NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
यूरोप
रूसी तेल की चिकनाहट पर लड़खड़ाता यूरोपीय संघ 
तेल निर्यात करने वाले अंतराष्ट्रीय संगठन ओपेक ने यूरोपीय संघ को इस बात की चेतावनी दी है कि प्रतिबंधों के कारण संभावित रूप से हाथ से निकल चुके 7 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) से ज़्यादा रूसी तेल और अन्य तरल निर्यात की जगह ले पाना असंभव होगा।
एम. के. भद्रकुमार
13 May 2022
oil

यूरोपीय संघ के अधिकारी इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि वे रूस के ख़िलाफ़ तेल प्रतिबंध लगाने वाले हैं। रविवार को फ़्रांस के पारिस्थितिक संक्रमण मंत्री बारबरा पॉम्पिली को इस बात का भरोसा था कि "हम इस हफ़्ते के आख़िर तक (एक समझौते पर) पहुंच जायेंगे।"   

लेकिन, पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) ने यूरोपीय संघ को इस बात की चेतावनी दी है कि प्रतिबंधों के कारण संभावित रूप से हाथ से निकल चुके 7 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) से ज़्यादा रूसी तेल और अन्य तरल निर्यात की जगह ले पाना असंभव होगा। 

जो अहम बात सामने नहीं आ पायी है, वह यह है कि तेल उत्पादन बढ़ाने को लेकर ओपेक पर पश्चिमी देशों के अनुरोध को इसलिए अनसुना नहीं किया जा रहा है कि इसके पीछे कोई कूटनीतिक अनिच्छा है, क्योंकि तेल और गैस उद्यमों में कम निवेश के चलते उच्च वृद्धि को लागू करने में इस समूह की वास्तविक अक्षमता है। इस समूह ने घटती अतिरिक्त क्षमता वाले ओपेक प्लस के सदस्य देशों (सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के अपवाद के साथ)  को उनके हाल पर छोड़ दिया है। हक़ीक़त यह है कि मार्च में ओपेक प्लस के उत्पादन में 13 महीनों में पहली बार गिरावट दर्ज की गयी थी और इस समय गठबंधन की कोटा प्रणाली के तहत उत्पादन तक़रीबन 1.48 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया है।   

रूस सहित ओपेक प्लस के सदस्य राष्ट्र कोविड-19 महामारी के चरम पर पहुंचने के दौरान उत्पादन में की गयी कटौती के क्रमिक रूप से बढ़ाये जाने के हिस्से के रूप में मई में प्रति दिन तक़रीबन 432,000 बैरल उत्पादन बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। वाशिंगटन में इस बात को लेकर भीतर ही भीतर ग़ुस्सा है कि सऊदी अरब और यूएई उत्पादन को बढ़ाने से परहेज़ कर रहे हैं। इसलिए, इन देशों को दंडित करने के लिए अमेरिकी क़ानून के रूप में 15 वर्षीय डैमोकल्स के उपाय, यानी उस नोपेक बिल पर नये सिरे से बात हो रही है, जिसका मक़सद उस संप्रभु प्रतिरक्षा को रद्द करने वाले मौजूदा एकाधिकार व्यापार विरोधी क़ानून को संशोधित करना है, जिसने लंबे समय से ओपेक और उसकी राष्ट्रीय तेल कंपनियों को अमेरिकी संघीय अदालतों में मुकदमों से बचाया हुआ है। 

अगर इस क़ानून को आख़िरी रूप से अधिनियमित कर दिया जाता है, तो अमेरिकी अटॉर्नी जनरल तेल उत्पादक संघ या उसके सदस्य देशों-सऊदी अरब या संयुक्त अरब अमीरात पर संघीय अदालत में मुकदमा चलाने की क्षमता हासिल कर लेगा।(ओपेक का ही विस्तारित रूप ओपेक प्लस के रूप में जाने जाते समूह के रूस जैसे उत्पादक देश उत्पादन को रोकने का काम करता है, उस पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है।) लेकिन, ऊर्जा महाशक्तियों को यह बात अच्छी तरह पता है कि इस ख़तरे का कोई मतलब इसलिए नहीं है, क्योंकि अमेरिका शर्तों को निर्धारित करने की स्थिति में ही नहीं है। सही बात तो यह है कि जब अमेरिकी कांग्रेस ने 2007 में इस विधेयक के एक प्रारूप को पारित कर दिया था, लेकिन वह तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की वीटो धमकी के आगे दम तोड़ गया था। बुश ने तब कहा था कि इससे तेल आपूर्ति में बाधा पैदा हो सकती है और साथ ही साथ "अमेरिकी हितों के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई" भी हो सकती है।

बुश को जिस "जवाबी कार्रवाई" की आशंका थी, उससे राष्ट्रपति बाइडेन को और भी ज़्यादा ख़ौफ़ खाना चाहिए, क्योंकि उस जवाबी कार्रवाई में आज अपने तेल व्यापार को लेकर डॉलर के इस्तेमाल को ख़त्म करने के सिलसिले में वह सऊदी प्रतिशोध भी शामिल हो सकता है, जिससे निश्चित ही रूप से दुनिया की मुख्य आरक्षित मुद्रा के रूप में डॉलर की स्थिति को घातक रूप से कमज़ोर कर देगा और वैश्विक व्यापार में अमेरिकी प्रभाव को भी बहुत हद तक कम कर देगा। 

कुछ हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि सऊदी वाले पहले से ही बीजिंग के साथ अपने तेल व्यापार के कुछ हिस्से के लिए स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को लेकर बातचीत कर रहे हैं। यह एक ऐसी बात है, जिसे चीन भी चाहता है। दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में एक टिप्पणी में जाने-माने चीनी राजनीतिक विचारक झांग वेईवेई ने अमेरिका के सख़्त प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि में रूसी सेंट्रल बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार को फ़्रीज करने और रूस को स्विफ़्ट इंटरनेशनल सेटलमेंट सिस्टमरूस से हटाने की पृष्ठभूमि के खिलाफ बीजिंग में एक नई सोच के पक्ष में ज़ोरदार तर्क दिया है। प्रोफ़ेसर झांग ने लिखा है:  

“प्राकृतिक गैस और अन्य कच्चे माल को रूबल से जोड़ने के मौजूदा (रूसी) निर्णय को अमेरिकी डॉलर के आधिपत्य के ख़िलाफ़ एक क्रांति कहा जा सकता है। यह बेहद प्रेरणादायक है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (क्रय शक्ति समानता के आधार पर) के रूप में सामग्रियों का सबसे बड़ा व्यापारी, सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार और निवेश बाज़ार हमें (चीन) साहसपूर्वक "अमेरिका के बाद के युग" में यह एक वित्तीय प्रणाली के निर्माण की कल्पना है और इसे अमल में लाया जाना चाहिए… हमारे पास कुशल मानव संसाधन है, हमारे पास प्रचुर मात्रा में दुर्लभ धातुओं सहित प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन हैं, हमारे पास दुनिया में सबसे पूर्ण औद्योगिक श्रृंखला है, हम दुनिया में अकेले ऐसे देश हैं, जो पहली औद्योगिक क्रांति से लेकर चौथी औद्योगिक क्रांति तक लगभग हर देश के लिए हर चीज़ का उत्पादन कर सकते हैं। रॅन्मिन्बी(1948 में शुरू की गयी पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की मुद्रा प्रणाली) को हमारे विशेष संसाधनों, कई उत्पादों से जोड़ना एक ऐसा नया विचार है, जिस पर हम विचार कर सकते हैं।” 

चाहे जो भी हो, बाइडेन एनओपीईसी की राह अपनायें, इसकी संभावना ज़्यादा नहीं है। शक्तिशाली अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान (जो इस बिल पर वीटो पावर का अधिकार रखता है) ओपेक के ख़िलाफ़ एकाधिकार व्यापार विरोधी व्यवहार और बाज़ार में हेरफेर को लेकर चलाये जाने वाले मुकदमे के विचार को पूरी तरह से खारिज कर है। इससे ओपेक सदस्यों को अमेरिकी कंपनियों के ख़िलाफ़ प्रतिशोध लेने और यहां तक कि बढ़ते उत्पादन को बनाये रखने की उनकी क्षमता को कम करने का अवसर देते हुए "गंभीर, अनपेक्षित परिणाम" सामने आने का डर है। 

यह कहना मुनासिब ही होगा कि यह हास्यस्पद है कि यूरोपीय संघ रूस के ख़िलाफ़ तेल प्रतिबंध लगाकर इस हफ़्ते के आख़िर में ख़ुदकुशी करने की योजना बना रहा है। हालांकि, यह उन विचित्र संयोगों में से एक है कि विश्व राजनीति में इस तरह के परिवर्तनकारी दौर में यूरोपीय संघ की इस कार्यकारी शाखा की अगुवाई आयोग के अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल कर रहे हैं और दोनों ही उत्तरी अमेरिका और यूरोप के आपसी सहयोग में यक़ीन करने वाले कट्टर और युद्धकारी रूस विरोधी भावना से ओतप्रोत शख़्स हैं। जब बाइडेन यूक्रेन में छद्म युद्ध में रूस को हराने के लिए 40 बिलियन डॉलर के बिल पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार दिख रहे है, ऐसे में युद्ध के प्रयासों के पूरक रूप में कम से कम निर्णय लेने वाले ये दोनों लोग तेल व्यापार में रूस के साथ यूरोप की नाभि-रज्जू को काटने का काम कर सकते हैं,ऐसा तो शीत युद्ध के दौर की चरम स्थिति वाले समय में भी  (अमेरिकी राजनयिक पैंतरेबाज़ी के बावजूद।) नहीं हुआ था। 

यही वजह है कि वॉन डेर लेयेन ने मंगलवार को बुडापेस्ट की यात्रा की थी, ताकि राष्ट्रपति विक्टर ओर्बन को रूसी गढ़ पर धावा बोलने के लिए अपने साथ शामिल होने के लिए राज़ी किया जा सके। ओर्बन ने रूस के ख़िलाफ़ यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों को वीटो करने की धमकी दी थी, क्योंकि हंगरी उस रूसी तेल आपूर्ति पर बुरी तरह निर्भर है, जो अविश्वसनीय रूप से कम लागत पर ड्रूज़बा पाइपलाइन के ज़रिये आता है। ओर्बन ने 1 फ़रवरी को मास्को का दौरा किया था, जब वह और राष्ट्रपति पुतिन अनुकूल मूल्य पर एक नए दीर्घकालिक गैस अनुबंध पर सहमत हुए थे।   

हंगरी को रूसी गैस पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ज़्यादा समय (और निवेश) की ज़रूरत है। लेकिन, ओर्बन एक चतुर राजनीतिज्ञ भी हैं। वॉन डेर लेयेन का सामना ओर्बन से अप्रत्याशित रूप से हुआ था, ऑर्बन अपने घरेलू मामले में जितना ही सत्तावादी प्रवृत्ति वाले हैं, क्रेमलिन के साथ उनका सम्बन्ध उतना ही गर्मजोशी वाला है। ओर्बन के इस रवैये से वॉन डेर लेयेन चिढ़ गयी थीं, और मार्च में इसी चिढ़ में हंगरी के लिए यूरोपीय संघ के वित्त पोषण को रोकने के लिए "नियम-सशर्तता व्यवस्था" का आह्वान करके उसे एक कड़ा सबक सिखाने की ठान ली थी।  

शायद, वॉन डेर लेयन ने सोचा होगा कि वह ओर्बन को प्रोत्साहित कर सकती हैं। बेशक, हंगरी के लिए "नियम-आधारित आदेश" तय करने वाले यूरोपीय संघ के सशर्त तंत्र पर धीमी गति से चलना एक ऐसा फ़रेब है, जिसका परीक्षण कर पाना असंभव है। बुडापेस्ट की तरफ़ से अब तक जो बात आयी है,वह यही है कि अभी तक कोई सौदा नहीं हुआ है। लेकिन, हंगेरिया की तरफ़ से जो बातें आ रही हैं,उसका लब्बोलुआब तो यही है कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश इस समूह की संधियों के भीतर "स्मार्ट पावर" जुटा सकते हैं, ताकि आयोग को इसके बाहर एक प्रणाली का इस्तेमाल करते हुए कोशिश करने और उन्हें हासिल करने को लेकर हतोस्त्साहित किया जा सके। व्यवस्थागत लिहाज़ से यह पिछले दरवाज़े के ज़रिये यूरोपीय एकीकरण की उन सीमाओं पर रौशनी डालता है,जो यूरोपीय संघ वास्तव में संधि परिवर्तन के बिना संस्थागत रूप से हासिल कर सकता है।

यूरोपीय संघ के लिए क़ीमतों को स्थिर करने या रूसी ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता को कम करने को लेकर बात कर पाना अभी बहुत जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि इन प्रक्रियाओं में समय लगेगा। दूसरी ओर, जहां ये प्रतिबंध यूक्रेन में रूसी सैन्य संचालन को रोक नहीं पायेंगे, वहीं विश्व तेल बाज़ार में आने वाली उथल-पुथल यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को भी नहीं बख़्शेगी। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें:-

EU Stumbles Over Russian Oil Slick

Oil politics
European Union
Russia-Ukraine
OPEC
OPEC countries

Related Stories

डेनमार्क: प्रगतिशील ताकतों का आगामी यूरोपीय संघ के सैन्य गठबंधन से बाहर बने रहने पर जनमत संग्रह में ‘न’ के पक्ष में वोट का आह्वान

रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने के समझौते पर पहुंचा यूरोपीय संघ

यूक्रेन: यूरोप द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाना इसलिए आसान नहीं है! 

विश्व खाद्य संकट: कारण, इसके नतीजे और समाधान

यूक्रेन में संघर्ष के चलते यूरोप में राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 

मैक्रों की जीत ‘जोशीली’ नहीं रही, क्योंकि धुर-दक्षिणपंथियों ने की थी मज़बूत मोर्चाबंदी

डोनबास में हार के बाद अमेरिकी कहानी ज़िंदा नहीं रहेगी 

नाटो देशों ने यूक्रेन को और हथियारों की आपूर्ति के लिए कसी कमर

कोविड-19 का वैश्विक दुष्प्रभाव और रूस पर आर्थिक युद्ध 

यूक्रेन में तीन युद्ध और तीनों में इंसानियत की हार के आसार


बाकी खबरें

  • Abhisar sharma
    न्यूज़क्लिक टीम
    दबंग राजा भैया के खिलाफ FIR ! सपा कार्यकर्ताओं के तेवर सख्त !
    28 Feb 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma Ukraine में फसे '15,000 भारतीय मेडिकल छात्रों को वापस लाने की सियासत में जुटे प्रधानमंत्री' के विषय पर चर्चा कर रहे है। उसके साथ ही वह…
  • रवि शंकर दुबे
    यूपी वोटिंग पैटर्न: ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा और शहरों में कम वोटिंग के क्या हैं मायने?
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में अब तक के वोटिंग प्रतिशत ने राजनीतिक विश्लेषकों को उलझा कर रख दिया है, शहरों में कम तो ग्रामीण इलाकों में अधिक वोटिंग ने पेच फंसा दिया है, जबकि पिछले दो चुनावों का वोटिंग ट्रेंड एक…
  • banaras
    सतीश भारतीय
    यूपी चुनाव: कैसा है बनारस का माहौल?
    28 Feb 2022
    बनारस का रुझान कमल खिलाने की तरफ है या साइकिल की रफ्तार तेज करने की तरफ?
  • एस एन साहू 
    उत्तरप्रदेश में चुनाव पूरब की ओर बढ़ने के साथ भाजपा की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं 
    28 Feb 2022
    क्या भाजपा को देर से इस बात का अहसास हो रहा है कि उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहीं अधिक पिछड़े वर्ग के समर्थन की जरूरत है, जिन्होंने अपनी जातिगत पहचान का दांव खेला था?
  • Mothers and Fathers March
    पीपल्स डिस्पैच
    तख़्तापलट का विरोध करने वाले सूडानी युवाओं के साथ मज़बूती से खड़ा है "मदर्स एंड फ़ादर्स मार्च"
    28 Feb 2022
    पूरे सूडान से बुज़ुर्ग लोगों ने सैन्य शासन का विरोध करने वाले युवाओं के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाले। इस बीच प्रतिरोधक समितियां जल्द ही देश में एक संयुक्त राजनीतिक दृष्टिकोण का ऐलान करने वाली हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License