NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
उत्तराखंड चुनाव : जंगली जानवरों से मुश्किल में किसान, सरकार से भारी नाराज़गी
पूरे राज्य के किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी, बढ़ती खेती लागत के साथ ही पहाड़ों में जंगली जानवरों का प्रकोप और लगातार बंजर होती खेती की ज़मीन जैसे तमाम मुद्दे लिए अहम हैं, जिन्हें इस सरकार ने संबोधित करने का प्रयास नहीं किया है।  
मुकुंद झा
11 Feb 2022
Uttarakhand

उत्तराखंड राज्य के विधानसभा चुनावों के बीच प्रदेश भर के किसान अपना दर्द लिए बैठे हैं। प्रदेश भर में किसान अपनी मांगों को लेकर मुखर हैं और अपने प्रतिनिधियों से सवाल कर रहे हैं, लेकिन शायद ही कोई प्रतिनिधि है जो उनके सवालों का उचित जवाब दे सके। केंद्र की सरकार और राज्य की सरकार दोनों ने ही किसानों से 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का वादा किया था। दोनों ही जगह भारतीय जनता पार्टी का शासन है लेकिन चुनावी सभा या प्रचार में उनके नेता इस बात का ज़िक्र तक नहीं कर रहे हैं।

पूरे राज्य के किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी, बढ़ती खेती लागत के साथ ही पहाड़ों में जंगली जानवरों का प्रकोप और लगातार बंजर होती खेती की ज़मीन जैसे तमाम मुद्दे अहम हैं, जिन्हें इस सरकार ने संबोधित करने का प्रयास नहीं किया है।  

न्यूज़क्लिक की चुनावी टीम ने राज्य के कई इलाके उधमसिंह नगर, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, चमोली, रुद्रप्रयाग पौड़ी, टिहरी के साथ ही देहरादून सहित कई इलाकों का दौरा किया और वहां के लोगों से उनके मुद्दों को समझने का प्रयास किया। हमने सभी इलाकों में किसानों को परेशान ही देखा हालाँकि मैदानी किसानों के हालात पहाड़ी किसानो से भिन्न ज़रूर थे परन्तु वो भी सरकार की गलत नीतियों से बुरी तरह प्रभावित दिखे।  

जंगली जानवर का भय

अगर हम पहाड़ में किसानों के हालात देखें तो उन्हें अपने खेतों की सिंचाई से लेकर बाकि सुविधाओं के लिए प्रकृति पर निर्भर रहना पड़ता है। हाल ही में जिस तरह से पहाड़ो पर जंगली जानवर आक्रामक हुए हैं उससे किसानो की फसल को तो नुकसान हुआ ही है साथ ही ये उनके पशुधन के लिए खतरा बन गया है।  

रूद्रप्रयाग विधान सभा के जखोली इलाके के डंगवाल गाँव के 45 वर्षीय हेमंत सिंह रावत अपनी बकरियों को हाथ में एक तेज़ धार वाली हँसिया नुमे हथियार को साथ लेकर चरा रहे थे। हमने उनसे पूछा कि आप इस तरह से क्यों घूमते हैं तो उन्होंने बताया कि अपनी और अपने पशु की सुरक्षा के लिए आजकल हर ग्रामीण रखता है क्योंकि पता नही कब कोई जंगली जानवर, तेंदुआ, जंगली सूअर या अन्य कोई जानवर हमला कर दे।

एक अन्य 22 वर्षीय नौजवान प्रदीप सिंह भी बकरी चरा रहे थे उन्होंने बताया कि पहले हमने बंदर और भालुओं के डर से खेती छोड़ी और अब लग रहा है हमें अपना पशुपालन भी छोड़ना पड़ेगा उन्होंने कहा- पिछले चार-पांच सालों में जंगली जानवरों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है जबकि सरकार ने इनके नियंत्रण के लिए कुछ भी नहीं किया है।  

टिहरी जिले के माला अप्पू गांव की 80 वर्षीय हेमा देवी ने बताया कि उन्होंने कुछ दिन पहले ही आठ किलो आलू बोया था, जिसे बंदरों ने पूरा खोद दिया। जब हम उनसे बात कर ही रहे थे उसी वक्त वहां बंदरों के एक झुंड आ गया जो उनकी फसल को खराब करने लगा।

ये भी पढ़ें: बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन

हेमा देवी ने कहा बन्दरों ने हमारा जीना हराम कर दिया है अब वो खेतों से हमारे घरो तक आ गए हैं। हम अपने घर में भी कुछ खाने को रखते हैं वो उसे भी लेकर भाग जाते हैं।

इसी तरह चमोली जिले के थराली विधानसभा के किसानों ने भी बताया कि भालू उनकी पूरी-पूरी फसलें बर्बाद कर दे रहे हैं।  

किसानो ने कहा सरकार इनके रोक के लिए तो कुछ नहीं कर रही है बल्कि शहरों से बंदरों को पकड़-पकड़ के गांव के पास जंगलों में छोड़ जा रही है।

हेमंत ने बताया, "पहले हमारे इलाके में कोई भी तेंदुआ आदि नहीं था परन्तु अब कुछ सालों से इनकी संख्या अचानक बढ़ गई है।" उन्होंने बताया कि वे लोग बकरी को पालते हैं और उसे बड़ा करके बेचते हैं जो उनकी आय का एक स्रोत होता है, परन्तु महीने दो महीने में उनकी बकरियों को तेंदुआ पकड़ कर ले जाता है। एक बकरी जाने का मतलब है आपकी कई महीनों की आमदनी का चले जाना।

उत्पाद का उचित बाज़ार न होना

चमोली जिले के मिंग गांव के किसान जगबीर सिंह ने कहा कि हमारे इस जिले में नारंगी यानि संतरे और माल्टा की अच्छी पैदावार होती है लेकिन उसका उचित बाज़ार न होने के कारण वो सड़ गलकर बर्बाद हो जाती हैं। उन्होंने कहा सरकारों ने किसानों को लेकर कभी कोई सार्थक नीति नहीं बनाई जो बनाई जानी चाहिए थी।

उन्होंने कहा ये पहाड़ी क्षेत्र है इनकी अपनी समस्याएं है। मेहनत ज़्यादा है और फसल कम होती है और जो होता भी है उसका दाम नहीं मिलता। इसलिए लोगों ने यहाँ अब खेती करना ही छोड़ दिया है।  

इसी तरह पहाड़ों में कई तरह की सब्जी और दाल उगाने वाले किसान भी हैं वे भी अपने उचित दाम के लिए भटकते हैं। इस पूरे इलाके में किसानो ने एक उचित विपणन व्यवस्था के भाव की बात कही जिसे किसी भी सरकार ने संबोधित करने का प्रयास नहीं किया। 

गढ़वाल क्षेत्र के नगला गांव के किसान योगेश भट्ट ने कहा कि हमें पानी की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है। क्योंकि हमारे पास सिंचाई का कोई कृत्रिम यानी मानव निर्मित साधन नही है। हमें प्राकृतिक वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अगर बारिश होती है तो हम कुछ फसल उगा पाते हैं वरना सब वीरान ही रहता है।  

ये सिर्फ भट्ट की ही नहीं बल्कि पूरे पहाड़ की समस्या है क्योंकि यहाँ मैदानी इलाकों की तरह पंपिंग सैट लगा नहीं सकते इसलिए इनके लिए सिंचाई एक गंभीर समस्या बनी हुई है।  

ये बेहद चिंताजनक है जिस राज्य से कई नदियों का उद्गम हो उस राज्य के किसान पानी के अभाव में रहें। ये साफतौर पर दिखता है कि किसी भी सरकार ने किसानों और उनकी समस्या को प्राथमिकता नही दी है। 

चमोली जिले के महिपाल सिंह रावत ने कहा, "ये सरकार लोगों को दो-दो हज़ार देकर बेवकूफ बना रही है जबकि दूसरी तरफ वो खाद से लेकर डीज़ल तक महंगा करके किसानों से कई गुना वसूल रहे हैं।  

किसानी से दूर होते किसान 

पहाड़ों में किसानों की नई पीढ़ी किसानी से दूर जा रही है। वो लगातार शहरों में पलायन कर रही है। लोगों के किसानी छोड़ने पर हेमा देवी कहती हैं छोड़ेंगे नहीं तो क्या करेंगे भूखे मरेंगे? क्योंकि खेती में अब फायदा नही है। इससे घर भी नही चल सकता है। 

दूसरा पहाड़ों में किसानों के पास खेती की ज़मीन भी बहुत कम है। इसलिए बहुत से किसान सरकारी योजनाओं का लाभ नही ले पाते हैं। इसके मुकाबले मैदानी इलाकों में किसानों की खेती बढ़ी है। उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल जाता है। यहां किसानों के पास अधिकतम कृषि भूमि दो हेक्टेअर क्षेत्र में है। उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र के किसानों की तुलना में ये बेहद कम है।

यही वजह है कि राज्य गठन के बाद से अब तक बड़ी संख्या में किसानों ने पलायन किया है।

राज्य गठन के बाद के 22 वर्षों में कृषि भूमि का क्षेत्रफल करीब 15 फीसदी घटा है। राज्य गठन के वक्त उत्तराखंड में कृषि का क्षेत्रफल 7.70 लाख हेक्टेयर था, जो अब 6.98 लाख हेक्टेयर पर रह गया है। यानी पिछले 18 सालों में 72 हज़ार हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर में तब्दील हुई है। ये सारी वजहें किसानों को खेती से दूर कर रही हैं।

किसान आंदोलन का व्यापक असर मैदानी इलाकों में 

किसानों के सवाल पर राष्ट्रीय किसान नेता अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव विजू कृष्णन जो लंबे से उत्तराखंड के किसानों के बीच आते रहे हैं और उनके आंदोलनों का एक हिस्सा रहे हैं, उन्होंने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा कि उत्तराखंड और पूरे देश में किसानों के विकास को लेकर एक नीति की आवश्यकता है। उनकी फसलों के उचित दाम देने की ज़रूरत है जैसे केरल में वामपंथी सरकार वहां के किसानों की सब्ज़ियों पर भी लाभकारी मूल्य देती है। इसी तरह देशभर में किसानो को उनकी फसलों का वाज़िब दाम मिलना चाहिए।  

सितारगंज से नौजवान किसान हरप्रीत सिंह जो दिल्ली बॉर्डर पर चले किसान आंदोलन का भी हिस्सा रहे थे, उन्होंने कहा कि इस पूरे क्षेत्र में एमएसपी एक बड़ा सवाल है इसे लेकर हमने दिल्ली की सीमाओं पर एक साल तक संघर्ष किया जिसके बाद सरकार ने इसकी गारंटी सुनिश्चित करने के लिए एक कमेटी बनाने का वादा किया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। दूसरा इस इलाके में अनाज मंडी की समुचित व्यवस्था नहीं है। यहां किसी भी तरह की कोई खरीद नहीं होती किसानो को अपनी फसल मंडी के बाहर ही बेचनी पड़ती है।  

इसके अलावा उन्होंने बताया कि उनके तराई बैल्ट में बड़ी संख्या में किसान गन्ना बोते हैं लेकिन मिल मालिक उन्हें कई-कई सालों तक भुगतान नहीं करते हैं।

विजू ने चुनाव को लेकर कहा कि पूरे प्रदेश में किसान आंदोलन के बाद से वर्तमान सरकार चला रही बीजेपी के खिलाफ भारी गुस्सा है। क्योंकि आंदोलन में सरकार के अड़ियल रवैये के कारण 700 किसानों की मौत हुई है। किसान ये सब याद करते हुए ही मतदान करेगा। 

हमने भी जब दौरा किया तो किसानों में सरकार को लेकर एक रोष तो दिखा लेकिन सवाल वही की क्या ये रोष मतदान के रूप दिखेगा या नहीं!

ये भी पढ़ें: उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल

UTTARAKHAND
Uttarakhand Election 2022
wild animals
kisan
farmers
agricultural crises
Hill districts

Related Stories

यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान

जनादेश—2022: वोटों में क्यों नहीं ट्रांसलेट हो पाया जनता का गुस्सा

उत्तराखंड में भाजपा को पूर्ण बहुमत के बीच कुछ ज़रूरी सवाल

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल

यूपी चुनाव: आजीविका के संकट के बीच, निषाद इस बार किस पार्टी पर भरोसा जताएंगे?

यूपी चुनाव : किसानों ने कहा- आय दोगुनी क्या होती, लागत तक नहीं निकल पा रही

2022 में महिला मतदाताओं के पास है सत्ता की चाबी

क्या हैं उत्तराखंड के असली मुद्दे? क्या इस बार बदलेगी उत्तराखंड की राजनीति?

यूपी चुनाव दूसरा चरण: अल्पसंख्यकों का दमन, किसानी व कारोबार की तबाही और बेरोज़गारी हैं प्रमुख मुद्दे

"रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के अभाव में पहाड़ से पलायन जारी"


बाकी खबरें

  • Gauri Lankesh pansare
    डॉ मेघा पानसरे
    वे दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी या गौरी लंकेश को ख़ामोश नहीं कर सकते
    17 Feb 2022
    दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी को चाहे गोलियों से मार दिया गया हो, मगर उनके शब्द और उनके विचारों को कभी ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
  • union budget
    टिकेंदर सिंह पंवार
    5,000 कस्बों और शहरों की समस्याओं का समाधान करने में केंद्रीय बजट फेल
    17 Feb 2022
    केंद्र सरकार लोगों को राहत देने की बजाय शहरीकरण के पिछले मॉडल को ही जारी रखना चाहती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर 30 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 541 मरीज़ों की मौत
    17 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 30,757 नए मामले सामने आए है | देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 27 लाख 54 हज़ार 315 हो गयी है।
  • yogi
    एम.ओबैद
    यूपी चुनावः बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा करने वाली BJP का, 5 साल का रिपोर्ट कार्ड कुछ और ही कहता है
    17 Feb 2022
    "पूरे देश में सबसे ज्यादा महंगी बिजली उत्तर प्रदेश की है। पिछले महीने मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) ने 50 प्रतिशत बिजली बिल कम करने का वादा किया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया। ये बीजेपी के चुनावी वादे…
  • punjab
    रवि कौशल
    पंजाब चुनाव : पुलवामा के बाद भारत-पाक व्यापार के ठप हो जाने के संकट से जूझ रहे सीमावर्ती शहर  
    17 Feb 2022
    स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ व्यापार के ठप पड़ जाने से अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन जैसे उन शहरों में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हो गयी है, जहां पहले हज़ारों कामगार,बतौर ट्रक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License