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विज्ञान
समझिए संगीत से मिलने वाले आनंद के पीछे का विज्ञान
ताजा शोधों से पता चला है कि संगीत का आनंद ''सकारात्मक प्रतिफल अनुमान'' से आता है। इसका मतलब है कि हमें कोई संगीत तभी खुशी देता है जब वो हमारी उम्मीदों से ज्यादा बेहतर हो।
संदीपन तालुकदार
14 Nov 2019
Unravelling the Science
Image Courtesy: Max Planck Gesellschaft

आख़िर संगीत में ऐसा क्या होता है, जिससे हमें आनंद महसूस होता है? शब्द, तान या स्वर, आखिर यह किसका खेल है? दरअसल यह सभी चीजें मिलकर हमें आनंद की अनुभूति करवाती हैं। रिसर्चर यह पता लगाने में जुटे हैं कि संगीत के बारे में मस्तिष्क अपनी पसंद कैसे तय करता है? क्या उसे पसंद है या क्या नहीं? पसंद का फ़ैसला ''रिवार्ड प्रोसेसिंग या प्रतिफल क्रमण'' से जुड़ा हुआ है। मस्तिष्क के रिवार्ड सिस्टम में तंत्रिका कोशिकाओं का एक समूह होता है, जो आनंद सबंधी भावनाओं के लिए ज़िम्मेदार होता है। सीधे शब्दों में, हमारे किसी काम को करने के बाद मस्तिष्क का ''रिवार्ड सर्किट या प्रतिफल तंत्र'' हमें आनंद का एहसास  देता है। आनंद के अलावा, इन तंत्रिकाओं का कोई काम नहीं है। लेकिन संगीत से संबंधित आनंद में इनका अहम किरदार है।

हाल की खोजों से पता चला है कि संगीत में आनंद, हमारी संगीत के प्रतिफल के अनुमान से आता है। मतलब़ कि जिस संगीत को हम सुनते हैं, अगर वह हमारी आशाओं से ज़्यादा अच्छा है, तो हमें आनंद आता है। बल्कि श्रोता की उम्मीदों से खेलकर ही संगीत आनंद पैदा करता है। जब हम पहली बार कोई गाना सुनते हैं, तब मस्तिष्क अंदाजा लगा रहा होता है कि आगे कौन सी आवाज आएगी। यह अंदाज हमारे पिछले सुने हुए संगीत के आधार पर होता है। हमें तब आनंद आता है, जब हमारी उम्मीदें पूरी होती हैं, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता।

इसी खोज को आगे बढ़ाते हुए, ''मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन कॉग्निशन एंड ब्रेन साइंस'' ने खोजा कि दो तरीके संगीत के आनंद से जटिलता के साथ जुड़े हुए हैं। आनंद से जुड़े यह दो तरीके हैं- पहला, कम अनिश्चित्ता और ज़्यादा आनंद देना वाला प्रतिरूप, दूसरा और इससे उलट, ज़्यादा अनिश्चित्ता वाला प्रतिरूप। किसी संगीत माला में कैसे स्वर, आनंद पैदा करते हैं, इस विषय पर शोध को करंट बॉयोलॉजी में छापा गया है।

इस अध्ययन में शामिल टीम ने ''कंप्यूटेशनल'' और ''ब्रेन इमेंजिग'' तकनीक का मिलाजुला इस्तेमाल किया। गणना करने वाला हिस्सा एक ''मशीन लर्निंग सिस्टम'' वाला सांख्यिकीय मॉडल था। इस मॉडल के ज़रिए ''अमेरिकन बिलबोर्ड हिट नंबर्स'' के 80,000 स्वरों को परिमाणित किया जा सकता था। इससे टीम को सहूलियत मिली कि वह इस बात की जांच कर सके कि, क्या आने वाले स्वर की अनिश्चित्ता या विस्मय के अनुभव से संगीत के आनंद का अनुमान लगाया जा सकता है। अगर किसी को पता है कि संगीत में आगे क्या आने वाला है, मतलब ''कम अनिश्चित्ता वाले स्वर क्रम'' के बारे में उसे जानकारी है और ऐन मौके पर गाने को बदल दिया गया, श्रोता को विस्मय में डाल दिया गया, तब संगीत खुशी देता है। दूसरी तरफ, ''ज़्यादा अनिश्चित्ता वाले स्वर क्रम'' में, जो श्रोता को विस्मय में नहीं डालता, तब भी संगीत व्यक्ति तो खुशी देता है।

अध्ययन के मुख्य वैज्ञानिक विंसेंट चेआंग के मुताबिक़ ''दूसरे शब्दों में, जरूरी है कि उम्मीदों के दोनों पहलुओं, मतलब ''स्वर आने के पहले की निश्चित्ता और स्वर आने के बाद होने वाले आश्चर्य में'' गतिशील आपसी क्रिया कराई जाए।''

''न्यूरल मैकेनिज़्म'' को समझने के लिए टीम ने ब्रेन इमेंजिग का सहारा लिया। FMRI के उपयोग से रिसर्चर संगीत सुनते वक्त श्रोता की दिमागी हलचलों का परीक्षण कर सकते थे। ब्रेन इमेज से पता चला कि आने वाले स्वर की अनिश्चित्ता और विस्मय स्तर के आपसी क्रिया का प्रभाव मस्तिष्क के भावनात्मक और श्रवण संबंधित क्षेत्र से जुड़े थे। संक्षिप्त में, मस्तिष्क के अमिग्डाला, हिप्पोकैंपस और श्रवण कॉर्टेक्स में होने वाली गतिविधि और न्यूक्लिअस एक्कयूंबेंस केवल अनिश्चित्ता के साथ जुड़े हुए थे। इससे पहले न्यूक्लिअस एक्कयूंबेंस का संगीत आनंद में एक अहम किरदार माना जाता था। लेकिन इस धारणा को ताजा अध्ययन से चुनौती मिली है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Unravelling the Science Behind Pleasure in Music

Music Pleasure
Brain Areas in Music Pleasure
FMRI
Brain Imaging
Max Planck Institute of Human Cognition and Brain Sciences

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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License