NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों में असहमति का मूल्य
बेंच के फ़ैसलों में किसी जज की असहमति क़ानून के विकास के दरवाज़े खोलती है
राज शेखर, रमीज़ रज़ा
29 Sep 2020
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों में असहमति का मूल्य
Credit: Burden, Source: Unsplash

न्यायपालिका में असहमति का लोकतंत्र में असहमति से पारस्परिक संबंध होता है। ख़ासकर सामान्य विधि (कॉमन लॉ) वाले देश में ऐसा होता है। राज शेखर और मोहम्मद रमीज रज़ा "न्यायिक फ़ैसलों में असहमति दिखाने" के चलन के कम होने और इस प्रक्रिया के "एक तेजतर्रार न्याय व्यवस्था में न्यायापालिका की भूमिका" पर प्रभाव के बारे में लिख रहे हैं। 

किसी फ़ैसले में लेखक की जरूरत क्यों होती है?

एक इंटरव्यू में पूर्व मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने "बेनाम" अयोध्या फ़ैसले के सवाल पर जवाब में यह प्रश्न उठाया था। इस टिप्पणी से कानून जगत में काफ़ी हलचल हुई। कुछ लोगों ने गोगोई का पक्ष लिया था, वहीं दूसरे लोगों ने इस तरह के फैसले को सामान्य विधि व्यवस्था (कॉमन लॉ सिस्टम) की आत्मा के खिलाफ़ बताया। भारत में इसी व्यवस्था का पालन किया जाता है। लेकिन एक बेहद निर्णायक और राजनीतिक तौर पर अतिसंवेदनशील फ़ैसले से शुरू हुआ चलन, अब न्यायपालिका में फ़ैसले देने के दौरान आम चलन बन गया है।

हाल में प्रशांत भूषण अवमानना मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने "बेनाम" (पर क्यूरियअम) फ़ैसला दिया, मतलब जजों की राय को नहीं बताया। इसने बौद्धिक लोगों को "कोर्ट द्वारा फ़ैसले" के मुद्दे पर सोचने को मजबूर कर दिया। इस व्यवस्था में कोर्ट एक "संस्थान" के तौर पर फ़ैसला देता है, ना कि "जजों की बेंच" द्वारा फ़ैसला दिया जाता है। इसमें किसी फ़ैसले कोर्ट द्वारा एक ताकतवर नज़रिया पेश किया जाता है और फ़ैसले में असहमति का कोई विचार नहीं होता।

यह सही बात है कि असहमति का किसी मामले के नतीज़े पर कोई असर नहीं पड़ता, फिर भी इस असहमति का प्रभाव दूरतलक हो सकता है, यहां तक कि इतना गहरा कि असहमति जताने वाले जज ने भी इसका अनुमान नहीं लगाया होता। यह संभव है कि असहमति वाले नज़रिए से किसी विषय पर मौजूदा न्यायशास्त्र को चुनौती मिल जाए और एक दूसरे प्रगतिशील न्यायशास्त्र के विकास की नींव पड़ जाए।

...एक पारंपरिक तरीके को भुलाया जाना, जिसमें फ़ैसले से असहमति को हटाया जा रहा है, यह एक ऐसी चीज है जिसका भार इस वक़्त न्यायपालिका नहीं उठा सकती।

इसलिए असहमति, कानून के विकास का एक अहम औजार है।

कई बार किसी फ़ैसले में असहमति या किसी जज का बहुमत से अलग नज़रिया, अगले मामले में बहुमत बन जाता है। उदाहरण के लिए, "ए के गोपालन बनाम् मद्रास राज्य" में जस्टिस फजल अली के असहमति वाले नज़रिए को "मेनका गांधी बनाम् भारत संघ" वाले मामले में बहुमत द्वारा अपना लिया गया। पिछले मामले में दिए गए फ़ैसले को पलट दिया गया और फजल अली की असहमति से एक ऐसी प्रक्रिया को अपनाया गया जो निश्चित तौर पर "निष्पक्ष, न्यायसंगत और तार्किक" होनी चाहिए।

हाल में "के एस पुट्टास्वामी बनाम् भारत संघ" में जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ का अलग नज़रिए भी इसी चीज का उदाहरण है। इस मामले में आधार कानून को संविधान की शक्ति से बाहर का कानून करार दिया गया था। असहमति वाले नज़रिए रखने वाले बहुत सारे ऐसे उदाहरण हैं, जिनका भारतीय न्याय व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ा है।

एक माने गए नियम के मुताबिक़, सामान्य विधि व्यवस्था वाले देशों के संवैधानिक कोर्ट में हर जज अपना अलग-अलग फ़ैसला (सेरिटिम जजमेंट) लिखता है। इसका मतलब हुआ कि हर बेंच का हर जज अपने फ़ैसले के लिए अपना तर्क और कानून को लागू करने की विधि बताता है। इसके बाद परीक्षणकर्ता हर तार्किकता का परीक्षण करते हैं और उस आधार को बताते हैं, जिस पर सवार होकर फ़ैसले में अंतिम नतीज़े पर पहुंचा गया।

इसलिए सिविल लॉ (नागरिक विधि) का पालन करने वाले देशों के उलट, सामान्य विधि का पालन करने वाले देशों का कानून के विकास में ज्यादा योगदान होता है।

इन फ़ैसलों से ज़्यादा व्यापक स्तर का नज़रिया मिलता है। कम मजबूती से ही सही, लेकिन इन फ़ैसलों में उस पहलू का भी पता चलता है, जो हमें असहमति शामिल ना करने वाले फ़ैसलों से नहीं मिल सकता।

अगर प्रक्रियागत् बदलावों की बात करें, तो सामान्य विधि की परंपराओं से हटकर, फ़ैसलों में व्यक्तिगत जजों की राय को ना बताना और कोर्ट का एक संस्थान के तौर पर फ़ैसला सुनाना, कोर्ट की रूढ़ीवादी प्रवृत्ति दर्शाता है। फिर भी भारत के राजनीतिक माहौल और ऐतिहासिक न्यायिक फ़ैसलों को देखते हुए यह कदम घालमेल भरा नज़र आता है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, समय के इस बिंदु पर भारतीय न्याय व्यवस्था फ़ैसलों में असहमति को दर्ज करने की परंपरा को छोड़ने का खामियाज़ा नहीं उठा सकती।

एक साथ फ़ैसले सुनाने का चलन संविधान के अनुच्छेद 145 (5) का उल्लंघन भी है। इस प्रावधान के ज़रिए किसी जज को शक्ति दी जाती है कि अगर वो बहुमत के फ़ैसले से इत्तेफ़ाक नहीं रखता, तो वह अपना अलग नजरिया या फ़ैसला सुना सकता है। अलग फ़ैसले को सुनाने का निर्णय पूरी तरह जज के विवेक पर है, लेकिन अगर कोर्ट का एक ही फ़ैसला देने का मौजूदा चलन चलता रहा, तो उस असहमति के अधिकार के लिए कोई जगह ही नहीं बचेगी।

हमें यह समझने की जरूरत है कि नागरिक विधि में जज केवल एक अच्छा क्लर्क होता है।

उसके सामने एक तथ्यात्मक स्थिति रखी जाती है, जिनके जवाब, केवल कुछ विशेष मामलों को छोड़कर, विधायी प्रक्रियाओं में पहले से ही तय है। प्रोफेसर जॉन एच मेरीमैन के मुताबिक़, इस व्यवस्था में जज का काम सिर्फ़ सही विधायी प्रावधान को खोजना है, जो स्थिति से मेल खाता हो। फिर इससे जो समाधान निकलता हो, उसे सुना देना है, आमतौर पर इस तरह के मेल से यह सामाधान खुद-ब-खुद सामने आते हैं।

न्यायपालिका के नज़रिए में इस परिवर्तन पर असहमति को दबाने के आधार पर सवाल उठाए जा सकते हैं। असहमति को इस तरह से दबाने से निष्पक्ष न्यायिक निर्णय प्रक्रिया पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।

लेकिन जब भारत जैसे सामान्य विधि का पालन करने वाले देश की बात होती है, तो चीजें काफ़ी अलग हो जाती हैं। यहां जज महज़ एक अधिकारी या सरकारी नौकर नहीं है। प्रोफेसर रोजर पेरोट के शब्दों में भारत के जज की भूमिका को समझा जा सकता है। वह कहते हैं, "जज के पास एक तार्किक, कई बार अनापेक्षित कीमत पर रेडीमेड कपड़े (विधायी कानून) में दर्जी की तरह कांट-छांट करने की ताकत होती है। इस चीज से समझा जा सकता है कि न्यायिक प्रशासन के पास कानूनों के कायाकल्प की ताकत भी होती है।" इसलिए नागरिक विधि का पालन करने वाले देशों के उलट, सामान्य विधि वाले देशों में जज का काम ज्यादा विस्तृत फलक पर फैला हुआ है, उन्हें ना सिर्फ कानून के प्रावधानों को बनाए रखना है, बल्कि उनके विकास में भी योगदान देना है।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि बहुमत से कानून का आधार तय होता है, लेकिन असहमति से इसके विकास का रास्ता तय होता है।

न्यायापालिका के पास बेनाम फ़ैसले देने के नए चलन वजहें हो सकती हैं। लेकिन इसे लोकतंत्र की आत्मा के प्रति अपने कर्तव्य का वहन करते हुए खुद को पारदर्शी भी दिखाने की जरूरत है। न्यायपालिका के नज़रिए में इस परिवर्तन पर असहमति को दबाने के आधार पर सवाल उठाए जा सकते हैं। असहमति को इस तरह से दबाने से निष्पक्ष न्यायिक निर्णय प्रक्रिया पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।

हम आशा करते हैं कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए न्यायिक फ़ैसलों में जज के नाम को दर्शाने और असहमति दिखाने के सवाल पर नया चलन सिर्फ तात्कालिक हो। इसे सामान्य बनाने की कोई मंशा ना हो।

"जब इतिहास दिखाता है कि कोर्ट का कोई एक फ़ैसला बेहद भयावह गलती साबित हुई, तो पीछे मुड़कर यह देखना अच्छा लगता है कि कम से कम कुछ जजों ने ख़तरों को साफ़ देखा था और अपनी आवाज उठाई थी, यह आवाज उनकी चिंताओं को बुलंद करती है।"

- जस्टिस एंटोनिन स्कालिया

यह लेख मूलत: द लीफ़लेट पर प्रकाशित किया गया था।

राज शेखर नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ के छात्र हैं। 

रमीज रज़ा फ़ैकल्टी ऑफ़ लॉ, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ इंडिया के छात्र हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

अंग्रेज़ी में प्रकाशिक मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

The Value of Dissent in Supreme Court Judgments

Indian Judicial System
CJI
Supreme Court of India
ranjan gogoi

Related Stories

क्यों मोदी का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे शर्मनाक दौर है

भारतीय अंग्रेज़ी, क़ानूनी अंग्रेज़ी और क़ानूनी भारतीय अंग्रेज़ी

न्याय वितरण प्रणाली का ‘भारतीयकरण’

सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंचों की ज़रूरत पर एक नज़रिया

क्या सीजेआई हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की पहल कर सकते हैं?

अमीश देवगन मामले में सुप्रीम कोर्ट का अजीब-ओ-ग़रीब फ़ैसला: अनगिनत सवाल

क्या सूचना का अधिकार क़ानून सूचना को गुमराह करने का क़ानून  बन जाएगा?

क्या कॉलेजियम सिस्टम भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित कर पाएगा?


बाकी खबरें

  • मेनका गांधी
    भाषा
    मेनका गांधी की कथित अपमानजनक टिप्पणी के ख़िलाफ़ पशु चिकित्सकों ने किया प्रदर्शन
    24 Jun 2021
    एसोसिएशन ने मांग की कि भाजपा सांसद अपनी टिप्पणी वापस लें और सार्वजनिक तौर पर काफी मांगे। शर्मा ने कहा कि कोविड-19 के संकट के दौरान देश भर में 150 से अधिक पशु चिकित्सक और एक हजार से अधिक पैरा मेडिक्स…
  • CNN न्यूज़ 18 ने बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा की ख़बर में कई साल पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल किया
    प्रियंका झा
    CNN न्यूज़ 18 ने बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा की ख़बर में कई साल पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल किया
    24 Jun 2021
    मालूम चला कि ये तस्वीर 2018 की है और आसनसोल में रामनवमी के समय भड़की हिंसा की है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने इस तस्वीर का क्रेडिट PTI को दिया है और लिखा है, “रानीगंज के बर्धमान में रामनवमी के जुलूस के…
  • दो-बच्चों की नीति राजनीतिक रूप से प्रेरित, असली मक़सद मतदाताओं का ध्रुवीकरण
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    दो-बच्चों की नीति राजनीतिक रूप से प्रेरित, असली मक़सद मतदाताओं का ध्रुवीकरण
    24 Jun 2021
    दरअसल दक्षिणपंथ की ओर से इस नीति की वकालत करने वालों का निहित संदेश यही है कि हिंदुओं के मुक़ाबले मुसलमानों के ज़्यादा बच्चे हैं और सरकार ने दो से ज़्यादा बच्चों वाले परिवारों को दंडित करके साहस…
  • ईएमएस स्मृति 2021 और केरल में वाम विकल्प का मूल्यांकन
    अज़हर मोईदीन
    ईएमएस स्मृति 2021 और केरल में वाम विकल्प का मूल्यांकन
    24 Jun 2021
    इस वर्ष के पैनल ने इस बात की तरफ़ इशारा किया कि केरल की वर्तमान एलडीएफ़ सरकार अगले पांच वर्षों में कैसे आगे बढ़ने की योजना बना रही है, जिसमें सार्वजनिक शिक्षा और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था, जन-योजना और…
  • CPM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्य प्रदेश रेत खनन पर माकपा ने कहा शिवराज सरकार रेत माफियों की है
    24 Jun 2021
    मंगलवार को सरकार ने रेत व्यपारियों को राहत देने का ऐलान किया। जिसमें रेत व्यपारियों को चार माह की रोयल्टी का 50 फीसद माफ करने और बाकी का 50 फीसद अगले साल जमा करने का  निर्णय किया गया है। जिसका अब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License