NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
संस्कृति
समाज
साहित्य-संस्कृति
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
UP: हिंदी में फेल 8 लाख स्टूडेंट हमारी जीवन चिंतन का हिंदी से दूर हो जाने का रिजल्ट है !
हिंदी में फेल हुए आठ लाख विद्यार्थी केवल केवल सरकार की नाकामी का रिजल्ट नहीं है बल्कि उस व्यवस्था और जीवन चिंतन के नाकामी का भी रिजल्ट है जिसमें हम जी रहे हैं।
अजय कुमार
02 Jul 2020
up

मुझे अपने इंजीनियर चाचा की वह बात याद रहती है, जब वह कहा करते थे कि मैथ, साइंस और अंग्रेजी पढ़ो, हिंदी और सामाजिक विज्ञान पढ़ने से नौकरी नहीं मिलेगी। बाद में पता चला कि यह केवल मेरी ही कहानी नहीं है बल्कि यूपी, बिहार के ज्यादातर विद्यार्थियों की जिंदगी की कहानी है। हमारे समाज में इस कहानी का असर इतना खतरनाक है की एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक डॉ कृष्ण कुमार कहते हैं कि हिंदुस्तान की बहुत बड़ी आबादी ढंग से एक पन्ना हिंदी नहीं लिख सकती है।

उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा संचालित साल 2020 के दसवीं और 12वीं के रिजल्ट आ चुके हैं। रिजल्ट ठीक वैसे ही हैं, जिस दिशा में हमारा समाज अपनी कहानी की दिशा गढ़ रहा है। साल 2020 के 10वीं और 12वीं की परीक्षा में तकरीबन 59.6 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया। इनमें से तकरीबन 8 लाख विद्यार्थी हिंदी की परीक्षा में फेल हो गए हैं। यानी तकरीबन उत्तर प्रदेश के 13 फ़ीसदी विद्यार्थी उस विषय में फेल हो गए, जो विषय उनकी मातृभाषा से सबसे करीबी रिश्ता रखती है।

इन आंकड़ों को थोड़ा कक्षाओं की लिहाज से समझते हैं। इस साल फरवरी-मार्च के महीने में तकरीबन 30 लाख विद्यार्थियों ने दसवीं की परीक्षा दी थी। इसमें से तकरीबन 5.28 लाख विद्यार्थी हिंदी में फेल हो गए। यानी दसवीं क्लास की हिंदी की परीक्षा में तकरीबन 15 फ़ीसदी से अधिक विद्यार्थी फेल हो गए। ठीक ऐसा ही हाल 12वीं क्लास की हिंदी का है। तकरीबन 25 लाख विद्यार्थियों ने 12वीं क्लास की परीक्षा दी थी। इसमें से तकरीबन 2.70 लाख विद्यार्थी हिंदी में फेल हो गए। यानी 10 फ़ीसदी से अधिक विद्यार्थी 12वीं की हिंदी में भी फेल हो गए। इन दोनों आंकड़ों के अलावा एक तीसरा आंकड़ा भी है जो यह बताता है कि दसवीं और 12वीं के कुल 59.6 लाख विद्यार्थियों में से तकरीबन 2.39 लाख विद्यार्थियों ने हिंदी की परीक्षा ही नहीं दी, परीक्षा छोड़ दी थी।

यह केवल साल 2020 की बात नहीं है कि हिंदी का रिजल्ट बहुत खराब रहा है। साल 2018 और 2019 की स्थिति आंकड़ों के लिहाज से इससे भी कमतर रही है। साल 2018 में हिंदी में फेल होने वालों की संख्या तकरीबन 11 लाख थी। साल 2019 में यह संख्या घटकर 10 लाख हुई। लेकिन यह इतनी भी कमतर नहीं है कि कि यह कहा जाए की हिंदी भाषा के पठन-पाठन में कोई क्रांतिकारी सुधार हो गया है।

इस मुद्दे पर बात करने के लिए सबसे पहले मैंने अपने ही इंटरमीडिएट के शिक्षक ब्रह्मा देव त्रिपाठी का फोन घुमाया। ब्रह्मदेव त्रिपाठी ने इस मुद्दे को बीच में टोककर बोला कि हिंदी नौकरी नहीं दे सकती है और अब कहां कोई हिंदी पढ़ता है। इसके बाद जब बात सिलसिलेवार ढंग से आगे बढ़ने लगी तो उन्होंने कहा कि मैं अपने परिवार से ही शुरू करता हूं। मुझे हिंदी पढ़ाते हुए तकरीबन 30 साल हो गए। मेरे बच्चे हिंदी पढ़ते थे। मुझसे आकर गद्य और पद्य की बातें पूछा करते थे। निबंध लिखा करते थे और निबंध प्रतियोगिताएं जीता करते थे। लेकिन अब मैं दादा बन चुका हूं। मेरे पोते मुझे एक शिक्षक के तौर पर उतनी अधिक इज्जत के भाव से नहीं देखते जितने अधिक मेरे बच्चे देखा करते थे। पहले हिंदी की पत्रिकाएं घर पर आया करती थी। अब अंग्रेजी की पत्रिकाएं आती हैं। पत्रिकाएं भी कम पढ़ी जाती हैं।

अब तो हाथ में इंटरनेट की सुविधा है। पहले जो समय कथा कहानियों को मिलता था। भाषा अपने आप संवरती जाती थी।वह समय अब इंटरनेट पर उपलब्ध फिल्मों को मिलता है, वीडियो गेम को मिलता है, इंटरनेट को मिलता है। इन सबके बाद भी अगर समय बचता है तो पठन-पाठन के लिहाज से अंग्रेजी पर ध्यान दिया जाता है। हिंदी का शिक्षक होने के नाते मैं अपने पोतों के बीच ही खुद को असहाय समझता हूं। मुझे याद नहीं कि कब अपनी पोतों के साथ बैठकर मैंने हिंदी के किसी कथा-कहानी-कविता पर वैसे चर्चा की होगी, जैसा पहले हुआ करता था।  

अब स्कूल की बात करता हूं। मैं ठहरा सरकारी अध्यापक और मैंने 90 के दशक से पढ़ाना शुरू किया है। शिक्षक के तौर पर शुरुआती दौर में मेरी भी इज्जत थी। लेकिन अब देखता हूँ कि हिंदी के शिक्षक के तौर पर यह इज्जत अंग्रेजी, मैथ और साइंस के शिक्षकों से कम हो गयी है। स्कूल खुलता है तो बच्चों की एक खेप हिंदी पढ़ने के लिए क्लास रूम में बैठा करती है। लेकिन इधर कुछ सालों से बहुत कुछ बदला है। जो उत्सुकता मैथ, साइंस और अंग्रेजी के क्लासों में देखी जाती है, वह उत्सुकता हिंदी के क्लासों में नहीं मिलती। सरकारी स्कूलों में भूले भटके अगर गार्जियन आते भी है तो हम हिंदी वाले टीचरों से नहीं मिलते। फिर भी एक बात कहूंगा कि हर साल कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो हिंदी बड़े चाव से पढ़ते हैं, बड़े रस लेकर पढ़ते हैं।

लेकिन अंततः दिक्कत दिख जाती है। मुझे साफ-साफ दिखता है कि हिंदी से उपजी हुई रूचि के पक्ष पर तो विद्यार्थी ध्यान दे रहे हैं लेकिन हिंदी से जुड़ी तकनीकी पहलुओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं । जैसे कथा, कहानी, कविता की बातें उन्हें सुनना अच्छा लगता है लेकिन इनसे जुड़े सवाल- जवाब, पक्ष- विपक्ष, तर्क-वितर्क, विमर्श, व्याकरण बोध को लिखना,पढ़ना , समझना बच्चों को आलस का भरा काम लगता है। अब तो ऐसा है कि अच्छे से अच्छे विद्यार्थी भी साल भर में मुश्किल से एक कॉपी हिंदी के लिए इस्तेमाल नहीं करते।

अगर अपनी बातों को एक लाइन में समेटना चाहूं तो वह यह है कि जितनी अधिक मेहनत 10वीं और 12वीं क्लास का एक विद्यार्थी अंग्रेजी का व्याकरण पढ़ने पर करता है, इस मेहनत का पांच फ़ीसदी हिस्सा भी हिंदी के व्याकरण पर खर्च नहीं करता। अंग्रेजी के कोचिंग क्लासेज हैं और हिंदी स्कूलों से भी बाहर जा रही है। कोई नहीं चाहता कि वह अपने बच्चे को हिंदी मीडियम स्कूल में भेजें। सबकी ख्वाहिश होती है कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर नौकरी हासिल करें। और यह कोई गलत ख्वाहिश नहीं है। बस गलत बात इतनी है कि इस ख्वाहिश को पाने के चक्कर में हिंदी हमसे बहुत दूर जा रही है और हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते कि हम हिंदी के दुराव को कम कर पाएं।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एमएड की पढ़ाई कर रहे शिक्षक नरोत्तम चौहान से इस विषय पर बात हुई। नरोत्तम चौहान का कहना था कि हमारे यहां सभी विषयों के शिक्षकों में ज्यादातर शिक्षक ऐसे हैं जिन्हें यह नहीं पता कि पढ़ाना कैसे है? पढ़ाने की कला क्या है? और इसमें सबसे खराब स्थिति भाषा से जुड़े शिक्षकों की है। भाषा के शिक्षक जितना अधिक जोर पढ़ने पर देते हैं, उतना अधिक जोर लेखन पर नहीं देते हैं। इसलिए बहुत सारे विद्यार्थी खुद को जब पन्नों पर जाहिर करने की कोशिश करते हैं तो बहुत अधिक मुश्किल का सामना करते हैं।

उन्हें समझ में नहीं आता कि वाक्य लिखा कैसे जाएं? शब्दों के साथ बर्ताव कैसे किया जाए? अपने विचारो की शुरुआत कहां से की जाए और अंत कहां पर किया जाए? भाषा अपने लिए अभ्यास की मांग करती है। वाचिक यानी बोलने की शैली में तो अभ्यास सबका होता रहता है लेकिन लेखन की शैली में तब तक भाषा का अभ्यास नहीं हो पता का जब तक किसी का सामना लिखने से नहिओ होता है। इसलिए लिखना मुश्किल हो जाता है, व्याकरण की अथाह गलतियां होती हैं और अंततः परीक्षा में हमारी बातें नहीं जाती बल्कि हमारी कॉपी जाती है।

दिल्ली हिंदी विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉक्टर विजेंद्र मसीजीवी का कहना है कि सत्र की शुरुआत में मैं हमेशा अपने विद्यार्थियों से पूछता हूं कि आप लोगों में से कितने विद्यार्थियों ने हिंदी पढ़ने का चयन अपनी इच्छा से किया है। तो शायद इक्के-दुक्के विद्यार्थी होते हैं, जो यह मानते हैं कि उन्होंने अपनी इच्छा और रुचि से हिंदी पढ़ने का चयन किया है। विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ने वाला बहुत बड़ा तबका गरीब वर्ग से आता है। यहाँ तक कि निम्न मध्यमवर्ग भी चाहता है कि उसके बच्चे हिंदी माध्यम से ना पढ़े।

यह सारी बातें हिंदी को लेकर घनघोर सामाजिक उदासीनता की तरफ इशारा करती हैं। इसलिए हिंदी को लेकर अगर कुछ प्रशासनिक कमियां भी हों या शिक्षण से जुड़ी हुई कमियां भी हैं तो इन्हें दूर करना मुश्किल हो जाता है। विजेंद्र जी ने यह भी कहा कि हिंदी के कई स्तर हैं। जो हिंदी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है, वह हिंदी का साहित्यिक स्तर है। इसमें भी बदलाव करने की जरूरत है। हिंदी का पाठ्यक्रम समय से बहुत पीछे है।

मीडिया के फलने फूलने और हिंदी सिनेमा के विकास के बाद हिंदी के जिस स्वरूप का विकास हुआ है, वह पारंपरिक हिंदी से बहुत अलग है। हिंदी का नया स्वरूप हमें सोशल मीडिया की गलियों में देखने को मिल रहा है। डिजिटल प्लेटफार्म पर देखने को मिल रहा है। नई वाली हिंदी के नाम से आई हिंदी की किताबों में देखने को मिल रहा है। नौजवानों का आकर्षण हिंदी के इस स्वरूप की तरफ बढ़ा है। यह हिंदी भी पाठ्यक्रमों का हिस्सा बननी चाहिए ताकि छात्र अपने समय के साथ जुड़ पाएं।

जहां तक हिंदी से रोजगार की बात है तो हिंदी विषय पढ़ने पर शिक्षण, अनुवाद और मीडिया में रोजगार की संभावनाएं रहती है। यहां पर भी रोजगार पाने के लिए उतनी ही मशक्कत करनी पड़ती है, जितनी कि दूसरों क्षेत्रों में रोजगार पाने के लिए करनी पड़ती है। लेकिन हिंदी के साथ दिक्कत यही है कि मैथ, साइंस, अंग्रेजी पढ़ने के बाद नौकरी ना मिलने पर कोचिंग खोलकर पढ़ाया भी जा सकता है लेकिन हिंदी वालों के साथ यह सहूलियत नहीं है। कहने का मतलब है कि हिंदी के जरिए रोजगार की संभावनाएं बहुत कम हैं।

विजेंद्र जी की बातों से जब नई वाली हिंदी का जिक्र आया तो तो मैंने सोचा कि क्यों ना किसी नई वाली हिंदी के लेखक से इस विषय पर बात की जाए? नीलोत्पल मृणाल डार्क हॉर्स और औघड़ किताब के लेखक हैं। नीलोत्पल मृणाल ने बड़े ही साफ शब्दों में कहा कि हिंदी पढ़ कर ना कलेक्टर बना जा सकता है, ना ही वकील बना जा सकता है, ना ही डॉक्टर बना जा सकता है और ना ही इंजीनियर बना जा सकता है। ऐसे में कोई अंग्रेजी की कोचिंग छोड़कर हिंदी की किताबें क्यों पड़े? हिंदी मीडियम स्कूल में क्यों पढ़ाई करें? इतिहास, भूगोल समाजशास्त्र, विज्ञान अब सब कुछ तो अंग्रेजी में ही पढ़ाया जाता है, ऐसे में हिंदी का रोना क्यों रोया जाए? हिंदी में 8 लाख विद्यार्थी फेल हो गए, यह भावनात्मक बात जरूर हो सकती हैं, लेकिन ऐसी बात भी है जिससे इस देश को कोई फर्क नहीं पड़ता।

और जहां तक रही नई वाली हिंदी की बात तो नई वाली हिंदी क्या है? हम भी रेणु और प्रेमचंद की परंपरा के ही लोग हैं। हम भी आम लोगों की दास्तान को दर्ज करते हैं। बस दिक्कत यही है कि जो संस्थानिक मानक बनाए गए हैं, जहां से क्लिष्ट हिंदी पैदा होती है, जो बोरियत का एहसास कराती है, समाज से कटाव का एहसास कराती है, हम वैसी हिंदी नहीं लिखते। हम हम वैसी हिंदी लिखते हैं जिसे हम लोग बोलते हैं। जो पंचायतों के बैठक में बोली जाती है, जो हिंदी के अखबारों में छपती है। जो सोशल मीडिया की गलियों में युवाओं क्रिएटिविटी की पहचान बन रही है, जिस हिंदी में प्रवाह है, सरसता है, आकर्षण है।

इस हिंदी को बहुत सारे नौजवान पसंद कर रहे हैं। समय बदला है। इस समय का विषय भी बदला है। नई वाली हिंदी भी संवेदनशीलता पैदा करने का काम ही करती है। मानव को और अधिक बनाने का ही काम करती है। नई वाली हिंदी को हिंदी के पाठ्यक्रमों शामिल किया जाना चाहिए। हिंदी रुका हुआ पानी बन चुकी है। इसमें जब ताजा पानी डाला जाएगा, तभी गतिशीलता आएगी। इसलिए 8 लाख बच्चों का हिंदी में फेल हो जाना केवल हिंदी के शैक्षणिक माहौल पर सवाल नहीं खड़ा करता बल्कि हिंदी के मौजूदा पाठ्यक्रम पर भी सवाल खड़ा करता है।

कई सारे मसलों पर मुखर रहने वाले हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर लक्ष्मण से भी बात हुई। डॉक्टर लक्ष्मण का कहना है कि स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के भारतीय भाषाओं और हिंदी के पाठ्यक्रमों और शिक्षण पद्धतियों को देखने में ही ऐसा लगता है कि हम केवल औपचारिकता निभा रहे हैं। नई पीढ़ी अपने बच्चों को वैकल्पिक विषय के तौर पर तो हिंदी पढ़ा रही है लेकिन मुख्य विषय के तौर पर हिंदी नहीं पढ़ने देना चाहती। हिंदी का आकर्षण खो गया है। पाठ्यक्रमों के लिहाज से हिंदी किसी पुरा प्राचीन काल का पाठ्यक्रम लगती है। कथा-कहानी-कविता-उपन्यास की किताबें बिकना बंद हो गयी है। हमें हिंदी में फेल हो रहे विद्यार्थियों की संख्या रोकनी है तो हिंदी का आकर्षण पैदा करना पड़ेगा। बोरिंग शिक्षण पद्धति बदलनी पड़ेगी। पाठ्यक्रम को रुचिकर बनाना होगा। अफसोस की बात है कि इस पहलू पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हो रही है।  

इस तरह से हम देख सकते हैं कि हिंदी में फेल हुए आठ लाख विद्यार्थी केवल केवल सरकार की नाकामी का रिजल्ट नहीं है बल्कि उस व्यवस्था और जीवन चिंतन के नाकामी भी रिजल्ट है  जिसमें हम जी रहे हैं।

UttarPradesh
UP Result
School Result
fail in hindi in up exam
hindi
8 lakh students fail in Hindi
education system

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी

कुपोषित बच्चों के समक्ष स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौतियां

रचनात्मकता और कल्पनाशीलता बनाम ‘बहुविकल्पीय प्रश्न’ आधारित परीक्षा 

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने वाले सैकड़ों शिक्षक सड़क पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?

मोदी जी! विकलांग को दिव्यांग नाम नहीं, शिक्षा का अधिकार चाहिए

यूपी: रोज़गार के सरकारी दावों से इतर प्राथमिक शिक्षक भर्ती को लेकर अभ्यर्थियों का प्रदर्शन

प्रधानमंत्री की 'परीक्षा पर चर्चा' से उन बच्चों की परेशानियों का कोई जिक्र नहीं जो चाय बेचकर परीक्षा देते हैं!

सैनिक स्कूल पर भाजपा का इतना ज़ोर देना क्या जायज़ है?

अपनी भाषा में शिक्षा और नौकरी : देश को अब आगे और अनीथा का बलिदान नहीं चाहिए


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License