NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
ब्रांड मोदी से नौजवानों का बढ़ता मोहभंग क्या गुल खिलायेगा ?
वैसे तो सर्वग्रासी संकट के ख़िलाफ़ पूरे समाज में बेचैनी है और तंद्रा टूटने के संकेत हैं, पर धीरे धीरे छात्र-नौजवान इस राष्ट्रव्यापी हलचल के केंद्र में आते जा रहे हैं। उनका मुद्दा, रोज़गार का सवाल देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है और धीरे धीरे राजनैतिक शक्ल अख़्तियार कर रहा है।
लाल बहादुर सिंह
12 Sep 2020
रोज़गार का सवाल

आज समाज के सभी तबके संघर्ष की राह पर बढ़ रहे हैं क्योंकि सबका अस्तित्व दांव पर लग गया है। किसानों के जगह जगह सड़कों पर उतरने और पुलिस से झड़प की खबरें आ रही हैं, तो मजदूर संगठनों की हड़ताल और प्रतिवाद के लगातार कार्यक्रम हो रहे हैं। दुकानदार-व्यवसायी, स्वास्थ्यकर्मी, आशाबहुएं-आंगनबाड़ी कर्मी, फीस को लेकर परेशान अभिभावक, लोकतांत्रिक- नागरिक अधिकार संगठन, महिलाएं, बाढ़पीड़ित, बैंकों से लुटे-पिटे लोग-सब बेचैन और आंदोलित हैं।

5 सितम्बर वैसे तो शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, पर इस बार गौरी लंकेश का यह शहादत दिवस सचेत नागरिकों के राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध दिवस में बदल गया, #हमअगरउट्ठेनहीं, #IfWeDontRise के साथ देश के अनगिनत संगठन और व्यक्ति जो लोकतंत्र और जनता के पक्ष में खड़े हैं, वे मोदी सरकार के तमाम दमनकारी कदमों के खिलाफ अभियान में उतर पड़े, बेशक महामारी के खतरों के बीच यह अधिकांशतः online social media प्रोटेस्ट ही रहा, पर इससे इसकी गम्भीरता रंचमात्र भी कम नहीं होती।

और शाम होते होते तो पूरा नज़ारा ही बदल गया था, जब देश के तमाम शहरों में बड़ी तादाद में नौजवान स्वतःस्फूर्त ढंग से रोज़गार के सवाल को लेकर ताली-थाली बजाते सड़कों पर उतर पड़े। वैसे तो इस आंदोलन की गूंज काफी बड़े क्षेत्र में थी लेकिन इलाहाबाद जैसे प्रतियोगी छात्रों के गढ़ इसके केंद्र थे।

इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए 9 सितम्बर की रात 9 बजे देश के विभिन्न इलाकों में लाइट बुझाकर, मोबाइल, टॉर्च, मोमबत्ती, लालटेन जलाकर युवाओं ने अपने गुस्से का इजहार किया। सत्ता को उसी की भाषा में जवाब देते इन युवाओं को तमाम सामाजिक-नागरिक संगठनों, आंदोलनों, बुद्धिजीवियों , राजनैतिक दलों का भी समर्थन मिला।

119021859_3286454231432402_5791310609658627194_n.jpg

और अब नौजवानों ने 17 सितम्बर, प्रधानमंत्री के जन्मदिन को "बेरोज़गारी दिवस", "जुमला दिवस" "राष्ट्रीय रोज़गार दिवस",  "राष्ट्रीय झूठ दिवस" के रूप में मनाने का आह्वान किया है। संसद सत्र के दौरान, पहले दिन 14 सितम्बर से शुरू करके रोज़गार के मौलिक अधिकार के लिए अभियान चलाने की अपील की गई है।

युवाओं के इस बदलते तेवर से घबराई केंद्र सरकार ने दो दो साल से लटकी नौकरियों की परीक्षा तिथियों की आनन फानन में घोषणा तो करवाई, पर नौजवानों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। माना जा रहा है कि ‘मन की बात’ से शुरू होकर प्रधानमंत्री के हर वीडियो पर जो Like से कई गुना Dislike हो रहा था, उसके पीछे नौजवानों का यही गुस्सा है। हार कर BJP के चिन्तित थिंक टैंक ने अब मोदी जी के वीडियो पर dislike का ऑप्शन ही हटवा दिया है।

वैसे तो सर्वग्रासी संकट के खिलाफ पूरे समाज में बेचैनी है और तंद्रा टूटने के संकेत हैं, पर धीरे धीरे छात्र-नौजवान इस राष्ट्रव्यापी हलचल के केंद्र में आते जा रहे हैं। उनका मुद्दा, रोज़गार का सवाल देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है और धीरे धीरे राजनैतिक शक्ल अख़्तियार कर रहा है।

यह स्वागत योग्य है। इतिहास गवाह है कि समुद्री जहाज के मस्तूल की तरह, युवा-आंदोलन हमें किसी समाज के गर्भ में उमड़ घुमड़ रहे आलोड़न की पहली झलक दिखाता है और अपनी ऊर्जा, आवेग और अदम्य साहस से इस हलचल को उसके तार्किक अंजाम तक पहुंचाता है। सत्ता परिवर्तन से लेकर व्यवस्था परिवर्तन तक कि लड़ाई का सहभागी और नियामक बनता है।

ब्रांड मोदी से नौजवानों का यह बढ़ता मोहभंग इसलिये बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यही वह तबका है जिसने प्रधानमंत्री के रूप मे नरेंद्र मोदी के उत्थान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतीय समाज में युवाओं की आबादी का अनुपात बेहद ऊंचा बना हुआ है, यहां 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है।

इसके potential को पहचानने और उसे address करने में मोदी जी ने कोई चूक नहीं की थी।

याद कीजिये 2013-14 का उनका चुनाव अभियान, भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड का बार बार हवाला देकर उन्होंने aspirational india की, युवाओं की प्रगति की आकांक्षा को सहलाया, भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना दिखा उसे गुदगुदाया, भारत को चीन की तरह मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सब्ज़बाग़ दिखा और हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा कर उसकी उम्मीदों को पंख लगाये।

कुल मिलाकर उन्होंने अपने को 21वीं सदी के आशा-उम्मीद और संभावनाएं से भरे नए भारत के, भ्रष्टाचार मुक्त विकास की नई राजनीति के मसीहा के बतौर पेश किया। बेशक कॉरपोरेट की पूंजी और गोदी मीडिया ने  यह छवि गढ़ने में निर्णायक भूमिका निभाई।

"अच्छे दिन" का नारा सर्वोपरि इसी युवा constituency को सम्बोधित था।

पर आज वह युवा अपने को एकदम ठगा और छला हुआ सा महसूस कर रहा है। जिस तरह पूरी अर्थव्यवस्था रसातल में डूबती जा रही है, एक एक महीने में 50-50 लाख salaried नौकरियाँ जा रही हैं, महामारी के 5 महीने में 2 करोड़ नौकरियाँ खत्म हो गईं, उनके सारे सपने धूल धूसरित हो गए हैं।

सच्चाई यह है कि रोज़गार के मोर्चे पर आज स्थिति विस्फोटक हो गयी है।

याद करिये, मोदी जी ने 2014 के चुनाव अभियान में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार को जॉबलेस ग्रोथ  के लिए कठघरे में खड़ा करते हुए रोज़गार के प्रश्न को बड़ा मुद्दा बनाया था, लेकिन उनके सत्ता में आने के बाद रोज़गार सृजन की दिशा में हुआ कुछ नहीं, उल्टे उनकी नीतियों, विशेषकर नोटबन्दी, जीएसटी, और अब  अविवेकपूर्ण लॉकडाउन और अंधाधुंध निजीकरण के फलस्वरूप पूरी अर्थव्यवस्था बैठ गयी है और बेरोज़गारी आज़ादी के बाद के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई है, 9.1%.

आज हालत यह है कि केन्द्र व राज्य सरकारों की मिलाकर 100 से अधिक परीक्षाएं लटकी हुई हैं जिनसे 10 करोड़ से अधिक प्रतियोगी छात्र सीधे तौर पर प्रभावित हैं। इनमें कई परीक्षाएं तो सात-सात साल से अधर में हैं।

सरकार अपने सभी विभागों में नौकरियों के पद खत्म कर रही है। आर्थिक संकट के भंवर में फंसी सरकार इन सब मदों पर होने वाला खर्च हर हाल में कम करना चाहती है। जाहिर है वह मौजूद कर्मचारियों की तरह तरह से छंटनी कर रही है, उनकी जगह नई नियुक्तियां नहीं होगी, नए पद सृजित नहीं होंगे, नई भर्ती अपवादस्वरूप होगी।

4 सितम्बर को वित्त मंत्रालय से विभिन्न मंत्रालयों व विभागों के लिए एक निर्देश जारी हुआ कि कोई नया पद सृजित न करें! हालांकि,  5 सितम्बर को सम्भवतः युवाओं के आंदोलन के दबाव में वित्त मंत्रालय ने सफाई दे दी कि फ़ंड की कमी के कारण सरकारी पदों की भर्ती पर कोई रोक या प्रतिबंध नहीं लगा है। सामान्य भर्तियां चलती रहेंगी। लेकिन यह साफ साफ आंख में धूल झोंकने की कोशिश है।

इसी दिशा में सरकार कामों के निष्पादन में दक्षता, इकॉनोमी और रफ्तार के नाम पर हर मंत्रालय तथा विभाग में 50 से 55 वर्ष उम्र के बीच के अथवा 30 वर्ष नौकरी कर चुके कर्मचारियों का एक रजिस्टर तैयार करवा रही है, जिसमें प्रत्येक तिमाही में उनके परफॉर्मेंस की समीक्षा की जायगी और मानक पर खरे न उतरने पर उनकी सेवा समाप्त कर दी जायगी। देश का सबसे बड़ा बैंक अपने 30 हजार कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के एलान कर चुका है।

सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र को जो अंधाधुंध कारपोरेट के हवाले किया जा रहा है, ठेके पर दिया जा रहा है, उसका सीधा असर यह होगा कि नौकरियां बड़े पैमाने पर खत्म होंगी।

युवाओं की कुंठा और हताशा आज चरम पर पहुंच गई है । अवसाद या आंदोलन, आज  दो ही रास्ते हैं उनके सामने।

यह शुभ है हमारे समाज के लिए कि युवा आज मोदी राज से अपने विराट मोहभंग को सृजनात्मक ढंग से आंदोलन की ओर मोड़ रहे हैं। यह विकासमान आंदोलन इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है कि फासीवादी राजनीति ने हमारे समाज में जो गहरे विभाजन पैदा किये हैं, एकताबद्ध लोकतांत्रिक छात्र-नौजवान आंदोलन नफरत की उस खाई को अपनी अग्रगामी सांस्कृतिक चेतना से पाटने का काम करेगा। यह युवा ही हैं जो सड़े गले पुनरुत्थानवादी विचारों तथा अपनी आज़ादी पर हजार बंदिशें थोपने वाली फासीवादी संस्कृति के खिलाफ नए मुक्तिकामी मूल्यों के वाहक हैं।

अतीत के छात्र-युवा आंदोलनों की गौरवशाली विरासत के समृद्ध अनुभवों एवं संघर्षों से सीखते हुए उन्हें आगे बढ़ना होगा। राष्ट्रीय छात्र-युवा संगठनों को पहल लेते हुए देश भर में फैले तमाम छात्रयुवा मंचों/आंदोलनों/ छात्रसंघों की विराट एकता कायम करना होगा।

खाली पड़े 40 लाख सरकारी पदों को निश्चित समय सीमा के अंदर भरने, सबके लिए रोज़गार, रोज़गार मिलने तक सम्मानजनक व पर्याप्त जीवन निर्वाह भत्ता,  सर्वोपरि रोज़गार को मौलिक संवैधानिक अधिकार बनाने के लिए योजनाबद्ध आंदोलन छेड़ना होगा।

हर हाल में अपनी स्वतंत्रता व लोकतांत्रिक दिशा बरकरार रखना होगा, आंदोलन को निहितस्वार्थों द्वारा इस्तेमाल होने से बचाना होगा तथा रोज़गारपरक अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में निजीकरण के खिलाफ मजदूरों व सर्वांगीण कृषि विकास के लिए किसान आंदोलन के साथ एवं अन्य सभी तबकों के लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ एकताबद्ध होना होगा।

(लेखक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।  विचार व्यक्तिगत हैं।)

unemployment
Indian Youth
Narendra modi
modi sarkar
youth protest
Farmer protest
workers protest
#IfWeDontRise
Online Social Media Protest
JOB CRISIS

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

पंजाब: आप सरकार के ख़िलाफ़ किसानों ने खोला बड़ा मोर्चा, चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर डाला डेरा


बाकी खबरें

  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    मोदी सरकार के 8 साल: सत्ता के अच्छे दिन, लोगोें के बुरे दिन!
    29 May 2022
    देश के सत्ताधारी अपने शासन के आठ सालो को 'गौरवशाली 8 साल' बताकर उत्सव कर रहे हैं. पर आम लोग हर मोर्चे पर बेहाल हैं. हर हलके में तबाही का आलम है. #HafteKiBaat के नये एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार…
  • Kejriwal
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: MCD के बाद क्या ख़त्म हो सकती है दिल्ली विधानसभा?
    29 May 2022
    हर हफ़्ते की तरह इस बार भी सप्ताह की महत्वपूर्ण ख़बरों को लेकर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन…
  • राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!
    29 May 2022
    गोडसे जी के साथ न्याय नहीं हुआ। हम पूछते हैं, अब भी नहीं तो कब। गोडसे जी के अच्छे दिन कब आएंगे! गोडसे जी का नंबर कब आएगा!
  • Raja Ram Mohan Roy
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या राजा राममोहन राय की सीख आज के ध्रुवीकरण की काट है ?
    29 May 2022
    इस साल राजा राममोहन रॉय की 250वी वर्षगांठ है। राजा राम मोहन राय ने ही देश में अंतर धर्म सौहार्द और शान्ति की नींव रखी थी जिसे आज बर्बाद किया जा रहा है। क्या अब वक्त आ गया है उनकी दी हुई सीख को अमल…
  • अरविंद दास
    ओटीटी से जगी थी आशा, लेकिन यह छोटे फिल्मकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा: गिरीश कसारावल्ली
    29 May 2022
    प्रख्यात निर्देशक का कहना है कि फिल्मी अवसंरचना, जिसमें प्राथमिक तौर पर थिएटर और वितरण तंत्र शामिल है, वह मुख्यधारा से हटकर बनने वाली समानांतर फिल्मों या गैर फिल्मों की जरूरतों के लिए मुफ़ीद नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License