NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उत्तर प्रदेश: क्या योगी आदित्यनाथ अल्ताफ़ को न्याय देंगे?
हम अल्ताफ़ की मौत की तुलना पुलिस हिरासत में अक्सर होने वाली मौतों के साथ नहीं कर सकते हैं।
अनिल सिन्हा
13 Nov 2021
altaf

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में पुलिस हिरासत में अल्ताफ़ की मौत को लेकर अब ज्यादा संदेह नहीं रहा। लोग किसी तरह भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि दो से तीन फीट ऊंचे नल से साढ़े पांच फीट लंबा आदमी लटक कर मर सकता है, वह भी अपने जैकेट की डोरी से। हिरासत में मौत की हाल में हुई दो और घटनाओं को लेकर राज्य की पुलिस पहले से विवादों में है। ये आगरा के अरुण वाल्मीकि और सुल्तानपुर के राजेश कोरी की मौत की घटनाएं हैं। इन घटनाओं में एक साम्य है कि तीनों शिकार गरीब और वंचित तबके से हैं।

यह कोई छिपी बात नहीं है कि गरीब और सामाजिक रूप से वंचित समूहों के प्रति पुलिस का रवैया हिकारत का है और वह यह मान कर चलती है कि वे अपराधी हैं। यह औपनिवेशिक विरासत है। अंग्रेजों ने तो उन समुदायों को ही अपराधी घोषित कर रखा था जिन्होंने उनके खिलाफ बगावत की थी या उनकी नीतियों के कारण हाशिए पर चले गए थे।

आजादी के बाद राज्य  की ओर से स्थाई तौर पर अपराधी करार दिए जाने की इस अमानवीय फैसले से उन्हे मुक्ति मिली। संविधान ने उन्हें न केवल बराबरी का दर्जा दिया बल्कि उन्हें संरक्षण और सहूलियतें भी दीं कि वे मुख्यधारा में शामिल हों। लेकिन गरीबों और वंचितों को अपराधी मानने की इस औपनिवेशिक दुराग्रह से पुलिस मुक्त नहीं हो पाई। आज भी जब अपराध की कोई घटना होती है तो पुलिस सबसे पहले इन्हीं तबके के लोगों को हिरासत में लेती है।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या अल्ताफ़ जैसे एक खास संप्रदाय के लोगों के बारे में पुलिस का रवैया सिर्फ अंग्रेजी काल से चले आ रहे दुराग्रह से ही प्रेरित है? क्या इसमें अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर पिछले कुछ सालों में फैली नफरत की भूमिका नहीं है? इससे भी आगे बढ़ कर हम पूछ सकते हैं कि क्या योगी आदित्यनाथ की सरकार ऐसे ही पूर्वाग्रहों वाली पुलिस नहीं चाहती है? भले ही उसने अल्ताफ़ की पूछताछ में लगे कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया हो, लेकिन उससे किसी ऐसे कदम की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए जो पुलिस को नफरत और क्रूरता के रास्ते से हटाए।

  अल्ताफ़ की मौत जैसी घटना को समझने में भ्रम होना लाजिमी है। कुछ भ्रम तो स्वाभाविक हैं और कुछ सरकार चलाने वाली पार्टी की सोच और उसके व्यवहार से ध्यान हटाने के लिए हैं। इस तरह की टिप्पणियां स्वाभाविक हैं कि सामान्य लोगों के प्रति पुलिस का रवैया क्रूरता से भरा होता है, किसी भी सरकार ने पुलिस को सुधारने की कोशिश नहीं की और हर सरकार पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल करती है। कुछ लोग इसे औपनिवेशिक  विरासत बता कर छुट्टी पा लेते हैं और व्यापक सुधारों की बात करते हैं।

मीडिया का बड़ा तबका यह साबित करने में ही दिलचस्पी रखता है कि यह सब पहले से चलता आया है और क्या कांग्रेस और क्या बसपा, हर पार्टी की सरकार में ऐसा ही होता आया है। यह सरलीकरण नरेंद्र मोदी-अमित शाह  के नेतृत्व में चल रहे शासन  और उत्तर प्रदेश में धार्मिक नफरत बढाने पर तुली योगी सरकार के कारनामों  पर पर्दा डालने के लिए है।

हम अल्ताफ़ की मौत की तुलना पुलिस हिरासत में अक्सर होने वाली मौतों के साथ नहीं कर सकते हैं। मोदी सरकार के काल में मुसलमानों को निशाना बनाने का काम योजना बना कर किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन  कानून इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कथित लव जिहाद की नैरेटिव  आरएसएस सालों से बना रहा है। अब उसे कानूनी जामा भी पहनाया जाने लगा है। इन सब के अलावा सत्ताधारी पार्टी के आशीर्वाद से गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की लोमहर्षक घटनाएं  हम देख ही चुके हैं।

उत्तर  प्रदेश सरकार की खासियत यह है कि इसके मुखिया की कट्टर सांप्रदायिक  नेता की पहचान है ।  उन्होंने इसे लगातार बनाए रखी है। यह भी समझना मुश्किल  नहीं है कि चुनाव के नजदीक आ जाने के बाद भाजपा नेतृत्व ने उन्हें और भी नफरती दिखने की सलाह दी है। बहुत कम लोगों का ध्यान इस बात पर गया है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राजनीतिक प्रस्ताव पेश  करने का खास काम करने के बाद योगी कैराना गए और उन्होंने वहां सांप्रदायिक विभाजन की लगभग समाप्त हो गई नैरेटिव को जिंदा करने की कोशिश  की जिसके आधार पर भाजपा ने पिछले चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश  में बढ़त हासिल की थी। मुसलमानों को आतंकवादी  और अपराधी बताने का काम उन्होंने खुल कर  किया।

योगी यह सब लगातार करते रहे हैं। हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में उत्तर प्रदेश का चुनाव संघ ने गुजरात के पहले ही कर लिया था और वह लंबे समय से इस काम में लगा है। राम मंदिर आंदोलन का केंद्र होने की वजह से यह संघ के लिए सदैव जरूरी रहा है कि वह इस प्रदेश को हिंदुत्ववादी जहर से भर दे। लेकिन सामाजिक न्याय और आंबेडकरवादी राजनीति के उभार ने उसके फैलाव को लंबे समय तक रोके रखा।  यह अनायास नहीं है कि पिछले विधानसभा के चुनावों की जीत के बाद संघ ने चुनाव में सीमित भूमिका के बाद भी योगी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया। वह ऐसे व्यक्ति हैं जो सोशल मीडिया में अपनी पहचान में अपने पद के साथ यह भी जोड़े रखते हैं कि गोरक्षा पीठ के पीठाधीश्वर  हैं। उत्तर प्रदेश  को हिंदुत्व का राजनीतिक तीर्थस्थल बनाने के लिए उनकी कोशिशों का नमूना अयोध्या  में दिखाई देता है जहां के कार्यक्रम कोरोना काल में भी बिना रूकावट के चलते रहे हैं और गरीब प्रदेश में नौ लाख दीप जलाने का कार्यक्रम हुआ। बुझे दीपों  में बचे सरसों तेल लेने आए गरीब औरतों और बच्चों की तस्वीर भले ही मुख्यधारा के मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाईं, सोशल मीडिया पर वायरल जरूर हो गईं।

प्रदेश को हिंदुत्व का राजनीतिक तीर्थ स्थल बनाने की कोशिश कर रही सरकार से आप कैसी पुलिस की उम्मीद कर सकते हैं?  वह क्या लोकतांत्रिक पुलिस बना सकती है जो दलितों, अल्पसंख्यकों और औरतों के साथ सही व्यवहार करे? यह बात भी समझनी चाहिए कि वंचित तबके के लोगों को अपराधी मानने वाली पुलिस की नफरत का शिकार अन्य तबके के लोग भी होंगे। गोरखपुर में पुलिस के हाथों मारे गए मनीष गुप्ता ऐसे ही  शिकार थे जिनका रिश्ता भी सत्ताधारी पार्टी से था।  निरंकुश पुलिस किसी के भी मानवाधिकारों को स्वीकार नहीं कर सकती है।

अब उस सरलीकरण की ओर लौटें जिसमें यह कहा जाता है कि पुलिस का चरित्र सदैव ऐसा है। इस सरलीकरण में इस तथ्य को नजरअंदाज किया जाता है कि समुदाय विशेष को अपराधी करार देने से स्थिति में बहुत फर्क आ जाता है। इन समुदायों को समाज और मीडिया का वह सहारा मिलना बंद हो जाता है जो पुलिस के अत्याचार से बचने के लिए निहायत जरूरी  है। एक और बात को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं कि मोदी के शासन काल में पहला हमला उन मानवाधिकार संगठनों तथा कार्यकर्ताओं को झेलना पड़ा है जो वंचितों और कमजोर लोगों के लिए लड़ते रहे हैं। पहला काम भाजपा सरकार ने यह किया कि दलों से बाहर और सरकारी तंत्र से अलग होकर काम करने वाले इन समूहों को किनारे कर दिया। उन्हें हर तरह से बदनाम किया गया और उन्हें पुलिस समेत अन्य यंत्रणाओं के जरिए सताया गया। उन्हें  देशद्रोही बताया गया। पहले और अब की स्थिति में सबसे बड़ा अंतर है कि आज इन संगठनों को पुलिस या प्रशासन किसी तरह का महत्व देने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में विपक्षी पार्टियां या संप्रदाय के नाम पर खड़े संगठन ही सामने आते हैं। तंत्र उन्हें राजनीतिक या निहित स्वार्थ वाला बता कर आसानी से खारिज कर देता है।

मानवाधिकार संगठनों के साथ दुर्व्यवहार करने में योगी सरकार सबसे आगे है। इसने पुलिस तथा तंत्र को निरंकुश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा करने और उन्हें डराने-धमकाने के कई मामले चर्चा में रहे हैं। ऐसे में अल्ताफ़, अरूण या राजेश  कोरी को न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है। अल्ताफ़ की स्थिति तो और भी कमजोर है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें : ग्राउंड रिपोर्ट: अल्ताफ़ मामले पर मां का बयान, कहा शरीर पर चोट के निशान, उसकी हत्या की गई

UttarPradesh
Yogi Adityanath
Altaf
Kasganj
UP police
Death in custody

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

क्या वाकई 'यूपी पुलिस दबिश देने नहीं, बल्कि दबंगई दिखाने जाती है'?

मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?

यूपी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच करोड़ों की दवाएं बेकार, कौन है ज़िम्मेदार?

उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव का समीकरण


बाकी खबरें

  • Red Volunteers
    संदीप चक्रवर्ती
    बंगाल ट्रेन दुर्घटना के पीड़ितों की मदद करने के लिए आगे आये ‘रेड वालंटियर्स’
    15 Jan 2022
    जलपाईगुड़ी जिला अस्पताल में दुर्घटना में घायल यात्रियों को यथासंभव मदद पहुंचाने के लिए आपातकालीन स्थिति में रक्तदान करने के लिए करीब चालीस रेड वालंटियर्स फौरन पहुंचे।  
  • yogi
    एम.ओबैद
    दलितों के ख़िलाफ़ हमले रोकने में नाकाम रही योगी सरकार
    15 Jan 2022
    पिछले साल जारी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में उत्तर प्रदेश में साल 2020 में दलितों के खिलाफ सबसे अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए। यहां 12,714 मामले (25.2 प्रतिशत) दर्ज किए गए थे।
  • tubnisia
    काथरिन स्काएर, तारक गुईज़ानी
    ट्यूनीशिया: पहली डिजिटल राजनीतिक सुझाव प्रक्रिया पर लोगों में मत-विभाजन
    15 Jan 2022
    नए संविधान पर लोगों से डिजिटल तरीके से राजनीतिक सुझाव बुलवाए गए हैं। यह ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति काएस सईद का राजनीतिक संकट से निकलने का रास्ता हो सकता है। लेकिन सईद की मंशा की तरह, इस ऑनलाइन सुझाव…
  • Turkey
    एम. के. भद्रकुमार
    क्या अमेरिका और यूरोप के करीब आ रहा है तुर्की?
    15 Jan 2022
    लेकिन, हक़ीक़त यह है कि पश्चिम तुर्की को तो स्वीकार कर सकता है, लेकिन क्या वे एर्दोगन को स्वीकार करेगा?
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,68,833 नए मामले, 402 मरीज़ों की मौत
    15 Jan 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 3.85 फ़ीसदी यानी 14 लाख 17 हज़ार 820 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License