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यूक्रेन विवाद: अमेरिका ने रूस को बाहर निकलने का रास्ता दिखाया
अगर पुतिन पीछे हटते हैं तो यह उनकी "मज़बूत नेता" वाली छवि को नुकसान पहुंचाएगा। इसका असर 2024 में होने वाले रूस के राष्ट्रपति चुनावों पर पड़ सकता है।
एम. के. भद्रकुमार
04 Jan 2022
 Joe Biden
राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 30 दिसंबर, 2021 को अपने रूसी समकक्ष व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बात की। 

पुतिन ने गुरुवार को जो बाइडेन के साथ 50 मिनट तक फोन पर बात की। अब देखने लायक होगा कि आगे मास्को किस तरह का रास्ता अख्तियार करता है। क्योंकि लंबी तनातनी के बाद, जल्द मधुरता पर आना कठिन होता है।

वाशिंगटन ने दावा किया कि यह बातचीत पुतिन की अपील के बाद हुई थी। मतलब रूस फिलहाल रक्षात्मक मुद्रा में है।

बैठक के बाद जारी किए गए रूसी दस्तावेज में कहा गया कि आगे जनवरी के दूसरे हफ़्ते में रूस की अमेरिका, नाटो और ओएससीई (यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग संगठन) से क्रमशः  बातचीत होगी। "इसका उद्देश्य रूस को वैधानिक तौर पर बाध्य सुरक्षा गारंटी उपलब्ध कराना होगा।" लेकिन फिलहाल अमेरिका किसी भी तरह का वायदा नहीं कर रहा है।

दस्तावेज कहता है कि "बाइडेन ने साफ कहा है कि वाशिंगटन का यूक्रेन में आक्रामक हथियारों की तैनाती का कोई विचार नहीं है।" लेकिन अमेरिका द्वारा जारी किए गए वक्तव्य में इसका कोई जिक्र नहीं है। बल्कि बातचीत की पृष्ठभूमि पर बुलाई गई प्रेस वार्ता में एक अधिकारी ने साफ कहा कि "जहां तक मंशा की बात है, उसके ऊपर कोई घोषणा नहीं हुई है।"

उस अधिकारी ने जोर देकर कहा कि रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने की स्थिति में, रूस को इसकी कीमत चुकानी होगी, जो आर्थिक तौर पर हो सकती है, इलाके में मित्र देशों में नाटो फौजों की तैनाती हो सकती है, यूक्रेन को अतिरिक्त माद्दा के रूप में भी यह मदद हो सकती है।"

रूसी पक्ष ने जोर देकर कहा कि पुतिन ने बाइडेन को कहा है कि अगर बड़े स्तर के प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो वह "बहुत बड़ी गलती होगी, जहां अमेरिका रूस के संबंध पूरी तरह टूटने की भी संभावना है।" रूसी मीडिया ने इस बात पर खास जोर दिया है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी दस्तावेज आखिर में कहता है, "बातचीत (जेनेवा) में कोई भी प्रगति तभी हो सकती है जब  तनाव को बढ़ाए जाने के बजाए घटाया जाए।

सुरक्षा गारंटी के मुख्य मुद्दे पर रूस की तरफ से युरी उसाकोव ने इतना ही कहा, "हां, मुझे ऐसा लगता है कि वाशिंगटन रूस की चिंताओं को समझता है, हालांकि अमेरिका की अपनी चिंताएं हैं।" जबकि इसके उलट अमेरिकी अधिकारी ने किसी भी तरह की सुरक्षा गारंटी पर चर्चा नहीं की।

जहां तक अमेरिकी पक्ष की बात है तो नाटो से जुड़े मुद्दों पर "हमारी स्थिति बिल्कुल साफ है कि इन फैसलों को संप्रभु राज्यों द्वारा लिया जाना है, जिसमें स्वाभाविक तौर पर गठबंधन के साथ विमर्श शामिल होगा, इसका फैसला दूसरे लोग नहीं करेंगे।" सीधे शब्दों में कहें तो  नाटो के विस्तार या यूक्रेन की नाटो सदस्यता पर रूस को अपना मत रखने का कोई अधिकार नहीं है।

कुल मिलाकर बाइडेन ने पुतिन को हटने के रास्ते बताए हैं। व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि " बाइडेन ने पुतिन को दो रास्ते बताए हैं, जो इस मुद्दे पर अमेरिका के दो कार्रवाई के तरीकों को बताते है, यह दोनों ही तरीके रूस के क़दमों पर होने वाली प्रतिक्रिया हैं।"

उन्होंने कहा, "एक तरीका कूटनीति का है, जो तनाव को कम करेगा। दूसरा तरीका भयादोहन पर ज्यादा केंद्रित है, जिसके तहत यूक्रेन पर हमला करने की स्थिति में रूस को बड़ी क़ीमत चुकानी होगी।"

वाशिंगटन का अनुमान है कि वह ज्यादा प्रभावी स्थिति से मॉस्को से बातचीत कर रहा है। हाल के दिनों में पुतिन द्वारा शांति बनाए रखने वाली बातों ने अमेरिकी लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि पुतिन बाहर निकलने की रणनीति खोज रहे हैं।

इस बीच अमेरिका अपने यूरोपीय साथियों को एकजुट करने में कामयाब रहा है। अमेरिका का कहना है कि वो इन सहयोगियों  के बीच समन्वय और पारदर्शिता को प्रबंधित करने की पूरी कोशिश करेगा।

वाशिंगटन ने बाइडेन कि फोन पर वार्ता के पहले शक्ति प्रदर्शन भी किया था। अमेरिका का परमाणु शक्ति संपन्न एयरक्राफ्ट कैरियर एच एस ट्रूमैन और इसके सहयोगी जंगी जहाज ग्रीस और इटली के बीच तैनात हो चुके हैं। 27 दिसंबर को अमेरिका के जासूसी जहाज़ जे स्टार्स ई-8 ने यूक्रेन के ऊपर मैदानी जानकारी इकट्ठा करने के लिए उड़ान भरी थी।

दो दिन बाद इस विमान ने फिर उस इलाके का दौरा किया। यह पहली बार है जब अमेरिका रूसी तैनाती पर इतने खुल्लेआम जानकारी इकट्ठा कर रहा है। यह मिशन यूक्रेन सरकार की अनुमति से किया गया था।

हाल के हफ्तों में अमेरिकी विचारकों ने प्रचुर मात्रा में अपना विश्लेषण किया है, जिनसे पता चलता है कि अमेरिका खुद को हर स्थिति में जीता हुआ देख रहा है।  ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट रूस की मांगों को पूरी तरह खारिज करता हुआ नजर आता है। इन मांगों को संस्थान विचार करने के लिए भी विचित्र मानता है। वॉशिंगटन में विश्लेषक रूस की तरफ से दो तरह में से एक कार्रवाई करने का अंदाजा लगा रहे हैं। उनका सोचना है कि या तो रूस पूरे यूक्रेन पर हमला करेगा या फिर सीमित हमला करेगा और डोंबास में अपनी सेना की तैनाती करेगा।

अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट और स्टडी ऑफ वार्स द्वारा बनाई गई एक रिपोर्ट में बाद वाले विकल्प को तरजीह दी गई है। इस रिपोर्ट को बनाने वाले विशेषज्ञों का नेतृत्व फ्रेडरिक कागन कर रहे हैं, जो राज्य की अंडर सेक्रेटरी विक्टोरिया नुलांद के पति हैं।

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि "इस सर्दी में पुतिन द्वारा बेलारूस में सेना तैनात किए जाने की बहुत संभावना है... इस तरह का कदम बाल्टिक सागर में तैनात नाटो फौजों के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। यह फौजें यहां भविष्य के किसी रूसी हमले से बचाव के लिए तैनात की गई है। बेलारूस में रूसी सेना की तैनाती से इसलिए नाटो की दिक्कतें बढ़ जाएंगी, क्योंकि तब बेहद पतले सुवॉकी कॉरिडोर के दोनों तरफ रूस की मौजूदगी हो जाएगी। यह वह कॉरिडोर है, जहां से नाटो बाल्टिक राज्यों को अपनी रसद पहुंचाता है। इसके अलावा रूस पोलैंड की सीमा पर भी सैनिकों की संख्या बढ़ाएगा, ताकि नाटो के पूर्वी धड़े पर दबाव बढ़ जाए।"

17 दिसंबर को रूस अपनी वैधानिक सुरक्षा गारंटी की मांग की सार्वजनिक घोषणा कर चुका है, इसलिए उसे इनपर केंद्रित रहना होगा। अमेरिका का मानना है कि किसी भी स्थिति में पुतिन नुकसान में ही रहेंगे।

बल्कि अगर पुतिन अपने कदम पीछे हटा लेते हैं, तो उनकी मजबूत व्यक्तित्व वाली छवि को धक्का लगेगा। इसका प्रभाव रूस में 2024 में होने वाले चुनावों पर पड़ सकता है।

बदतर यह होगा कि पश्चिम अपनी मौजूदा "सलामी रणनीति" को ज्यादा खुलकर लागू करने के लिए प्रेरित होगा। इस रणनीति में यूक्रेन को लगातार नाटो की तरफ खींचा जा रहा है, वहीं रूस की सीमा पर लगातार सैन्य तैनाती बढ़ाई जा रही है।रूस की स्थिति को थोड़ा खराब करना अंतरराष्ट्रीय अमेरिकी हितों के लिए अच्छा है। 

दिलचस्प है कि अमेरिका "चीन की स्थिति" को यहां गंभीरता से नहीं लेता।अमेरिका की चीन से टकराव की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जहां शीत युद्ध की तरह का विवाद उपजने की संभावना है, अमेरिका को पूरा भरोसा है कि चीन इस संकट में सैन्य टकराव मोल नहीं लेगा, क्योंकि 2022 की दूसरी अर्धवार्षिक में कम्युनिस्ट पार्टी की 20 वीं बैठक होनी है।

अमेरिकी विशेषज्ञों में आम सहमति है कि चीन का प्रशासन पूरी तरह राष्ट्रपति शी जिनपिंग का पार्टी में आधार बनाए रखने, आने वाली बैठक और जिनपिंग के तीसरे चुनाव पर केन्द्रित है, जो चीन के राजनीतिक इतिहास में माओ जेडोंग के बाद सबसे बड़ी घटना होगी।

यहीं बड़ा खतरा है: अमेरिका में नवंबर में चुनौतीपूर्ण मध्यकालीन चुनाव होने हैं, जिसमें बाइडेन का हारना लगभग तय है। यहां बाइडेन रूसी कार्ड का इस्तेमाल कर अपना आधार बढ़ाने की कोशिश करेंगे। इस कार्ड पर अमेरिका में हर तरफ से समर्थन मिलता है। रणनीतिक तरीके से देखें तो इससे अमेरिका की ट्रांस अटलांटिक नेतृत्व को भी फायदा होगा।

यहां रूसी नेतृत्व के सामने एक अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। एक तरफ, इतना आगे बढ़ जाने के बाद वापस लौटना मुश्किल है। दूसरी तरफ, अगर मौजूदा स्थिति को बरकरार रहने दिया जाता है तो नाटो का रूस को अपने इशारे पर नचाने का सपना पूरा होता है।

लेकिन यहां एक चीज को पूरे तरीके से नजरअंदाज किया जा रहा है। दरअसल यूक्रेन में भी सत्ता संघर्ष चल रहा है। राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने हाल में अपने पूर्ववर्ती, पेट्रो पोरोशेंको को देशद्रोह के आरोप में जेल में डालने का कदम उठाया।

पेंडोरा पेपर्स में पता चला था कि जेलेंस्की ने ऑफशोर कंपनियों का एक जाल बनाया था, और उनके पुराने बिजनेस साझेदार व नियोक्ता,  ईहोर कोलोमॉयस्क्यि ने कथित तौर पर शेल कंपनियों द्वारा 5.5 बिलियन डॉलर की लॉन्ड्रिंग की।  कोलोमॉयस्क्यि  , यूक्रेन के बैंकिंग और मीडिया दिग्गज हैं। उनके ऊपर अमेरिका ने प्रतिबंध भी लगाया हुआ है।

सितंबर में कीव में किसी ने सेरहिय शेफिर की हत्या करने की कोशिश की थी। शेफिर, जेलेंस्की के दोस्त और व्यापार साझेदार हैं, ऐसा माना जाता है कि उन्होंने ही जेलेंस्की और दूसरे लोगों के लिए ऑफशोर कंपनियों  का तंत्र तैयार किया था।

इस बीच, तत्कालीन उपराष्ट्रपति बाइडेन के बेटे हंटर के यूक्रेन की एक भ्रष्ट कंपनी और उसके मालिक के साथ सीधे संबंध का मामला भी शांत नहीं हुआ है। फोर्ब्स मैगज़ीन ने हाल में लिखा, "यह अब आम समझ है कि हंटर के विदेश संबंधों ने यूक्रेन में अमेरिका के विदेश नीति संबंधों को नुकसान पहुंचाया है।"

यूक्रेन में आंतरिक और विदेशी राजनीति में होने वाले बदलावों को गंभीरता से लेना होगा। ये अमेरिकी धारणाओं में "छूटे हुए तथ्य" साबित हो सकते हैं। भले ही बाइडेन प्रशासन इनकी अनदेखी कर रहा हो, पर मॉस्को की इन पर कड़ी नज़र होगी।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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