सवाल जो सपा और भाजपा दोनों के लिए चिंता का विषय है: वह यह है कि आखिर दलित किस गठबंधन की ओर रुख करेंगे? अभी तक यूपी में दलित वोटों की मुख्य दावेदार बहुजन समाज पार्टी थी और यही वजह है कि 2017 के चुनाव में बसपा को सपा से कुछ अधिक वोट मिले थे। भाजपा को जहां 36.7 फीसदी वोट मिले, वहीं सपा को 21.8 फीसदी और बसपा को 22.2 फीसदी वोट मिले थे। यह भी सच है कि पिछले चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी दलित समुदाय के एक बड़े तबके ने भाजपा को वोट दिया था।

अब जब काफी हद तक भाजपा के खिलाफ हवा चल रही है, तो अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि दलित किस तरफ जाएंगे? क्या वे बसपा की ओर रुख करेंगे या वे सपा गठबंधन को वोट देंगे।

इसकी जांच के लिए न्यूज़क्लिक ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीन प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों के दलित मतदाताओं से बात की। ये बड़ौत, शामली और बुढाना हैं जो क्रमशः बागपत, शामली और मुजफ्फरनगर जिले में आते हैं। बागपत और शामली में दलित आबादी करीब 12 फीसदी और मुजफ्फरनगर में करीब 13.55 फीसदी है।

सोनू का गांव बावली बड़ौत विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत बड़ौत शहर से एक किलोमीटर दूर स्थित है। इस अपेक्षाकृत बड़े गांव की आबादी करीब 10,000 है। यह मुख्य रूप से जाट बहुल क्षेत्र है और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। पिछले चुनावों में जाटों ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था और परिणामस्वरूप भाजपा के प्रतिनिधि की जीत हुई थी। लेकिन किसान आंदोलन ने यहां चुनावी समीकरण ही बदल कर रख दिया है। अब जाट समुदाय ज्यादातर सपा और राष्ट्रीय लोक दल गठबंधन का समर्थन कर रहा है और भाजपा को हराने के लिए कमर कस रहा है।

2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में दलितों की आबादी 16.81 प्रतिशत है। इनका असर राज्य के चुनावी नतीजों पर पड़ने वाला है। राज्य में दलितों की दुर्दशा को देखते हुए कोई भी दल या गठबंधन यह दावा नहीं कर सकता कि उसने दलितों के उत्थान के लिए बहुत प्रयास किए हैं। इसलिए दलित मतदाताओं के दिल और दिमाग के बारे में व्यापक अटकलें हैं।

इसे भी पढ़ें : यूपी चुनाव और दलित: फिर पकाई और खाई जाने लगी सियासी खिचड़ी

शामली और बुढाना विधानसभा क्षेत्र भी जाट बहुल क्षेत्र हैं। इन दो क्षेत्रों में, दलित आबादी औसतन 12.5 प्रतिशत है। शामली विधानसभा के तहत आने वाले सिसौली और भोरा खुर्द के दलित मतदाताओं का कहना है कि इस बार 90 फीसदी लोग सपा-लोक दल को वोट देंगे।

कई चुनावी मुकाबलों के अनुभवी भोरा खुर्द के सोहनबीर ने कहा कि गांव के लोग भाजपा के बहुत खिलाफ हैं क्योंकि भाजपा द्वारा दिखाए गए “विकास के सपने” पूरे नहीं हुए हैं।

उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया कि, “दलितों की दुर्दशा पहले से भी बदतर हो गई है। मुद्रास्फीति और बेरोजगारी ने दलित वर्गों को निचोड़ दिया है”।

सिसौली कस्बे के सुरेंद्र कुमार का कहना है कि पिछले चुनाव में लगभग पूरे इलाके ने सामूहिक रूप से बीजेपी को वोट दिया था।

कुमार ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, "लेकिन इस बार स्थिति बदल गई है और 90 प्रतिशत मतदाता सपा-लोक दल गठबंधन को वोट देंगे।"

लगभग 2400 की आबादी वाले और बुढाना विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चंदेढ़ी गांव में दलित मतदाता सपा-लोक दल गठबंधन की ओर रुख कर रहे हैं।

“हालांकि परंपरागत रूप से दलित मतदाता बसपा को वोट देते रहे हैं, लेकिन इस बार स्थिति बदल गई है और दलित वोट एसपी-लोक दल और बसपा में विभाजित हो सकते हैं। आम तौर पर लोग भाजपा के कुशासन से नाराज हैं और दलित मतदाता भी इस बार राज्य में बदलाव के पक्ष में हैं।'

चूंकि चुनावी परिदृश्य अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, इसलिए यह देखा जाना बाकी है कि कौन सा गठबंधन इन वर्गों को पूरी तरह से लुभाने में कामयाब होता है। लेकिन एक बात तय है कि किसान आंदोलन की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जमीन खिसकती दिख रही है और दलित मतदाता भी इस अभियान से जुड़ना चाहते हैं ताकि राज्य में आने वाले बदलाव को सुनिश्चित किया जा सके।

इसे भी पढ़ें :दलितों के ख़िलाफ़ हमले रोकने में नाकाम रही योगी सरकार

इसे भी देखें : चुनाव चक्र: यूपी में दलित राजनीति और रिज़र्व सीटों का गणित

Uttar pradesh
Yogi Adityanath
yogi government
Dalits
Attack on dalits
Dalits in UP
Dalit Rights
caste politics
BJP

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे


बाकी खबरें

  • सड़क में गड्ढे...: एक स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    सड़क में गड्ढे...: एक स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम
    12 Sep 2021
    तिरछी नज़र: गड्ढे सड़क बनवाने में बरती गई ईमानदारी का परिचायक हैं। सड़क बनाने में जितनी अधिक ईमानदारी बरती गई होती है गड्ढे उतनी ही जल्दी और उतने ही ज़्यादा बनते हैं।
  • ‘प्रेस की आज़ादी पर हमला': एडिटर्स गिल्ड, डीयूजे ने मीडिया घरानों पर आयकर विभाग द्वारा “सर्वे” की निंदा की
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ‘प्रेस की आज़ादी पर हमला': एडिटर्स गिल्ड, डीयूजे ने मीडिया समूहों पर आयकर विभाग के “सर्वे” की निंदा की
    12 Sep 2021
    गिल्ड ने न्यूज़क्लिक और न्यूज़लॉन्ड्री के दफ़्तरों में आईटी द्वारा ‘सर्वे’ की आलोचना करते हुए कहा कि आज़ाद मीडिया को परेशान करने और डराने-धमकाने की इस ख़तरनाक रवैये को रोका जाना चाहिए।
  • महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे (दाएं) और नारायण दत्तात्रय आप्टे (बाएं)।
    अनिल जैन
    विडंबना: अब गोडसे ही नहीं आप्टे को भी ‘पूजने’ की तैयारी, मेरठ में लगेगी मूर्ति?
    12 Sep 2021
    महात्मा गांधी के हत्यारों में से एक नारायण आप्टे की मूर्ति लगाने की कोशिशों के पीछे कौन-सी ताकतें हैं, उनका क्या राजनीतिक मकसद है और मूर्ति लगाने के लिए मेरठ शहर का ही चयन क्यों किया गया है, इन सारे…
  • karnala
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    करनाल में किसानों की बड़ी जीत; एसडीएम सिन्हा के ख़िलाफ़ बैठी जांच, मृत किसान के परिवार को मिली दो नौकरियां
    11 Sep 2021
    'समझौते के मुताबिक, सरकार पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा बस्तारा टोल प्लाजा पर लाठीचार्ज प्रकरण की जांच करेगी। जांच पूरी होने तक आयुष सिन्हा जबरन छुट्टी पर रहेंगे। इसी…
  • rupani
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का इस्तीफ़ा
    11 Sep 2021
    उत्तराखंड और कर्नाटक के बाद गुजरात में भी बीजेपी को चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदलना पड़ा है। कुल मिलाकर बीजेपी में सबकुछ ठीक नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License