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अफ़ग़ानिस्तान संकट के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद ज़िम्मेदार 
ऐप्सो की बिहार राज्य परिषद की ओर से 'समकालीन विश्व परिदृश्य में अफगान संकट' पर विमर्श का आयोजन किया गया। इस विमर्श में अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद की स्थितियों  के  विश्व परिदृश्य तथा  भारत की चिंताओं व सरोकारों पर विचार किया गया।
अनीश अंकुर
03 Sep 2021
अफ़ग़ानिस्तान संकट के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद ज़िम्मेदार 

पटना: अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन (ऐप्सो) की बिहार राज्य परिषद की ओर से 'मैत्री शांति भवन'  में ‘समकालीन विश्व परिदृश्य में अफगान संकट’ पर विमर्श का आयेजन किया गया। इस विमर्श में अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद की स्थितियों  के  विश्व परिदृश्य तथा  भारत की चिंताओं व सरोकारों पर विचार किया गया। इस कार्यक्रम में शहर के बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी  आदि इकट्ठा हुए।

सोवियत संघ के खिलाफ तालिबान का इस्तेमाल किया गया: जयप्रकाश, युवा संस्कृतिकर्मी 

विषय प्रवेश करते हुए  युवा  संस्कृतिकर्मी  जयप्रकाश ने कहा "अफगानिस्तान में पिछले बीस सालों से अमेरिका काबिज था।  ओसामा बिन  लादेन को खोजने के बहाने अमेरिकी सेना घुसी और इस दौरान लाखों लोग मारे गए। लेकिन अब उसे उसी तालिबान के हवाले कर दिया और खुद छोड़कर भाग गए।  आज अफगानिस्तान के हालात बेहद खराब हैं। अर्थव्यस्था तबाह है, समाज अस्तव्यस्त है। जो  भयावह दृश्य हमने देखा कि कैसे हवाई जहाज से गिर कर लोगों की मौत हो गई। हम सब जानते हैं सोवियत संघ को अफगानिस्तान से भगाने के लिए तालिबान को खड़ा किया गया था।  कैसे कम्युनिस्ट सरकार के प्रभाव को खत्म किया जाये इस चक्कर मे अमेरिका ने पूरे इलाके को तहस-नहस कर दिया। इस दौरान अमेरिका ने अफगानिस्तान में लगभग 3 ट्रिलियन पैसा खर्च किया। यह पैसा ज्यादातर हथियार बनाने वाले कंपनियों के पास गया।" 

भारत की विदेश नीति अमेरिका के हाथों गिरवी रख दी गई है: सर्वोदय शर्मा, बिहार राज्य महासचिव, AIPSO 

बिहार ‘ऐप्सो’ के महासचिव सर्वोदय शर्मा ने अपने संबोधन में कहा “अफगानिस्तान में भू-राजनीतिक हितों की खातिर अमेरिकी साम्राज्यवाद ने सोवियत शासन को समाप्त करने के बाद  जो  जहरीला बीज बोया उसका परिणाम अब भुगतना पड़ रहा है। अलकायदा आज भले अफगानिस्तान में कमजोर लगता है लेकिन विभिन्न नामों से जैसे इस्लामिक स्टेट के नाम से सक्रिय है। अमेरिका कई सालों से तालिबान से संपर्क में था। हमारा विरोध तालिबानी मानसिकता से है। यदि अफगानिस्तान में तालिबान की ताकत बढ़ी है, तो वहां की औरतों, बच्चों व बुजुर्गो पर कहर बढ़ता जाएगा। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार भारत के जो चन्द मुसलमान खुशी मना रहे हैं वे दरअसल तालिबान को आगे बढ़ा रहे हैं। साथ ही यदि कोई धर्म के नाम और मुसलमान को तंग करता है तो वह भी एक तरह से तालिबान को ही आगे बढ़ा रहे हैं। भारत की विदेशनीति चूंकि अमेरिका के हाथों गिरवी रख दी गई है इस कारण भारत भी संकट में पड़ गया है।”

अमीर आदमी का आतंकवाद दिखाई नहीं देता: बिद्युतपाल, संपादक,  अंग्रेज़ी पाक्षिक,  बिहार हेराल्ड

अंग्रेज़ी साप्ताहिक ‘बिहार हेराल्ड’ के सम्पादक बिद्युतपाल ने अपने सम्बोधन में कहा, “1991 में अमेरिका के नेतृत्व में ये कहा जाने लगा कि पूंजीवाद ही मानवजाति की समस्याओं का समाधान करेगा, अब समाजवाद की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इस घोषणा के आठ साल बाद ही दक्षिण एशियाई टाइगर– फिलीपीन्स, मलेशिया आदि देश– कहे जाने वाले मुल्क औंधे मुंह गिर पड़े।  इसके बाद फिर 2008 में विश्व्यापी मंदी आई। अब तक साम्राज्यवाद को हम 'जी-8' के  रूप में देखते आये थे, लेकिन अब वह विश्व वित्तीय पूंजी के कारण पूरी दुनिया मे फैल गया है। इस आर्थिक मंदी के कारण दुनिया के कई देशों में दक्षिणपंथी सरकारें आ गई हैं। लेकिन अब इन सरकारों के कारण पूरी दुनिया मे संघर्ष शुरू हो गया है। अभी भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार के ख़िलाफ़ नौ महीनों से किसानों का आंदोलन चल रहा है। जब दुनिया का परिदृश्य बदलने की स्थिति में है, ऐसे नाजुक मुकाम पर अफगानिस्तान में तालिबान आ बैठा है। आतंकवाद के खिलाफ पूंजीवाद नहीं लड़ सकता। अमीर आदमी का आतंकवाद किसी को भी नहीं दिखाई देता है, लेकिन गरीब आदमी का आतंकवाद सबको दिखाई देने लगता है।  इसके लिए आवश्यक है कि जनता की बुनियादी समस्याओं का समाधान किया जाए। तालिबान एक सिग्नल है कि यदि आपने संघर्ष नहीं किया तो इस किस्म का शासन देखने को मिलेगा। आतंकवाद तो देन ही इन लोगों का है। बीसवीं सदी में मुस्लिम देशों के जनतान्त्रिक नेताओं की हत्या कर, जेल में डाल कर इस्लामिक स्टेट जैसी ताकतों को बढ़ावा दिया गया। अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एक ढ़ोंग है।”

भारत और  अफ़ग़ानिस्तान में दोनों जगह धर्म के नाम पर शासन: इरफान अहमद फातमी, राज्य महासचिव, ऑल इंडिया तंजीम-ए-इंसाफ

ऑल इंडिया तंजीम-ए-इंसाफ के बिहार  राज्य महासचिव इरफान अहमद फातमी के अनुसार, “ईरान की इस्लामी क्रांति और अफगानिस्तान में तालिबान इन दोनों को समझना चाहिए। आखिर तालिबान अफगानिस्तान में ही क्यों आया?  पाकिस्तान में क्यों नहीं? यदि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर यदि हम लोकतंत्र हैं तो हमारा क्या पक्ष है। तालिबान अल्लाह के नाम पर बात करने का दावा करता है। भारत और  अफगानिस्तान में कोई ज्यादा फर्क नहीं है क्योंकि दोनों जगह की सरकारें  धर्म के नाम पर राज करना चाहते हैं। अफगानिस्तान में इस्लाम के नाम पर और भारत में हिन्दू के नाम पर करना चाहते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि वे पश्तो बोलते हैं जबकि हम हिंदी बोलते हैं। पूरे एशिया में वंचित लोगों पर तालिबान एक सवाल है। दुनिया मे धार्मिक लोगों ने धर्म के नाम पर हिंसा को अंजाम दिया है।”

आम आदमी के मसअलों को सामने लाना होगा:  ग़ालिब खान, सिटीजन्स फोरम 

सिटीजन्स फोरम, पटना से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ग़ालिब खान  ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “अफगानिस्तान पर बहुत जजमेंटल होकर लिखा जा रहा है। वहदत और सूफीज्म के बगैर अफगानिस्तान को  समझा नहीं जा सकता है। यदि अफगान पर बात करनी है तो अब्दुल गफ्फार खान को आगे रखना होगा। हमें लोगों के आम आदमी के मसअलों को सामने लाना होगा। अफगानिस्तान मामले में हमारा समर्थन अफगानियों को मिलना चाहिए।"

तालिबान आज अफ़ग़ानिस्तान का सच है:  सर्वेश, लेखक व शिक्षक 

सर्वेश कुमार के अनुसार, “तालिबान आज अफगानिस्तान का सच है। इसे हमें स्वीकार करना होगा। अफगानिस्तान को अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के संकट के मध्य देखना होगा। मध्यपूर्व में हमारे हित चीन, रूस के साथ टकराता है। यहां हमारी दुविधा सामने आती है। अफगानिस्तान मामले में हमारा समर्थन अफगानियों को मिलना चाहिए। हमें सही समय का इंतज़ार करना चाहिए। अफगानिस्तान में 42 प्रतिशत यदि पश्तो हैं तो ताजिक, हजारा आदि लगभग 47 प्रतिशत  हैं। अफगानिस्तान अब सिविल वार की ओर बढ़ता जा रहा है।”

अफ़ग़ानिस्तान मुस्लिम समाज के लिए एक सवाल- कमलेश शर्मा, सी.पी.आई (एम-एल-लिबरेशन)

भाकपा-माले (लिबरेशन) से जुड़े नेता कमलेश शर्मा ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “अफगानिस्तान पूरे लोकतंत्र के लिए चुनौती है। पूरे मुस्लिम समाज के अंदर एक सवाल है। उनके अंदर तालिबानी सोच न जड़ें जमा ले, इसे लेकर बेहद सतर्क रहना होगा। मुस्लिम समाज के अंदर भी यह बात होनी चाहिए कि आप किधर खड़े हैं। उस विचारधारा को खाद-पानी देने का काम नहीं होना चाहिए।”

अफ़ग़ानी जनता की सांस्कृतिक भूख उन्हें फिर से खड़ा करेगी: रवींद्रनाथ राय, राज्य महासचिव, ISCUF (इंडिया सोसायटी फ़ॉर कल्चरल कोऑपरेशन एन्ड फ़्रीडम)

रवींद्र नाथ राय ने सभा मे कहा, “मुझे अफगानिस्तान जाने का मौका मिला है। तब सोवियत फौज थी लेकिन उसके बावजूद एक आजादी थी। काबुल विश्विद्यालय में लड़कियों को मैन स्कर्ट पहने देखा है। अफगानिस्तान में जब एक संगीत कार्यक्रम में गया तो देखा कि लोग दीवार पर चढ़कर भारतीय ग़ज़लों को सुनने के लिए आतुर थे। आज अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसे समझना  इतना आसान नहीं है। प्राचीन काल से अफगानिस्तान का इलाका महत्वपूर्ण रहा है। जो भी ताकतवर देश रहे हैं उनकी वहां के  संसाधन के ऊपर निगाह रही है। अफगानिस्तान की जनता का क्या होगा यह कोई नहीं सोच रहा है। अफगानिस्तान की जनता की जो सांस्कृतिक भूख है वह फिर से अपनी लड़ाई लड़ेगी।"    

अफ़ग़ानिस्तान  के बहाने चीन को घेरने की साजिश: सुनील सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता

सामाजिक कार्यकर्ता सुनील सिंह ने अपने संबोधन में कहा, “अफगानिस्तान के बहाने चीन को घेरना चाहता है। भारतीय मीडिया अमेरिका के पूंजीवादियों के पाप को छुपाना चाहता है। अमेरिका अफगानिस्तान में हारा नहीं है बल्कि अपना अजेंडा लागू कर रहा है। वियतनाम की तरह अमेरिका अफगानिस्तान में पराजित नहीं हुआ है। वहां जो प्रगतिशील सुधार चला, वह शहरों तक ही केंद्रित रहा, वह  देहातों तक नहीं गया। जब वहां विज्ञान, तर्क की पढ़ाई हो रही थी, उनको लगा कि अब मूलभूत परिवर्तन हो रहा है। उस तर्क व विज्ञान की दुनिया को नष्ट करने के लिए प्रतिक्रियावादी शक्तियों को बढ़ावा दिया गया। जिस अरब मुल्क ने दुनिया को ज्ञान-विज्ञान की दुनिया मे 9 वीं से 12 वीं शताब्दी तक एक से एक योगदान दिया वह क्यों इस तरह से प्रतिक्रिया के गढ़ में तब्दील हो गया।  यह विचारणीय है।”

पूरे अरब में  प्रगतिशील शक्तियों को खत्म किया गया-  अरुण मिश्रा, केंद्रीय समिति सदस्य, सीपीआई (एम)

सभा की अध्यक्षता करते हुए माकपा केंद्रीय समिति के सदस्य अरुण मिश्रा ने कहा, “हम साम्राज्यवाद को समझे बगैर अफगानिस्तान को नहीं समझ सकते। सोवियत रूस के जाने  के बाद जो स्थिति थी अब भी वही बात है। उसके पहले भी प्रगतिशील शक्तियों के खिलाफ माहौल था। इस पूरे इलाके में प्रगतिशील शक्तियों को खत्म कर दिया गया। इराक में सद्दाम हुसैन ने वैसे तो कम्युनिस्टों को मारा लेकिन जब तेल का राष्ट्रीयकरण किया तो साम्राज्यवाद को बहुत बुरा लगा। अफगानिस्तान में जब भी सुधार करने की कोशिशें हुई । जब अमानुल्लाह खान  जब अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बना और दुनिया की यात्रा और गए। उस दरम्यान फ्रांस के राष्ट्रपति ने अमानुलान कहां जी पत्नी बिना बुर्के के चली गई। उसकी तस्वीर खींचकर ब्रिटिश इंटेलीजेन्स ने अफगानिस्तान में प्रसारित करवा दिया। इसका इस्तेमाल वहां  की रियेक्शनरी  ताकतों ने किया।"  

फ़िल्म अभिनेता राकेश राज ने इस मौके पर गौहर रजा की अफगानिस्तान पर लिखी कविता  का पाठ किया।

अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन ‘ऐप्सो’ की बिहार राज्य परिषद द्वारा इस सभा मे मौजूद प्रमुख लोगों में थे गोपाल शर्मा, नीरज कुमार , तारकेश्वर ओझा, अभिषेक कुमार, पुष्पेंद्र शुक्ला, सुशील उमाराज, सीमा सिंह, कौशल किशोर झा, भोला पासवान, मीर सैफ अली, ओसामा खुर्शीद, रामजी यादव, कपिलदेव वर्मा, अशोक कुमार सिन्हा, हेमन्त आदि ।

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