NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
महिलाओं पर हिंसा : कब बदलेगा पितृसत्ता का चरित्र
आज यानी 25 नवंबर,  इंटरनेशनल डे फ़ॉर द एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमेन है। यानी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस। इस बार की थीम है- "ऑरेंज द वर्ल्ड: जनरेशन इक्वलिटी स्टैंड्स अगेंस्ट रेप"।
डॉ. राजू पाण्डेय
25 Nov 2019
violence against women
फोटो साभार : coe.int

डोमिनिकन रिपब्लिक के तानाशाह राफेल ट्रजिलो ने 25 नवंबर 1960 को अपने अत्याचारी शासन के विरुद्ध बहादुरी से आवाज़ बुलंद करने वाली तीन बहनों पेट्रिया, मारिया और एंटोनिया- जिन्हें मिराबल बहनों के नाम से जाना जाता है- को नृशंसतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया था। 1981 से नारी अधिकारों के लिए कार्य करने वाले एक्टिविस्टों द्वारा इन वीर महिलाओं की शहादत की स्मृति में इस दिन हर प्रकार के नारी उत्पीड़न का विरोध प्रारंभ किया गया। यूएन जनरल असेम्बली द्वारा 17 दिसंबर 1999 को निर्णय लिया गया कि 25 नवंबर, इंटरनेशनल डे फ़ॉर द एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमेन के रूप में मनाया जाएगा।

25 नवंबर 2000 से एक निश्चित थीम के आधार पर यह दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2019 की थीम- ऑरेंज द वर्ल्ड: जनरेशन इक्वलिटी स्टैंड्स अगेंस्ट रेप- रखी गई है।

यूएन जनरल असेंबली द्वारा 1993 में पारित डिक्लेरेशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमेन में नारियों पर हिंसा को परिभाषित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि इसके अंतर्गत "जेंडर आधारित हिंसा का कोई भी ऐसा कृत्य जिसके परिणाम स्वरूप नारी को शारीरिक, यौनिक या मनोवैज्ञानिक क्षति अथवा पीड़ा पहुंचे या पहुंचने की संभावना हो" सम्मिलित होगा।

नारियों पर हिंसा की परिभाषा में अंतरंग साथी की हिंसा (बार बार प्रहार कर चोट पहुंचाना, मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना, मैरिटल रेप, हत्या) यौन हिंसा एवं यौन प्रताड़ना (बलात्कार, जबरन की गई सेक्सुअल एक्टिविटी, चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज,जबरन विवाह, सड़कों पर अभद्रता करना और सताना तथा पीछा करना,साइबर उत्पीड़न), मानव तस्करी(दासता और यौन उत्पीड़न), जननांगों को क्षति पहुंचाना और बाल विवाह सम्मिलित किए गए हैं।

नारियों पर होने वाली हिंसा के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। दुनिया की हर तीसरी महिला शारीरिक या यौन हिंसा की शिकार होती है। यह हिंसा प्रायः उसके निकट संबंधी और अंतरंग साथियों द्वारा ही की जाती है।

विवाहित महिलाओं में से केवल 52 प्रतिशत महिलाओं को अपनी इच्छा से यौन संबंध बनाने,गर्भनिरोधकों का प्रयोग करने तथा स्वास्थ्य रक्षा के उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है। प्रायः उन्हें अपने पुरुष साथी की मर्जी के अनुसार चलना पड़ता है।

आज दुनिया में ऐसी 75 करोड़ महिलाएं और युवतियां हैं जिनका विवाह 18 वर्ष से कम आयु में कर दिया गया है। जबकि 20 करोड़ महिलाओं को नारी जननांगों को क्षति पहुंचाने वाले कृत्यों का सामना करना पड़ा है।

वर्ष 2017 में जिन महिलाओं की हत्या की गई उनमें हर दूसरी महिला के हत्यारे उसके साथी या परिवार जन ही थे। जबकि पुरुषों के लिए यह औसत बीस पुरुषों में एक पुरुष था। विश्व में 35 प्रतिशत महिलाओं को अपने अंतरंग साथी की शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। जबकि अपने साथी के अतिरिक्त बाहरी व्यक्तियों की यौन हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या  सात प्रतिशत है।
विश्व भर में महिलाओं की हत्या के मामलों में से 38 प्रतिशत इंटिमेट पार्टनर वायलेंस के मामले होते हैं। मानव तस्करी का शिकार होने वाले लोगों में 71 प्रतिशत महिलाएं हैं। मानव तस्करी की शिकार हर चार महिलाओं में से तीन यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं में विकलांगता और मृत्यु की जितनी घटनाएं कैंसर के कारण  होती हैं, उतनी ही या उससे अधिक यौन हिंसा के कारण होती हैं।

द नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 30 प्रतिशत महिलाओं को शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है जबकि इसी आयु वर्ग की 6 प्रतिशत महिलाओं को अपने जीवन में कम से कम एक बार यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है। इकतीस प्रतिशत विवाहित महिलाएं अपने जीवनसाथी की शारीरिक हिंसा या मानसिक यातना अथवा यौन प्रताड़ना का शिकार हुई हैं।लाइवमिंट का एक अध्ययन बताता है कि यौन हिंसा के 99 प्रतिशत मामलों की रिपोर्ट नहीं होती। बिहार, उत्तरप्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में जो स्त्री शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हैं, केवल आधा प्रतिशत यौन हिंसा के मामलों की रिपोर्ट हो पाती है।  हमारे देश में प्रति एक लाख जनसंख्या पर रिपोर्ट किए जाने वाले बलात्कार के मामलों की संख्या 6.3 है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी  क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट 2016 के अनुसार महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की संख्या 2007 में 185312 थी जो 2016 में 83 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 338954 हो गई। 2016 में नारियों के साथ होने वाले मामलों में कन्विक्शन रेट 18.9 था जो पिछले दशक की न्यूनतम दर है। 2015 में बलात्कार की रिपोर्ट की गई घटनाओं की संख्या 34651 थी जो 2016 में बढ़कर 38947 हो गई, इन मामलों में 36859 मामलों में बलात्कारी व्यक्ति बलात्कार पीड़िता का परिचित ही था।

क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट 2016 के अनुसार रेप की शिकार जीवित महिलाओं में से 43.2 प्रतिशत की आयु 18 वर्ष से कम है।भारत में सर्वाधिक मामले घरेलू हिंसा के होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का 2013 का एक अध्ययन यह बताता है कि समूचे दक्षिण पूर्वी एशिया में नारियों पर घरेलू हिंसा की दर विश्व के अन्य भागों की तुलना में बहुत अधिक है।

भारत मानवाधिकारों से जुड़े लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हस्ताक्षरकर्त्ता है जिनमें नारी अधिकारों और उनके साथ होने वाले भेदभाव एवं अत्याचारों को रोकने के बड़े स्पष्ट प्रावधान हैं। इसमें कन्वेंशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ आल फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वीमेन जैसे समझौते सम्मिलित हैं।

नारियों के साथ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। डावरी प्रोहिबिशन एक्ट 1961, इंडिसेंट रिप्रजेंटेशन ऑफ वीमेन प्रोहिबिशन एक्ट 1986, चाइल्ड लेबर प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन एक्ट 1986, प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सिलेक्शन एक्ट 1994, प्रोटेक्शन ऑफ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005, प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट 2006, इनफार्मेशन एंड टेक्नोलॉजी एक्ट 2008, द प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट 2012, क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट 2013- सेक्सुअल हैरेससेमेंट ऑफ वीमेन (प्रोटेक्शन, प्रीवेंशन एंड रिड्रेसल) एक्ट 2013, चाइल्ड लेबर प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन एक्ट 2016, क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट (डेथ पेनाल्टी फ़ॉर रेपिंग ए माइनर) 2018 जैसे कितने ही कानूनों की मौजूदगी के बावजूद नारियों के साथ होने वाली हिंसा के मामले न केवल बढ़े हैं बल्कि इस हिंसा का स्वरूप और भयानक हुआ है।

लैंगिक हिंसा के कारणों की पड़ताल इस समस्या के जटिल स्वरूप को उजागर करती है। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अर्थोपार्जन का केंद्र होता है और नारी अपनी आजीविका के लिए पुरुष पर निर्भर होती है। यह निर्भरता न केवल नारी के दमन और शोषण का कारण बनती है बल्कि नारी को अपने साथ हो रहे हिंसा एवं अत्याचार को चुपचाप सहन करने हेतु विवश भी करती है। किन्तु पितृसत्ता का वर्चस्व केवल आर्थिक जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि उसका प्रसार धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में भी देखा जा सकता  है जहाँ पुरुष धार्मिक कर्मकांडों और सांस्कृतिक परंपराओं में नेतृत्व करता दिखता है और नारी गौण अथवा सहायक भूमिका में होती है । कई बार वह मोक्ष प्राप्ति जैसे उच्चतर लक्ष्यों के लिए बाधक भी समझी जाती है।

पुरुषवादी वर्चस्व की मानसिकता नारी को जन्म के पूर्व से ही अंतहीन हिंसा के चक्र में धकेल देती है। संतान के रूप में लड़के की प्राप्ति की इच्छा कन्या भ्रूण की हत्या हेतु उत्तरदायी होती है। कन्या का जन्म होने पर उसे पराया धन और एक अवांछित उत्तरदायित्व समझा जाता है। उसके पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। कन्या को जन्म देने वाली माता पर अत्याचार किये जाते हैं।

कन्या जब युवा होती है तब उसे ज्ञात होता है कि रजोधर्म जैसी अपरिहार्य शारीरिक विशेषता के इर्दगिर्द वर्जनाओं का एक जाल बुना गया है जो उसे अनेक सामाजिक-धार्मिक अधिकारों से वंचित कर देता है। कई बार उसे अस्पृश्य भी समझा जाता है। मानसिक और शारीरिक हिंसा का यह दौर विवाह के बाद भी जारी रहता है, जहां न  यौन संबंध बनाने के विषय में उसकी इच्छा का सम्मान होता है न गर्भ निरोधकों के प्रयोग और गर्भधारण के बारे में उसकी मर्जी चलती है।

जब जब वह प्रतिरोध करती है तब तब यह मानसिक प्रताड़ना शारीरिक हिंसा में बदल जाती है। कभी आर्थिक स्वातंत्र्य की तलाश में तो कभी पुरुष की अकर्मण्यता और लालच के कारण नारी धन अर्जन के लिए बाहर निकलती है तो उसका सामना कार्य स्थल पर अपना आधिपत्य  जमाए बैठे पुरुषों से होता है। वे नारी की अनुभवहीनता और संकोच का लाभ उठाकर उसका शोषण प्रारंभ कर देते हैं। प्रायः कार्यस्थल की हिंसा का प्रारंभ डांट फटकार से होता है और अंत नारी के दैहिक समर्पण के बाद उसे दी जाने वाली कथित सहूलियतों के रूप में होता है।

मानसिक प्रताड़ना नारी के जीवन में इस तरह समाई हुई है कि वह निरंतर तनाव, तिरस्कार और अपमान झेलने को ही अपनी स्वाभाविक नियति मान लेती है, किंतु निरन्तर भय,असुरक्षा एवं दमन का उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है और वह अवसादग्रस्त होकर अनेक शारीरिक व्याधियों से भी ग्रस्त हो जाती है। जब वह मानसिक प्रताड़ना या शारीरिक हिंसा अथवा यौन उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाती है तो उसे ज्ञात होता है कि पुलिस, प्रशासन, न्याय प्रणाली और राजसत्ता का चरित्र भी पितृसत्तात्मक है जो उसे गलत सिद्ध कर पराजित करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है। न कानून उसके पक्ष में हैं न कानूनों को लागू करने वाले लोगों की मंशा उसे न्याय दिलाने की है। हमारे समाज में यह देखा जाता है कि बलात्कार पीड़िता को दुश्चरित्र ठहराने की होड़ सी लग जाती है। उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। यदि वह अविवाहित है तो उसके विवाह में कठिनाई होती है और यदि वह विवाहित है तो उसका पारिवारिक जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है।  

कठुआ, मुजफ्फरपुर और उन्नाव की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि  पितृसत्ता नारी को न्याय से वंचित करने के लिए क्या क्या कर सकती है और किस तरह अमानवीय रूप धारण कर सकती है। हमारी व्यवस्था  नारी को न्याय की मांग करने की जुर्रत करने की भयंकर सजा भी देती है। यह पितृसत्ता का रणनीतिक कौशल ही था कि धीरे धीरे इन प्रकरणों को सांप्रदायिक, जातीय और राजनीतिक रंग देकर पूरे विमर्श से नारी को ही गायब कर दिया गया। स्वयं नारियां सम्प्रदाय,जाति और दलीय राजनीति के आधार पर विभक्त होकर आपस में ही उलझ पड़ीं और इस प्रकार पीड़िताओं का पक्ष अपेक्षित प्रबलतापूर्वक नहीं रखा जा सका। यही स्थिति हम मी टू की मुहिम के संदर्भ में देखते हैं। पुरुषों द्वारा किए गए शारीरिक-मानसिक तथा यौन उत्पीड़न के विषय में जब कुछ पीड़िताएं मुखर हुईं तो उनके विरोध को अपेक्षित प्रतिसाद नारी समुदाय से नहीं मिल सका। बल्कि अनेक नारियां इनकी आलोचना करती नजर आईं।

मी टू अभियान में जिन पुरुषों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगे थे वे सभी अपने अपने क्षेत्र में नेतृत्वकारी स्थिति में हैं। इन पुरुषों का विरोध उस क्षेत्र विशेष में आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा रखने वाली स्त्रियों को अपने लिए घातक लगा होगा क्योंकि पूर्वानुभव यह बताते हैं कि भले ही किसी एक प्रकरण  में कोई नारी किसी प्रभावशाली व्यक्ति को उसके दुष्कर्मों की सजा दिलाने में कामयाब हो सकती है किंतु यदि उस नारी को पुरूष समाज द्वारा अपने हित के लिए घातक मानकर उसका अघोषित बहिष्कार कर दिया जाए तो उसे काम मिलना बंद हो जाएगा और उसका कैरियर भी चौपट हो सकता है।

नारियों पर होने वाली घरेलू हिंसा (चाहे वह दहेज प्रताड़ना हो या  लैंगिक भेदभाव) प्रायः घर की अन्य नारियों द्वारा ही की जाती है। यह पितृसत्ता के वर्चस्व की गहराई को प्रदर्शित करता है, जब नारी पुरुष की मानसिक दासता के कारण अपनी समानधर्मा और सहयोगिनी  नारियों पर अत्याचार करने लगती है और पुरुष उसे अपने हिंसक आधिपत्य की स्थापना का माध्यम बना देता है। राजनीति और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने वाली नारियां भी पुरुष सत्ता की मूल्य मीमांसा का अनुकरण करती देखी जाती हैं तथा नारियों पर होने वाली हिंसा के प्रति उनका रवैया कई बार बहुत असंवेदनशील होता है।

यदि सूक्ष्मतापूर्वक विचार करें तो हमारे सामाजिक ढांचे, शिक्षण प्रणाली, न्याय व्यवस्था और प्रशासन तंत्र सब पर पितृसत्तात्मक सोच की छाप स्पष्ट दिखती है। नारी को जन्म से लेकर मृत्यु तक इस पुरुषवादी व्यवस्था से अनुकूलन करना पड़ता है। भीरुता, आत्मसुरक्षा की प्रबल भावना, दासता कहे जाने की सीमा तक चरम समर्पण जैसे गुण जिन्हें नारी की मूल प्रवृत्ति कहा जाता है दरअसल हिंसक पुरुषवादी व्यवस्था के निरंतर आक्रमण की प्रतिक्रिया स्वरूप नारी द्वारा  अर्जित विशेषताएं हैं। हिंसा पितृसत्ता के चिंतन का मूल आधार है क्योंकि इसके माध्यम से वह नारी को अनुशासित करने का परपीड़क आनंद प्राप्त करती है।

बलात्कार जैसे कृत्य नारी पर आधिपत्य स्थापित करने की  आदिम पितृसत्तात्मक सोच की हिंसक अभिव्यक्तियां हैं और इनके लिए यौन परितुष्टि की भावना  से अधिक नारी को शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुंचा कर  उसे परास्त करने की विकृत सोच उत्तरदायी होती है। आज जब हम नारियों पर होने वाली हिंसा की चर्चा करते हैं तो हमारा जोर हिंसा की स्थूल अभिव्यक्तियों पर होता है किंतु हिंसात्मक सोच की बुनियाद पर खड़ी पुरुषवादी व्यवस्था में परिवर्तन लाने का मूलभूत मुद्दा अचर्चित रह जाता है।
 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

international day for the elimination of violence against women
Orange the World Generation Equality Stands Against Rape
violence against women
male dominant society
patriarchal society
Sexual Abuse of Women
The National Family Health Survey
dowry system
gender discrimination
gender inequality

Related Stories

एमपी ग़ज़ब है: अब दहेज ग़ैर क़ानूनी और वर्जित शब्द नहीं रह गया

सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर

आख़िर क्यों सिर्फ़ कन्यादान, क्यों नहीं कन्यामान?

ओलंपिक में महिला खिलाड़ी: वर्तमान और भविष्य की चुनौतियां

केरल सरकार ने दहेज निषेध नियमावली में किया बदलाव, ज़िले में तैनात किए ‘दहेज निषेध अधिकारी’

क्या दहेज प्रथा कभी खत्म हो पाएगी?

बोलती लड़कियां, अपने अधिकारों के लिए लड़ती औरतें पितृसत्ता वाली सोच के लोगों को क्यों चुभती हैं?

दुनिया की हर तीसरी महिला है हिंसा का शिकार : डबल्यूएचओ रिपोर्ट

महिला दिवस विशेष: क्या तुम जानते हो/ पुरुष से भिन्न/ एक स्त्री का एकांत

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: क़ाफ़िला ये चल पड़ा है, अब न रुकने पाएगा...


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License