NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
उत्पीड़न
भारत
राजनीति
बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?
उत्तराखंड में एक बार फिर सवर्ण छात्रों द्वारा दलित महिला के हाथ से बने भोजन का बहिष्कार किया गया।
रवि शंकर दुबे
23 May 2022
students
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

जिस तरह देश विकास के नाम की झूठी कहानियां सुन रहा है, आधुनिकता के नए आयामों को सिर्फ सपने में देख रहा है, वैसे ही ये बात ज़रा भी सच नहीं है कि अब ज़ातियों के नाम पर भेदभाव नहीं रहा। तमाम किताबें, सामाजिक ज्ञान और दीवारों पर लिखे स्लोगन उस वक्त अपना दम तोड़ देते हैं जब छोटी-छोटी कक्षाओँ के छात्र-छात्राओं को एक दलित के हाथ से घिन आने लगती है। न जाने इन बच्चों को कौन बताता है कि तुम सवर्ण हो या फलां-फलां हो.... ख़ैर इस तरह की चीजों को बताकर बच्चों के मन में सिर्फ ज़हर ही बोया जा सकता है शिक्षा का बीज नहीं।

इन बातों को हम सिर्फ इस लिए कुरेद रहे हैं क्योंकि उत्तराखंड में एक बार फिर कुछ सवर्ण छात्रों ने एक दलित रसोईया के हाथ से बना खाना खाने से इनकार कर दिया। हालांकि स्कूल के प्रिंसिपल ने छात्रों को मनाने की कोशिश की लेकिन वे अड़े रहे और दलित महिला का विरोध करते रहे। जिसके बाद छात्रों को मनाने के लिए ख़ुद ज़िलाधिकारी को आना पड़ा। ज़िलाधिकारी ने छात्रों के परिजनों के साथ बैठक की।

दरअसल राज्य के चंपावत ज़िले में बने सरकारी स्कूल स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री राम चंद्र शासकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ सात-आठ सवर्ण छात्रों ने दलित रसोईयां सुनीता देवी के हाथों से बना खाना खाने से इनकार कर दिया।

स्कूल के प्रिंसिपल प्रेम कुमार ने बताया ‘’ डीएम और कुछ पुलिस अधिकारियों ने छात्रों के माता-पिता से बात की और उन्हें अपने बच्चों को समझाने के लिए कहा कि वे इस तरह मिड डे मील का विरोध न करें। इन अधिकारियों ने खुद स्कूल में आकर खाना खाया। हालांकि अभी भी ये 7-8 छात्र खाना खाने के लिए तैयार नहीं हैं। हमने उन्हें चेतावनी दी थी कि बच्चों को स्कूल से निकाला जा सकता है। गुरुवार यानी 19 मई को हुई इस मीटिंग के दौरान छात्रों के माता-पिता ने हमें आश्वासन दिया था कि वे अपने बच्चों से खाना खाने के बारे में बात करेंगे, लेकिन उन्होंने हमें छात्रों पर दबाव नहीं बनाने के लिए भी कहा है।”

ये मामला इतना ज्यादा बढ़ गया था कि ज़िलाधिकारी को ख़ुद हस्तक्षेप करना पड़ा। ज़िलाधिकारी की ओर से जारी एक बयान के अनुसार बच्चों ने दलित कुक नहीं, बल्कि चावल के कारण खाना खाने से इनकार किया था। दावा किया गया कि कुछ बच्चे चावल खाना पसंद नहीं करते। उन्होंने ही खाना खाने से इनकार किया था।

पहले भी हुआ ऐसा

इसी स्कूल में पहले भी कुछ छात्रों ने सुनीता देवी द्वारा बनाए खाने का विरोध किया था। पिछले साल दिसंबर में स्कूल के 66 छात्रों ने सुनीता देवी के खाना बनाने का विरोध किया था। जिसके बाद चंपावत जिला प्रशासन ने सुनीता देवी को बर्खास्त कर दिया गया था। सुनीता देवी की जगह एक सामान्य वर्ग की महिला को स्कूल में कुक के पद पर तैनात कर दिया गया था। जिसके विरोध में स्कूल के 23 दलित छात्रों ने नई कुक के बनाए खाने को खाने से मना कर दिया था।

स्कूल के इस एक्शन के खिलाफ सुनीता ने एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की धारा 506 के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस शिकायत के बाद प्रशासन के आदेश पर सुनीता देवी की दोबारा तैनाती कर दी गई थी। सुनीता देवी का कहना है कि छात्रों की इस हरकत से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। सुनीता देवी का कहना है कि स्कूल ने उनको कहा है कि जो बच्चे खाना खाएं सिर्फ उन्हीं के लिए खाना बनाएं, बाकी की चिंता न करें।

ये मामला जब पहले प्रकाश में आया था तब उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के लिए रैलियों का दौर चल रहा था, ज़ाहिर है राजनीति होना तो तय है। तब उत्तराखंड में सत्ता हासिल करने का ख्वाब देख रही आम आदमी पार्टी ने अपने शगूफ़ों की फहरिस्त में दलित महिला सुनीता देवी को दिल्ली में भोजन माता के पद पर नौकरी देने की बात कही। लेकिन अचरज की बात ये थी कि दिल्ली में भोजनमाता को कोई पद था ही नहीं। दरअसल दिल्ली में तो मिड-डे-मील बनाने का काम एनजीओ को आउटसोर्स है।

उस वक्त दिल्ली के राजकीय विद्यालय शिक्षक संघ के पश्चिम ज़िला सचिव संत राम ने कहा था कि कि मिड-डे-मील बनाने का काम विभिन्न एनजीओ को दिया गया है, वहां स्कूलों में खाना बनता ही नहीं है। हालांकि कोविड आने के बाद तो यह भी बंद है, मार्च 2020 से सूखा राशन दिया जा रहा है।

आम आदमी पार्टी के इस फर्जी स्टंट के बाद राजनीति ने रफ्तार पकड़ा ली, एक ओर जहां भीम आर्मी ने इसे दलितों के साथ मज़ाक करार दिया तो कांग्रेस और भाजपा ने भी आम आदमी पार्टी पर जमकर हमला किया।

इस बेहद संवेदनशील मामले में हुए राजनीतिक कृत्य याद दिलाने का मकसद सिर्फ इतना है, कि हमें इस बात से अनजान नहीं रहना चाहिए... कि राजनेताओं के लिए दलित समाज सिर्फ वोट का ज़रिया है। वोटों का फायदा होने के बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।

ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि जब आज के वक्त में भी ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जब दलित के हाथ से बने भोजन को नकारा जा रहा है, तब दलितों के लिए आरक्षण के खिलाफ बोलने वालों का भी मुंह बंद रखना चाहिए। क्योंकि हर दिन जिस तरह से अल्पसंख्यक यानी दलितों को टारगेट कर उनकी ज़िंदगी के साथ खेला जा रहा है और समाज में उनके प्रति लोगों में नफरत पैदा की जा रही है, ये सामाजिक जीवन में एक इंसान के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है। क्योंकि अगर आने वाली पीढ़ियां यानी भविष्य के ज़हन में ही ऐसी ज़हरीली बातें घर कर जाएंगी, फिर तो समाज को सर्वधर्म एक समान बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

इसे भी पढ़े: दलित भोजनमाता को दिल्ली में नौकरी के 'आप' के दावे पर सवाल.. दिल्ली में तो यह पद ही नहीं

Dalits
minorities
Uttrakhand
upper caste
students

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया

मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सैलून वाले आज भी नहीं काटते दलितों के बाल!

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला


बाकी खबरें

  • rally
    भाषा
    कोविड-19 की तीसरी लहर के मद्देनजर चुनावी रैलियों पर रोक लगाए सरकार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
    24 Dec 2021
    अदालत ने कहा, दूसरी लहर में हमने देखा कि लाखों की संख्या में लोग संक्रमित हुए और लोगों की मृत्यु हुई। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के कारण बड़ी संख्या में लोग संक्रमित…
  • covid
    भाषा
    सिंगापुर के विशेषज्ञों को 2022 में ‘ओमीक्रोन’ के सबसे अधिक मामले सामने आने की आशंका
    24 Dec 2021
    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 वैश्विक महामारी को अगले साल खत्म करने के लिए विश्व से एक साथ आने का आह्वान किया है।
  • omicron
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश के 24 घंटो में 6,650 नए मामले, ओमिक्रॉन के मामले बढ़कर 350 के पार 
    24 Dec 2021
    देश में कोरोना वायरस संक्रमण के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा बढ़ता जा रहे हैं। बढ़ते मामलो को देखकर कई राज्य सरकारों ने धीरे-धीरे पाबंदिया लगानी शुरू कर दी हैं।
  • kisan
    अमेय तिरोदकर
    महाराष्ट्र: किसानों की एक और जीत, किसान विरोधी बिल वापस लेने को एमवीए सरकार मजबूर
    24 Dec 2021
    मोदी सरकार के तीनों कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के लिए मजबूर होने के बाद अब महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार ने वर्तमान में जारी विधानसभा सत्र के दौरान विधायी कामकाज के लिए सूचीबद्ध प्रस्तवित विधेयकों…
  • Modi in Varanasi
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव : पीएम मोदी की 1 लाख करोड़ की घोषणा कितनी प्रभावी?
    24 Dec 2021
    इसमें से क़रीब 70,000 करोड़ रुपये एक्सप्रेसवे और हवाई अड्डों के लिए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License