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टीकाकरण: साथ डूबेंगे या साथ उबरेंगे, पर धनी देश क्या वाकई यह समझेंगे
"हम में से कोई भी तब तक सुरक्षित नहीं होगा, जब तक कि सब सुरक्षित नहीं होंगे।"
प्रबीर पुरकायस्थ
09 Feb 2021
टीकाकरण

ऐसा लगता है कि दुनिया सिर के बल खड़ी हो गयी है। तभी तो निर्विवाद रूप से वैश्विक पूंजी की आवाज मानी जाने वाली संस्थाओं ने कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए देशों के बीच ‘सहयोग’ की जरूरत और ‘सार्वभौम टीकाकरण’ की बातें करना शुरू कर दी है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपनी ताजातरीन रिपोर्ट में कहा है कि विश्व अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट से उबरने के लिए जरूरी है कि ‘मजबूत बहुपक्षीय सहयोग’ हो और ‘सब की सामर्थ्य की कीमतों पर टीकों का सार्वभौम वितरण’ हो। इंटरनेशनल चैम्बर ऑफा कॉमर्स ने, जो घोषित रूप से बड़े कारोबार की आवाज है, एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें यह कहा गया है कि यह तो खुद धनी देशों के अपने हित में है कि अमीर देश जो टीका हड़पने में लगे हुए हैं, उसके बजाए अपने से गरीब देशों के साथ बांटकर टीकों का उपयोग करें।

आइए, पहले हम उन आंकड़ों पर नजर डाल लें, जो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा इंटरनेशनल चैम्बर ऑफ कॉमर्स ने पेश किए हैं। अंतर्राष्ट्रीय  मुद्रा कोष ने, 2021 के जनवरी के महीने में वल्र्ड इकॉनमिक आउटलुक का जो अपडेट जारी किया है, वह बताता है कि 2021 के उत्तराद्र्घ में विश्व जीडीपी, 3.5 फीसद की अपनी गिरावट से उबर जाएगा और 2019 के जीडीपी के मुकाबले 2 फीसद की मामूली वृद्घि दर्ज कराएगा। विश्व जीडीपी को ऊपर उठाने का काम मुख्यत: उदीयमान बाजारों में तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बहाली ही करेगी, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं यानी अमीर देशों के क्लब में बहाली काफी धीमी ही रहने जा रही है।

ट्रम्प प्रशासन ने, टीका बांटकर लेने के मामले में, स्वार्थपरता ही अच्छी होने का दर्शन ही पेश किया था। यह प्रशासन टीका बांटकर इस्तेमाल करने की तुलना, विमान के दबाव-रक्षित वातावरण में ऑक्सीजन मास्क लगाने से करता था--‘पहले अपनी मदद करें, उसके बाद ही दूसरों की मदद करें।’ बहरहाल, आइसीसी का कहना है कि ‘पहले मैं, पहले मैं’ की ऐसी नीति के नतीजे में अमीर देशों को 203 अरब डालर से 500 अरब डालर तक का नुकसान हो सकता है! वैश्विक अर्थव्यवस्था, आयात तथा निर्यात दोनों के लिए ही आपूर्ति शृंखलाओं के जरिए, आपस में एक-दूसरे से बंधी हुई है। उक्त संभावित नुकसान का एक छोटा सा अंश--कुल 38 अरब डालर--खर्च करने से ही, सबके लिए टीके  की खरीद, कोल्ड चेन तथा टीका लगाने के खर्च की भरपाई करने में मदद करने के लिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन के एसीटी ऐसिलेटर कार्यक्रम की पूरी की पूरी लागत की भरपाई की जा सकती है।

आइसीसी का कहना है, ‘ध्यनाकर्षक है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की ओर से 27.2 अरब अमरीकी डालर का निवेश--एसीटी एसिलरेटर तथा उसके टीका स्तंभ, कोवैक्स का पूरी तरह से पूंजीकरण करने के लिए, फंडिंग में इस समय इतनी ही कमी रहती है--यह निवेश से 166 गुना तक लाभ दे सकता है।’ सीधे-सादे तरीके से कहें तो यह कहा जा रहा है कि अगर अमीर देश विश्व स्तर पर सार्वभौम टीकाकरण के लिए मदद देते हैं तो उससे पूूंजी पर सबसे ज्यादा कमाई हासिल होगी। हमारी जानकारी में दूसरी कोई भी चीज नहीं है, जिसमें निवेश से 166 गुनी कमाई हो सकती है!

आइसीसी का मॉडल इस सरल से पूर्वाधार से शुरू करता है कि कोई भी देश, अपने आप में अकेला द्वीप नहीं होता है। देश, अपने आयातों तथा निर्यातों, दोनों के जरिए, एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। उन्हें अपने उद्योगों तथा अपनी जनता के लिए दूसरों के कच्चे माल, आद्र्घ-तैयार माल तथा तैयार मालों की जरूरत होती है। और अपना विकास करने के लिए ऐसे ही मालों का दूसरों को निर्यात करने की भी जरूरत होती है। अलग-अलग देशों में इन मालों का अनुपात अलग-अलग तो होता है, लेकिन कोई चाहे विकसित अर्थव्यवस्था हो या विकासशील, सभी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। इस पूर्वाधार से शुरू कर, आइसीसी का आलेख दिखाता है:

‘...टीके को वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कराने का सिर्फ नैतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्व है। इससे यह साबित होता है कि वैश्विक टीकाकरण के हमें अभाव की बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। विडंबना यह है कि इस कीमत का एक उल्लेखनीय हिस्सा विकसित देशों पर इसके बावजूद पड़ेगा कि वे 2021 की गर्मियों तक अपने ज्यादातर नागरिकों का टीकाकरण कर चुके हो सकते हैं। इसकी वजह यह है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं, अपने गैर-टीकाकृत व्यापार सहयोगी के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी होंगी। महामारी के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशक, डा. टेड्रोस घेब्रेयेसस और योरपीय कमीशन के अध्यक्ष, डा. उर्सुला वॉन डर लेयन ने यह माना है कि ‘‘हम में से कोई भी तब तक सुरक्षित नहीं होगा, जब तक कि सब सुरक्षित नहीं होंगे।’’ हमारे नतीजे, इस तर्क का अर्थव्यवस्थाओं तक विस्तार करने पर हम यह समझ पाएंगे कि कोई भी अर्थव्यवस्था तब तक पूरी तरह से बहाली नहीं कर सकती है, जब तक कि सभी अर्थव्यवस्थाएं बहाली नहीं करती हैं।

बेशक, ये कठोर शब्द हैं  जिनके लिए ट्रम्प प्रशासन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और उसके निर्देशक को तरह-तरह की गालियां सुनायी थीं। लेकिन अब तो खुद बड़ी पूंजी के क्लब, आइसीसी द्वारा वही बात कह रही है। और सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य के संबंध में सत्य के रूप में ही नहीं यह बात काही जा रही है, बल्कि ठोस आर्थिक सत्य के रूप में भी  यह कही जा रही है। यह बात विचित्र लग सकती है, लेकिन पूंजीवाद के लिए जाग्रत स्वार्थ का रास्ता वही है, जो कि परोपकार का रास्ता है!

दूसरी ओर, टीकों के वितरण के मोर्चे पर तस्वीर निराशाजनक बनी हुई है और ज्यादातर देशों पर टीका-राष्ट्रवाद हावी है। हम पहले भी यह दर्ज कर चुके हैं कि टीकों की आपूर्ति का परिदृश्य कितना ज्यादा असंतुलित है। यहां दिए जा रहे ताजा आंकड़े, ड्यूक्स ग्लोबल हैल्थ इंस्टीट्यूट की वैबसाइट से लिए गए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, दुनिया की पूरी आबादी का टीकाकरण तो 2024 तक भी नहीं हो पाएगा, फिर 2021 के आखिर तक की तो बात ही कहां उठती है। जबकि वैश्विक आर्थिक बहाली इसी की मांग करती है। जब हम एक-एक देश की स्थिति लेते हैं, तो ये आंकड़े और भी असंतुलित नजर आते हैं। अमरीका, यूके तथा योरपीय यूनियन ने हरेक संभावना का सामना करने के लिए, अपनी जरूरत से दो से तीन गुना तक टीके खरीद लिए हैं।

दूसरी ओर, शुरू में आयी रिपोर्टों के विपरीत,भारत के पास टीकों का आंकड़ा, उसकी जरूरत के एक छोटे से हिस्सा भर के बराबर है और वह उन देशों में भी नहीं है जिन्होंने कोई बहुत लंबे-चौड़े अग्रिम आर्डर दे रखे हों। ड्यूक ग्लोबल हैल्थ इंस्टीट्यूट के डैशबोर्ड पर प्रदर्शित आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 11 करोड़ 65 लाख खुराकों के ही आर्डर दिए हैं और इसमें से 10 करोड़ टीका खुराकें गामालेया के टीके, स्पूतनिक वी की होनी हैं। लेकिन, स्पूतनिक-वी को अब तक भारत के दवा नियंत्रक, सीडीएससीओ से मंजूरी नहीं मिली है। इस तरह, इकलौते पक्के आर्डर करीब 1 करोड़ 10 लाख खुराक के सीरम इंस्टीट्यूट को ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के टीके के लिए दिए गए हैं और 55 लाख टीका खुराकों के लिए, भारत बायोटैक को उसके टीके कोवैक्सिन के लिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का प्लेटफार्म कोवैक्स, जो निजी परोपकारार्थ फंडों की मदद से शुरू किया गया है, वह कहां तक पहुंचा है? इसने 2021 तक 2 अरब टीका खुराकें हासिल करने और करीब 1 अरब लोगों को टीका देने (जो विकासशील देशों की लक्ष्य आबादी का पांचवां हिस्सा होता है) का लक्ष्य बनाया है। लेकिन, इस विनम्र लक्ष्य को लेकर भी कोवैक्स प्लेटफार्म अपने लक्ष्य के करीब 50 फीसद तक ही पहुंच पाया है और उसके पास फंड की बहुत भारी कमी है क्योंकि धनी देशों का पूरा ध्यान अपनी जरूरत से दो-तीन गुने टीके हथियाने पर ही है।

पूंजीवादी सिद्घांतकार इतने लंबे अर्से से संपन्नता के रास्ते के तौर पर, स्वार्थपरता का गुणगान करते रहे हैं। नतीजा यह कि धनी देशों में इसे एक आर्थिक सत्य की तरह स्थापित किया जा चुका है कि स्वार्थपरता संपन्नता की कुंजी है। महामारी से बचाव के टीकों को साझा करने की तो बात ही छोड़ दें, इन देशों में दक्षिणपंथ के खासे बड़े हिस्से तो स्वार्थपरता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता मानने के विकृत नजरिए से, मास्क पहनने तक का विरोध करते आए हैं। इसलिए, गरीबों के लाभ के लिए अपनी जेबें ढीली करना तो, भले ही उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए कितना ही जरूरी हो, लेकिन उनके लिए यह किसी डरावने समाजवाद की ही दुहाई है। शीत युद्घ के दौर के अमरीका के एक पुराने नारे का सहारा लेें तो उनके हिसाब से तो, ‘लाल हो जाने से तो मर जाना ही अच्छा है।’

महामारी हो या वैश्विक पर्यावरण विनाश, विश्व पूंजीवाद के अस्तित्व मात्र के लिए खतरा नजर आने पर ही, उस बात का सच दुनिया को दिखाई देता है, जो वामपंथ बहुत पहले से कहता आ रहा था। बरबादी से बचाव का रास्ता एक ही है, हम या तो मिलकर फल-फूल सकते हैं या फिर एक प्रजाति के रूप में खत्म हो सकते हैं। सत्रहवीं सदी के कवि, जॉन डोन की प्रसिद्घ पंक्तियां हैं: ‘कोई भी व्यक्ति एकाकी द्वीप नहीं होता है; हर कोई महाद्वीप का अंश है, मुख्य भाग का हिस्सा है...इसलिए, यह कभी मत पता करो कि मृत्यु का घंटा किस के लिए बजता है; वो तुम्हारे लिए ही बजता है।’  

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