NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
चमोली आपदा : इकोलोजी, सुरक्षा को ध्यान में रख विकास परियोजनाओं की समीक्षा करने की ज़रूरत  
इन परियोजनाओं से इन इलाक़ों में रहने वाले आम लोगों को लाभ मिलना था, लेकिन वे अब लाभ की जगह आपदाएं झेल रहे हैं।
डी रघुनंदन
16 Feb 2021
Translated by महेश कुमार
चमोली आपदा

उत्तराखंड में हाल ही में आई पर्यावरणीय आपदा से सरकार को इकोलोजी/पारिस्थितिक प्रबंधन और संवेदनशीलता के बारे कई सबक ले लेने चाहिए। चमोली में हुए जानलेवा हादसे को रोका जा सकता था, बशर्ते इलाके में भारी निर्माण और इमारत निर्माण की गतिविधियां नहीं होती। डी. रघुनंदन के अनुसार यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना अधिकारियों को नींद से जगाने और पर्यावरण का संज्ञान लेने का जरिया होनी चाहिए। 

7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के चमोली जिले में आई भीषण आपदा में 30 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 150 से अधिक लोग लापता या फंसे हुए। दुख की बात यह है कि ज्यादातर मृतक मजदूर हैं जो बुनियादी ढाँचों और हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर परियोजनाओं में काम कर रहे थे, ये सब रेनी गाँव के पास ऋषिगंगा नदी पर 13.2 मेगावाट की छोटी परियोजना पर काम कर रहे थे जो पूरी तरह से तबाह हो गई है। धौलीगंगा के पास में मौजूद बड़ा यानि 520 मेगावाट का तपोवन बिजली संयंत्र भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है और कई मजदूर फंस गए हैं।

इन परियोजनाओं से इलाके में रहने वाले आम लोगों को लाभ मिलना था, लेकिन वे अब लाभ की जगह आपदा को झेल रहे हैं। यह विडंबना ही है क्योंकि ऐसी लापरवाह और कथित तौर पर "विकासात्मक" गतिविधियां इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण आपदाओं का प्रमुख कारण रही हैं, भले ही वे घटना का मुख्य कारण हमेशा न रही हो।

आपदा के पीछे का सटीक कारण और परिस्थितियां अभी भी उभर कर सामने आ रही हैं। ऐसा लगता होता है कि ग्लेशियल झील के फटने के बारे में पहले की अटकलें सटीक नहीं थीं। अब ऐसा लगता है, भारत और विदेश में उपग्रह इमेजरी के अध्ययन के आधार पर और भारतीय विशेषज्ञ टीमों द्वारा जो प्रारंभिक टिप्पणियां की गई थी उसके मुताबिक यह आपदा चट्टानी पर्वत-की-चोटी के एक बड़े हिस्से के टूटने से हुए  बड़े पैमाने के भूस्खलन के कारण हुई थी। और इसके परिणामस्वरूप हाल ही में जमा हुई बर्फ हिमस्खलन के जरिए और चट्टानों की बड़ी मात्रा के ढहने से भारी बाढ़ और तबाही आ गई। कुछ संदेह ऐसा भी है कि हो सकता है अस्थिर चट्टान के ऊपर ग्लेशियर के एक हिस्से के टूट कर गिरने से घटनाओं की यह पूरी श्रृंखला शुरू हुई हो सकती है।

विकास और इकोलोजिकल ग़फ़लत

कारण जो कुछ भी हो, लेकिन ये परियोजनाएं नासमझ मानव-निर्मित "विकास" के परिणामों की गंभीर याद दिलाटी हैं जो चेतावनी के सभी संकेतों की घनघोर उपेक्षा करती हैं। इससे दो पहलू सामने आते हैं और दोनों के परिणाम एक ही है, कि विशेष रूप से पश्चिमी हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में समान आपदाएं आती है क्योंकि जलवायु परिवर्तन और निर्माण परियोजनाओं के क्षेत्र में बिना सोचे-समझे योजना बनाई जाती है।

इन इलाकों में असंख्य सड़कों, बिजली संयंत्रों और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए गैर-जिम्मेदाराना दौड़ ने समस्या को बढ़ा दिया गया है। हिमालय को नई और अस्थिर पर्वतमाला के रूप में जाना जाता है।

अब यह सब जानते है कि मानव निर्मित ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय बर्फ के आवरणों के पिघलने के साथ-साथ ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और सिकुड़ना शुरू हो गया है। भारत और विदेशों दोनों में हाल के अध्ययनों से पता चला है कि पहले के दशकों की तुलना में ग्लेसियर के पिघलने की दर काफी तेज़ हुई है। भारत में, ग्लेशियर पूर्वी इलाके की तुलना में पश्चिमी हिमालय में अधिक तेजी से पिघल रहे हैं।

ग्लेशियर पिघलने से बड़े तालाब या ग्लेशियल झीलें बनती हैं,’ जिनके नाके कभी-कभी टूट जाते हैं। इस प्रकार पानी की बड़ी मात्रा में बह कर नीचे के इलाके में फ्लैश बाढ़ का कारण बन जाती है, जैसा कि पहले चमोली में हुआ था। यह प्रक्रिया पश्चिमी हिमालय में तेजी से चल रही है जिससे अस्थिरता और फ्लैश बाढ़/फ्लड की संभावना बढ़ रही है।

इन इलाकों में असंख्य सड़कों, बिजली संयंत्रों और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए गैर-जिम्मेदाराना दौड़ ने समस्या को बढ़ा दिया गया है। हिमालय को नई और अस्थिर पर्वतमाला के रूप में जाना जाता है। इनमें अक्सर भूस्खलन होता हैं, बादल फटने और बाढ़ से सामान्य परिस्थितियों में भी चट्टानें और अन्य मलबे नीचे आते हैं। पहाड़ी इलाकों में पहले ही बस्तियों के विस्तार, सड़क निर्माण, जल स्रोतों की कमी और मिट्टी और चट्टानों को काटने, पेड़ की कटाई करने से स्थानीय इकोलोजी/पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी दबाव पड रहा था। इससे भूस्खलन और बारिश के पानी का प्रवाह बढ़ता है जिससे स्थानीय जलधाराओं और नदियों में बाढ़ आती है। विशेष रूप से वर्तमान सरकार के तहत इस तरह की लापरवाही की निर्माण परियोजनाओं ने इस तरह के विनाश को नए और खतरनाक स्तरों पर पहुंचा दिया है।

भारी निर्माण परियोजनाएं आने वाली हैं 

अब इस क्षेत्र में कई जलविद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। वर्तमान में, राज्य में लगभग 100 बांध हैं, बावजूद इसके कई ओर बांधों का निर्माण किया जाएगा। इनमें से कई को नदी-नालों की परियोजना के रूप में माना जाता है, लेकिन व्यवहार में, इसमें पानी और निर्माण की कुछ गतिविधियाँ भी शामिल हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार, 450 से अधिक पनबिजली परियोजनाओं की योजना बनाई गई है, जिसका अर्थ है कि एक परियोजना चंद दर्जन किलोमीटर के दायरे में मौजूद हो सकती है।

इस परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी को 100 किलोमीटर से कम की 53 परियोजनाओं में विभाजित कर मंजूरी ली गई थी जिसने मंजूरी को आसान बना दिया था। परियोजना की समीक्षा करने वाली समिति ने सड़क की चौड़ाई 10 मीटर तक बढ़ा दी, जिसमें 24 मीटर तक पहाड़ी की कटाई शामिल है।

2016 में शुरू हुई 14,000 करोड़ रुपये की चार-धाम परियोजना पर बड़े पैमाने का सड़क निर्माण का काम चल रहा है। इसका उद्देश्य चार धाम महामार्ग राजमार्ग, होटल और अन्य बुनियादी ढांचे सहित 800 किलोमीटर से अधिक सड़कों के जरिए उत्तराखंड में चार प्रमुख तीर्थ स्थलों को जोड़ना है। इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी को 100 किलोमीटर से कम की 53 परियोजनाओं में विभाजित कर मंजूरी ली गई थी जिसने मंजूरी को आसान बना दिया था। परियोजना की समीक्षा करने वाली समिति ने सड़क की चौड़ाई 10 मीटर तक बढ़ा दी, जिसमें 24 मीटर तक पहाड़ी की कटाई शामिल है।

इससे भी बड़ी चिंता सड़क पर कटाई और पहाड़ियों के खुरचने की है, जिसे भौंडे और खतरनाक तरीके से डायनामाइटिंग के माध्यम से अंजाम दिया जाता है, ऐसा अक्सर सीधे खड़े स्लोप के साथ किया जाता है। ढलानों को बांधने और ताजा वृक्षारोपण में कमी से पैदा हुई हलचल (अपर्याप्त स्थिरीकरण) के कारण तेजी से भूस्खलन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। डेवलपर्स की प्राथमिकताएं स्पष्ट रूप से परियोजना को तेज करना हैं, ताकि निवेशकों के लिए अधिक लाभ कमाया जा सके, और परिणाम सुरक्षा नियमों का घनघोर उलंघन। 

इन इलाकों में सीधे नुकसान के अलावा, भविष्य में बाढ़ की घटनाओं की संभावनाओं और उसके भयंकर असर को बढ़ा देता है। मलबे नदी के तल को बढ़ाते हैं, जिससे बाढ़ और बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है, जैसा कि 2013 की आपदा में हुआ था।

केदारनाथ, जिसने 2013 में बड़े पैमाने के नुकसान का सामना किया था उस केदारनाथ शहर को आसपास के वातावरण पर पड़ने वाले असर को ठीक से न कम समझकर फिर से बनाया जा रहा है। बाढ़ और अन्य आपदाओं की अधिक घटनाओं के कारण शहर खतरे के साए में आ गया है। इन नाजुक इलाकों में मौजूद बस्तियों की सहने की क्षमता पर कोई विचार नहीं किया गया है।

कम ऊंचाई वाले इलाकों में आवासीय बस्ती बनाना और मंदिर में तीर्थयात्रा वाले यातायात को विनियमित करने जैसे विकल्पों को धता बता दिया गया है। भीषण मौसम की घटनाओं, भूस्खलन, ढलान अस्थिरता और ग्लेशियर पिघलने वाले इस क्षेत्र की सक्रिय निगरानी और उसका ठोस अवलोकन लगभग नहीं के बराबर हैं।

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जारी सभी परियोजनाओं की पूर्ण सुरक्षा की और पर्यावरणीय समीक्षा करने की जरूरत है। यह जरूरी है कि इस विनाशकारी रास्ते को बिना देरी किए उलट देना चाहिए। 

अन्यथा, भविष्य में भी इस तरह की आपदाएं होती रहेंगी। (आईपीए सेवा)

डी. रघुनंदन वरिष्ठ पत्रकार हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

यह लेख मूल रूप से The Leaflet में प्रकाशित हुआ था।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें। 

Chamoli Disaster: Need to Review Development Projects with Ecology, Safety in Mind

Uttarakhand Tragedy
Chamoli disaster
Enviornment impact
development
Ecological Damage

Related Stories

'विनाशकारी विकास' के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है देहरादून, पेड़ों के बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग

उत्तराखंड: विकास के नाम पर विध्वंस की इबारत लिखतीं सरकारें

जलवायु परिवर्तन और प्रलय का कारण बन रहा कॉरपोरेट लाभ और लोभ

जब जम्मू-कश्मीर में आर्द्रभूमि भूमि बन गई बंजर

स्पेशल रिपोर्ट: बनारस की गंगा में 'रेत की नहर' और 'बालू का टीला'

क्या उत्तराखंड में लगातार हो रही अतिवृष्टि के लिये केवल प्रकृति ज़िम्मेदार है? 

चमोली के सुमना में हिम-स्खलन से 10 की मौत, रेस्क्यू जारी, जलवायु परिवर्तन का असर है असमय बर्फ़बारी

त्रासदी: उत्तराखंड के पहाड़ों से खिलवाड़!

चमोली हादसे के सवाल और सबक़ क्या होंगे, क्या अब भी हिमालय में हज़ारों पेड़ कटेंगे!

ग्लेशियर टूटने से तो आपदा आई, बांध के चलते मारे गए लोगों की मौत का ज़िम्मेदार कौन!


बाकी खबरें

  • up map
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव:  कई सीटें ऐसी भी जहां हार-जीत का अंतर 500 वोटों से भी कम
    25 Jan 2022
    इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होने वाले हैं, जानें किन-किन सीटों पर होगा एक-एक वोट का महत्व?
  • UP Polls
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: राज्य के वित्तीय कुप्रबंधन की एक तस्वीर
    25 Jan 2022
    जहां एक तरफ़ राज्य पर क़र्ज़ को बोझ बढ़ गया है, वहीं दूसरी तरफ़ यूपी सरकार के पास जो पैसे थे,वह उसे भी ख़र्च नहीं कर पा रही थी।
  • poor district
    सौरभ शर्मा
    उप्र चुनाव: भारत के सबसे पिछड़े  जिले के जीवन में एक दिन
    25 Jan 2022
    भारत के सबसे बड़े इस राज्य में विधानसभा चुनाव तेजी से नजदीक सरकते आ रहे हैं। यहां विकास हर पार्टी के लिए एक महत्त्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बना हुआ है। इसके बावजूद राज्य के कुछ जिले विकास के संकेतकों पर…
  • hum bharat ke log
    लाल बहादुर सिंह
    आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष में हमारा गणतंत्र एक चौराहे पर खड़ा है
    25 Jan 2022
    यह आज का ख़ौफ़नाक सच है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा ने हमारे गणतंत्र के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। हमारे गणतांत्रिक संविधान की जो मूल आत्मा है-न्याय, स्वतंत्रता, समानता, और…
  • solver gang
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी : टीईटी परीक्षा में सॉल्वर गैंग के 19 सदस्य गिरफ़्तार, वर्षों से हैं सक्रिय
    24 Jan 2022
    बीते कुछ वर्षों में सॉल्वर गैंग के एक के बाद एक कई मामले सामने आए हैं जो परीक्षार्थियों से भारी रकम लेकर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में उनकी जगह बैठ कर पेपर देते हैं। गत रविवार को हुई यूपी-टीईटी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License