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उत्तराखंड आकस्मिक बाढ़: क्या एक और आपदा के घटित होने का हो रहा है इंतज़ार?
तपोवन और ऋषि गंगा जलविद्युत परियोजनाओं में कथित तौर पर पर्यावरणीय मानदंडों की धज्जियां उड़ाईं जा रही थीं।
अयस्कांत दास
01 Mar 2021
उत्तराखंड
प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: 7 फरवरी के दिन हिमनद फटने के बाद आई आकस्मिक बाढ़ के दौरान उत्तराखंड में जिस प्रकार की मानवीय एवं पर्यावरणीय त्रासदी उजागर हुई, वह एक ऐसी आपदा थी जिसके घटित होने का इंतजार किया जा रहा था। यहाँ तक कि मृतकों की संख्या में जहाँ लगातार इजाफा होता जा रहा है, वहीं यह बात भी धीरे-धीरे उभरकर आ रही है कि इन दोनों निर्माणाधीन जलविद्युत संयंत्र स्थलों पर, जो कि इसकी मार से सबसे अधिक प्रभावित हैं, में विभिन्न पर्यावरणीय मानदंडों का कथित तौर पर पालन नहीं किया जा रहा था।

इस त्रासदी को बीते 20 दिन हो चुके हैं, और बचाव दलों द्वारा अभी तक कुल 72 मृतकों के शवों को बरामद कर लिया गया है। जबकि अभी भी काफी संख्या में लोग लापता हैं। उत्तराखंड पुलिस द्वारा शनिवार को जारी किये गए एक बयान में कहा गया है कि जो लोग इस आपदा में मारे गए थे, उनमें से 40 लोगों की पहचान कर ली गई है। इसके अलावा लगभग 30 विभिन्न मानव अंगों को भी बरामद किया गया था। जिनकी पहचान स्थापित करने के लिए फॉरेंसिक जांच की जा रही है। अकेले जोशीमठ पुलिस स्टेशन में ही इस आकस्मिक बाढ़ के हवाले से 205 लापता लोगों की शिकायतें दर्ज की गई हैं।

इस आकस्मिक बाढ़ ने ऋषिगंगा नदी के ऊपरी प्रवाह पर निर्मित एक विद्युत् संयंत्र को पूरी तरफ से तहस-नहस करने के बाद धौलीगंगा नदी पर निर्मित नेशनल थर्मल पॉवर कारपोरेशन (एनटीपीसी) के तपोवन विष्णुगाड़ जलविद्युत पॉवर प्लांट को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया है। भले ही हिमनद विस्फोट से उत्पन्न आकस्मिक से भारी बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा थी, लेकिन क्या इसके परिणामस्वरूप होने वाली मानव त्रासदी को रोकना संभव था?

नदियों की पारिस्थितिकी मामलों के विशेषज्ञ मनोज मिश्र, जो कि दिल्ली स्थित यमुना जिए अभियान के प्रमुख हैं, का इस बारे में कहना है “यह मानव त्रासदी निश्चित तौर पर मानव निर्मित थी। यदि अतीत में जाकर तलाश करें तो हिमनद विस्फोट को भी मानव निर्मित कहा जा सकता है, क्योंकि यह एक जलवायु परिवर्तन से प्रेरित घटना है। वहां पूर्व-चेतावनी जैसी व्यवस्था का सर्वथा अभाव था, जो यदि होता तो इस आपदा को टाला जा सकता था। निश्चित तौर पर इस आकस्मिक भीषण बाढ़ के ऋषि गंगा संयंत्र को अपनी चपेट में लेने और फिर डाउनस्ट्रीम पर बने एनटीपीसी के संयंत्र के बीच में एक समय का अंतराल था। यदि नदी के ऊपरी जलप्रवाह में पूर्व-चेतावनी व्यवस्था मौजूद होती तो कम से कम डाउनस्ट्रीम में मौजूद एनटीपीसी संयंत्र में से कई जिंदगियों को बचाया जा सकता था।”

नंदादेवी ग्लेशियर से निकलने वाली ऋषि गंगा नदी, चमोली जिले के रैनी गाँव के पास धौलीगंगा में समाहित होती है। ये दोनों नदियाँ अलकनंदा नदी की अपस्ट्रीम सहायक नदियाँ हैं जो अंततः गंगा में मिल जाती हैं। बांधों, नदियों और लोगों पर दक्षिण एशिया नेटवर्क के संयोजक हिमांशु ठाकुर के अनुसार “दोनों संयंत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी के स्तर को लेकर संदेह है। एनटीपीसी की साईट से श्रमिकों को सुरक्षित निकाल लेने का उनके पास पर्याप्त समय था। इसके अलावा, इन बिजली संयंत्रों के निर्माण का कार्य अर्ध-हिमनद प्रभाव क्षेत्र में किया गया है, जो कि किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए था।”

वास्तव में वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ कमेटी को उत्तराखंड में मौजूद 24 जल-विद्युत संयंत्रों के प्रभाव की जाँच का काम सौंपा गया था, जिसने सिर्फ एक संयंत्र को छोड़ बाकी सभी को बंद किये जाने की अनुशंसा की थी। यह इस विचार पर आधारित था कि जिस प्रकार से “मलबे के निस्तारण में लापरवाही” बरती जा रही है उसमें अप्रत्याशित हिमनदीय गतिविधियों अथवा विस्फोटों के कारण संभावित आपदा की भयावहता में तीव्र वृद्धि संभव है। इस बीच यह तथ्य प्रकाश में आया है कि एनटीपीसी कथित तौर पर अपने जलविद्युत संयंत्र में अनुचित तरीके से अपशिष्ट पदार्थों के निपटान में जुटा हुआ था। 

संयोगवश, पिछले हफ्ते ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की प्रमुख बेंच ने उत्तराखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिसंबर 2020 में एनटीपीसी पर “मलबा निपटान स्थल रख-रखाव” में निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन करने पर 58 लाख रूपये का जुर्माना लगाया था, को माफ़ किये जाने की याचिका को ख़ारिज कर दिया है। 

कुल पाँच मलबा निपटान स्थलों में से दो पर निर्धारित मानदंडों के अनुरूप कार्य संचालन नहीं किया जा रहा था। इसके बावजूद भुगतान करने और सुधारात्मक उपायों को अपनाने के बजाय एनटीपीसी ने ट्रिब्यूनल से जुर्माना हटाए जाने की अपील की थी।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने आदेश में इस बात का उल्लेख किया था “...मलबे के ढेर के ढलाव को लगभग 60 [डिग्री] पाया गया, जो कि निर्धारित मानकों की तुलना में खतरनाक रूप से दोगुना है। अपस्ट्रीम की तरफ के मलबे के ढेर से पानी के प्रवेश करने की स्थिति बनती है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर मिट्टी कटाव में तेजी आ सकती है। ऐसी अस्थिर परिस्थितियों में, जैसा कि अपेक्षित था, देखने में आया है कि इस प्रकार के मलबे के ढेर के कारण डाउनस्ट्रीम में बड़े पैमाने पर कटाव के चलते बेहद गहरी घाटी का गठन होने लगता है।” 

हालाँकि एनटीपीसी अधिकारियों ने इन मलबे के ढेरों से आकस्मिक बाढ़ के दुष्प्रभावी परिणामों की संभावनाओं से इंकार किया है। 

एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड़ संयंत्र के परियोजना प्रभारी एवं महाप्रबंधक, आर.पी. अहिरवार ने न्यूज़क्लिक को बताया “ये डंप यार्ड नदी किनारे के बजाय दूरी पर स्थित हैं। हमारे पास इन जगहों पर मलबा निस्तारण की वैध अनुमति हासिल है। हमारी सभी तैयारियां होने के बावजूद आकस्मिक बाढ़ ने अचानक से हमला कर दिया था, और हमारे पस प्रतिक्रिया और श्रमिकों को वहां से निकाल पाने का समय ही नहीं मिल पाया। इस सबके बावजूद हमने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है। इस त्वरित कार्यवाही का ही नतीजा था कि हम एक सुरंग के भीतर फंसे 12 लोगों को बचाकर निकाल पाने में कामयाब रहे।” 

विशेषज्ञों का यह भी कहना था कि जब कभी नदियों पर, विशेषकर उत्तराखंड के पहाड़ी भू-भाग में बड़े पैमाने पर अंधाधुंध वाणिज्यिक या आवासीय निर्माण गतिविधियाँ बढ़ने लगती हैं तो आकस्मिक बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाता है। जून 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी जैसी आपदा की पुनरावृत्ति से बचने के लिए एनजीटी ने उत्तराखंड में सरकारी संस्थाओं को कई आवश्यक दिशानिर्देश जारी किये हुए थे।

इसके अतिरिक्त भारत के पास नदियों के मोर्चे पर और बाढ़ क्षेत्रों पर विकासात्मक कार्यों को नियमबद्ध करने के लिए आवश्यक रिवर रेगुलेशन जोन (आरआजेड) दिशानिर्देश मौजूद नहीं हैं। पर्यावरण मामलों के वकील संजय उपाध्याय का इस बारे में कहना था “पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील किसी भी क्षेत्र को चिन्हित करने और फिर ठीक उसी दौरान उस क्षेत्र में कानूनों को लागू करने के लिए ठोस कार्यवाई करने में विफलता की समस्या देश में एक बड़ी बीमारी के हिस्से के तौर पर बनी हुई है।”  

2019 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) यह आरोप लगाते हुए दाखिल की गई थी कि ऋषि गंगा जलविद्युत संयंत्र के कार्यस्थल पर कुछ ऐसी कारगुजारियां चल रही थीं जिनसे नदियों की पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो रहा था। आरोप लगाए गए थे कि परियोजना स्थल पर नदी की सतह पर पत्थरों और चट्टानों को तोड़ने और उनमें छेद करने जैसी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा था। जनहित याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि नदी के किनारे ट्रकों की आवाजाही हो रही थी और नदी में मलबे के ढेर को फेंका जा रहा था।

ऋषि गंगा परियोजना को दिल्ली स्थित कुंदन ग्रुप ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की कार्यवाही के बाद 2018 के अंत में कंपनी को दिवाला और दिवालियेपन के लिए संदर्भित किये जाने के बाद हस्तगत कर लिया था। परियोजना स्थल पर पर्यावरणीय उल्लंघन का जो आरोप पीआईएल में लगाया गया था, वह अभी भी विचाराधीन है, जबकि संयंत्र का पूरी तरह से सफाया हो चुका है।

न्यूज़क्लिक की तरफ से पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में कुंदन ग्रुप के प्रवक्ता का कहना था: “ये आरोप गलत हैं। यह परियोजना 2011 में शुरू हुई थी। एक कमेटी ने इसे सत्यापित किया था और संगठन द्वारा किसी भी प्रकार के पर्यावरणीय उल्लंघन को नहीं पाया था। सभी सुरक्षा उपायों को अपनाया गया था। हालाँकि आपदा की भयावहता इतनी विनाशकारी थी कि ग्लेशियर विस्फोट के 10 से 15 सेकंड के भीतर ही परियोजना स्थल पर इसके प्रभाव को देखा जा सकता था।”

हालाँकि आकस्मिक बाढ़ के कारण जिंदगियों और आजीविका के नुकसान की कहानी का एक पक्ष अपनी जगह पर तो है ही, लेकिन इसके साथ ही साथ दोनों निर्माणाधीन जल-विद्युत संयंत्रों की संपत्तियों को भी भारी नुकसान हुआ है। केन्द्रीय उर्जा मंत्री राजकुमार सिंह, जिन्होंने आकस्मिक बाढ़ के एक दिन बाद ही अधिकारियों की एक टीम के साथ उत्तराखंड का दौरा किया था। उनका कहना था कि इस दुर्घटना से अकेले एनटीपीसी संयंत्र को 1,500 करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है। हालाँकि एक गहन जांच के बाद ही इस बात को तय किया जा सकता है कि इस मानव त्रासदी के लिए  यदि कोई  जलविद्युत संयंत्रों द्वारा पर्यावरणीय मानदंडों के उल्लंघन और लापरवाही जिम्मेदार थी। 

चमोली की जिलाधिकारी स्वाति भदौरिया ने न्यूज़क्लिक को बताया “अभी तक किसी जाँच के आदेश नहीं दिए गए हैं। फिलहाल हमारा सारा ध्यान राहत, बचाव, पुनर्निर्माण और बहाली जैसी गतिविधियों पर केन्द्रित है। हमारी तात्कालिक प्राथमिकता उन लोगों तक भोजन आपूर्ति और दवा पहुंचाने की बनी हुई थी, जो लोग उन गाँवों में फंसे हुए थे जिनका संपर्क बाढ़ के बाद बाकी के राज्य से खत्म हो गया था। और इस लक्ष्य को हम हासिल कर पाने में सफल रहे हैं।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Uttarakhand Flash Floods: Another Disaster Waiting to Happen?

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